गुरु चांडाल योग कैलकुलेटर (Guru Chandal Yog Calculator) में अपनी जन्म तिथि, जन्म समय और जन्म स्थान डालकर एक साथ पाँच परंपरागत योग जाँचें — गुरु चांडाल योग, सूर्य ग्रहण योग, चंद्र ग्रहण योग, अंगारक योग और श्रापित योग। ये सभी योग राहु या केतु के किसी ग्रह के साथ एक ही राशि में होने से बनते हैं। टूल हर योग के लिए बताता है कि वह बनता है या नहीं, किस भाव में बनता है, दोनों ग्रहों के बीच कितने अंश (डिग्री) का अंतर है और उसी के आधार पर योग प्रबल, मध्यम या हल्का है। साथ में कुंडली चार्ट और ग्रहों की तालिका भी मिलती है। grahan yog in kundli, angarak yog या shrapit dosh खोजने वालों के लिए यह एक ही जगह पूरी जाँच है।
गुरु चांडाल योग क्या है?
ज्योतिष की परंपरा में जब गुरु (बृहस्पति) और राहु कुंडली में एक ही राशि में बैठे हों, तो इसे गुरु चांडाल योग कहा जाता है। गुरु को ज्ञान, धर्म, गुरुजन, संस्कार और सद्बुद्धि का ग्रह माना जाता है, जबकि राहु को भ्रम, असंतोष, परंपरा तोड़ने और अचानक बदलाव का छाया ग्रह। मान्यता है कि राहु के साथ आने पर गुरु के शुभ गुणों पर छाया पड़ती है — व्यक्ति के निर्णय, आस्था या गुरुजनों से संबंधों में उलझन आ सकती है।
कुछ ज्योतिषी गुरु और केतु की युति को भी गुरु चांडाल योग में गिनते हैं, जबकि कई ज्योतिषी इसे अलग और कम कठिन मानते हैं — कुछ तो गुरु–केतु को आध्यात्मिक झुकाव का संकेत भी कहते हैं। इसलिए यह टूल गुरु–राहु को मुख्य योग के रूप में दिखाता है और गुरु–केतु को अलग से नोट के रूप में बताता है।
शास्त्रों के बारे में एक ईमानदार बात
गुरु चांडाल, अंगारक और श्रापित जैसे नाम बृहत् पाराशर होरा शास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों से कम और बाद की ज्योतिष परंपरा से ज़्यादा आए हैं। अलग-अलग ज्योतिषी इनके नियम अलग ढंग से लगाते हैं — कोई केवल युति देखता है, कोई दृष्टि भी गिनता है, कोई अंशों की दूरी को महत्व देता है। इसलिए इस टूल का परिणाम एक परंपरागत संकेत है, भविष्य का निर्णय नहीं।
यह कैलकुलेटर कौन-से 5 योग जाँचता है?
| योग | कब बनता है | टिप्पणी |
|---|---|---|
| गुरु चांडाल योग | गुरु और राहु एक ही राशि में | गुरु–केतु को कुछ ज्योतिषी गिनते हैं; टूल इसे अलग से नोट करता है |
| सूर्य ग्रहण योग | सूर्य राहु या केतु के साथ एक ही राशि में | सूर्य आत्मा, पिता और प्रतिष्ठा का कारक |
| चंद्र ग्रहण योग | चंद्रमा राहु या केतु के साथ एक ही राशि में | चंद्रमा मन और माता का कारक |
| अंगारक योग | मंगल और राहु एक ही राशि में | कुछ ज्योतिषी मंगल–केतु को भी गिनते हैं |
| श्रापित योग | शनि और राहु एक ही राशि में | इसे श्रापित दोष भी कहा जाता है |
सूर्य और चंद्रमा के साथ राहु या केतु की युति को मिलाकर बोलचाल में ग्रहण दोष या ग्रहण योग कहा जाता है, क्योंकि आकाश में सूर्य और चंद्र ग्रहण राहु–केतु बिंदुओं के पास ही होते हैं। अगर आप सूर्य–राहु युति को पितृ दोष के नज़रिए से देखना चाहते हैं, तो पितृ दोष कैलकुलेटर देखें।
यह कैलकुलेटर गणना कैसे करता है?
टूल आपकी जन्म तिथि, समय और स्थान से लाहिरी अयनांश (निरयन पद्धति) के अनुसार सभी ग्रहों, राहु–केतु और लग्न की स्थिति अंशों तक निकालता है। फिर हर योग के लिए:
- राशि से युति: देखा जाता है कि दोनों ग्रह एक ही राशि में हैं या नहीं। योग इसी आधार पर बनता या नहीं बनता है।
- भाव: लग्न से गिनकर बताया जाता है कि योग किस भाव में बन रहा है, क्योंकि परंपरा में भाव से तय होता है कि प्रभाव जीवन के किस क्षेत्र पर माना जाए।
- अंशों का अंतर: दोनों ग्रहों के बीच की दूरी डिग्री में दिखाई जाती है और उसी से योग की तीव्रता तय होती है।
- गुरु की स्थिति: अगर गुरु अपनी राशि (धनु या मीन) में है या उच्च (कर्क) में है, तो टूल यह नोट करता है, क्योंकि परंपरा में इससे गुरु चांडाल योग का प्रभाव कम माना जाता है।
भाव लग्न पर निर्भर है और लग्न लगभग हर दो घंटे में बदलता है, इसलिए जन्म समय जितना सही होगा, भाव उतना ही सही आएगा। योग बनेगा या नहीं, यह राशि पर टिका है, इसलिए वह समय की छोटी गलती से आम तौर पर नहीं बदलता — सिवाय चंद्रमा के, जो लगभग सवा दो दिन में राशि बदल देता है।
प्रबल, मध्यम या हल्का — अंशों से तीव्रता
एक ही राशि में बैठे दो ग्रह 1° की दूरी पर भी हो सकते हैं और 25° की दूरी पर भी। परंपरा में माना जाता है कि ग्रह जितने पास हों, युति उतनी गहरी होती है। टूल इसी आधार पर हर योग की तीव्रता दिखाता है:
| अंशों का अंतर | तीव्रता | क्या समझें |
|---|---|---|
| 5° या उससे कम | प्रबल | दोनों ग्रह बहुत पास हैं; परंपरा में प्रभाव अधिक माना जाता है |
| 5° से अधिक, 12° तक | मध्यम | युति स्पष्ट है, पर बहुत गहरी नहीं |
| 12° से अधिक | हल्का | एक ही राशि में हैं, पर दूरी काफ़ी है; कई ज्योतिषी इसे कमज़ोर मानते हैं |
उदाहरण: अगर गुरु मिथुन में 8° पर और राहु मिथुन में 21° पर हो, तो अंतर 13° है — योग बनता है, पर तीव्रता “हल्का” दिखेगी। अगर गुरु धनु या मीन में हो, तो साथ में यह नोट भी आएगा कि गुरु स्वराशि में है।
परिणाम कैसे पढ़ें
- हर योग की पंक्ति देखें: बनता है या नहीं, किस भाव में, कितने अंश का अंतर और तीव्रता।
- नोट पढ़ें: गुरु–केतु की युति या गुरु के स्वराशि/उच्च होने जैसे नोट परिणाम को संतुलित करते हैं।
- चार्ट देखें: उत्तर भारतीय शैली की कुंडली में देखें कि योग किस भाव में है और उस भाव में और कौन-से ग्रह हैं।
- पूरी कुंडली से मिलाएँ: किसी एक योग से निष्कर्ष न निकालें। पूरी तस्वीर के लिए मुफ़्त कुंडली और चल रही महादशा भी देखें।
हर योग का परंपरागत अर्थ
गुरु चांडाल योग
मान्यता है कि इससे शिक्षा, आस्था, गुरुजनों से संबंध या सही-गलत के निर्णय में उलझन आ सकती है। दूसरी ओर, कई ज्योतिषी कहते हैं कि यही योग व्यक्ति को परंपरा से हटकर सोचने वाला और नए विचारों वाला भी बना सकता है।
सूर्य और चंद्र ग्रहण योग
सूर्य के साथ राहु–केतु को आत्मविश्वास, पिता या प्रतिष्ठा से, और चंद्रमा के साथ राहु–केतु को मन की बेचैनी या भावनात्मक उतार-चढ़ाव से जोड़ा जाता है। ये परंपरागत व्याख्याएँ हैं; मन की परेशानी लंबी चले तो किसी विशेषज्ञ से बात करना ही सही रास्ता है।
अंगारक योग
मंगल ऊर्जा और साहस का ग्रह है। राहु के साथ इसे जल्दबाज़ी, क्रोध या जोखिम लेने की प्रवृत्ति से जोड़ा जाता है। यह मांगलिक दोष से अलग है — मांगलिक दोष मंगल के भाव से देखा जाता है, अंगारक योग राहु के साथ युति से।
श्रापित योग
शनि और राहु की युति को परंपरा में पूर्व कर्मों के भार से जोड़ा जाता है और कहा जाता है कि इससे काम में देरी और धैर्य की परीक्षा हो सकती है। यह साढ़ेसाती से अलग है, जो गोचर में चलने वाली अवधि है।
परंपरागत उपाय
नीचे दिए उपाय परंपरा में बताए जाते हैं। ये पूजा, सेवा और अनुशासन के सरल कर्म हैं — इन्हें श्रद्धा से करें, डर से नहीं:
- गुरु चांडाल योग: गुरुवार को भगवान विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप, अपने शिक्षकों और बड़ों का सम्मान, और चने की दाल, हल्दी, केले या पीले वस्त्र जैसी पीली वस्तुओं का दान।
- सूर्य/चंद्र ग्रहण योग: सुबह सूर्य को जल से अर्घ्य, और सोमवार को शिवलिंग पर जल चढ़ाकर “ॐ नमः शिवाय” का जप।
- अंगारक योग: मंगलवार को हनुमान जी की पूजा और हनुमान चालीसा का पाठ; क्रोध पर संयम का अभ्यास।
- श्रापित योग: शनिवार को शनि से जुड़ी सेवा — ज़रूरतमंदों, मज़दूरों और बुज़ुर्गों की मदद, तेल या काले तिल का दान, और ईमानदारी व धैर्य से अपना काम।
किसी महँगी पूजा की ज़रूरत नहीं। परंपरा में नियमित श्रद्धा, सेवा और अच्छे आचरण को ही सबसे बड़ा उपाय माना गया है।
मान्यता और तथ्य
- मान्यता: गुरु चांडाल योग हो तो व्यक्ति गलत रास्ते पर ही जाएगा। तथ्य: कुंडली के बाकी योग, ग्रहों का बल और दशा कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं। व्यक्ति के अपने कर्म और संस्कार सबसे बड़े हैं।
- मान्यता: ये सब योग प्राचीन शास्त्रों में लिखे हैं। तथ्य: इनके नाम और नियम मुख्यतः बाद की परंपरा से हैं, और ज्योतिषियों में इन पर मतभेद है।
- मान्यता: एक ही राशि में हों तो योग हमेशा बराबर प्रबल है। तथ्य: अंशों की दूरी से फ़र्क पड़ता है — 2° और 25° की युति एक जैसी नहीं मानी जाती।
- मान्यता: गुरु–केतु भी उतना ही कठिन है जितना गुरु–राहु। तथ्य: कुछ ज्योतिषी ही इसे गिनते हैं; कई इसे हल्का या आध्यात्मिक संकेत मानते हैं।
- मान्यता: राहु–केतु के सारे योग एक ही बात हैं। तथ्य: कालसर्प योग सभी ग्रहों के राहु–केतु के एक तरफ़ होने से बनता है, जबकि ये पाँच योग किसी एक ग्रह की युति से।
Guru Chandal Yog Calculator — in English
This free Guru Chandal Yog calculator checks five Rahu–Ketu yogas in your sidereal (Lahiri) birth chart by sign conjunction: Guru Chandal (Jupiter with Rahu, with Jupiter–Ketu noted separately), Surya Grahan yog (Sun with Rahu or Ketu), Chandra Grahan yog (Moon with Rahu or Ketu), Angarak yog (Mars with Rahu) and Shrapit yog (Saturn with Rahu). For each it shows the house and the degree gap, rated strong (within 5°), moderate (within 12°) or mild, and notes when Jupiter is in its own sign or exalted. A chart and planet table are included. These yogas come from later tradition and astrologers apply them differently. Switch to English at the top of the page for the full English version.
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
गुरु चांडाल योग क्या होता है?
जब कुंडली में गुरु (बृहस्पति) और राहु एक ही राशि में हों, तो परंपरा में इसे गुरु चांडाल योग कहा जाता है। मान्यता है कि राहु गुरु के ज्ञान और सद्बुद्धि वाले गुणों पर छाया डालता है।
guru chandal yog kaise pata kare?
ऊपर के कैलकुलेटर में जन्म तिथि, जन्म समय और जन्म स्थान डालें। टूल बताता है कि गुरु और राहु एक ही राशि में हैं या नहीं, किस भाव में और उनके बीच कितने अंश का अंतर है।
क्या गुरु और केतु की युति भी गुरु चांडाल योग है?
कुछ ज्योतिषी गुरु–केतु को भी गुरु चांडाल योग में गिनते हैं, जबकि कई इसे अलग और हल्का मानते हैं। यह टूल गुरु–केतु को अलग नोट के रूप में दिखाता है।
ग्रहण योग या ग्रहण दोष क्या है?
जब सूर्य या चंद्रमा राहु या केतु के साथ एक ही राशि में हों, तो इसे ग्रहण योग कहा जाता है — सूर्य के साथ सूर्य ग्रहण योग और चंद्रमा के साथ चंद्र ग्रहण योग। बोलचाल में इसे ग्रहण दोष भी कहते हैं।
अंगारक योग क्या है?
मंगल और राहु के एक ही राशि में होने को अंगारक योग कहा जाता है। कुछ ज्योतिषी मंगल–केतु की युति को भी इसमें गिनते हैं।
श्रापित दोष या श्रापित योग क्या है?
शनि और राहु के एक ही राशि में होने को श्रापित योग या श्रापित दोष कहा जाता है। परंपरा में इसे पूर्व कर्मों के भार और कामों में देरी से जोड़ा जाता है।
योग प्रबल, मध्यम या हल्का कैसे तय होता है?
टूल दोनों ग्रहों के बीच अंशों का अंतर देखता है — 5° तक प्रबल, 12° तक मध्यम और उससे अधिक दूरी पर हल्का। ग्रह जितने पास हों, युति उतनी गहरी मानी जाती है।
क्या गुरु स्वराशि या उच्च का हो तो गुरु चांडाल योग कम होता है?
हाँ, परंपरा में माना जाता है कि गुरु धनु या मीन (स्वराशि) में या कर्क (उच्च) में हो तो गुरु चांडाल योग का प्रभाव कम हो जाता है। टूल ऐसी स्थिति में यह नोट दिखाता है।
क्या ये योग शास्त्रों में लिखे हैं?
गुरु चांडाल, अंगारक और श्रापित जैसे नाम मुख्यतः बाद की ज्योतिष परंपरा से आए हैं, न कि बृहत् पाराशर होरा शास्त्र जैसे ग्रंथों से। ज्योतिषी इनके नियम अलग-अलग ढंग से लगाते हैं।
क्या जन्म समय ज़रूरी है?
योग बनता है या नहीं, यह राशि पर निर्भर है, पर योग किस भाव में है यह लग्न से तय होता है। लग्न जन्म समय पर निर्भर है, इसलिए सही समय डालना ज़रूरी है।
गुरु चांडाल योग के उपाय क्या हैं?
परंपरा में गुरुवार को विष्णु या बृहस्पति देव की पूजा, शिक्षकों और बड़ों का सम्मान, और चने की दाल, हल्दी या केले जैसी पीली वस्तुओं का दान बताया जाता है।
अंगारक योग का उपाय क्या है?
परंपरा में मंगलवार को हनुमान जी की पूजा और हनुमान चालीसा का पाठ बताया जाता है। साथ में क्रोध और जल्दबाज़ी पर संयम का अभ्यास भी उपयोगी माना जाता है।
ग्रहण योग और श्रापित योग के उपाय क्या हैं?
ग्रहण योग के लिए सूर्य को अर्घ्य और सोमवार को शिव पूजा, तथा श्रापित योग के लिए शनिवार को ज़रूरतमंदों और बुज़ुर्गों की सेवा व तेल या काले तिल का दान परंपरा में बताया जाता है।
गुरु चांडाल योग और कालसर्प योग में क्या अंतर है?
गुरु चांडाल योग केवल गुरु और राहु की युति से बनता है, जबकि कालसर्प योग तब माना जाता है जब सातों ग्रह राहु–केतु के बीच एक ही तरफ़ हों।
क्या गुरु चांडाल योग हमेशा बुरा होता है?
नहीं। कुंडली के बाकी योग, ग्रहों का बल और दशा कहीं ज़्यादा मायने रखते हैं। कई ज्योतिषी इसे परंपरा से हटकर सोचने की क्षमता का संकेत भी मानते हैं।