सीधे सामग्री पर जाएँ
रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
पसंदीदा
Ekadashi

अपरा एकादशी कब है? (Apara Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण, अचला और भद्रकाली एकादशी

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे अचला एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा की जाती है। “अपरा” का भाव है अपार, यानी जिसकी कोई सीमा न हो। परंपरा के अनुसार इस व्रत का पुण्य भी अपार माना गया है।

इस एकादशी की प्रसिद्ध कथा धर्मात्मा राजा महीध्वज की है, जिन्हें उनके छोटे भाई वज्रध्वज ने मारकर पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया था। अकाल मृत्यु के कारण राजा प्रेत बन गए। तब धौम्य ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य राजा को दिया और उन्हें प्रेत योनि से मुक्ति मिली।

इस लेख में आप अपरा एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, सामग्री सूची, मंत्र, व्रत के नियम, पंजाब की भद्रकाली एकादशी और ओडिशा की जलक्रीड़ा एकादशी से इसका संबंध, गर्मी में दान का महत्व और व्रत से जुड़ी आम भ्रांतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।

अपरा एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: अपरा एकादशी 2026 (13 मई) बीत चुकी है। अगली अपरा एकादशी मंगलवार, 1 जून 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 31 मई 2027 सुबह 10:02 बजे से 1 जून सुबह 9:39 बजे तक रहेगी, और पारण 2 जून 2027 की सुबह लगभग 5:24 से 8:10 बजे के बीच किया जा सकेगा।

अगली अपरा एकादशी

अपरा एकादशी 2027

1 जून 2027, मंगलवार 212 दिन बाकी

मास और पक्ष
ज्येष्ठ कृष्ण
एकादशी तिथि
31 मई 10:04 – 1 जून 09:41
पारण (व्रत खोलने का समय)
2 जून, 05:23 – 08:09
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202613 मई 2026, बुधवार12 मई 14:55 –
13 मई 13:32
14 मई, 05:31 – 08:13
20271 जून 2027, मंगलवार31 मई 10:04 –
1 जून 09:41
2 जून, 05:23 – 08:09
202820 मई 2028, शनिवार19 मई 10:13 –
20 मई 12:03
21 मई, 05:27 – 08:11
20297 जून 2029, गुरुवार7 जून 00:23 –
8 जून 02:45
8 जून, 13:43 – 16:30

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

अपने शहर की सही तारीख और पारण समय ऊपर की तालिका में देखें, क्योंकि समय स्थानीय सूर्योदय के अनुसार बदलता है। 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में व्रत एक ही दिन है। जिन वर्षों में दोनों की तारीख अलग होती है, तालिका में वह भी दिखाया जाता है।

एक बात ध्यान रखें: 2027 में द्वादशी तिथि पारण वाले दिन सुबह जल्दी समाप्त हो रही है, इसलिए पारण की खिड़की छोटी है। देर से उठने की आदत हो तो एक दिन पहले ही अलार्म लगा लें।

अपरा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

संस्कृत में “अपार” का अर्थ है जिसका पार न हो, यानी असीम। “अपरा” नाम इसी भाव से जुड़ा है। व्रत कथा में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह एकादशी अपार धन और पुण्य देने वाली है, और इसका व्रत करने वाला संसार में प्रसिद्ध होता है। इसलिए इसे “अपार पुण्य देने वाली एकादशी” कहा जाता है।

“अपार पुण्य” का अर्थ यह नहीं कि कोई गिनती या सौदा है। इसका भाव यह है कि सच्चे मन से किया गया छोटा-सा व्रत भी भगवान की कृपा से बहुत बड़ा फल देता है। जैसे समुद्र का किनारा दिखाई नहीं देता, वैसे ही भक्ति के फल की कोई सीमा नहीं मानी गई।

अपरा एकादशी के अन्य नाम

  • अचला एकादशी (Achala Ekadashi): कथा में श्रीकृष्ण इस एकादशी के दो नाम बताते हैं, अपरा और अचला। “अचल” का अर्थ है जो हिले नहीं, यानी स्थिर। मान्यता है कि इस व्रत का पुण्य अचल और स्थायी रहता है।
  • भद्रकाली एकादशी (Bhadrakali Ekadashi): पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में इसी तिथि को माँ भद्रकाली की पूजा होती है। सारस्वत ब्राह्मण समाज में यह बड़ा पर्व माना जाता है।
  • जलक्रीड़ा एकादशी (Jalakrida Ekadashi): ओडिशा में यही एकादशी पुरी के भगवान जगन्नाथ को समर्पित जलक्रीड़ा एकादशी के रूप में मनाई जाती है।
  • वैशाख वदी एकादशी: गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में अमांत पंचांग के कारण इसे वैशाख कृष्ण (वदी) एकादशी कहा जाता है।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में पूर्णिमांत पंचांग चलता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इसमें अपरा एकादशी ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में अमांत पंचांग चलता है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। वहाँ यही एकादशी वैशाख कृष्ण पक्ष में गिनी जाती है।

दोनों पंचांगों में नाम अलग है, पर दिन एक ही है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह व्रत प्रायः मई या जून में आता है। अपरा एकादशी से पहले वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी आती है और इसके बाद ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी।

अपरा एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

अपरा एकादशी को पापों का नाश करने वाली एकादशी माना जाता है। कथा में बताया गया है कि यह व्रत ब्रह्महत्या जैसे बड़े पाप, दूसरों की निंदा, झूठी गवाही, झूठ बोलना, कम तौलना, झूठे शास्त्र पढ़ना-लिखना और नकली ज्योतिषी या वैद्य बनकर लोगों को ठगने जैसे दोषों से भी मुक्ति दिला सकता है।

माहात्म्य में दो विशेष उदाहरण भी आते हैं। जो क्षत्रिय युद्ध से भाग जाए, और जो शिष्य अपने गुरु की निंदा करे, वे भी पश्चाताप के साथ यह व्रत करें तो उनके दोष दूर होते हैं। यानी यह एकादशी गलती करने वालों के लिए सुधार का द्वार खोलती है।

इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा का विधान है। त्रिविक्रम वामन अवतार का वह विराट रूप है, जिसने तीन पगों में तीनों लोक नाप लिए थे। कुछ स्थानों पर भक्त इस दिन वामन भगवान की पूजा भी करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

अपरा एकादशी की कथा का सबसे बड़ा संदेश करुणा है। धौम्य ऋषि का राजा महीध्वज से कोई रिश्ता नहीं था, फिर भी उन्होंने एक दुखी आत्मा के लिए स्वयं उपवास किया और अपना पुण्य उसे दे दिया। यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के कल्याण के लिए भी होती है।

दूसरा संदेश ईर्ष्या से जुड़ा है। वज्रध्वज की जलन ने उसे अपने ही भाई की हत्या तक पहुँचा दिया। यह एकादशी हमें अपने मन में छिपी ईर्ष्या, क्रोध और छल को पहचानने और उन्हें छोड़ने का अवसर देती है।

तीसरा संदेश सच्चाई का है। माहात्म्य में जिन दोषों का ज़िक्र है, उनमें से अधिकतर झूठ और धोखे से जुड़े हैं, जैसे झूठी गवाही, कम तौलना और नकली ज्ञान। इसलिए इस दिन केवल भोजन का नहीं, झूठ और छल का भी उपवास रखने की सलाह दी जाती है।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार अपरा एकादशी का माहात्म्य ब्रह्माण्ड पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है। इस्कॉन और स्वामीनारायण संप्रदाय की ग्रंथ-सामग्री भी इसी पुराण का नाम लेती है। सभी चौबीस एकादशियों के माहात्म्य की तरह यहाँ भी युधिष्ठिर प्रश्न पूछते हैं और श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं।

माहात्म्य में इस व्रत के फल की तुलना कई बड़े तीर्थों और दानों से की गई है। कार्तिक पूर्णिमा पर पुष्कर में स्नान, माघ में मकर संक्रांति पर प्रयाग स्नान, शिवरात्रि पर काशी में शिव पूजा, गया में पिंडदान, सिंह राशि में बृहस्पति होने पर गौतमी (गोदावरी) नदी में स्नान, केदारनाथ और बद्रीनाथ के दर्शन, सूर्य ग्रहण में कुरुक्षेत्र स्नान, और स्वर्ण व गौ दान। मान्यता है कि अपरा एकादशी का व्रत इन सबके बराबर पुण्य देता है।

कथा में इस व्रत के लिए चार सुंदर उपमाएँ भी दी गई हैं। यह व्रत पाप रूपी वृक्ष को काटने वाली कुल्हाड़ी है, पाप रूपी ईंधन को जलाने वाली अग्नि है, पाप रूपी अंधकार को मिटाने वाला सूर्य है और पाप रूपी हिरण के लिए सिंह के समान है।

अपरा एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर का प्रश्न

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रता से पूछा, “हे जनार्दन, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसकी कथा क्या है, उसका व्रत कैसे किया जाता है और उससे क्या फल मिलता है? कृपया मुझे विस्तार से बताइए।”

श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर बोले, “हे राजन, यह एकादशी अपरा और अचला, इन दो नामों से जानी जाती है। यह अपार धन और पुण्य देने वाली है। जो मनुष्य इसका व्रत करता है, वह संसार में यश पाता है। इस दिन भगवान त्रिविक्रम की पूजा की जाती है।” फिर भगवान ने इस व्रत की महिमा बताई और एक प्राचीन कथा सुनाई।

धर्मात्मा राजा महीध्वज

प्राचीन काल में महीध्वज नाम के एक राजा थे। वे बड़े धर्मात्मा, न्यायप्रिय और प्रजा का ध्यान रखने वाले थे। उनकी प्रजा सुखी थी और चारों ओर उनके यश की चर्चा होती थी।

राजा महीध्वज का एक छोटा भाई था, जिसका नाम वज्रध्वज था। वह अपने बड़े भाई से बिलकुल उलटा स्वभाव का था। वह क्रूर, अधर्मी और अन्यायी था। बड़े भाई का यश और प्रजा का प्रेम देखकर उसके मन में गहरी ईर्ष्या पलती रहती थी। वह हर समय राजा को रास्ते से हटाने के उपाय सोचता रहता था।

ईर्ष्या का भयानक परिणाम

एक रात अवसर पाकर वज्रध्वज ने अपने ही बड़े भाई महीध्वज की हत्या कर दी। अपने पाप को छिपाने के लिए वह राजा के शरीर को एक जंगल में ले गया और वहाँ एक पीपल के पेड़ के नीचे गाड़ दिया।

राजा महीध्वज की मृत्यु अचानक और अन्यायपूर्ण ढंग से हुई थी। शास्त्रों में ऐसी मृत्यु को अकाल मृत्यु कहा गया है। अकाल मृत्यु के कारण राजा की आत्मा को शांति नहीं मिली और वह प्रेत बनकर उसी पीपल के पेड़ पर रहने लगी।

पीपल के पेड़ पर प्रेतात्मा

प्रेत बने राजा उस पीपल के पेड़ पर बैठकर बहुत दुखी रहते थे। उनकी बेचैन आत्मा उस रास्ते से गुज़रने वाले लोगों को परेशान करने लगी। धीरे-धीरे लोग उस रास्ते से जाने में डरने लगे। जो राजा कभी प्रजा की रक्षा करते थे, वही अब अपने ही दुख में भटक रहे थे।

बहुत समय तक यही स्थिति रही। राजा की आत्मा मुक्ति के लिए तड़पती रही, पर उसे कोई रास्ता नहीं मिल रहा था।

धौम्य ऋषि का आगमन

एक दिन धौम्य नाम के एक महान ऋषि उसी रास्ते से जा रहे थे। उन्होंने पीपल के पेड़ पर उस प्रेतात्मा को देखा। ऋषि ने अपने ज्ञान-चक्षु और तपोबल से उस प्रेत के पूरे अतीत को जान लिया। उन्हें पता चल गया कि यह कोई साधारण प्रेत नहीं, बल्कि धर्मात्मा राजा महीध्वज हैं, जिनकी उनके भाई ने हत्या कर दी थी।

ऋषि ने प्रेत को पेड़ से नीचे उतारा। उन्होंने उसे शांत किया और परलोक की विद्या का उपदेश दिया, ताकि उसका मन स्थिर हो सके। राजा की दशा देखकर धौम्य ऋषि का हृदय करुणा से भर गया।

ऋषि का व्रत और पुण्य का दान

राजा को प्रेत योनि से मुक्त करने के लिए धौम्य ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखा। उन्होंने पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की, उपवास किया और भगवान का स्मरण करते रहे।

द्वादशी के दिन व्रत पूरा होने पर ऋषि ने संकल्प लेकर उस व्रत से प्राप्त पूरा पुण्य प्रेत बने राजा महीध्वज को अर्पित कर दिया। उन्होंने भगवान से प्रार्थना की कि इस पुण्य के प्रभाव से राजा को इस दुख से मुक्ति मिले।

राजा की मुक्ति

अपरा एकादशी के पुण्य का प्रभाव तुरंत दिखाई दिया। राजा महीध्वज प्रेत योनि से मुक्त हो गए और उन्हें दिव्य शरीर प्राप्त हुआ। उन्होंने हाथ जोड़कर धौम्य ऋषि को प्रणाम किया और उनका बहुत आभार माना।

इसके बाद राजा पुष्पक विमान में बैठकर स्वर्ग लोक चले गए। कुछ कथाओं में बताया गया है कि वे वैकुंठ गए। दोनों रूपों में कथा का भाव एक ही है: अपरा एकादशी के पुण्य से एक दुखी आत्मा को शांति और उत्तम लोक मिला।

कथा का फल

कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “हे राजन, यह कथा मैंने लोक कल्याण के लिए कही है। जो व्यक्ति अपरा एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं। जो श्रद्धा से इस कथा को पढ़ता या सुनता है, वह भी पापों से मुक्त होता है।”

इस्कॉन जैसी कुछ वैष्णव परंपराओं में अपरा एकादशी का माहात्म्य बिना इस कथा के, केवल श्रीकृष्ण के उपदेश के रूप में पढ़ा जाता है। उत्तर भारत की लोक परंपरा में राजा महीध्वज की यह कथा व्रत के दिन विशेष रूप से सुनी जाती है। कुछ जगह राजा का नाम “महाध्वज” भी लिखा मिलता है।

अपरा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

नीचे दी गई विधि घर पर सरलता से की जा सकती है। आपके परिवार की परंपरा या गुरु के निर्देश अलग हों, तो उन्हें प्राथमिकता दें।

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक ही बार सात्विक भोजन करें। भोजन में प्याज, लहसुन, मांस, शराब और बहुत तेल-मसाले वाली चीज़ें न लें।
  2. दशमी की रात ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में अगले दिन के व्रत का संकल्प रखें।
  3. पूजा का स्थान साफ कर लें और पूजा सामग्री पहले ही जुटा लें।
  4. तुलसी के पत्ते दशमी को ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी पर तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. सूर्योदय से पहले, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। संभव हो तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ।
  2. साफ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें। पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है।
  3. सूर्य देव को जल अर्पित करें।
  4. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं (अपना नाम, गोत्र) आज अपरा एकादशी का व्रत भगवान त्रिविक्रम की प्रसन्नता के लिए, अपनी सामर्थ्य के अनुसार (निर्जला / फलाहार / एक समय) रखूँगा/रखूँगी।” फिर जल भूमि पर छोड़ दें।
  5. संकल्प में यह भी जोड़ सकते हैं कि आज आप झूठ, निंदा और छल से दूर रहेंगे। अपरा एकादशी के माहात्म्य के भाव से यह संकल्प बहुत सुंदर माना जाता है।

भगवान विष्णु (त्रिविक्रम) की पूजा

  1. एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएँ और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र रखें। वामन या त्रिविक्रम रूप का चित्र हो तो उसे भी रखें। न हो, तो भगवान विष्णु की पूजा में ही त्रिविक्रम रूप का ध्यान करें।
  2. पास में जल से भरा कलश रखें और घी का दीपक जलाएँ।
  3. भगवान को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर साफ जल से।
  4. पीला चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
  5. धूप-दीप दिखाएँ और मौसमी फल (आम, खरबूजा आदि), मिश्री या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  6. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का कम से कम 108 बार जप करें।
  7. अपरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
  8. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।

पीपल पूजा (वैकल्पिक)

  1. कथा में पीपल का पेड़ आता है और पीपल को भगवान विष्णु का वास माना जाता है, इसलिए कई परिवार इस दिन पीपल में जल चढ़ाते हैं।
  2. शाम को पीपल के नीचे घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ और परिक्रमा करें।
  3. दीपक जलाते समय अपने पितरों और दिवंगत परिजनों की शांति के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। यह परंपरागत भावना है, कोई अनिवार्य नियम नहीं।

दिन भर, शाम और रात्रि जागरण

  1. दिन में सोने से बचें। समय मिले तो विष्णु सहस्रनाम, गीता या भगवान की कथाओं का पाठ करें।
  2. शाम को तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाएँ (तुलसी को छुएँ या तोड़ें नहीं) और फिर से आरती करें।
  3. परंपरा में एकादशी की रात जागरण का महत्व है। परिवार के साथ भजन-कीर्तन, नाम जप या कथा श्रवण करें।
  4. पूरी रात जागना कठिन हो तो कुछ समय भगवान का स्मरण करके सो जाएँ। स्वास्थ्य का ध्यान रखकर ही जागरण करें।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु की पूजा करें।
  2. संभव हो तो किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद व्यक्ति या गौ को भोजन कराएँ और यथाशक्ति दान दें। गर्मी का मौसम है, इसलिए जल, छाता, जूते-चप्पल या पंखा दान करना भी अच्छा माना जाता है।
  3. ऊपर की तालिका में दिए पारण समय के भीतर तुलसी दल डालकर जल या प्रसाद लेकर व्रत खोलें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र (वामन / त्रिविक्रम रूप का चित्र हो तो वह भी)
  • लकड़ी की चौकी और पीला कपड़ा
  • जल से भरा तांबे या पीतल का कलश
  • गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • घी का दीपक, रुई की बत्ती और माचिस
  • धूप या अगरबत्ती और कपूर
  • पीला चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत (साबुत चावल, केवल पूजा के लिए)
  • पीले फूल, फूलों की माला
  • तुलसी दल (दशमी को तोड़े हुए)
  • मौसमी फल जैसे आम, केला, खरबूजा
  • मिश्री, मेवे या घर का बना फलाहारी भोग
  • पान के पत्ते, सुपारी और लौंग-इलायची
  • पीला वस्त्र या जनेऊ (भगवान को अर्पित करने के लिए)
  • पीपल पूजा के लिए जल का लोटा और दीपक
  • दान के लिए अन्न, जल का पात्र, छाता या चप्पल (यथाशक्ति)
  • व्रत कथा की पुस्तक या यह पेज

अपरा एकादशी के मंत्र

मंत्र जप के लिए तुलसी की माला सबसे अच्छी मानी जाती है। जप शांत मन से, साफ उच्चारण के साथ करें। संख्या से ज़्यादा भाव ज़रूरी है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण / विष्णु) को नमन करता हूँ। यह बारह अक्षरों का मंत्र एकादशी के दिन सबसे अधिक जपा जाता है। इसे कम से कम 108 बार जपें।

2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र

ॐ नमो नारायणाय

अर्थ: मैं भगवान नारायण को नमन करता हूँ। यह आठ अक्षरों का छोटा और सरल मंत्र है, जिसे दिन भर चलते-फिरते भी मन में जपा जा सकता है।

3. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम भगवान नारायण को जानें और वासुदेव का ध्यान करें। भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करें। सच्चाई और सही मार्ग का संकल्प लेने वाली अपरा एकादशी पर यह मंत्र विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।

4. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका रूप शांत है, जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी हैं, जो पूरे विश्व के आधार हैं, आकाश के समान अनंत हैं, मेघ के समान श्याम रंग वाले हैं और सुंदर अंगों वाले हैं। जो लक्ष्मी जी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी ध्यान से जिन्हें पाते हैं। संसार के भय को हरने वाले, सभी लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

त्रिविक्रम पूजा: अपरा एकादशी पर विष्णु का विराट रूप

अपरा एकादशी पर भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा का विशेष विधान है। भगवान ने वामन अवतार में राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी थी। फिर उन्होंने विराट रूप धारण किया और दो पगों में पृथ्वी और आकाश नाप लिए। तीसरा पग राजा बलि ने अपने सिर पर रखवाया। यही विराट रूप “त्रिविक्रम” कहलाता है, यानी तीन बड़े पग रखने वाला।

त्रिविक्रम की पूजा का भाव यह है कि भगवान की शक्ति अपार है, ठीक वैसे ही जैसे इस एकादशी का नाम अपार पुण्य की ओर संकेत करता है। जिस भगवान ने तीन पगों में तीनों लोक नाप लिए, उनके सामने बड़े से बड़ा पाप भी छोटा है। इसी विश्वास के साथ भक्त इस दिन अपनी गलतियों के लिए क्षमा माँगते हैं।

घर पर त्रिविक्रम पूजा के लिए अलग से कुछ कठिन करने की ज़रूरत नहीं है। भगवान विष्णु की सामान्य पूजा करते समय मन में उनके विराट रूप का ध्यान करें।

भद्रकाली एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी

भारत की विविधता इस बात में भी दिखती है कि एक ही तिथि अलग-अलग क्षेत्रों में अलग रूप में मनाई जाती है। ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी इसका सुंदर उदाहरण है।

पंजाब और हरियाणा में भद्रकाली एकादशी

पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में इस दिन को भद्रकाली एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन माँ भद्रकाली की पूजा की जाती है, जो माँ काली का कल्याणकारी रूप मानी जाती हैं। सारस्वत ब्राह्मण समाज के लिए यह एक बड़ा पर्व है।

जो परिवार भद्रकाली एकादशी मनाते हैं, वे अपनी कुल परंपरा के अनुसार देवी की पूजा करते हैं। कई परिवार देवी पूजा के साथ भगवान विष्णु की एकादशी पूजा भी करते हैं। अपने घर के बड़ों से अपनी परंपरा के बारे में पूछना सबसे अच्छा रहता है।

ओडिशा में जलक्रीड़ा एकादशी

ओडिशा में यही एकादशी जलक्रीड़ा एकादशी के नाम से जानी जाती है और पुरी के भगवान जगन्नाथ को समर्पित है। वहाँ यह एकादशी का बहुत लोकप्रिय व्रत माना जाता है। ज्येष्ठ की तेज़ गर्मी में भगवान की जल से जुड़ी लीलाओं का स्मरण इस नाम का भाव है।

अपरा एकादशी पर दान: गर्मी में सेवा का महत्व

अपरा एकादशी ज्येष्ठ की भीषण गर्मी में आती है। इसलिए इस दिन ऐसे दान का विशेष महत्व माना जाता है, जो लोगों को गर्मी से राहत दे। माहात्म्य में स्वर्ण और गौ दान के पुण्य से इस व्रत की तुलना की गई है, पर आम भक्त अपनी सामर्थ्य के अनुसार छोटे दान से भी यह भाव पूरा कर सकते हैं।

  • जल दान: प्याऊ लगवाना, राहगीरों को ठंडा पानी पिलाना या मिट्टी का घड़ा दान करना।
  • छाता और जूते-चप्पल: धूप में काम करने वालों को छाता या चप्पल देना।
  • अन्न दान: द्वादशी को किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराना। (एकादशी पर स्वयं अन्न न खाएँ, पर दूसरों को अन्न दान किया जा सकता है।)
  • फल दान: मौसमी फल जैसे आम, खरबूजा या तरबूज बाँटना।
  • पशु-पक्षियों के लिए पानी: छत या आँगन में पक्षियों के लिए पानी का बर्तन रखना।

दान दिखावे के लिए नहीं, विनम्रता से करें। अपनी आय की सीमा में रहकर किया गया छोटा दान भी उतना ही मूल्यवान है।

अपरा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का मूल नियम है अन्न का त्याग। ज़्यादातर परंपराओं में इस दिन चावल और सभी अनाज वर्जित हैं। अपनी सेहत और सामर्थ्य के अनुसार व्रत का प्रकार चुनें।

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल: आम, केला, खरबूजा, तरबूज, पपीता, सेब
  • दूध, दही, छाछ, मक्खन और पनीर
  • साबूदाना की खिचड़ी या खीर
  • कुट्टू (बकव्हीट) और सिंघाड़े के आटे की रोटी या पूरी
  • आलू, शकरकंद, अरबी और कद्दू
  • मखाना, मूँगफली, बादाम, काजू और किशमिश
  • सेंधा नमक, काली मिर्च और जीरा
  • नारियल पानी, नींबू पानी (सेंधा नमक के साथ) और भरपूर पानी

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़
  • गेहूँ, जौ, मक्का और अन्य अनाज
  • दालें, चना, राजमा और सभी फलियाँ
  • प्याज और लहसुन
  • मांस, मछली, अंडा और शराब
  • सामान्य (आयोडीन) नमक, जिसकी जगह सेंधा नमक लें
  • बैंगन और कुछ परंपराओं में पत्तेदार साग
  • बाज़ार के पैकेट वाले “व्रत स्नैक्स”, जिनमें अनाज मिला हो सकता है

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल, दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है। ज्येष्ठ की गर्मी में निर्जला व्रत से शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) हो सकती है। इसलिए यह व्रत केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही रखें। मधुमेह, ब्लड प्रेशर, किडनी की समस्या, गर्भावस्था या नियमित दवा लेने वाले लोग निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।

फलाहार व्रत

फलाहार व्रत सबसे अधिक रखा जाता है। इसमें अनाज छोड़कर फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू जैसी चीज़ें खाई जाती हैं और पानी पिया जाता है। गर्मी के मौसम में यह व्रत अधिकतर लोगों के लिए सुरक्षित और संतुलित विकल्प है।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा दिन उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार फलाहारी भोजन कर सकते हैं। बुज़ुर्ग, बच्चे और कमज़ोर स्वास्थ्य वाले लोग इसी प्रकार का व्रत रख सकते हैं। शास्त्रों में भी सामर्थ्य के अनुसार व्रत करने की बात कही गई है।

अपरा एकादशी पारण कब और कैसे करें

एकादशी व्रत तब पूरा माना जाता है जब अगले दिन, यानी द्वादशी को, सही समय पर पारण किया जाए। पारण का अर्थ है व्रत खोलना। अपने शहर का पारण समय ऊपर की तालिका में देखें।

  • द्वादशी के भीतर पारण: पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना दोषपूर्ण माना जाता है।
  • हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग “हरि वासर” कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। तालिका में दिया पारण समय इसे ध्यान में रखकर ही दिया गया है।
  • सुबह का समय सबसे अच्छा: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे उत्तम है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है।
  • स्मार्त और वैष्णव: कभी-कभी दोनों परंपराओं की व्रत तारीख या पारण का समय अलग होता है। 2027 में दोनों का व्रत एक ही दिन है, पर इस्कॉन पंचांग में पारण की अंतिम सीमा थोड़ी अलग हो सकती है। अपनी परंपरा के अनुसार समय चुनें।

पारण कैसे करें

  1. स्नान करके भगवान विष्णु को प्रणाम करें और भोग लगाएँ।
  2. पहले तुलसी दल डला हुआ जल या चरणामृत लें।
  3. फिर हल्का सात्विक भोजन करें। परंपरा में द्वादशी पर चावल खाकर पारण करना शुभ माना जाता है।
  4. पारण से पहले या साथ में किसी ज़रूरतमंद को भोजन या दान दें।
  5. लंबे उपवास के बाद तुरंत बहुत भारी या तला हुआ भोजन न करें।

अपरा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा करें।
  • दिन भर सत्य बोलने का विशेष प्रयास करें, क्योंकि यह व्रत झूठ और छल के दोष दूर करने से जुड़ा है।
  • अपरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
  • पीपल और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
  • प्यासे को पानी पिलाएँ और गर्मी से राहत देने वाली चीज़ें दान करें।
  • दिवंगत परिजनों की शांति के लिए प्रार्थना करें।
  • किसी से मनमुटाव हो तो क्षमा माँगें या क्षमा करें।
  • सही समय पर द्वादशी को पारण करें।

क्या न करें

  • चावल, अनाज, दाल, प्याज, लहसुन और मांसाहार न खाएँ।
  • झूठ न बोलें, किसी की निंदा या चुगली न करें।
  • किसी को धोखा न दें, कम न तौलें और गलत सलाह न दें।
  • क्रोध, ईर्ष्या और कठोर वाणी से बचें।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • दिन में सोने से बचें।
  • किसी बड़े, गुरु या माता-पिता का अपमान न करें।
  • स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ करके कठोर व्रत न रखें।

अपरा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: अपरा एकादशी का व्रत रख लिया तो कोई भी गलत काम करने की छूट मिल जाती है।

सच्चाई: माहात्म्य में पापों से मुक्ति की बात पश्चाताप और सुधार के भाव के साथ कही गई है। व्रत को गलत काम जारी रखने का बहाना बनाना परंपरा के भाव के उलट है। शास्त्र कहते हैं कि सच्चे मन से गलती मानना और आगे उसे न दोहराना ही असली प्रायश्चित है।

मिथक: एकादशी पर पीपल के पास जाने से प्रेत बाधा होती है।

सच्चाई: कथा में पीपल का पेड़ केवल वह स्थान है जहाँ राजा का शरीर गाड़ा गया था। हिंदू परंपरा में पीपल को भगवान विष्णु का वास माना जाता है और उसकी पूजा शुभ मानी जाती है। कथा का संदेश डर नहीं, बल्कि करुणा और मुक्ति है।

मिथक: दूसरे के लिए व्रत रखने से अपना पुण्य कम हो जाता है।

सच्चाई: धौम्य ऋषि की कथा इसका उलटा संदेश देती है। परंपरा में दूसरों के कल्याण के लिए किया गया व्रत और पुण्य का दान बहुत श्रेष्ठ माना गया है। दूसरों के लिए प्रार्थना करना भक्ति का सबसे सुंदर रूप है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो अपरा एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: शास्त्रों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत करने की अनुमति है। फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत भी पूरा व्रत माना जाता है। भगवान भाव देखते हैं, कष्ट नहीं। गर्मी में बिना पानी के व्रत से सेहत बिगड़ सकती है, इसलिए समझदारी से व्रत चुनें।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और अपशकुन होगा।

सच्चाई: अनजाने में हुई भूल पर डरने की ज़रूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, बचे हुए दिन व्रत के नियमों का पालन करें और पूजा पूरी करें। किसी अपशकुन की बात परंपरा में नहीं कही गई है।

मिथक: बीमार व्यक्ति या दवा लेने वाले को व्रत नहीं करना चाहिए, नहीं तो पाप लगेगा।

सच्चाई: बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से हल्का व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा, जप और कथा श्रवण कर सकते हैं। दवा छोड़ना या सेहत से समझौता करना सही नहीं है। स्वास्थ्य की रक्षा भी धर्म का हिस्सा है।

मिथक: व्रत रखने से शरीर का “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी व्रत का उद्देश्य आध्यात्मिक है, यानी संयम, भक्ति और मन की शुद्धि। इसे किसी चिकित्सा उपचार के रूप में नहीं देखना चाहिए। मधुमेह, ब्लड प्रेशर या अन्य बीमारी में व्रत से पहले डॉक्टर से बात करें।

अपरा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ धार्मिक मान्यता और कथा पर आधारित हैं। इन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।

  • पापों से मुक्ति: मान्यता है कि यह व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों, विशेष रूप से झूठ, निंदा और छल के दोषों को दूर करता है।
  • अपार पुण्य: माहात्म्य में इसके पुण्य की तुलना बड़े तीर्थों के स्नान और स्वर्ण-गौ दान से की गई है।
  • यश और सम्मान: कथा में कहा गया है कि इसका व्रत करने वाला संसार में प्रसिद्ध होता है।
  • दिवंगत आत्माओं की शांति: धौम्य ऋषि की कथा के आधार पर माना जाता है कि इस व्रत का पुण्य दिवंगत परिजनों की शांति के लिए अर्पित किया जा सकता है।
  • मन की शुद्धि: एक दिन का संयम मन से ईर्ष्या, क्रोध और लालच को कम करने में मदद करता है।
  • विष्णु लोक की प्राप्ति: माहात्म्य के अनुसार भगवान त्रिविक्रम की पूजा के साथ यह व्रत करने वाला विष्णु लोक को प्राप्त होता है।

संबंधित एकादशी और पाठ

अपरा एकादशी से पहले वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी आती है, जो भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ी है। अपरा के बाद ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी आती है, जिसे भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है और जो साल की सबसे कठिन एकादशी मानी जाती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

अपरा एकादशी हमें सिखाती है कि भगवान की कृपा अपार है और सच्चे मन से किया गया छोटा प्रयास भी बड़ा फल देता है। इस दिन सच बोलने का संकल्प लें, किसी प्यासे को पानी पिलाएँ, अपने दिवंगत प्रियजनों को याद करें और मन से ईर्ष्या को दूर करें। भगवान त्रिविक्रम आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

अपरा एकादशी कब है 2027 में?

अपरा एकादशी 2026 (13 मई) बीत चुकी है। अगला व्रत मंगलवार, 1 जून 2027 को है और पारण 2 जून की सुबह होगा (नई दिल्ली)। अपने शहर का पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

अपरा एकादशी किस महीने में आती है?

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है, और गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में वैशाख कृष्ण पक्ष की। दोनों में दिन एक ही होता है, जो प्रायः मई या जून में आता है।

अपरा एकादशी का नाम अपरा क्यों पड़ा?

“अपरा” का भाव अपार यानी असीम से है। कथा में श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह एकादशी अपार धन और पुण्य देती है और इसका व्रत करने वाला यश पाता है।

अपरा एकादशी को अचला एकादशी क्यों कहते हैं?

कथा में श्रीकृष्ण इस एकादशी के दो नाम बताते हैं, अपरा और अचला। “अचल” का अर्थ है स्थिर, और मान्यता है कि इस व्रत का पुण्य स्थिर रहता है।

भद्रकाली एकादशी और जलक्रीड़ा एकादशी क्या है?

पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्सों में इसी तिथि को माँ भद्रकाली की पूजा के साथ भद्रकाली एकादशी मनाई जाती है। ओडिशा में यही दिन भगवान जगन्नाथ को समर्पित जलक्रीड़ा एकादशी कहलाता है।

अपरा एकादशी की व्रत कथा क्या है?

धर्मात्मा राजा महीध्वज को उनके ईर्ष्यालु छोटे भाई वज्रध्वज ने मारकर पीपल के नीचे गाड़ दिया, जिससे वे प्रेत बन गए। धौम्य ऋषि ने स्वयं अपरा एकादशी का व्रत रखकर उसका पुण्य राजा को दिया, और राजा प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य लोक चले गए।

अपरा एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु के त्रिविक्रम रूप की पूजा होती है, जो वामन अवतार का विराट रूप है। कुछ स्थानों पर वामन भगवान की पूजा भी की जाती है।

अपरा एकादशी के व्रत में क्या खाएँ?

फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, मखाना और मेवे खा सकते हैं। नमक के लिए सेंधा नमक लें।

क्या अपरा एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल और सभी अनाज वर्जित माने जाते हैं। परंपरा में द्वादशी को पारण के समय चावल खाना शुभ माना जाता है।

क्या अपरा एकादशी के व्रत में पानी पी सकते हैं?

हाँ, फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। केवल निर्जला व्रत में पानी नहीं पिया जाता, जो गर्मी में कठिन है, इसलिए सेहत देखकर ही निर्जला व्रत रखें।

अपरा एकादशी का पारण कब करें?

द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले पारण करें। अपने शहर का सही समय इस पेज की तालिका में देखें।

स्मार्त और वैष्णव अपरा एकादशी में क्या अंतर है?

स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) परंपराएँ एकादशी तिथि की गणना अलग नियमों से करती हैं, इसलिए कभी-कभी व्रत की तारीख अलग होती है। 2027 में दोनों का व्रत एक ही दिन है।

अपरा एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” सबसे प्रमुख मंत्र है। इसके साथ “ॐ नमो नारायणाय” और विष्णु गायत्री मंत्र का जप भी किया जा सकता है।

क्या अपरा एकादशी का व्रत पितरों या दिवंगत परिजनों के लिए रख सकते हैं?

धौम्य ऋषि की कथा के आधार पर परंपरा में माना जाता है कि व्रत का पुण्य किसी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए संकल्प करके अर्पित किया जा सकता है। यह श्रद्धा की बात है, अपने परिवार की परंपरा के अनुसार करें।

क्या महिलाएँ और गर्भवती महिलाएँ अपरा एकादशी का व्रत रख सकती हैं?

हाँ, महिलाएँ यह व्रत रख सकती हैं। गर्भवती महिलाएँ निर्जला व्रत न रखें और डॉक्टर की सलाह से हल्का फलाहार व्रत रखें या केवल पूजा और कथा करें।

बुज़ुर्ग या बीमार लोग अपरा एकादशी कैसे करें?

वे फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा, जप और कथा श्रवण कर सकते हैं। मधुमेह, ब्लड प्रेशर या नियमित दवा लेने वाले लोग पहले डॉक्टर से सलाह लें और दवा न छोड़ें।

अगर अपरा एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, बचे हुए दिन नियमों का पालन करें और पूजा पूरी करें। अगली एकादशी पर फिर से श्रद्धा से व्रत रख सकते हैं।

अपरा एकादशी पर क्या दान करें?

गर्मी के मौसम के कारण जल, मिट्टी का घड़ा, छाता, जूते-चप्पल, पंखा और मौसमी फल का दान अच्छा माना जाता है। द्वादशी को किसी ज़रूरतमंद को भोजन भी कराएँ।

अपरा एकादशी का उल्लेख किस पुराण में है?

परंपरा के अनुसार इसका माहात्म्य ब्रह्माण्ड पुराण में श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद के रूप में मिलता है। राजा महीध्वज की कथा उत्तर भारत की प्रचलित व्रत कथा परंपरा में सुनी जाती है।

अपनी टिप्पणी लिखें

आपका ईमेल प्रकाशित नहीं किया जाएगा। टिप्पणी समीक्षा के बाद दिखाई देगी।