परमा एकादशी (Parama Ekadashi) अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भक्त भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम रूप की पूजा और व्रत करते हैं। “परमा” का अर्थ है सबसे श्रेष्ठ, और परंपरा में इसे अधिक मास की परम पुण्यदायी एकादशी माना गया है। अधिक मास लगभग हर 32 से 33 महीने में एक बार आता है, इसलिए यह एकादशी भी लगभग तीन साल में एक बार ही आती है।
परंपरा के अनुसार परमा एकादशी का व्रत दरिद्रता दूर करने, पापों से मुक्ति और भगवान की कृपा पाने वाला माना जाता है। इसकी कथा काम्पिल्य नगर के गरीब पर धर्मात्मा ब्राह्मण सुमेधा और उनकी पत्नी पवित्रा की है, जिन्हें कौण्डिन्य मुनि ने यह व्रत बताया था। इसी कथा में कुबेर और राजा हरिश्चंद्र के प्रसंग भी आते हैं।
इस पेज पर आप अगली परमा एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, पंचरात्रि व्रत, मंत्र, व्रत के नियम और अधिक मास का अर्थ सरल भाषा में जानेंगे।
परमा एकादशी 2029 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: परमा एकादशी 2026 (गुरुवार, 11 जून, अधिक ज्येष्ठ) बीत चुकी है। अगला अधिक मास 2029 में अधिक चैत्र के रूप में आएगा (16 मार्च से 13 अप्रैल 2029), और अगली परमा एकादशी सोमवार, 9 अप्रैल 2029 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 8 अप्रैल 2029 दोपहर लगभग 3:45 बजे से 9 अप्रैल शाम लगभग 5:39 बजे तक रहेगी। पारण 10 अप्रैल 2029 की सुबह होगा।
अगली परमा एकादशी
परमा एकादशी 2029
9 अप्रैल 2029, सोमवार 890 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- अधिक चैत्र कृष्ण
- एकादशी तिथि
- 8 अप्रै 15:48 – 9 अप्रै 17:41
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 10 अप्रै, 06:01 – 08:33
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 अधिक ज्येष्ठ कृष्ण | 11 जून 2026, गुरुवार | 11 जून 01:00 – 11 जून 22:38 | 12 जून, 05:22 – 08:10 |
| 2029 अधिक चैत्र कृष्ण | 9 अप्रैल 2029, सोमवार | 8 अप्रै 15:48 – 9 अप्रै 17:41 | 10 अप्रै, 06:01 – 08:33 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय ऊपर दी गई तालिका में देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदलता है। जिन वर्षों में अधिक मास नहीं होता, उनमें परमा एकादशी आती ही नहीं। 2029 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में यह व्रत एक ही दिन बताया गया है, फिर भी अपने परिवार या गुरु परंपरा का पंचांग देख लें।
परमा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“परमा” नाम का अर्थ
संस्कृत में “परम” का अर्थ है सबसे ऊँचा, सर्वोत्तम। कथा में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि इस पुण्यदायी दिन का नाम परमा एकादशी है। भक्त मानते हैं कि यह परम सुख, परम धन और अंत में परम पद, यानी भगवान के धाम की ओर ले जाने वाली एकादशी है।
परमा एकादशी के अन्य नाम
- पुरुषोत्तमी एकादशी: पुरुषोत्तम मास में आने के कारण कई पंचांग और लेख इसे यह नाम देते हैं।
- कमला एकादशी: कुछ पंचांग अधिक मास की दोनों एकादशियों को कमला एकादशी कहते हैं, हालाँकि यह नाम अधिकतर शुक्ल पक्ष वाली पद्मिनी एकादशी के लिए प्रयोग होता है।
- अधिक मास कृष्ण एकादशी: पंचांग की भाषा में इसका सीधा नाम।
- महीने के साथ नाम: जैसे 2026 में “अधिक ज्येष्ठ परमा एकादशी” और 2029 में “अधिक चैत्र परमा एकादशी”।
ध्यान दें: परमा एकादशी और कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी नाम में मिलती-जुलती हैं, पर ये अलग एकादशियाँ हैं। रमा हर साल आती है, जबकि परमा केवल अधिक मास में।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
परमा एकादशी किसी तय महीने में नहीं आती। जिस साल जो महीना अधिक होता है, उसी के कृष्ण पक्ष में यह आती है, जैसे 2026 में अधिक ज्येष्ठ और 2029 में अधिक चैत्र। अधिक मास अमावस्या से अमावस्या तक गिना जाता है, इसलिए पूर्णिमांत (उत्तर भारत) और अमांत (दक्षिण-पश्चिम भारत) दोनों पंचांगों में इसका नाम एक ही रहता है।
अधिक मास में पहले शुक्ल पक्ष आता है और फिर कृष्ण पक्ष। इसलिए पद्मिनी एकादशी पहले आती है और परमा एकादशी उसके लगभग पंद्रह दिन बाद, अधिक मास की समाप्ति से कुछ दिन पहले।
परमा एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
सामान्य वर्ष में 24 एकादशियाँ होती हैं, पर अधिक मास वाले वर्ष में पद्मिनी और परमा, ये दो एकादशियाँ और जुड़ती हैं। माहात्म्य में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे दो पैर वालों में ब्राह्मण, चार पैर वालों में गाय और देवताओं में इंद्र श्रेष्ठ हैं, वैसे ही महीनों में अधिक मास श्रेष्ठ है। इसी महीने की अंतिम एकादशी होने से परमा का महत्व और बढ़ जाता है।
मान्यता है कि यह व्रत पापों का नाश करता है, घर से दरिद्रता दूर करता है और इस लोक में सुख तथा परलोक में सद्गति देता है। कथा पाठों में इसका फल सभी तीर्थों और यज्ञों के बराबर बताया गया है।
आध्यात्मिक संदेश
परमा एकादशी की कथा गरीबी में भी धर्म न छोड़ने की कथा है। सुमेधा और पवित्रा के पास खाने को भी पूरा नहीं था, फिर भी उन्होंने घर आए अतिथि का प्रेम से सत्कार किया। संदेश यह है कि सच्ची संपत्ति मन की उदारता है, और भगवान की कृपा अक्सर सेवा और सत्संग के रास्ते आती है।
दूसरा संदेश धैर्य और सही मार्गदर्शन का है। कथा का सार यह भी कहता है कि धन केवल चाहने से नहीं आता। उसके लिए सच्चा प्रयास, संयम और भगवान पर भरोसा तीनों चाहिए।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार परमा एकादशी की कथा स्कंद पुराण से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को इसका माहात्म्य सुनाते हैं। कुछ हिंदी कथा पाठों में प्रश्न पूछने वाले अर्जुन बताए गए हैं, और कुछ पाठ किसी पुराण का नाम नहीं लेते।
परमा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन, अधिक मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता की पूजा होती है?” श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन, इस पुण्यदायी दिन का नाम परमा एकादशी है। इस दिन धूप, दीप, नैवेद्य और फूलों से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इसके बारे में मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ, जो महर्षियों ने काम्पिल्य नगर में कही थी।”
काम्पिल्य नगर का गरीब ब्राह्मण
प्राचीन काल में काम्पिल्य नगर में सुमेधा नाम के एक धर्मात्मा ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी पवित्रा पतिव्रता और बहुत सेवाभावी थीं। पिछले जन्म के किसी कर्म के कारण दोनों बहुत गरीबी में जी रहे थे। सुमेधा भिक्षा माँगने जाते, पर अक्सर खाली हाथ लौटते, और कई बार दोनों को भूखा सोना पड़ता।
फिर भी पवित्रा का स्वभाव ऐसा था कि घर में जो कुछ भी होता, पहले अतिथि को खिलातीं और स्वयं भूखी रह जातीं। उन्होंने कभी पति से अपनी तकलीफ़ नहीं कही।
परदेस जाने का विचार और पवित्रा की सलाह
एक दिन सुमेधा ने दुखी होकर कहा, “प्रिये, यहाँ धनवान लोग भी मुझे कुछ नहीं देते। परिश्रम की बड़ी महिमा कही गई है, इसलिए मैं धन कमाने परदेस जाना चाहता हूँ।”
पवित्रा ने विनम्रता से कहा, “स्वामी, मनुष्य को वही मिलता है जो उसने पिछले जन्मों में दान और कर्म से बोया है। भाग्य में जो लिखा है, वह यहीं भी मिल जाएगा। आप मुझे छोड़कर न जाएँ। हम यहीं रहकर भगवान की भक्ति करें।” पत्नी की बात मानकर सुमेधा ने परदेस जाने का विचार छोड़ दिया।
कौण्डिन्य मुनि का आगमन
कुछ समय बाद महान तपस्वी कौण्डिन्य मुनि उनके घर आए। दोनों ने आनंद से उन्हें आसन दिया और जो कुछ घर में था, उससे प्रेमपूर्वक भोजन कराया। मुनि प्रसन्न हुए।
तब पवित्रा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मुनिवर, हम बहुत गरीबी में हैं। मैंने अपने पति को परदेस जाने से रोका, क्योंकि मुझे विश्वास था कि भगवान कोई राह दिखाएँगे, और आज आप हमारे घर आए हैं। कृपया बताइए, हमारी दरिद्रता कैसे दूर हो?”
कौण्डिन्य मुनि का उपदेश
मुनि ने कहा, “अधिक मास के कृष्ण पक्ष में परमा एकादशी आती है। यह पाप और दरिद्रता दोनों को दूर करती है। इस दिन व्रत रखो, भगवान विष्णु की पूजा करो और रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करो।”
उन्होंने दो उदाहरण दिए। “यक्षराज कुबेर ने यह व्रत किया था, और भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें धन का स्वामी बनाया। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने भी पत्नी और पुत्र के बिक जाने के बाद यह व्रत किया, और उन्हें अपनी पत्नी, पुत्र और राज्य वापस मिल गए।”
फिर मुनि ने पंचरात्रि व्रत की महिमा बताई, जो इस एकादशी से जुड़ा पाँच दिनों का नियम है। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी साथ मिलकर अपनी शक्ति के अनुसार यह व्रत करें। इसके नियम नीचे “पंचरात्रि व्रत” वाले भाग में दिए गए हैं।
व्रत और सुख-समृद्धि
जब अधिक मास आया, तब सुमेधा और पवित्रा ने परमा एकादशी का व्रत और फिर पाँच दिनों का पंचरात्रि व्रत पूरी श्रद्धा से किया। व्रत पूरा होने पर पवित्रा ने देखा कि एक राजकुमार उनके घर की ओर आ रहा है।
वह राजकुमार ब्रह्मा जी की प्रेरणा से आया था। उसने उन्हें सब सुविधाओं से भरा एक सुंदर घर दिया और जीविका के लिए एक पूरा गाँव भी दे दिया। इसके बाद दोनों ने सुख से जीवन बिताया, दान-पुण्य और भक्ति करते रहे, और अंत में भगवान विष्णु के धाम को प्राप्त हुए।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “जो भी श्रद्धा से परमा एकादशी का व्रत करता है, परंपरा के अनुसार वह सब तीर्थों और यज्ञों का पुण्य पाता है। गरीब व्यक्ति को भी अधिक मास में कम से कम एक व्रत करना चाहिए।”
कथा के अलग-अलग रूप
- प्रश्न पूछने वाले: इस्कॉन पाठों में युधिष्ठिर, जबकि कुछ हिंदी पाठों में अर्जुन।
- पत्नी का नाम: अधिकतर पाठों में पवित्रा। कुछ पाठ उन्हें केवल “ब्राह्मणी” कहते हैं।
- धन कैसे मिला: इस्कॉन और कई हिंदी पाठों में ब्रह्मा जी की प्रेरणा से आया राजकुमार घर और गाँव देता है। कुछ सरल पाठ केवल इतना कहते हैं कि भगवान की कृपा से धीरे-धीरे उनकी गरीबी दूर हो गई।
- कुबेर का प्रसंग: अधिकतर पाठों में शिव जी ने कुबेर को धन का स्वामी (देवताओं का कोषाध्यक्ष) बनाया। एक लेख इसे शिव जी के कैलाश का स्वामी बनने से जोड़ता है, जो प्रचलित पाठ नहीं है।
- पंचरात्रि व्रत की शुरुआत: कुछ पाठों में यह एकादशी से जुड़ा बताया गया है, और इस्कॉन के अंग्रेज़ी पाठ में इसका संकल्प द्वादशी से बताया गया है।
परमा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सादा सात्विक भोजन करें। चावल, मसूर, उड़द, चना, प्याज़ और लहसुन से बचें।
- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन बिल्कुल न लें।
- रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन को भगवान में लगाएँ।
- घर की साफ़-सफ़ाई करें और पूजा की सामग्री तैयार रख लें। तुलसी दल इसी दिन तोड़ लें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर भगवान विष्णु का स्मरण करें।
- स्नान करें। पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें। अधिक मास में तीर्थ स्नान का विशेष महत्व माना गया है, इसलिए संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें।
- साफ़, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: “मैं (अपना नाम) अधिक मास कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का व्रत भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता और घर की सुख-शांति के लिए अपनी शक्ति के अनुसार रखूँगा/रखूँगी।”
भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) की पूजा
- चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति या चित्र रखें।
- भगवान को गंगाजल से स्नान कराएँ या छींटे दें, फिर चंदन, रोली, अक्षत और पीले फूल अर्पित करें।
- कथा में बताए अनुसार धूप, दीप, नैवेद्य (भोग) और फूलों से पूजा करें। घी का दीपक जलाएँ।
- तुलसी दल के साथ फल, पंचामृत और मिठाई का भोग लगाएँ।
- माता लक्ष्मी का भी स्मरण करें, क्योंकि यह व्रत घर की समृद्धि की कामना से भी जुड़ा है।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें, व्रत कथा पढ़ें या सुनें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे की आरती करें।
शाम की पूजा और रात्रि जागरण
- शाम को फिर दीपक जलाकर आरती करें। तुलसी के पास भी एक दीपक रखें।
- कौण्डिन्य मुनि ने रात में भजन, कीर्तन और नृत्य के साथ जागरण करने को कहा था। रात में नाम जप, भजन और भगवद्गीता या भागवत का पाठ करें।
- पूरी रात जागना संभव न हो तो कम से कम कुछ घंटे भजन करें। स्वास्थ्य से बड़ा कोई नियम नहीं।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें।
- किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और अन्न, वस्त्र, पुस्तक या दक्षिणा का दान दें।
- ऊपर दी गई तालिका में बताए पारण समय में तुलसी दल लेकर व्रत खोलें।
- यदि आप पंचरात्रि व्रत रख रहे हैं, तो उसका नियम अपनी परंपरा के अनुसार आगे जारी रखें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या लक्ष्मी-नारायण की मूर्ति या चित्र
- चौकी और पीला कपड़ा
- गंगाजल, शुद्ध जल और कलश
- तुलसी दल (दशमी को तोड़कर रखें)
- पीले फूल, फूलों की माला
- चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल)
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती, कपूर
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- मौसमी फल, नारियल, मिठाई या घर का बना सात्विक भोग
- पान का पत्ता, सुपारी, लौंग, इलायची
- विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या व्रत कथा की पुस्तक
- दान के लिए अन्न, वस्त्र, तिल, घी या दक्षिणा
परमा एकादशी के मंत्र
परमा एकादशी के लिए अलग से कोई प्राचीन विशेष मंत्र नहीं मिलता। इस दिन भगवान विष्णु के प्रसिद्ध मंत्र जपे जाते हैं। पुरुषोत्तम मास का एक प्रसिद्ध श्रीकृष्ण मंत्र भी नीचे दिया गया है, जो परंपरा में इसी कथा के कौण्डिन्य मुनि से जोड़ा जाता है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: सभी प्राणियों में बसे भगवान वासुदेव को नमस्कार है। यह एकादशी और पूरे अधिक मास का सबसे प्रचलित मंत्र है। संभव हो तो एक माला (108 बार) जप करें।
2. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम भगवान नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें। कथा में पवित्रा ने सद्बुद्धि से ही पति को सही निर्णय लेने में मदद की थी।
3. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं, जो आकाश जैसे व्यापक और मेघ जैसे श्याम हैं, जो लक्ष्मी के पति और कमल नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, जो संसार के भय को हरते हैं और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
4. पुरुषोत्तम मास का श्रीकृष्ण मंत्र
गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्। गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्॥
अर्थ: गोवर्धन पर्वत उठाने वाले, गायों के रक्षक, ग्वाले का रूप धरने वाले, गोकुल के आनंद, सबके स्वामी, गोविन्द और गोपियों के प्रिय श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। वैष्णव परंपरा में माना जाता है कि कौण्डिन्य मुनि अधिक मास में प्रतिदिन इसका जप करते थे।
परमा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
परमा एकादशी का व्रत अपनी उम्र, स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार रखें। कथा में कहा गया है कि जो पूरा व्रत न कर सके, वह भी अपनी शक्ति के अनुसार नियम रखे।
क्या खा सकते हैं
- मौसमी फल, जैसे केला, सेब, पपीता, तरबूज़, खरबूजा, संतरा
- दूध, दही, छाछ, मखाना
- साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बनी चीज़ें
- उबला आलू, शकरकंद, अरबी
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
- नारियल पानी, नींबू पानी, सूखे मेवे
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़
- गेहूँ, जौ, मक्का जैसे अनाज और सभी दालें
- प्याज़, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और मदिरा
- सामान्य (आयोडीन वाला) नमक, यदि आप फलाहारी व्रत रख रहे हैं
- बहुत तला-भुना और भारी भोजन
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक न अन्न लिया जाता है, न जल। यह सबसे कठोर रूप है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे रखें। अधिक मास अप्रैल या जून जैसे गर्म महीनों में भी पड़ सकता है, इसलिए शरीर में पानी की कमी का खास ध्यान रखें।
फलाहार व्रत
अधिकतर गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं, जिसमें अन्न नहीं लिया जाता पर फल, दूध, जल और व्रत के अनुकूल चीज़ें ली जाती हैं। जागरण करना हो तो दिन में थोड़ा-थोड़ा फलाहार लेते रहें।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
पूरे दिन उपवास न कर सकें तो दिन में एक बार सात्विक व्रत भोजन लें, जैसे साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू की रोटी और आलू। इसमें भी चावल, अनाज और दालें नहीं ली जातीं।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, दिल या किडनी की बीमारी वाले लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे और नियमित दवा लेने वाले लोग कोई भी कठोर व्रत या पाँच दिन का पंचरात्रि व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह लें। दवा न छोड़ें। ऐसे लोग फलाहार या एक समय भोजन से भी पूरी श्रद्धा के साथ व्रत कर सकते हैं।
परमा एकादशी पारण कब और कैसे करें
एकादशी का व्रत पारण से पूरा होता है, इसलिए इसके नियम ध्यान से समझें:
- पारण द्वादशी तिथि के भीतर ही करें। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण उचित नहीं माना जाता।
- हरि वासर, यानी द्वादशी तिथि के पहले एक-चौथाई भाग में पारण न करें।
- सुबह (प्रातःकाल) का समय पारण के लिए सबसे अच्छा है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचें।
- स्मार्त और वैष्णव परंपरा के पारण समय कभी-कभी अलग होते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
पारण का सही समय आपके शहर के सूर्योदय पर निर्भर है। अंदाज़ा न लगाएँ, ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर का पारण समय देखें।
पारण कैसे करें
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
- किसी ब्राह्मण, गरीब या गाय को भोजन दें। कथा में अतिथि सत्कार का बड़ा महत्व है, इसलिए किसी को भोजन कराकर ही स्वयं भोजन करें।
- पहले तुलसी दल या प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
- फिर हल्का सात्विक भोजन करें। निर्जला व्रत के बाद पहले थोड़ा पानी लें और धीरे-धीरे खाएँ।
परमा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम रूप की पूजा करें और व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का पाठ करें।
- घर आए अतिथि का सम्मान करें, जैसा सुमेधा और पवित्रा ने किया था।
- अन्न, वस्त्र, तिल, घी, जल या पुस्तकों का दान करें।
- शाम को तुलसी और घर के मंदिर में दीपक जलाएँ।
- रात में जागरण या कम से कम कुछ घंटे भजन करें।
- पति-पत्नी साथ मिलकर पूजा करें, क्योंकि कथा में दोनों ने साथ व्रत किया था।
क्या न करें
- चावल, अनाज, दालें और तामसिक भोजन न लें।
- एकादशी पर तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
- क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और झगड़े से बचें।
- किसी गरीब या ज़रूरतमंद का अपमान न करें।
- दिन में सोने से बचें।
- बीमारी में ज़बरदस्ती निर्जला या पाँच दिन का व्रत न रखें।
- अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे नए मांगलिक कार्य शुरू न करें।
परमा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: परमा एकादशी का व्रत रखने से धन अपने आप आ जाएगा, मेहनत की ज़रूरत नहीं।
सच्चाई: कथा में सुमेधा-पवित्रा को व्रत के बाद समृद्धि मिली, इसलिए भक्त धन की कामना से यह व्रत रखते हैं। पर कथा का सार स्वयं कहता है कि धन केवल चाहने से नहीं आता, उसके लिए सच्चा प्रयास चाहिए। व्रत को आस्था और संयम का साधन मानें, मेहनत का विकल्प नहीं।
मिथक: परमा और रमा एकादशी एक ही हैं।
सच्चाई: दोनों अलग हैं। रमा एकादशी हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष में आती है, जबकि परमा एकादशी केवल अधिक मास के कृष्ण पक्ष में, लगभग तीन साल में एक बार।
मिथक: अधिक मास अशुभ है, इसलिए इसमें कोई धार्मिक काम नहीं करना चाहिए।
सच्चाई: परंपरा में अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश जैसे नए मांगलिक कार्य टाले जाते हैं। पर पूजा, जप, व्रत, दान और कथा के लिए इसे सबसे उत्तम महीना माना गया है, क्योंकि भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम दिया।
मिथक: पंचरात्रि व्रत न किया तो परमा एकादशी का कोई फल नहीं।
सच्चाई: पंचरात्रि व्रत एक अतिरिक्त, कठिन नियम है जिसे कथा में विशेष पुण्यदायी कहा गया है। साथ ही कथा कहती है कि जो जितना कर सके, उतना करे। केवल एकादशी का व्रत भी पूरी श्रद्धा से किया जाए तो वह पूर्ण माना जाता है।
मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और कुछ बुरा होगा।
सच्चाई: भूल से कुछ खा लेने पर डरने की ज़रूरत नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें और बाकी दिन संयम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को सबसे बड़ा माना गया है।
मिथक: लंबा उपवास शरीर को पूरी तरह “डिटॉक्स” कर देता है, इसलिए हर किसी को पाँच दिन निर्जला रहना चाहिए।
सच्चाई: एकादशी और पंचरात्रि व्रत आध्यात्मिक साधनाएँ हैं, कोई इलाज नहीं। पाँच दिन बिना पानी के रहना स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हो सकता है। किसी भी लंबे या कठोर व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह लें।
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) क्या है?
अधिक मास क्यों आता है
हिंदू पंचांग में महीने चंद्रमा से और वर्ष सूर्य से जुड़े हैं। बारह चंद्र महीने लगभग 354 दिन में पूरे होते हैं, जबकि सूर्य का एक चक्र लगभग 365 दिन का होता है। हर साल बचने वाले लगभग 11 दिन करीब तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाते हैं।
इस अंतर को पूरा करने के लिए एक अतिरिक्त चंद्र महीना जोड़ा जाता है, ताकि त्योहार अपनी ऋतुओं से न खिसकें। औसतन ऐसा लगभग हर साढ़े बत्तीस महीने में होता है।
अधिक मास का नाम कैसे तय होता है
हर चंद्र महीने में सामान्यतः सूर्य एक नई राशि में प्रवेश करता है, जिसे संक्रांति कहते हैं। जिस चंद्र महीने में कोई संक्रांति नहीं होती, वही अधिक मास बनता है। उसका नाम उसके बाद आने वाले सामान्य महीने पर रखा जाता है। पहले “अधिक” महीना आता है, फिर उसी नाम का “निज” महीना, जैसे 2029 में पहले अधिक चैत्र और फिर निज चैत्र।
भगवान विष्णु का नाम “पुरुषोत्तम”
परंपरा के अनुसार हर महीने का एक स्वामी देवता है, पर इस अतिरिक्त महीने का कोई स्वामी नहीं था। इसे “मलमास” कहा गया और कोई देवता इसका स्वामी बनने को तैयार नहीं हुआ। तब यह भगवान विष्णु की शरण में गया।
भगवान ने इसे अपनाया और अपना नाम “पुरुषोत्तम” दिया, यानी सभी में उत्तम परमात्मा। उन्होंने वरदान दिया कि इस महीने की भक्ति, जप और दान का फल कई गुना होगा। वैष्णव परंपरा में यह भी कहा जाता है कि भगवान विष्णु इसे गोलोक में श्रीकृष्ण के पास ले गए, और श्रीकृष्ण ने इसे अपना नाम और अपने गुण दिए। भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय “पुरुषोत्तम योग” कहलाता है, और कई भक्त इस महीने में रोज़ उसका पाठ करते हैं।
अधिक मास में क्या करें, क्या न करें
- करें: विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा, जप, गीता-भागवत-विष्णु सहस्रनाम का पाठ, दीपदान, तीर्थ स्नान, दान, सात्विक भोजन और सेवा।
- न करें: विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ जैसे नए संस्कार और बड़े नए काम की शुरुआत। इलाज, कर्ज़ चुकाना जैसे ज़रूरी काम रोके नहीं जाते।
पिछले और अगले अधिक मास
हाल के वर्षों में 2020 में अधिक आश्विन, 2023 में अधिक श्रावण और 2026 में अधिक ज्येष्ठ (17 मई से 15 जून) आया। अगला अधिक मास 2029 में अधिक चैत्र होगा, इसलिए अगली परमा एकादशी भी 2029 में ही आएगी।
पंचरात्रि व्रत क्या है?
परमा एकादशी की एक खास परंपरा पंचरात्रि (पाँच रातों का) व्रत है। कथा में कौण्डिन्य मुनि इसे बहुत उत्तम बताते हैं, और सुमेधा-पवित्रा ने भी परमा एकादशी के साथ यह व्रत किया था। कथा पाठों में इसके फल इस तरह बताए गए हैं:
- पाँच दिन बिना जल के व्रत करने वाला अपने माता-पिता और जीवनसाथी के साथ स्वर्ग जाता है।
- जो पाँच दिन केवल शाम को एक बार भोजन करे, उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति कही गई है।
- पाँच दिन स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल पूरे संसार को भोजन कराने के बराबर बताया गया है।
- तिल, घी से भरे पात्र, जल के पात्र या घोड़े के दान का अलग-अलग पुण्य बताया गया है।
- पाँच दिन ब्रह्मचर्य पालन का भी विशेष फल कहा गया है।
- पति-पत्नी साथ में, और चाहें तो दोनों के माता-पिता भी, अपनी शक्ति के अनुसार यह व्रत करें।
पंचरात्रि व्रत कब से शुरू हो, इस पर पाठों में अंतर है, इसलिए अपने परिवार या गुरु परंपरा से पूछकर ही रखें। आज के समय में अधिकतर लोग पाँच दिन निर्जला नहीं रहते, बल्कि फलाहार, एक समय भोजन, ब्रह्मचर्य, जप और दान के रूप में यह नियम निभाते हैं। स्वास्थ्य का ध्यान सबसे पहले रखें।
परमा एकादशी पर दान और समृद्धि की कामना
क्योंकि इस कथा में गरीबी दूर होने का प्रसंग है, कई भक्त इस दिन घर की आर्थिक स्थिति सुधरने की प्रार्थना करते हैं। परंपरा में इसके लिए ये सरल उपाय बताए जाते हैं, जिन्हें आस्था के रूप में अपनाएँ:
- भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें।
- अपनी क्षमता से अन्न, वस्त्र या भोजन का दान करें, जैसे पवित्रा अपने हिस्से का भोजन अतिथि को देती थीं।
- गाय की सेवा करें या गौशाला में चारा दान करें।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- घर में कलह न होने दें और पति-पत्नी साथ बैठकर पूजा करें।
पद्मिनी और परमा एकादशी में अंतर
| बिंदु | पद्मिनी एकादशी | परमा एकादशी |
|---|---|---|
| पक्ष | अधिक मास का शुक्ल पक्ष | अधिक मास का कृष्ण पक्ष |
| क्रम | पहले आती है | लगभग पंद्रह दिन बाद आती है |
| कथा | राजा कृतवीर्य, रानी पद्मिनी, माता अनसूया | ब्राह्मण सुमेधा, पत्नी पवित्रा, कौण्डिन्य मुनि |
| मुख्य कामना | संतान, पाप मुक्ति | दरिद्रता दूर होना, पाप मुक्ति |
| विशेष नियम | चार प्रहर का जागरण | पंचरात्रि व्रत की परंपरा |
परमा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
परंपरा और कथा के अनुसार परमा एकादशी का व्रत श्रद्धा से करने पर ये फल माने जाते हैं। इन्हें आस्था के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं:
- दरिद्रता और आर्थिक कष्ट दूर होने की मान्यता।
- जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति।
- कथा के अनुसार सभी तीर्थों और यज्ञों के बराबर पुण्य, और गया में पितरों को पिंडदान के समान फल।
- अधिक मास में की गई भक्ति का फल कई गुना होने की आस्था।
- घर में सुख-शांति और पति-पत्नी में प्रेम बढ़ने की मान्यता।
- परंपरा के अनुसार अंत में भगवान विष्णु के धाम की प्राप्ति।
संबंधित एकादशी और पाठ
परमा एकादशी से लगभग पंद्रह दिन पहले अधिक मास के शुक्ल पक्ष में पद्मिनी एकादशी आती है, जिसकी कथा रानी पद्मिनी और माता अनसूया की है। अधिक मास की ये दोनों एकादशियाँ साथ में रखना विशेष पुण्यदायी माना गया है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।
परमा एकादशी हमें याद दिलाती है कि कम साधनों में भी उदार मन, अतिथि का सम्मान और भगवान पर भरोसा जीवन को सच्चा धनवान बनाते हैं। यह अवसर लगभग तीन साल में एक बार आता है, इसलिए इस दिन किसी भूखे को भोजन कराएँ, एक दीपक जलाएँ और कुछ समय नाम जप में बिताएँ। भगवान पुरुषोत्तम और माता लक्ष्मी आपके घर को सुख, शांति और समृद्धि से भर दें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
परमा एकादशी 2029 कब है?
परमा एकादशी 2026 (11 जून) बीत चुकी है और 2027 व 2028 में अधिक मास नहीं है। अगली परमा एकादशी की तारीख, तिथि और आपके शहर का पारण समय इस पेज पर ऊपर दिए संक्षिप्त उत्तर और तारीख तालिका में देखें।
परमा एकादशी किस महीने में आती है?
यह अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की एकादशी है। जिस साल जो महीना अधिक होता है, उसी में यह आती है, जैसे 2026 में अधिक ज्येष्ठ और 2029 में अधिक चैत्र।
परमा एकादशी हर साल क्यों नहीं आती?
क्योंकि यह केवल अधिक मास में आती है, जो लगभग हर 32 से 33 महीने में एक बार जुड़ता है। इसलिए यह एकादशी लगभग तीन साल में एक बार आती है।
अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहते हैं?
परंपरा के अनुसार इस अतिरिक्त महीने का कोई स्वामी देवता नहीं था और इसे मलमास कहा जाता था। भगवान विष्णु ने इसे अपनाकर अपना नाम पुरुषोत्तम दिया, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहते हैं।
परमा एकादशी का अर्थ क्या है?
“परम” का अर्थ है सबसे श्रेष्ठ। कथा में श्रीकृष्ण इस पुण्यदायी दिन को परमा एकादशी कहते हैं, और भक्त इसे परम सुख और परम पद देने वाली एकादशी मानते हैं।
परमा एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु की पुरुषोत्तम रूप में धूप, दीप, नैवेद्य और फूलों से पूजा होती है। समृद्धि की कामना से कई भक्त माता लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं।
परमा एकादशी की व्रत कथा संक्षेप में क्या है?
काम्पिल्य नगर के गरीब ब्राह्मण सुमेधा और उनकी पत्नी पवित्रा ने अभाव में भी कौण्डिन्य मुनि का सत्कार किया। मुनि के बताने पर दोनों ने परमा एकादशी और पंचरात्रि व्रत किया, और ब्रह्मा जी की प्रेरणा से आए एक राजकुमार ने उन्हें घर और गाँव दिया।
परमा एकादशी की कथा में कुबेर का क्या प्रसंग है?
कथा में कौण्डिन्य मुनि बताते हैं कि कुबेर ने यह व्रत किया था और भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उन्हें धन का स्वामी बनाया। इसी कारण यह व्रत धन और समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है।
परमा एकादशी का वर्णन किस पुराण में है?
परंपरा के अनुसार इसकी कथा स्कंद पुराण से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को इसका माहात्म्य सुनाते हैं। कुछ हिंदी पाठ किसी पुराण का नाम नहीं लेते।
पंचरात्रि व्रत क्या है?
यह परमा एकादशी से जुड़ा पाँच रातों का व्रत है, जिसे कथा में विशेष पुण्यदायी बताया गया है। इसकी शुरुआत को लेकर पाठों में अंतर है, इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार और स्वास्थ्य देखकर ही रखें।
परमा एकादशी पर क्या खाएँ?
फलाहार व्रत में फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक ले सकते हैं। चावल, अनाज, दालें, प्याज़ और लहसुन नहीं लिए जाते।
क्या परमा एकादशी पर पानी पी सकते हैं?
हाँ, यदि आप निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं तो पानी, दूध और फलाहार ले सकते हैं। निर्जला व्रत केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही रखें।
क्या परमा एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं। सभी एकादशियों की तरह इस दिन भी चावल और चावल से बनी चीज़ें वर्जित मानी जाती हैं।
परमा एकादशी का पारण कब करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि के भीतर, हरि वासर समाप्त होने के बाद, सुबह के समय करें। अपने शहर का सही पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।
स्मार्त और वैष्णव परमा एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो सूर्योदय को छूती है या दशमी से मिलती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) व्रत अलग दिन हो सकते हैं। 2029 में दोनों का दिन एक ही बताया गया है। अपनी परंपरा के अनुसार तालिका देखें।
परमा एकादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?
सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। विष्णु गायत्री मंत्र और पुरुषोत्तम मास का मंत्र “गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्…” भी जपा जाता है।
क्या परमा और रमा एकादशी एक ही हैं?
नहीं। रमा एकादशी हर साल कार्तिक कृष्ण पक्ष में आती है, जबकि परमा एकादशी केवल अधिक मास के कृष्ण पक्ष में आती है।
पद्मिनी और परमा एकादशी में क्या अंतर है?
दोनों अधिक मास में आती हैं। पद्मिनी शुक्ल पक्ष में पहले आती है और इसकी कथा रानी पद्मिनी की है, जबकि परमा कृष्ण पक्ष में लगभग पंद्रह दिन बाद आती है और इसकी कथा सुमेधा और पवित्रा की है।
गर्भवती महिलाएँ या बुज़ुर्ग परमा एकादशी का व्रत कैसे रखें?
वे निर्जला या पाँच दिन का व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें, दवाएँ न छोड़ें और पूजा, कथा व नाम जप से व्रत का भाव पूरा करें।
अगर गलती से व्रत टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें और बाकी दिन संयम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को सबसे बड़ा माना गया है।