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श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027 (Shravana Putrada Ekadashi): कब है, व्रत कथा, पूजा विधि, पारण और पवित्रा एकादशी

अंतिम अपडेट: 27 मिनट पढ़ें लेखक: admin

श्रावण पुत्रदा एकादशी (Shravana Putrada Ekadashi) सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे भगवान विष्णु की उपासना और संतान सुख की कामना से जुड़ा पावन व्रत माना जाता है। इसे सावन पुत्रदा एकादशी, पवित्रा एकादशी और पवित्रोपना एकादशी भी कहते हैं। “पुत्रदा” का अर्थ है — संतान देने वाली।

परंपरा के अनुसार जिन दंपतियों को संतान की प्रतीक्षा है, वे यह व्रत श्रद्धा से रखते हैं, और जिनके बच्चे हैं, वे उनके अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करते हैं। वैष्णव मंदिरों में इसी दिन भगवान को रेशमी या सूती धागों की “पवित्रा” माला अर्पित की जाती है और कई जगह झूलन उत्सव का आरंभ होता है।

नीचे श्रावण पुत्रदा एकादशी की अगली तारीख, पारण समय, राजा महीजित और लोमश ऋषि की व्रत कथा, पूजा विधि, संतान गोपाल मंत्र, पवित्रारोपण की परंपरा और पौष पुत्रदा से इसका अंतर — सब सरल भाषा में दिया गया है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: 2026 की श्रावण पुत्रदा एकादशी (23 अगस्त) बीत चुकी है। अगली श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत गुरुवार, 12 अगस्त 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 12 अगस्त की रात 12:58 बजे से 13 अगस्त की रात 2:59 बजे तक रहेगी और पारण 13 अगस्त को दोपहर लगभग 1:45 से 4:24 बजे के बीच होगा।

अगली श्रावण पुत्रदा एकादशी

श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027

12 अगस्त 2027, गुरुवार 284 दिन बाकी

मास और पक्ष
श्रावण शुक्ल
एकादशी तिथि
12 अग 01:00 – 13 अग 03:01
पारण (व्रत खोलने का समय)
13 अग, 13:45 – 16:24
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202623 अगस्त 2026, रविवार
वैष्णव: 24 अग
23 अग 02:01 –
24 अग 04:20
24 अग, 13:41 – 16:16
202712 अगस्त 2027, गुरुवार12 अग 01:00 –
13 अग 03:01
13 अग, 13:45 – 16:24
20281 अगस्त 2028, मंगलवार31 जुला 08:51 –
1 अग 08:53
2 अग, 05:43 – 08:24
202920 अगस्त 2029, सोमवार19 अग 08:29 –
20 अग 07:31
21 अग, 05:53 – 06:55

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर की तालिका में अपने शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले तीन वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप अपडेट होकर दिखता है। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के हिसाब से ही देखें।

स्मार्त और वैष्णव: गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा सूर्योदय के समय की तिथि को मानती है, जबकि वैष्णव (इस्कॉन आदि) परंपरा में दशमी से जुड़ी एकादशी छोड़कर अगले दिन व्रत रखा जाता है। जब दोनों तारीखें अलग हों, तो अपनी कुल या संप्रदाय की परंपरा का पालन करें।

श्रावण पुत्रदा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“पुत्रदा” दो शब्दों से बना है — “पुत्र” (संतान) और “दा” (देने वाली)। व्रत कथा में राजा महीजित को इसी व्रत के पुण्य से संतान प्राप्त हुई, इसलिए यह एकादशी पुत्रदा कहलाई। आज के समय में “पुत्र” शब्द को संतान, यानी बेटा और बेटी दोनों, के अर्थ में समझना अधिक उचित है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी के अन्य नाम

  • सावन पुत्रदा एकादशी — उत्तर भारत में आम बोलचाल का नाम।
  • पवित्रा एकादशी — इस दिन भगवान को “पवित्रा” (धागों की माला) अर्पित करने की परंपरा के कारण।
  • पवित्रोपना / पवित्रारोपण एकादशी — “पवित्रा का आरोपण” यानी पवित्रा पहनाने का दिन। इस्कॉन और गौड़ीय वैष्णव पंचांगों में यही नाम प्रचलित है।
  • श्रावण शुक्ल एकादशी — पंचांग में तिथि का नाम।

किस महीने में आती है? (पूर्णिमांत और अमांत)

यह एकादशी शुक्ल पक्ष की है, और शुक्ल पक्ष का महीना पूर्णिमांत (उत्तर भारत) और अमांत (दक्षिण व पश्चिम भारत) दोनों पंचांगों में एक ही होता है। इसलिए हर जगह इसे श्रावण शुक्ल एकादशी ही कहा जाता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः जुलाई के अंत से अगस्त के बीच पड़ती है।

इससे ठीक पहले वाली कामिका एकादशी कृष्ण पक्ष की है, इसलिए उसका महीना अलग-अलग बताया जाता है — उत्तर भारत में श्रावण कृष्ण और अमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण। श्रावण पुत्रदा के बाद श्रावण पूर्णिमा (रक्षा बंधन) आती है।

साल में दो पुत्रदा एकादशी

पुत्रदा एकादशी साल में दो बार आती है — एक श्रावण शुक्ल पक्ष में और दूसरी पौष शुक्ल पक्ष में। उत्तर भारत में पौष वाली अधिक प्रसिद्ध है, जबकि श्रावण वाली उत्तर भारत के बाहर कई क्षेत्रों और वैष्णव परंपराओं में अधिक प्रचलित है। दोनों के अंतर को नीचे एक तालिका में समझाया गया है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी का महत्व

सावन का पूरा महीना भक्ति का माना जाता है। इसमें भगवान शिव की आराधना के साथ-साथ एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा का विशेष स्थान है। चातुर्मास के इन दिनों में भगवान विष्णु योगनिद्रा में माने जाते हैं, और भक्त व्रत, जप और सेवा से अपना मन उनमें लगाते हैं।

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत संतान सुख, परिवार की उन्नति और पापों से मुक्ति की कामना से रखा जाता है। कथा में कहा गया है कि इस एकादशी की महिमा सुनने मात्र से मन के दोष दूर होते हैं और इस लोक में सुख तथा परलोक में सद्गति मिलती है। माता-पिता अपने बच्चों के स्वास्थ्य और संस्कार के लिए भी यह व्रत रखते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

इस एकादशी की कथा का सबसे गहरा संदेश करुणा है। राजा महीजित के दुख का कारण पिछले जन्म में एक प्यासी गाय को पानी पीने से रोकना बताया गया है। यानी किसी भी जीव के प्रति छोटी-सी निर्दयता भी मन पर भार बन सकती है, और सामूहिक प्रार्थना व सेवा से वह भार हल्का होता है।

कथा का दूसरा संदेश है — दूसरों के लिए प्रार्थना। राजा के लिए उसकी प्रजा और मंत्रियों ने मिलकर व्रत रखा और अपना पुण्य उसे अर्पित किया। यह बताता है कि परिवार और समाज एक-दूसरे का सहारा बनकर बड़े दुख भी पार कर सकते हैं।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार श्रावण पुत्रदा एकादशी की कथा भविष्य पुराण (भविष्योत्तर पुराण) में मिलती है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को वर्ष की सभी एकादशियों की महिमा बताते हैं। एकादशी माहात्म्य के लोकप्रिय संग्रहों में भी यह कथा इसी रूप में पढ़ी जाती है। कुछ कथा पाठों में श्रोता अर्जुन बताए गए हैं।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — “हे मधुसूदन! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसका व्रत कैसे किया जाता है और उसका क्या फल है? कृपा करके बताइए।”

भगवान श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन! इस एकादशी का नाम पुत्रदा है। इसकी कथा सुनने मात्र से मनुष्य के पाप दूर होते हैं। ध्यान से सुनिए।”

राजा महीजित का दुख

द्वापर युग के आरंभ में माहिष्मती नाम की एक सुंदर नगरी थी। वहाँ महीजित नाम के राजा राज करते थे। वे धर्मात्मा थे, प्रजा का पालन पुत्र के समान करते थे और उनके राज्य में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। फिर भी एक दुख उन्हें भीतर ही भीतर खाए जा रहा था — उनके कोई संतान नहीं थी।

बहुत समय बीत गया। राजा को अपना वैभव और राजपाट भी फीका लगने लगा। एक दिन उन्होंने अपने मंत्रियों, ब्राह्मणों और प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा — “मैंने जीवन में कभी अन्याय से धन नहीं लिया, किसी का अधिकार नहीं छीना और प्रजा को अपनी संतान माना। फिर भी मुझे संतान का सुख क्यों नहीं मिला? इसका कारण खोजिए।”

लोमश ऋषि से भेंट

राजा का दुख देखकर मंत्री और प्रजा के लोग उपाय खोजने वन की ओर चल पड़े। वहाँ वे अनेक ऋषियों के आश्रमों में गए। अंत में उन्हें महान तपस्वी लोमश ऋषि के दर्शन हुए। लोमश ऋषि अत्यंत दीर्घायु, वेदों के ज्ञाता और भूत-भविष्य जानने वाले माने जाते थे। कथा में कहा गया है कि उनके शरीर से एक-एक रोम (बाल) एक-एक कल्प बीतने पर गिरता है, इसीलिए वे लोमश कहलाए।

सबने ऋषि को प्रणाम किया। ऋषि ने आने का कारण पूछा। मंत्रियों ने हाथ जोड़कर कहा — “हे महर्षि! हमारे राजा महीजित धर्मात्मा हैं, पर संतानहीन हैं। उनके दुख से पूरी प्रजा दुखी है। कृपया बताइए कि उन्हें संतान का सुख कैसे मिले।”

पिछले जन्म का रहस्य

लोमश ऋषि ने कुछ क्षण ध्यान लगाया और राजा के पिछले जन्म को देखा। फिर बोले — “पिछले जन्म में यह राजा एक निर्धन वैश्य (व्यापारी) था। धन के लिए वह गाँव-गाँव घूमता था और कई बार उससे अनुचित कर्म भी हुए। एक बार ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में वह दो दिन तक भूखा-प्यासा भटकता रहा।”

“दोपहर के समय, तेज़ गर्मी में वह पानी पीने के लिए एक जलाशय पर पहुँचा। वहाँ एक गाय, जिसने हाल ही में बछड़े को जन्म दिया था, प्यास से व्याकुल होकर पानी पी रही थी। उस व्यापारी ने गाय को हटा दिया और स्वयं पानी पी लिया। प्यासी गाय को पानी से रोकने के इसी पाप के कारण इस जन्म में उसे संतान का दुख मिला है।”

“पर अनजाने में ही सही, उन दो दिनों में उसका एकादशी का उपवास हो गया था। उसी पुण्य से उसे इस जन्म में राजपद मिला।”

व्रत का उपाय

प्रजा के लोगों ने पूछा — “हे मुनिवर! इस पाप के प्रभाव को दूर करने का कोई उपाय बताइए।” लोमश ऋषि बोले — “श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहते हैं। तुम सब लोग विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करो, रात्रि में जागरण करके भगवान विष्णु का कीर्तन करो, और अगले दिन द्वादशी को इस व्रत का पुण्य अपने राजा को अर्पित कर दो। इससे राजा का दोष दूर होगा और उन्हें संतान प्राप्त होगी।”

मंत्री और प्रजा प्रसन्न होकर नगर लौटे और राजा को सब बताया। श्रावण शुक्ल एकादशी आने पर मंत्रियों और प्रजा ने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा, रात भर जागरण किया और द्वादशी के दिन संकल्प करके अपना पुण्य राजा को अर्पित कर दिया।

व्रत का फल

उस पुण्य के प्रभाव से रानी गर्भवती हुईं और समय आने पर उन्होंने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा का दुख दूर हो गया और पूरी माहिष्मती नगरी में आनंद छा गया।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा — “हे युधिष्ठिर! इसीलिए इस एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। जो व्यक्ति श्रद्धा से इसका व्रत करता है, उसे इस लोक में सुख और परलोक में उत्तम गति मिलती है। जो इसकी कथा पढ़ता या सुनता है, उसे बड़े यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।”

कथा के अलग-अलग रूप

  • अधिकतर कथा पाठों में श्रोता युधिष्ठिर हैं; कुछ में भगवान यह कथा अर्जुन को सुनाते हैं।
  • राजा का नाम महीजित (कहीं महाजित) और ऋषि का नाम लोमश (कहीं लोमेश) लिखा मिलता है।
  • कुछ पाठों में पिछले जन्म की घटना ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी की बताई गई है, कुछ में एकादशी की। कहीं केवल “गाय”, कहीं “गाय और उसका बछड़ा” लिखा है।
  • अधिकतर पाठों में व्रत मंत्रियों और प्रजा ने रखा; कुछ आधुनिक पाठों में राजा-रानी ने भी साथ में व्रत रखा।
  • फलश्रुति में किसी पाठ में वाजपेय यज्ञ और किसी में अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य बताया गया है।

संतान की कामना और श्रावण पुत्रदा एकादशी: आस्था की दृष्टि से

श्रावण पुत्रदा एकादशी का नाम ही संतान से जुड़ा है, इसलिए बहुत से दंपति बड़ी उम्मीद के साथ यह व्रत रखते हैं। यह व्रत पूरी तरह आस्था, प्रार्थना और भगवान के प्रति समर्पण का विषय है। इसे किसी चिकित्सा उपचार या निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।

व्रत का सही भाव

  • व्रत को भगवान से “सौदा” न मानें। इसे मन की शांति, धैर्य और प्रार्थना का माध्यम समझें।
  • पति-पत्नी दोनों साथ मिलकर संकल्प, पूजा और कथा-श्रवण कर सकते हैं। कथा में भी पूरी प्रजा ने मिलकर प्रार्थना की थी — परिवार का साथ अपने आप में बड़ा सहारा है।
  • प्रार्थना बेटा या बेटी के भेद के बिना, स्वस्थ और संस्कारी संतान के लिए करें।
  • जिनके बच्चे हैं, वे उनके स्वास्थ्य, पढ़ाई और अच्छे भविष्य के लिए यह व्रत रख सकते हैं।
  • दादा-दादी, नाना-नानी या परिवार का कोई भी सदस्य किसी प्रियजन के लिए यह व्रत रख सकता है, जैसे कथा में प्रजा ने अपने राजा के लिए रखा।

आस्था के साथ डॉक्टर की सलाह भी

यदि संतान होने में देर हो रही है, तो व्रत और प्रार्थना के साथ-साथ किसी योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञ या फर्टिलिटी डॉक्टर से सलाह लेना भी उतना ही ज़रूरी है। आस्था और आधुनिक चिकित्सा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बहुत से परिवार दोनों का सहारा लेते हैं।

जो महिलाएँ उपचार ले रही हैं, गर्भवती हैं या कोई दवा ले रही हैं, वे कठोर या निर्जला व्रत न रखें। फलाहार, दूध या केवल पूजा और मंत्र जप से भी व्रत का भाव पूरा माना जाता है। डॉक्टर से एक बार अवश्य पूछ लें।

पवित्रा एकादशी: भगवान को पवित्रा अर्पित करने की परंपरा

श्रावण पुत्रदा एकादशी को “पवित्रा” या “पवित्रोपना” एकादशी इसलिए कहते हैं क्योंकि इस समय भगवान को पवित्रा अर्पित की जाती है। पवित्रा रेशमी या सूती धागों से बनी एक माला होती है, जिसमें गाँठें लगाई जाती हैं और कई बार छोटे-छोटे फूल या फुँदने भी गूँथे जाते हैं।

पवित्रारोपण का अर्थ

आगम परंपरा में पवित्रारोपण को वर्ष भर की पूजा में हुई भूल-चूक — जैसे मंत्र का गलत उच्चारण, विधि में कमी या मन का भटकना — के लिए क्षमा माँगने और पूजा को फिर से पूर्ण करने का अनुष्ठान माना गया है। यानी भक्त भगवान से कहता है, “मेरी सेवा में जो कमी रह गई, उसे स्वीकार कर लीजिए।”

मंदिरों और संप्रदायों में

  • इस्कॉन और गौड़ीय वैष्णव मंदिरों में इस दिन भगवान को पवित्र धागे और मालाएँ अर्पित की जाती हैं और यहीं से झूलन यात्रा का उत्सव शुरू होता है, जो श्रावण पूर्णिमा तक चलता है।
  • पुष्टिमार्ग (वल्लभ संप्रदाय) में पवित्रा एकादशी सबसे बड़े उत्सवों में से एक है। परंपरा के अनुसार इसी तिथि पर श्री वल्लभाचार्य जी को भगवान श्रीकृष्ण से दीक्षा मिली थी, उसकी स्मृति में भक्त ठाकुर जी को पवित्रा धारण कराते हैं और हिंडोला दर्शन होते हैं।
  • कई क्षेत्रों में पवित्रारोपण का दिन देवता और स्थानीय परंपरा के अनुसार बदलता है — कहीं एकादशी, कहीं द्वादशी, कहीं पूर्णिमा।

घर पर पवित्रा कैसे अर्पित करें

घर पर आप साफ़ पीले या लाल सूती/रेशमी धागों की एक छोटी माला बनाकर, उसमें श्रद्धा से कुछ गाँठें लगाकर, भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या बाल गोपाल को पहना सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में घी या पंचामृत में डुबोई रुई की बत्तियाँ भी पवित्रा के रूप में चढ़ाई जाती हैं। बाल गोपाल को छोटे झूले में बिठाकर झुलाना भी इस दिन शुभ माना जाता है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

पूजा विधि बहुत कठिन नहीं है। मुख्य बात है — श्रद्धा, साफ़-सफ़ाई और नियम। नीचे दशमी से द्वादशी तक का पूरा क्रम दिया गया है।

  1. दशमी की तैयारी: एकादशी से एक दिन पहले दशमी को सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन करें। चावल, लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा से दूर रहें। रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में व्रत का निश्चय करें।
  2. प्रातः स्नान: एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें। स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें। पीले रंग के वस्त्र विष्णु पूजा में शुभ माने जाते हैं।
  3. पूजा स्थान की तैयारी: घर के पूजा स्थान को साफ़ करें, गंगाजल छिड़कें और एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या बाल गोपाल की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  4. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और मनोकामना मन में कहते हुए संकल्प लें — “मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत करूँगा/करूँगी।” दंपति साथ बैठकर संकल्प ले सकते हैं।
  5. कलश और दीप: एक कलश में जल भरकर उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें। घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  6. भगवान का पूजन: भगवान को जल या पंचामृत से स्नान कराएँ (प्रतिमा हो तो), फिर चंदन, पीले फूल, तुलसी दल, अक्षत और वस्त्र अर्पित करें। तुलसी दल एक दिन पहले तोड़कर रखें, क्योंकि एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
  7. पवित्रा अर्पण: यदि आपकी परंपरा में हो, तो धागों की पवित्रा भगवान को पहनाएँ और पूजा की भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।
  8. भोग: मौसमी फल, केला, नारियल, पंचामृत, मखाने की खीर या माखन-मिश्री का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  9. मंत्र जप और कथा: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या संतान गोपाल मंत्र का जप करें। फिर श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें। परंपरा में कथा सुनना व्रत का आवश्यक अंग माना गया है।
  10. आरती: अंत में ॐ जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें। तुलसी जी के पास दीपक जलाकर तुलसी माता की आरती भी कर सकते हैं।
  11. दिन भर: दिन में सोने से बचें, भजन-कीर्तन, विष्णु सहस्रनाम या गीता पाठ करें। किसी से विवाद न करें। पशु-पक्षियों के लिए पानी और गाय को चारा देना इस कथा के भाव से जुड़ा सुंदर सेवा कार्य है।
  12. संध्या पूजा: शाम को फिर से दीपक जलाकर भगवान की आरती करें और तुलसी के पास दीपदान करें।
  13. रात्रि जागरण: कथा में प्रजा ने रात भर जागरण किया था, इसलिए इस एकादशी पर जागरण का विशेष महत्व है। जितना संभव हो, रात में भजन-कीर्तन करें। स्वास्थ्य ठीक न हो तो कुछ समय जागरण करके विश्राम कर सकते हैं।
  14. द्वादशी और पारण: अगले दिन स्नान करके भगवान की पूजा करें, किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या वस्त्र का दान दें और फिर ऊपर तालिका में बताए पारण समय में व्रत खोलें। कथा की परंपरा में चाहें तो पारण से पहले अपना पुण्य किसी प्रियजन की भलाई के लिए भगवान को अर्पित कर सकते हैं।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या बाल गोपाल की प्रतिमा या चित्र
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • कलश, आम के पत्ते, नारियल
  • गंगाजल और साफ़ जल
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल — केवल पूजा के लिए)
  • पीले फूल और फूलों की माला
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
  • पवित्रा — रेशमी या सूती धागों की माला (यदि परंपरा हो)
  • घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप-अगरबत्ती, कपूर
  • मौसमी फल, केला, सूखे मेवे, मिश्री, माखन
  • पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची
  • बाल गोपाल के लिए छोटा झूला (वैकल्पिक)
  • व्रत कथा की पुस्तक या पाठ
  • दान के लिए अन्न, वस्त्र या दक्षिणा

श्रावण पुत्रदा एकादशी के मंत्र

इस दिन भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के मंत्रों का जप शुभ माना जाता है। मंत्र शुद्ध उच्चारण और शांत मन से जपें। संख्या से अधिक महत्व श्रद्धा का है — 108 बार जप सामान्य परंपरा है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण / विष्णु) को नमन करता हूँ। यह बारह अक्षरों वाला मंत्र हर एकादशी पर जपा जाता है और इसे सबसे सरल विष्णु मंत्रों में गिना जाता है।

2. संतान गोपाल मंत्र

ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥

अर्थ: हे देवकी नंदन, हे गोविंद, हे वासुदेव, हे जगत के स्वामी श्रीकृष्ण! मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे संतान का आशीर्वाद दीजिए। यह पंक्ति संतान गोपाल स्तोत्र में भी आती है और संतान की कामना के लिए परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है। इसके बीज मंत्र वाले रूप किसी गुरु या पुरोहित से समझकर ही जपें।

3. अष्टाक्षर मंत्र

ॐ नमो नारायणाय॥

अर्थ: मैं भगवान नारायण को नमन करता हूँ। यह छोटा और सरल मंत्र है, जिसे दिन भर चलते-फिरते भी मन में जपा जा सकता है।

4. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम भगवान नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं — वे विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें।

दोनों पुत्रदा एकादशी में अंतर (श्रावण और पौष)

बहुत से लोग दोनों पुत्रदा एकादशियों को एक ही समझ लेते हैं। दोनों का नाम और उद्देश्य (संतान की कामना) मिलता-जुलता है, पर महीना, कथा और परंपराएँ अलग हैं। पौष वाली एकादशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए हमारा पौष पुत्रदा एकादशी लेख देखें।

बिंदुश्रावण पुत्रदा एकादशीपौष पुत्रदा एकादशी
तिथिश्रावण शुक्ल एकादशीपौष शुक्ल एकादशी
अंग्रेज़ी महीना (लगभग)जुलाई – अगस्तदिसंबर – जनवरी
ऋतुवर्षा ऋतु, चातुर्मास के बीचशीत ऋतु, चातुर्मास के बाद
कथा के पात्रराजा महीजित, माहिष्मती नगरी, लोमश ऋषिराजा सुकेतुमान, रानी शैब्या, भद्रावती नगरी, विश्वेदेव
संतान न होने का कारण (कथा में)पिछले जन्म में प्यासी गाय को पानी पीने से रोकने का पापकारण नहीं बताया गया, विश्वेदेव सीधे व्रत बताते हैं
व्रत किसने रखा (कथा में)मंत्रियों और प्रजा ने, और पुण्य राजा को अर्पित कियास्वयं राजा ने
अन्य नामपवित्रा / पवित्रोपना एकादशीवैकुंठ / मुक्कोटी एकादशी (जब धनुर्मास में पड़े)
किस क्षेत्र में अधिक प्रचलितउत्तर भारत के बाहर कई क्षेत्रों और वैष्णव परंपराओं मेंउत्तर भारत में अधिक प्रसिद्ध
विशेष परंपरापवित्रा अर्पण, झूलन उत्सव, पुष्टिमार्ग में पवित्रा एकादशीबाल गोपाल पूजा, दक्षिण में वैकुंठ द्वार दर्शन

दोनों एकादशियों का मूल भाव एक ही है — भगवान विष्णु से संतान और परिवार के कल्याण की प्रार्थना। जो दंपति इस कामना से व्रत रखते हैं, वे परंपरा के अनुसार दोनों पुत्रदा एकादशी कर सकते हैं।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का मूल नियम है — अन्न (अनाज) का त्याग। सावन बरसात का महीना है, जिसमें पाचन कमज़ोर रहता है और पानी व खाने से जुड़े संक्रमण बढ़ जाते हैं। इसलिए फलाहार हल्का, ताज़ा और साफ़ रखें।

व्रत में क्या खा सकते हैं

  • ऋतु फल — केला, सेब, पपीता, नाशपाती, अनार, जामुन (अच्छी तरह धोकर)
  • आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू, लौकी जैसी सब्ज़ियाँ (सेंधा नमक के साथ)
  • कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा (चौलाई) का आटा; साबूदाना और समा (व्रत के चावल)
  • दूध, दही, पनीर, छाछ और घी
  • मखाना, मूँगफली, बादाम, अखरोट, किशमिश, खजूर
  • नारियल पानी, नींबू पानी, सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा

व्रत में क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़ — एकादशी पर इसे सबसे अधिक वर्जित माना जाता है
  • गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा जैसे सभी अनाज
  • दालें, चना, राजमा, सोयाबीन जैसी फलियाँ
  • लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा, शराब और तंबाकू
  • साधारण (आयोडीन युक्त) नमक — इसकी जगह सेंधा नमक लें
  • बासी, खुले में रखा या बाहर का तला हुआ खाना — बरसात में यह जल्दी खराब होता है

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठोर व्रत है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे रखें। जब पारण अगले दिन दोपहर में हो (जैसा 2027 में है), तो व्रत की अवधि लंबी हो जाती है — इसलिए निर्जला व्रत का निर्णय सोच-समझकर लें।

फलाहार व्रत

ज़्यादातर गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें दिन में फल, दूध और ऊपर बताई गई व्रत की चीज़ें ली जा सकती हैं। पानी पीने में कोई दोष नहीं माना जाता। उमस भरे मौसम में शरीर में पानी की कमी न हो, इसका ध्यान रखें।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा उपवास नहीं रख सकते, वे दिन में केवल एक बार फलाहारी भोजन करते हैं। बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और कमज़ोर शरीर वालों के लिए यह अच्छा विकल्प है। मधुमेह, हृदय रोग, गर्भावस्था, स्तनपान या नियमित दवा लेने वाले लोग किसी भी तरह का कठोर व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

श्रावण पुत्रदा एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण यानी व्रत खोलना। परंपरा में व्रत का पूरा फल तभी माना जाता है जब पारण सही समय पर हो। अपने शहर का समय ऊपर दी गई तालिका में देखें।

पारण के मुख्य नियम

  • पारण एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि के भीतर किया जाता है। द्वादशी समाप्त होने के बाद पारण उचित नहीं माना गया।
  • हरिवासर (द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग) में पारण नहीं करना चाहिए। हरिवासर समाप्त होने का इंतज़ार करें।
  • पारण के लिए सबसे अच्छा समय प्रातःकाल माना जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है; यदि हरिवासर के कारण सुबह संभव न हो, तो मध्याह्न के बाद पारण किया जाता है।
  • स्मार्त और वैष्णव तारीखें अलग हों, तो दोनों का पारण भी अलग दिन होगा। अपनी परंपरा वाली पंक्ति ही देखें।

2027 में पारण दोपहर में क्यों है?

2027 में एकादशी तिथि आधी रात के बाद शुरू होकर अगली रात समाप्त हो रही है। इसलिए द्वादशी का पहला चौथाई भाग (हरिवासर) अगली सुबह तक चलता है। हरिवासर खत्म होने तक प्रातःकाल बीत जाता है, और मध्याह्न से बचने के नियम के कारण पंचांगों में पारण का समय दोपहर बाद दिया गया है। इसलिए ऊपर संक्षिप्त उत्तर में दिया गया समय ही देखें, सुबह जल्दी पारण न करें।

पारण कैसे करें

  1. द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी दल चढ़ाएँ।
  2. किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद या गौशाला में अन्न, फल या दक्षिणा का दान करें।
  3. भगवान को भोग लगाए गए प्रसाद या तुलसी दल डले जल से व्रत खोलें।
  4. पहला भोजन हल्का और सात्विक रखें। पारण में चावल खाए जा सकते हैं, क्योंकि चावल का निषेध केवल एकादशी के दिन है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु या बाल गोपाल को तुलसी दल, पीले फूल और फल अर्पित करें।
  • व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ बैठकर सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या संतान गोपाल मंत्र का जप करें।
  • गाय को चारा और पशु-पक्षियों के लिए पानी रखें — यह इस कथा का मुख्य संदेश है।
  • रात में जितना संभव हो, भजन-कीर्तन और जागरण करें।
  • द्वादशी को दान करके सही समय पर पारण करें।
  • बच्चों के साथ मिलकर पूजा करें, उन्हें कथा सुनाएँ।

क्या न करें

  • चावल, अनाज, दालें, लहसुन-प्याज और तामसिक भोजन न खाएँ।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • किसी जीव को सताएँ नहीं, प्यासे को पानी देने से मना न करें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें।
  • दिन में सोने से बचें (बीमार और बुजुर्ग इसमें छूट ले सकते हैं)।
  • बेटा-बेटी में भेद करने वाली बातें न करें।
  • हरिवासर में या द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न करें।
  • स्वास्थ्य ठीक न होने पर ज़बरदस्ती कठोर व्रत न रखें।

श्रावण पुत्रदा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: यह व्रत करने से संतान अवश्य हो जाती है।

सच्चाई: परंपरा इस व्रत को संतान की कामना से जुड़ी प्रार्थना मानती है, कोई गारंटी नहीं। यह आस्था और मन की शांति का माध्यम है। संतान से जुड़ी किसी भी समस्या में योग्य डॉक्टर की सलाह लेना ज़रूरी है — प्रार्थना और उपचार साथ-साथ चल सकते हैं।

मिथक: पुत्रदा एकादशी केवल बेटे के लिए होती है।

सच्चाई: पुराने पाठों में “पुत्र” शब्द आता है, क्योंकि उस समय की भाषा ऐसी थी। व्रत का मूल भाव संतान सुख और वंश का कल्याण है। आज बेटा और बेटी दोनों के लिए समान भाव से यह प्रार्थना की जाती है।

मिथक: यह व्रत केवल निःसंतान दंपति ही रख सकते हैं।

सच्चाई: कोई भी भक्त यह व्रत रख सकता है। माता-पिता बच्चों की भलाई के लिए, और परिवार के बड़े किसी प्रियजन के लिए यह व्रत रखते हैं। कथा में भी राजा के लिए पूरी प्रजा ने व्रत रखा था।

मिथक: व्रत केवल निर्जला रखने से ही फल मिलता है।

सच्चाई: शास्त्रों में निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन — सभी रूप बताए गए हैं। अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखना ही उचित है। गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग, मधुमेह के रोगी और दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से हल्का व्रत या केवल पूजा-जप कर सकते हैं।

मिथक: पवित्रा अर्पण केवल मंदिरों के पुजारी कर सकते हैं।

सच्चाई: मंदिरों में पवित्रारोपण विशेष विधि से होता है, पर घर पर भी भक्त श्रद्धा से साफ़ धागों की छोटी पवित्रा बनाकर भगवान को पहना सकते हैं। इसका भाव पूजा की भूल-चूक के लिए क्षमा माँगना है, किसी जटिल नियम का पालन नहीं।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत का कोई फल नहीं मिलेगा।

सच्चाई: परंपरा में भाव को सबसे ऊपर माना गया है। अनजाने में भूल हो जाए तो भगवान से क्षमा माँगें, मंत्र जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। कथा में भी व्यापारी का अनजाने में हुआ उपवास पुण्य बना था।

श्रावण पुत्रदा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे बताए गए लाभ परंपरा और आस्था पर आधारित हैं। इन्हें धार्मिक मान्यता के रूप में समझें, किसी निश्चित परिणाम के रूप में नहीं।

  • मान्यता है कि यह व्रत संतान सुख की कामना को भगवान विष्णु तक पहुँचाने का माध्यम है।
  • संतान के अच्छे स्वास्थ्य, संस्कार और उन्नति के लिए इसे शुभ माना जाता है।
  • कथा के अनुसार इस एकादशी की महिमा सुनने से पापों का प्रभाव कम होता है।
  • पवित्रा अर्पण से वर्ष भर की पूजा में हुई भूल-चूक का प्रायश्चित माना जाता है।
  • उपवास, जप और जागरण से मन में संयम, धैर्य और शांति आती है।
  • पशु-पक्षियों की सेवा और दान से करुणा का भाव बढ़ता है।
  • परिवार के साथ मिलकर पूजा करने से आपसी प्रेम और विश्वास मज़बूत होता है।

संबंधित एकादशी और पाठ

श्रावण पुत्रदा से ठीक पहले कामिका एकादशी आती है, जो सावन की पहली एकादशी है और तुलसी पूजा के लिए जानी जाती है। इसके बाद भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी आती है, जिसकी कथा राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी है। साल की दूसरी पुत्रदा एकादशी के लिए पौष पुत्रदा एकादशी पढ़ें।

वर्ष की सभी एकादशियों की तारीख के लिए हमारा एकादशी कब है पेज देखें। रोज़ की तिथि और मुहूर्त के लिए आज का पंचांग और सभी आरतियों के लिए आरती संग्रह PDF भी उपयोगी है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी हमें सिखाती है कि करुणा, सेवा और सामूहिक प्रार्थना से बड़े से बड़ा दुख भी हल्का हो सकता है। इस दिन श्रद्धा से व्रत रखें, किसी प्यासे जीव को पानी पिलाएँ, अपनी क्षमता के अनुसार नियम निभाएँ और बेटा-बेटी दोनों के लिए समान भाव से प्रार्थना करें। भगवान श्री हरि आपके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

श्रावण पुत्रदा एकादशी 2027 कब है?

2026 की श्रावण पुत्रदा एकादशी बीत चुकी है; अगली अगस्त 2027 में श्रावण शुक्ल एकादशी को है। सटीक तारीख, तिथि और पारण समय इस पेज के ऊपर दिए संक्षिप्त उत्तर और तारीख तालिका में देखें।

श्रावण पुत्रदा एकादशी को और किन नामों से जाना जाता है?

इसे सावन पुत्रदा एकादशी, पवित्रा एकादशी और पवित्रोपना (पवित्रारोपण) एकादशी भी कहते हैं। पंचांग में यह श्रावण शुक्ल एकादशी है।

इसे पुत्रदा एकादशी क्यों कहते हैं?

‘पुत्रदा’ का अर्थ है संतान देने वाली। व्रत कथा के अनुसार माहिष्मती के राजा महीजित को इसी व्रत के पुण्य से संतान प्राप्त हुई थी।

इसे पवित्रा एकादशी क्यों कहते हैं?

इस दिन भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण को रेशमी या सूती धागों की ‘पवित्रा’ माला अर्पित की जाती है। परंपरा में इसे वर्ष भर की पूजा में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा माँगने का भाव माना जाता है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा संक्षेप में क्या है?

माहिष्मती के धर्मात्मा राजा महीजित संतानहीन थे। लोमश ऋषि ने बताया कि पिछले जन्म में उन्होंने एक प्यासी गाय को पानी पीने से रोका था; ऋषि के कहने पर प्रजा ने श्रावण शुक्ल एकादशी का व्रत रखकर पुण्य राजा को अर्पित किया और रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।

पुत्रदा एकादशी साल में कितनी बार आती है?

साल में दो बार — श्रावण शुक्ल एकादशी (जुलाई-अगस्त) और पौष शुक्ल एकादशी (दिसंबर-जनवरी)। दोनों का भाव संतान की कामना है, पर कथाएँ अलग हैं।

श्रावण और पौष पुत्रदा एकादशी में क्या अंतर है?

श्रावण वाली की कथा राजा महीजित और लोमश ऋषि की है और इसे पवित्रा एकादशी भी कहते हैं, जबकि पौष वाली की कथा राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या की है। पौष पुत्रदा उत्तर भारत में अधिक प्रसिद्ध है।

श्रावण पुत्रदा एकादशी पर किसकी पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है। संतान की कामना से कई परिवार श्रीकृष्ण के बाल रूप, बाल गोपाल की भी पूजा करते हैं।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

स्मार्त (गृहस्थ) परंपरा सूर्योदय की तिथि मानती है, जबकि वैष्णव परंपरा दशमी से जुड़ी एकादशी छोड़कर अगले दिन व्रत रखती है। दोनों तारीखें अलग हों तो अपनी कुल परंपरा का पालन करें।

श्रावण पुत्रदा एकादशी का पारण कब करें?

पारण अगले दिन द्वादशी तिथि के भीतर, हरिवासर समाप्त होने के बाद करें। अपने शहर का पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

क्या एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

निर्जला व्रत को छोड़कर फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। सावन की उमस में पानी की कमी न होने दें।

क्या एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी के दिन चावल और सभी अनाज वर्जित माने जाते हैं। द्वादशी के पारण में चावल खाए जा सकते हैं।

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत में क्या खाएँ?

फल, दूध, दही, पनीर, मखाना, सूखे मेवे, आलू-शकरकंद, साबूदाना, समा के चावल और कुट्टू या सिंघाड़े का आटा सेंधा नमक के साथ खा सकते हैं।

संतान प्राप्ति के लिए कौन-सा मंत्र जपें?

परंपरा में संतान गोपाल मंत्र ‘ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥’ सबसे प्रसिद्ध है। साथ में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप भी किया जाता है।

क्या इस व्रत से संतान होना निश्चित है?

नहीं, यह व्रत आस्था और प्रार्थना का माध्यम है, कोई गारंटी या उपचार नहीं। संतान से जुड़ी किसी भी समस्या में स्त्री रोग विशेषज्ञ या फर्टिलिटी डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।

क्या यह व्रत केवल बेटे के लिए होता है?

नहीं। पुराने पाठों में ‘पुत्र’ शब्द है, पर व्रत का भाव संतान सुख है, इसलिए आज बेटा और बेटी दोनों के लिए समान भाव से प्रार्थना की जाती है।

क्या पति-पत्नी दोनों यह व्रत रख सकते हैं?

हाँ, दंपति साथ मिलकर संकल्प, पूजा और कथा-श्रवण कर सकते हैं। माता-पिता अपने बच्चों के लिए और परिवार के बड़े किसी प्रियजन के लिए भी यह व्रत रखते हैं।

क्या गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग या मधुमेह के रोगी यह व्रत रख सकते हैं?

ऐसे लोग कठोर या निर्जला व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से फलाहार, एक समय भोजन या केवल पूजा-जप से व्रत का भाव पूरा माना जाता है।

गलती से व्रत टूट जाए तो क्या करें?

भगवान से क्षमा माँगें, मंत्र जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को सबसे ऊपर माना गया है।

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