पौष पुत्रदा एकादशी (Pausha Putrada Ekadashi) पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे भगवान विष्णु की उपासना और संतान सुख की कामना से जुड़ा पावन व्रत माना जाता है। “पुत्रदा” का अर्थ है — पुत्र या संतान देने वाली। परंपरा के अनुसार जिन दंपतियों को संतान की प्रतीक्षा है, वे यह व्रत श्रद्धा से रखते हैं, और जिनके बच्चे हैं, वे उनके अच्छे स्वास्थ्य, संस्कार और उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रार्थना करते हैं।
साल में दो पुत्रदा एकादशी आती हैं — एक पौष शुक्ल पक्ष में और दूसरी श्रावण शुक्ल पक्ष में। उत्तर भारत में पौष वाली पुत्रदा एकादशी अधिक प्रसिद्ध है। दक्षिण भारत में जब यह तिथि धनुर्मास (मार्गली) के भीतर पड़ती है, तब इसी दिन वैकुंठ एकादशी (मुक्कोटी एकादशी) भी मनाई जाती है।
नीचे पौष पुत्रदा एकादशी 2027 की तारीख, पारण समय, राजा सुकेतुमान की व्रत कथा, पूजा विधि, संतान गोपाल मंत्र, श्रावण पुत्रदा से अंतर और वैकुंठ एकादशी से संबंध — सब सरल भाषा में दिया गया है।
पौष पुत्रदा एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: पौष पुत्रदा एकादशी 2027 का व्रत गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा में सोमवार, 18 जनवरी 2027 को और वैष्णव परंपरा में मंगलवार, 19 जनवरी 2027 को रखा जाएगा। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 18 जनवरी सुबह 10:26 बजे शुरू होकर 19 जनवरी सुबह 7:49 बजे समाप्त होगी। स्मार्त व्रत का पारण 19 जनवरी को दोपहर में (हरिवासर समाप्त होने के बाद, लगभग 1:35 से 3:42 बजे) और वैष्णव व्रत का पारण 20 जनवरी की सुबह होगा।
अगली पौष पुत्रदा एकादशी · देहरादून
पौष पुत्रदा एकादशी 2027
19 जनवरी 2027, मंगलवार 79 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- पौष शुक्ल
- एकादशी तिथि
- 18 जन 10:28 – 19 जन 07:51
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 20 जन, 07:14 – 09:20
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2027 | 19 जनवरी 2027, मंगलवार | 18 जन 10:28 – 19 जन 07:51 | 20 जन, 07:14 – 09:20 |
| 2028 | 8 जनवरी 2028, शनिवार | 7 जन 20:32 – 8 जन 19:37 | 9 जन, 07:15 – 09:19 |
| 2028 | 27 दिसंबर 2028, बुधवार | 26 दिसं 20:57 – 27 दिसं 22:28 | 28 दिसं, 07:13 – 09:15 |
तारीखें देहरादून के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें।
स्मार्त और वैष्णव: इस बार एकादशी तिथि दो दिनों में बँट रही है और 19 जनवरी को एक ही दिन में एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तीनों का स्पर्श हो रहा है (इसे त्रिस्पर्शा या महाद्वादशी कहा जाता है)। इसलिए गृहस्थ 18 जनवरी को और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) 19 जनवरी को व्रत रखेंगे। कुछ पंचांग केवल उदया तिथि के आधार पर 19 जनवरी को ही व्रत बताते हैं (ऊपर की तालिका भी उदया तिथि से गणना करती है, इसलिए इस वर्ष वह 19 जनवरी दिखाती है), इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा या पुरोहित की सलाह के अनुसार दिन चुनें।
ध्यान दें कि कैलेंडर वर्ष 2026 में कोई पौष पुत्रदा एकादशी नहीं है। पिछली दिसंबर 2025 के अंत में थी, और 2026 में अधिक मास होने से अगली सीधे जनवरी 2027 में आ रही है।
पौष पुत्रदा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“पुत्रदा” शब्द दो भागों से बना है — “पुत्र” यानी संतान, और “दा” यानी देने वाली। इस तरह पुत्रदा एकादशी का अर्थ हुआ “संतान का वरदान देने वाली एकादशी”। पुराने ग्रंथों में “पुत्र” शब्द का प्रयोग हुआ है, पर आज के भक्त इसे बेटा-बेटी दोनों, यानी संतान के आशीर्वाद के रूप में समझते हैं।
नाम के आगे “पौष” इसलिए जोड़ा जाता है ताकि इसे श्रावण मास की पुत्रदा एकादशी से अलग पहचाना जा सके। दोनों का नाम एक है, पर महीना, कथा और परंपराएँ अलग हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी के अन्य नाम
- पौष शुक्ल एकादशी — तिथि के आधार पर सामान्य नाम।
- पुत्रदा एकादशी / पुत्रदायिनी एकादशी — संतान का वरदान देने वाली।
- पुष्य शुक्ल एकादशी — तेलुगु और कन्नड़ पंचांग में पौष को “पुष्य” मास कहा जाता है।
- वैकुंठ एकादशी / मुक्कोटी एकादशी — दक्षिण भारत में, जब यह तिथि धनुर्मास (मार्गली) के भीतर पड़ती है।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर चलता है (महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है) और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत कैलेंडर (महीना अमावस्या पर समाप्त होता है)। शुक्ल पक्ष का नाम दोनों कैलेंडरों में एक ही रहता है, इसलिए पौष पुत्रदा एकादशी उत्तर और दक्षिण दोनों जगह पौष शुक्ल एकादशी ही कहलाती है।
यह एकादशी आमतौर पर दिसंबर के अंत से जनवरी के बीच आती है। इससे पहले पौष कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी आती है, और इसके बाद माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी। कथा में भी कहा गया है कि इस एकादशी के पाँच दिन बाद माघ मास का पवित्र स्नान आरंभ होता है।
पौष पुत्रदा एकादशी का महत्व
साल की चौबीस एकादशियों में पौष पुत्रदा एकादशी का विशेष संबंध संतान, वंश की निरंतरता और पितरों की तृप्ति से है।
धार्मिक महत्व
हिंदू परंपरा में संतान को केवल परिवार का सुख ही नहीं, बल्कि पितृ ऋण चुकाने का माध्यम भी माना गया है। माना जाता है कि संतान ही आगे चलकर पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण और स्मरण करती है। इसी भाव से पुत्रदा एकादशी को परिवार और पितरों — दोनों के कल्याण से जोड़ा जाता है।
परंपरा के अनुसार इस दिन श्रद्धा से व्रत रखने, भगवान विष्णु या बाल गोपाल की पूजा करने और रात में हरि नाम का कीर्तन करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है। कथा में भी विश्वेदेव राजा से कहते हैं कि भगवान केशव की कृपा से उसकी इच्छा पूरी होगी।
आध्यात्मिक संदेश
पुत्रदा एकादशी की कथा का गहरा संदेश यह है कि जब इंसान अपने दुख में निराश होकर गलत रास्ता सोचने लगता है, तब भी धैर्य, सत्संग और भक्ति उसे सही दिशा दिखाते हैं। राजा सुकेतुमान ने आत्मघात का विचार त्याग दिया और संतों की शरण ली — यही उसके जीवन का मोड़ बना।
यह व्रत यह भी सिखाता है कि संतान भगवान का दिया हुआ उपहार है। जो माता-पिता बन चुके हैं, उनके लिए यह दिन बच्चों को अच्छे संस्कार देने की जिम्मेदारी याद करने का अवसर है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार पौष पुत्रदा एकादशी का माहात्म्य भविष्य पुराण (भविष्योत्तर पुराण) में बताया गया है, और एकादशी माहात्म्य के संग्रहों में भी यह कथा मिलती है। इस प्रसंग में धर्मराज युधिष्ठिर सफला एकादशी का माहात्म्य सुनने के बाद भगवान श्रीकृष्ण से पौष शुक्ल एकादशी के बारे में पूछते हैं, और श्रीकृष्ण उन्हें राजा सुकेतुमान की कथा सुनाते हैं।
कुछ प्रस्तुतियों में यह संवाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच बताया गया है। कथा के अंत में कहा गया है कि इस माहात्म्य को श्रद्धा से पढ़ने या सुनने से भी बड़ा पुण्य मिलता है। ये बातें आस्था की भाषा में कही गई हैं, इन्हें उसी भाव से समझें।
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत कथा
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — “हे केशव, आपने सफला एकादशी का माहात्म्य बताया, अब कृपा करके पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। उसका नाम क्या है, उसकी विधि क्या है और उस दिन किस देवता की पूजा की जाती है?” तब श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन, इस एकादशी का नाम पुत्रदा है। इसके अधिष्ठाता भगवान नारायण हैं। अब मैं तुम्हें इसकी कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”
राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या की कथा
प्राचीन समय में भद्रावती नाम की एक सुंदर नगरी थी। वहाँ राजा सुकेतुमान राज्य करते थे। उनकी रानी का नाम शैब्या था (कुछ ग्रंथों में शैव्या, और कुछ हिंदी प्रस्तुतियों में चम्पा)। राजा धर्मात्मा थे, प्रजा का पालन करते थे, और उनके पास धन, हाथी, घोड़े, मंत्री और विश्वासपात्र मित्र — सब कुछ था।
फिर भी राजा और रानी के मन में एक गहरा दुख था — उनके कोई संतान नहीं थी। रानी दिन-रात इसी चिंता में रहती थीं। राजा सोचते थे कि मेरे बाद मुझे और मेरे पूर्वजों को पिंडदान और तर्पण कौन करेगा? कथा के अनुसार राजा के पितर भी इसी चिंता में दुखी रहते थे कि आगे उन्हें जल और पिंड कौन देगा।
राजा को लगता था कि बिना संतान के वे न पितृ ऋण चुका सकते हैं, न देव ऋण। राजपाट, धन-वैभव और सुख-सुविधाएँ उन्हें फीकी लगने लगीं। एक समय दुख इतना बढ़ गया कि उनके मन में प्राण त्याग देने का विचार भी आया। पर फिर उन्होंने सोचा कि आत्मघात तो महापाप है, इससे न मेरा भला होगा, न मेरे पितरों का। उन्होंने यह विचार छोड़ दिया।
वन में भटकते राजा
मन को शांत करने के लिए एक दिन राजा अकेले घोड़े पर सवार होकर घने वन की ओर निकल पड़े। किसी को कुछ बताया नहीं। वन में उन्होंने तरह-तरह के पेड़-पौधे, हिरण, सिंह, बाघ और बंदर देखे। कहीं हाथी अपने बच्चों और परिवार के साथ घूम रहा था, कहीं मोर अपने परिवार के साथ नाच रहे थे।
हर पशु-पक्षी को अपने परिवार के साथ देखकर राजा का दुख और बढ़ गया। वे सोचने लगे — “मैंने यज्ञ किए, ब्राह्मणों को भोजन कराया, फिर भी यह दुख क्यों?” दोपहर होते-होते भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे पानी खोजने लगे।
सरोवर के तट पर विश्वेदेवों से भेंट
कुछ दूर जाने पर राजा को एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया। उसमें कमल खिले थे, हंस और सारस तैर रहे थे, और कुछ भक्तिमय प्रस्तुतियों में इसकी तुलना मानसरोवर से की गई है। सरोवर के चारों ओर ऋषि-मुनियों के आश्रम थे। उसी समय राजा का दाहिना अंग फड़कने लगा, जिसे वे शुभ संकेत मानकर प्रसन्न हुए।
राजा घोड़े से उतरे और तट पर बैठे मुनियों को प्रणाम करके विनम्रता से उनके सामने बैठ गए। मुनियों ने प्रसन्न होकर कहा — “हे राजन, हम तुमसे प्रसन्न हैं, बताओ तुम्हारी क्या इच्छा है?” राजा ने पूछा — “आप कौन हैं और यहाँ किस कारण पधारे हैं?”
मुनियों ने उत्तर दिया — “हम विश्वेदेव हैं और इस सरोवर में स्नान करने आए हैं। आज से पाँच दिन बाद माघ मास का स्नान आरंभ होगा। और आज का दिन पुत्रदा एकादशी है, जो संतान की इच्छा रखने वालों को श्रेष्ठ संतान का वरदान देती है।”
यह सुनकर राजा ने हाथ जोड़कर कहा — “हे मुनिवर, मेरे भी कोई संतान नहीं है। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे संतान का आशीर्वाद दीजिए।” विश्वेदेवों ने कहा — “हे राजन, आज पुत्रदा एकादशी है। तुम आज ही विधिपूर्वक इसका व्रत करो। भगवान केशव की कृपा और हमारे आशीर्वाद से तुम्हें संतान प्राप्त होगी।”
व्रत का फल
मुनियों की आज्ञा मानकर राजा ने उसी दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा, दिनभर भगवान का स्मरण किया और द्वादशी को विधिपूर्वक पारण किया। फिर विश्वेदेवों को प्रणाम करके वे अपने नगर लौट आए।
भगवान की कृपा से कुछ समय बाद रानी शैब्या ने गर्भ धारण किया और नौ महीने बाद एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। वह बालक बड़ा होकर वीर, यशस्वी, धर्मात्मा और प्रजा का पालन करने वाला राजा बना। राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या का जीवन आनंद से भर गया, और उनके पितर भी संतुष्ट हुए।
कथा के अंत में श्रीकृष्ण कहते हैं — “हे राजन, जो व्यक्ति श्रद्धा और नियम से पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है, उसे इस लोक में संतान सुख मिलता है और परलोक में उत्तम गति प्राप्त होती है। जो इस माहात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसे भी महान पुण्य मिलता है।” कुछ प्रस्तुतियों में यह पुण्य अश्वमेध यज्ञ के समान, तो कुछ में अग्निहोत्र के समान बताया गया है।
संतान की कामना और पौष पुत्रदा एकादशी: आस्था की दृष्टि से
पौष पुत्रदा एकादशी का नाम ही संतान से जुड़ा है, इसलिए बहुत से दंपति बड़ी उम्मीद के साथ यह व्रत रखते हैं। यह व्रत पूरी तरह आस्था, प्रार्थना और भगवान के प्रति समर्पण का विषय है। इसे किसी चिकित्सा उपचार या निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
व्रत का सही भाव
- व्रत को भगवान से “सौदा” न मानें। इसे मन की शांति, धैर्य और प्रार्थना का माध्यम समझें।
- पति-पत्नी दोनों साथ मिलकर संकल्प, पूजा और कथा-श्रवण कर सकते हैं। इससे आपसी विश्वास और सहारा भी बढ़ता है।
- प्रार्थना बेटा या बेटी के भेद के बिना, स्वस्थ और संस्कारी संतान के लिए करें। आज की समझ में संतान का अर्थ बेटा-बेटी दोनों है।
- जिनके बच्चे हैं, वे उनके स्वास्थ्य, पढ़ाई और अच्छे भविष्य के लिए यह व्रत रख सकते हैं।
आस्था के साथ डॉक्टर की सलाह भी
यदि संतान होने में देर हो रही है, तो व्रत और प्रार्थना के साथ-साथ किसी योग्य स्त्री रोग विशेषज्ञ या फर्टिलिटी डॉक्टर से सलाह लेना भी उतना ही ज़रूरी है। आस्था और आधुनिक चिकित्सा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बहुत से परिवार दोनों का सहारा लेते हैं।
जो महिलाएँ उपचार ले रही हैं, गर्भवती हैं या कोई दवा ले रही हैं, वे कठोर या निर्जला व्रत न रखें। फलाहार, दूध या केवल पूजा और मंत्र जप से भी व्रत का भाव पूरा माना जाता है। डॉक्टर से एक बार पूछ लें।
पौष पुत्रदा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
पुत्रदा एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ उनके बाल रूप — बाल गोपाल (लड्डू गोपाल) — की पूजा का भी विशेष चलन है। यह सरल विधि आप घर पर कर सकते हैं।
दशमी की तैयारी (एक दिन पहले)
- दशमी के दिन सात्विक भोजन करें और सूर्यास्त से पहले एक ही बार भोजन लेने का प्रयास करें। लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा से दूर रहें।
- रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें, घर और पूजा स्थान की सफाई कर लें।
- पूजा सामग्री पहले से जुटा लें और मन में अगले दिन के व्रत का निश्चय करें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और साफ (हो सके तो पीले) वस्त्र पहनें। सर्दी का मौसम है, इसलिए ठंडे पानी से कष्ट न उठाएँ — गुनगुने पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते हैं।
- सूर्य देव को जल अर्पित करें। पौष मास में सूर्य उपासना का भी विशेष महत्व माना जाता है।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं (अपना नाम, गोत्र) भगवान विष्णु की प्रसन्नता और संतान सुख / परिवार के कल्याण के लिए आज पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत रखता/रखती हूँ। हे प्रभु, इसे निर्विघ्न पूरा कराइए।” फिर जल भूमि पर छोड़ दें।
- दंपति साथ में व्रत कर रहे हों तो दोनों मिलकर संकल्प ले सकते हैं।
भगवान विष्णु और बाल गोपाल की पूजा
- पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएँ और भगवान विष्णु या लड्डू गोपाल की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें।
- सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करें। फिर कलश स्थापित करें (वैकल्पिक)।
- भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से। लड्डू गोपाल को सर्दी के अनुसार गर्म वस्त्र पहनाने का भी सुंदर चलन है।
- पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी के बिना विष्णु पूजा अधूरी मानी जाती है — पर तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें।
- धूप और घी का दीपक जलाएँ। ऋतु के फल, माखन-मिश्री, पंजीरी या फलाहारी मिठाई का भोग लगाएँ।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) जपें। संतान की कामना हो तो संतान गोपाल मंत्र का जप करें।
- पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा स्वयं पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें, फिर क्षमा प्रार्थना करें।
शाम की पूजा और रात्रि जागरण
- शाम को फिर से दीपक जलाकर भगवान की आरती करें। तुलसी जी के पास भी दीपक जलाएँ (शाम के बाद तुलसी को छूना या पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है)।
- विष्णु सहस्रनाम, गोपाल सहस्रनाम या संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं।
- संभव हो तो रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें। पूरी रात न जाग सकें तो कुछ समय भजन करके सो सकते हैं।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी के दिन स्नान करके भगवान की पूजा करें और भोग लगाएँ।
- किसी ब्राह्मण, जरूरतमंद व्यक्ति या बच्चों को भोजन कराएँ या अन्न, गर्म कपड़े, कंबल आदि का दान करें। सर्दी के मौसम में ऊनी वस्त्र और कंबल का दान बहुत उपयोगी माना जाता है।
- तालिका में दिए गए पारण समय के भीतर, हरिवासर समाप्त होने के बाद तुलसी दल डालकर जल या भोग का प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु या लड्डू गोपाल की प्रतिमा/चित्र
- चौकी और पीला वस्त्र
- गंगाजल और कलश (वैकल्पिक)
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
- पीला चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल — केवल पूजा के लिए)
- पीले फूल और फूलों की माला
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़े हुए)
- धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, कपूर
- ऋतु फल — केला, अमरूद, संतरा, सेब, बेर
- भोग — माखन-मिश्री, पंजीरी, मेवा या फलाहारी मिठाई
- जप माला (तुलसी की माला श्रेष्ठ मानी जाती है)
- दान के लिए अन्न, कंबल, गर्म वस्त्र या दक्षिणा
पौष पुत्रदा एकादशी के मंत्र
इस दिन भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के बाल रूप से जुड़े मंत्रों का जप विशेष फलदायी माना जाता है। मंत्र शुद्ध उच्चारण और शांत मन से जपें। संख्या से अधिक महत्व श्रद्धा का है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण / विष्णु) को नमन करता हूँ। यह बारह अक्षरों वाला मंत्र हर एकादशी पर जपा जाता है और इसे सबसे सरल व प्रभावशाली विष्णु मंत्र माना जाता है।
2. संतान गोपाल मंत्र
ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥
अर्थ: हे देवकी नंदन, हे गोविंद, हे वासुदेव, हे जगत के स्वामी श्रीकृष्ण! मैं आपकी शरण में आया हूँ, मुझे संतान का आशीर्वाद दीजिए। यह मंत्र संतान की कामना के लिए परंपरा में सबसे प्रसिद्ध है। इसके बीज मंत्र वाले रूप किसी गुरु या पुरोहित से समझकर ही जपें।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम भगवान नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं — वे विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें।
4. अष्टाक्षर मंत्र
ॐ नमो नारायणाय॥
अर्थ: मैं भगवान नारायण को नमन करता हूँ। दक्षिण भारत की श्रीवैष्णव परंपरा में, विशेषकर वैकुंठ एकादशी पर, इस मंत्र का जप बहुत प्रचलित है।
5. विष्णु ध्यान श्लोक
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी और पूरे विश्व के आधार हैं, आकाश के समान व्यापक और मेघ के समान श्याम वर्ण वाले हैं — ऐसे लक्ष्मीपति, कमलनयन, भय को हरने वाले भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। पूजा आरंभ करते समय यह श्लोक पढ़ा जाता है।
पौष पुत्रदा एकादशी और श्रावण पुत्रदा एकादशी में अंतर
बहुत से लोग दोनों पुत्रदा एकादशियों को एक ही समझ लेते हैं। दोनों का नाम और उद्देश्य (संतान की कामना) मिलता-जुलता है, पर महीना, कथा और क्षेत्रीय परंपराएँ अलग हैं। श्रावण वाली एकादशी के बारे में विस्तार से पढ़ने के लिए हमारा श्रावण पुत्रदा एकादशी लेख देखें।
| बिंदु | पौष पुत्रदा एकादशी | श्रावण पुत्रदा एकादशी |
|---|---|---|
| तिथि | पौष शुक्ल एकादशी | श्रावण शुक्ल एकादशी |
| अंग्रेज़ी महीना (लगभग) | दिसंबर – जनवरी | जुलाई – अगस्त |
| कथा के पात्र | राजा सुकेतुमान, रानी शैब्या, भद्रावती नगरी, विश्वेदेव | राजा महीजित, माहिष्मती नगरी, लोमश ऋषि |
| संतान न होने का कारण (कथा में) | कारण नहीं बताया गया, विश्वेदेव सीधे व्रत बताते हैं | पिछले जन्म में प्यासी गाय को पानी पीने से रोकने का पाप |
| अन्य नाम | वैकुंठ / मुक्कोटी एकादशी (जब धनुर्मास में पड़े) | पवित्रा / पवित्रोपना एकादशी |
| किस क्षेत्र में अधिक प्रचलित | उत्तर भारत में अधिक प्रसिद्ध | उत्तर भारत के बाहर कई क्षेत्रों में अधिक प्रचलित |
| विशेष परंपरा | बाल गोपाल पूजा, माघ स्नान की तैयारी, दक्षिण में वैकुंठ द्वार दर्शन | भगवान को पवित्रा (रेशमी धागों की माला) अर्पण, झूलन उत्सव का समय |
पौष पुत्रदा एकादशी और वैकुंठ एकादशी का संबंध (दक्षिण भारत)
दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में वैकुंठ एकादशी साल की सबसे बड़ी एकादशी मानी जाती है। कई वर्षों में यह पौष पुत्रदा एकादशी के ही दिन पड़ती है, इसलिए दोनों के बीच का संबंध समझना ज़रूरी है।
वैकुंठ एकादशी कैसे तय होती है? (धनुर्मास का नियम)
वैकुंठ एकादशी चंद्र मास से नहीं, बल्कि सौर मास से तय होती है। सूर्य जब धनु राशि में होते हैं (लगभग 16 दिसंबर से मकर संक्रांति तक), उस अवधि को धनुर्मास या तमिल में मार्गली (मार्गळि) कहते हैं। इस धनुर्मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की एकादशी ही वैकुंठ एकादशी कहलाती है।
- यदि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी (मोक्षदा एकादशी) धनुर्मास के भीतर पड़े, तो वही वैकुंठ एकादशी होती है।
- यदि मोक्षदा एकादशी धनु संक्रांति से पहले निकल जाए, तो अगली शुक्ल एकादशी — यानी पौष पुत्रदा एकादशी — धनुर्मास में आती है और वही वैकुंठ एकादशी बनती है।
- यदि पौष पुत्रदा एकादशी मकर संक्रांति के बाद पड़े, तो उस वर्ष वह वैकुंठ एकादशी नहीं होती।
उदाहरण के लिए, 10 जनवरी 2025 और 30 दिसंबर 2025 — दोनों बार पौष पुत्रदा एकादशी ही दक्षिण भारत में वैकुंठ एकादशी के रूप में मनाई गई। लेकिन इस बार पौष पुत्रदा एकादशी मकर संक्रांति के बाद पड़ रही है, इसलिए यह वैकुंठ एकादशी नहीं है। इस चक्र की वैकुंठ एकादशी दिसंबर 2026 में मोक्षदा एकादशी के दिन है। आने वाले वर्षों में यह फिर से पौष पुत्रदा के साथ पड़ सकती है।
तिरुपति (तिरुमला) में वैकुंठ द्वार दर्शन
तिरुमला के श्री वेंकटेश्वर मंदिर में गर्भगृह के चारों ओर एक विशेष परिक्रमा मार्ग है, जिसे वैकुंठ द्वारम् कहते हैं। मान्यता है कि वैकुंठ एकादशी के दिन वैकुंठ (भगवान विष्णु के धाम) के द्वार खुलते हैं, और इस द्वार से होकर दर्शन करने वाले भक्त को भगवान का विशेष आशीर्वाद मिलता है। तेलुगु क्षेत्र में इसे मुक्कोटी एकादशी कहते हैं।
पिछले कुछ वर्षों से तिरुमला तिरुपति देवस्थानम् (TTD) वैकुंठ एकादशी से शुरू करके दस दिन तक वैकुंठ द्वार दर्शन की व्यवस्था करता है — जैसे 10 से 19 जनवरी 2025, और 30 दिसंबर 2025 से 8 जनवरी 2026। हर वर्ष की तारीखें और टोकन व्यवस्था TTD की आधिकारिक घोषणा से ही देखें।
श्रीरंगम और अन्य मंदिर
तमिलनाडु के श्रीरंगम (श्री रंगनाथस्वामी मंदिर) में वैकुंठ एकादशी लगभग बीस दिन का उत्सव है — दस दिन “पगल पत्तु” और दस दिन “इरा पत्तु”। वैकुंठ एकादशी की भोर में भगवान नम्पेरुमाळ को “परमपद वासल” (स्वर्ग द्वार) से बाहर लाया जाता है। दक्षिण के अनेक विष्णु मंदिरों में इस दिन उत्तर द्वार से दर्शन की परंपरा है।
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
एकादशी व्रत का मूल नियम है — अन्न (अनाज) का त्याग। पौष का महीना कड़ाके की ठंड का होता है, इसलिए फलाहार में ऐसी चीज़ें चुनें जो शरीर को गर्मी और ऊर्जा दें।
व्रत में क्या खा सकते हैं
- ऋतु फल — केला, अमरूद, संतरा, सेब, पपीता, बेर
- शकरकंद, आलू, अरबी, कद्दू जैसी सब्ज़ियाँ (सेंधा नमक के साथ)
- कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा (चौलाई) का आटा; साबूदाना और समा (व्रत के चावल)
- दूध, दही, पनीर, घी और गुनगुना दूध
- मखाना, मूँगफली, बादाम, अखरोट, किशमिश, खजूर
- नारियल, सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
व्रत में क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़ — एकादशी पर इसे सबसे अधिक वर्जित माना जाता है
- गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा जैसे सभी अनाज
- दालें, चना, राजमा, सोयाबीन जैसी फलियाँ
- लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा, शराब और तंबाकू
- साधारण (आयोडीन युक्त) नमक — इसकी जगह सेंधा नमक लें
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठोर व्रत है और केवल स्वस्थ लोग ही इसे रखें। इस बार स्मार्त परंपरा में पारण अगले दिन दोपहर में है, यानी व्रत की अवधि सामान्य से लंबी हो सकती है — इसलिए निर्जला व्रत का निर्णय सोच-समझकर लें।
फलाहार व्रत
ज़्यादातर गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें दिन में फल, दूध और ऊपर बताई गई व्रत की चीज़ें ली जा सकती हैं। पानी, गुनगुना पानी और दूध लेने में कोई दोष नहीं माना जाता। यह व्रत सर्दी के मौसम में शरीर के लिए अधिक सुरक्षित भी है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरा उपवास नहीं रख सकते, वे दिन में केवल एक बार फलाहारी भोजन करते हैं। बुजुर्गों, बीमार व्यक्तियों और कमज़ोर शरीर वालों के लिए यह अच्छा विकल्प है। मधुमेह, हृदय रोग, गर्भावस्था, स्तनपान या नियमित दवा लेने वाले लोग किसी भी तरह का कठोर व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।
पौष पुत्रदा एकादशी पारण कब और कैसे करें
पारण यानी व्रत खोलना। परंपरा में व्रत का पूरा फल तभी माना जाता है जब पारण सही समय पर हो। अपने शहर का समय ऊपर दी गई तालिका में देखें।
पारण के मुख्य नियम
- पारण एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि के भीतर किया जाता है। द्वादशी समाप्त होने के बाद पारण करना शास्त्रों में उचित नहीं माना गया।
- हरिवासर (द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग) में पारण नहीं करना चाहिए। हरिवासर समाप्त होने का इंतज़ार करें।
- पारण के लिए सबसे अच्छा समय प्रातःकाल माना जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है, पर यदि सुबह संभव न हो तो मध्याह्न के बाद किया जा सकता है।
इस बार पारण दोपहर में क्यों है?
इस चक्र में एकादशी तिथि 19 जनवरी की सुबह समाप्त हो रही है और उसी समय द्वादशी शुरू हो रही है। द्वादशी का पहला चौथाई भाग (हरिवासर) दोपहर तक चलेगा, इसलिए स्मार्त व्रत रखने वालों का पारण 19 जनवरी को दोपहर में हरिवासर समाप्त होने के बाद होगा। वैष्णव परंपरा में व्रत 19 जनवरी को है और पारण 20 जनवरी की सुबह होगा। सटीक समय तालिका में देखें।
पारण कैसे करें
- स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
- सबसे पहले तुलसी दल डालकर जल या भगवान का प्रसाद ग्रहण करें।
- फिर सात्विक भोजन करें। परंपरा में द्वादशी के दिन चावल खाना शुभ माना जाता है, पर बहुत भारी या तला हुआ भोजन एकदम से न लें।
पौष पुत्रदा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु या बाल गोपाल की पूजा करें।
- पति-पत्नी साथ में संकल्प लें, कथा सुनें और आरती करें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या संतान गोपाल मंत्र का जप करें।
- तुलसी जी के पास दीपक जलाएँ।
- सर्दी को देखते हुए कंबल, ऊनी कपड़े, अन्न या गुड़ का दान करें।
- बच्चों को भोजन, फल या पढ़ाई की सामग्री भेंट करें — बाल रूप भगवान की सेवा का यह सुंदर तरीका है।
- सही समय पर पारण करें।
क्या न करें
- चावल, अनाज और दालें न खाएँ।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें — एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
- क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और झगड़े से बचें।
- मांस, मदिरा, तंबाकू, लहसुन-प्याज का सेवन न करें।
- संतान को लेकर किसी पर ताना न मारें, न किसी दंपति को दोष दें — यह व्रत करुणा का है।
- हरिवासर में या द्वादशी समाप्त होने के बाद पारण न करें।
- स्वास्थ्य की अनदेखी करके ज़बरदस्ती निर्जला व्रत न रखें।
पौष पुत्रदा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: पुत्रदा एकादशी का व्रत करने से संतान निश्चित रूप से होती है।
सच्चाई: परंपरा में इस व्रत को संतान सुख की कामना से जोड़ा गया है, और कथा भी इसी आस्था को दर्शाती है। लेकिन यह प्रार्थना और भक्ति का विषय है, कोई चिकित्सा उपचार या गारंटी नहीं। संतान से जुड़ी किसी भी स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह ज़रूरी है, और व्रत उसके साथ आस्था का सहारा बन सकता है।
मिथक: यह व्रत केवल बेटे की कामना के लिए है।
सच्चाई: पुराने ग्रंथों की भाषा में “पुत्र” शब्द आता है, क्योंकि उस समय यही शब्द प्रचलित था। आज भक्त इसे संतान — बेटा और बेटी दोनों — के आशीर्वाद के रूप में देखते हैं। बेटा-बेटी में भेद करना न धर्म का संदेश है, न आज के समाज के अनुकूल।
मिथक: केवल पत्नी को व्रत रखना चाहिए।
सच्चाई: कथा में स्वयं राजा सुकेतुमान ने व्रत रखा था। परंपरा में पति-पत्नी दोनों या कोई एक भी यह व्रत रख सकता है। संतान की ज़िम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं होती, इसलिए दोनों का साथ मिलकर प्रार्थना करना सबसे सुंदर माना जाता है।
मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो व्रत का कोई फल नहीं मिलता।
सच्चाई: परंपरा में शरीर की क्षमता के अनुसार फलाहार और एक समय भोजन जैसे विकल्प दिए गए हैं। भगवान भाव के भूखे हैं। सर्दी के मौसम में अपने स्वास्थ्य के अनुसार ही व्रत का प्रकार चुनें।
मिथक: व्रत में गलती से कुछ खा लिया तो बड़ा पाप लगता है।
सच्चाई: अनजाने में हुई भूल पर डरने की ज़रूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन व्रत का भाव बनाए रखें। परंपरा में भय नहीं, श्रद्धा को महत्व दिया गया है।
मिथक: पौष पुत्रदा एकादशी हर साल वैकुंठ एकादशी ही होती है।
सच्चाई: वैकुंठ एकादशी सौर धनुर्मास से तय होती है। कुछ वर्षों में यह मोक्षदा एकादशी के दिन होती है, कुछ में पौष पुत्रदा के दिन, और कुछ कैलेंडर वर्षों में तो एक भी नहीं पड़ती। इस बार पौष पुत्रदा मकर संक्रांति के बाद है, इसलिए यह वैकुंठ एकादशी नहीं है।
पौष पुत्रदा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे दिए गए लाभ परंपरा और आस्था पर आधारित हैं। इन्हें भक्ति के भाव से समझें, किसी निश्चित परिणाम के वादे के रूप में नहीं।
- संतान सुख की कामना: मान्यता है कि श्रद्धा से यह व्रत रखने वाले दंपतियों पर भगवान की कृपा होती है।
- संतान का कल्याण: माता-पिता की प्रार्थना से बच्चों के स्वास्थ्य, बुद्धि और संस्कार पर शुभ प्रभाव माना जाता है।
- पितरों की तृप्ति: कथा के अनुसार वंश की निरंतरता से पितर भी संतुष्ट होते हैं।
- पापों से मुक्ति और पुण्य: हर एकादशी की तरह यह व्रत भी मन और कर्म की शुद्धि का माध्यम माना जाता है।
- मन की शांति और धैर्य: उपवास, जप और कीर्तन से मन स्थिर होता है, जो प्रतीक्षा के कठिन समय में बहुत सहारा देता है।
- परिवार में प्रेम: पति-पत्नी के साथ मिलकर पूजा करने से आपसी विश्वास और अपनापन बढ़ता है।
- मोक्ष की कामना: कथा की फलश्रुति में कहा गया है कि यह व्रत परलोक में भी उत्तम गति देने वाला है।
संबंधित एकादशी और पाठ
पौष पुत्रदा एकादशी से ठीक पहले पौष कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी आती है, जिसकी कथा सुनने के बाद ही युधिष्ठिर ने पुत्रदा एकादशी के बारे में पूछा था। इसके बाद माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी आती है, जिसमें तिल के छह प्रकार के उपयोग का विधान है। साल की दूसरी पुत्रदा एकादशी के लिए श्रावण पुत्रदा एकादशी पढ़ें, और सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और मुहूर्त के लिए दैनिक पंचांग देखें, और सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी हमें याद दिलाती है कि जीवन के सबसे बड़े दुख में भी धैर्य, संतों का संग और भगवान पर भरोसा नई राह दिखा सकता है। इस दिन श्रद्धा से व्रत रखें, अपने परिवार और बच्चों के लिए प्रार्थना करें और किसी जरूरतमंद की मदद करें। बाल गोपाल आपके घर-आँगन को सदा खुशियों से भरा रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
पौष पुत्रदा एकादशी 2027 कब है?
नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार गृहस्थ (स्मार्त) परंपरा में पौष पुत्रदा एकादशी का व्रत सोमवार, 18 जनवरी 2027 को और वैष्णव परंपरा में मंगलवार, 19 जनवरी 2027 को है। आने वाले वर्षों की तारीख और अपने शहर का पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।
क्या 2026 में पौष पुत्रदा एकादशी है?
नहीं। पिछली पौष पुत्रदा एकादशी दिसंबर 2025 के अंत में थी, और 2026 में अधिक मास होने के कारण अगली पौष पुत्रदा एकादशी जनवरी 2027 में आ रही है। इसलिए कैलेंडर वर्ष 2026 में यह एकादशी नहीं पड़ती।
पुत्रदा एकादशी साल में कितनी बार आती है?
साल में दो पुत्रदा एकादशी आती हैं — पौष शुक्ल एकादशी (दिसंबर-जनवरी) और श्रावण शुक्ल एकादशी (जुलाई-अगस्त)। दोनों का भाव संतान की कामना है, पर कथा और क्षेत्रीय परंपराएँ अलग हैं।
इसे पुत्रदा एकादशी क्यों कहते हैं?
‘पुत्रदा’ का अर्थ है पुत्र या संतान देने वाली। व्रत कथा के अनुसार राजा सुकेतुमान को इसी व्रत के पुण्य से संतान प्राप्त हुई थी, इसलिए यह नाम पड़ा।
पौष पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा क्या है?
भद्रावती के राजा सुकेतुमान और रानी शैब्या संतानहीन थे। दुखी राजा वन में भटकते हुए एक सरोवर पर विश्वेदेवों से मिले, जिन्होंने उन्हें उसी दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत करने को कहा; व्रत के बाद रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया।
इस बार स्मार्त और वैष्णव की तारीख अलग क्यों है?
एकादशी तिथि 18 जनवरी सुबह से 19 जनवरी सुबह तक है, और 19 जनवरी को एक ही दिन में एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी तीनों का स्पर्श हो रहा है (त्रिस्पर्शा)। ऐसे में पंचांग गृहस्थों के लिए 18 जनवरी और वैष्णवों के लिए 19 जनवरी का व्रत बताते हैं; कुछ पंचांग उदया तिथि से 19 जनवरी ही मानते हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी का पारण कब करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि के भीतर, हरिवासर समाप्त होने के बाद किया जाता है। इस बार स्मार्त व्रत का पारण 19 जनवरी की दोपहर में और वैष्णव व्रत का पारण 20 जनवरी की सुबह है; अपने शहर का सटीक समय इस पेज की तालिका में देखें।
इस बार पारण दोपहर में क्यों है?
एकादशी तिथि 19 जनवरी की सुबह समाप्त होकर द्वादशी शुरू हो रही है, और द्वादशी का पहला चौथाई भाग (हरिवासर) दोपहर तक चलेगा। हरिवासर में पारण वर्जित है, इसलिए स्मार्त पारण दोपहर में हरिवासर के बाद होगा।
क्या पुत्रदा एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?
हाँ, फलाहार या एक समय भोजन वाले व्रत में पानी, गुनगुना पानी और दूध पी सकते हैं। केवल निर्जला व्रत में जल का भी त्याग होता है, और वह केवल स्वस्थ लोगों को ही रखना चाहिए।
क्या एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी पर चावल और सभी अनाज वर्जित माने जाते हैं। परंपरा में द्वादशी के दिन पारण के बाद चावल खाना शुभ माना जाता है।
पौष पुत्रदा एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
ऋतु फल, शकरकंद, आलू, कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा, साबूदाना, समा के चावल, दूध, दही, मखाना, मेवे और सेंधा नमक ले सकते हैं। सर्दी के मौसम में गर्म दूध और शकरकंद अच्छे विकल्प हैं।
संतान प्राप्ति के लिए पुत्रदा एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?
परंपरा में संतान गोपाल मंत्र ‘ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥’ सबसे प्रसिद्ध है। साथ में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप भी किया जाता है।
क्या पुत्रदा एकादशी व्रत से संतान निश्चित रूप से होती है?
यह व्रत आस्था और प्रार्थना का विषय है, कोई चिकित्सा उपचार या गारंटी नहीं। संतान से जुड़ी किसी भी समस्या में व्रत के साथ योग्य डॉक्टर की सलाह भी अवश्य लें।
क्या यह व्रत केवल बेटे के लिए है?
नहीं। ग्रंथों में ‘पुत्र’ शब्द उस समय की भाषा के कारण है; आज भक्त इसे बेटा-बेटी दोनों, यानी संतान के आशीर्वाद के रूप में मानते हैं।
क्या पति-पत्नी दोनों यह व्रत रख सकते हैं?
हाँ, पति-पत्नी दोनों या कोई एक भी यह व्रत रख सकता है। कथा में स्वयं राजा सुकेतुमान ने व्रत रखा था, और जिनके बच्चे हैं वे उनके कल्याण के लिए भी यह व्रत रखते हैं।
क्या गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग या मधुमेह के रोगी यह व्रत रख सकते हैं?
ऐसे लोग कठोर या निर्जला व्रत न रखें। फलाहार, एक समय भोजन या केवल पूजा-जप से भी व्रत का भाव पूरा माना जाता है; कोई भी व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें।
अगर एकादशी व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें और बाकी दिन व्रत का भाव बनाए रखें; चाहें तो अगली एकादशी पूरे नियम से रखें।
पौष पुत्रदा और श्रावण पुत्रदा एकादशी में क्या अंतर है?
पौष पुत्रदा पौष शुक्ल पक्ष में आती है और इसकी कथा राजा सुकेतुमान की है, जबकि श्रावण पुत्रदा श्रावण शुक्ल पक्ष में आती है और इसकी कथा माहिष्मती के राजा महीजित और लोमश ऋषि की है। पौष पुत्रदा उत्तर भारत में अधिक प्रसिद्ध है।
क्या पौष पुत्रदा एकादशी ही वैकुंठ एकादशी है?
हर साल नहीं। वैकुंठ एकादशी सौर धनुर्मास (लगभग 16 दिसंबर से मकर संक्रांति) की शुक्ल एकादशी होती है, इसलिए कुछ वर्षों में यह पौष पुत्रदा के दिन और कुछ में मोक्षदा एकादशी के दिन पड़ती है। जनवरी 2027 की पौष पुत्रदा मकर संक्रांति के बाद है, इसलिए वह वैकुंठ एकादशी नहीं है।