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सफला एकादशी 2026-27 (Saphala Ekadashi): कब है, व्रत कथा, पूजा विधि, पारण, फल अर्पण और दीपदान

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप की पूजा और कार्यों में सफलता की कामना के लिए विशेष माना जाता है। इसका नाम ही इसका भाव बता देता है — “सफला” यानी वह एकादशी जो जीवन के प्रयासों को सफल बनाने वाली मानी जाती है।

यह एकादशी प्रायः दिसंबर के अंत या जनवरी की शुरुआत में आती है, इसलिए बहुत से परिवार इसे अंग्रेज़ी नए साल के पहले व्रत के रूप में भी रखते हैं। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान को मौसमी फल अर्पित किए जाते हैं, घी का दीपक जलाकर दीपदान किया जाता है और रात में हरि-नाम का जागरण होता है।

यहाँ आपको सफला एकादशी की तारीख, पारण समय, राजा महिष्मान और लुम्पक की व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, फल अर्पण और दीपदान की पूरी जानकारी एक ही जगह मिलेगी।

सफला एकादशी 2026-27 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय

2026-27 में सफला एकादशी रविवार, 3 जनवरी 2027 को है। नई दिल्ली के अनुसार एकादशी तिथि 2 जनवरी 2027 को दोपहर लगभग 2:24 बजे शुरू होकर 3 जनवरी 2027 को शाम लगभग 4:08 बजे समाप्त होगी, और पारण 4 जनवरी की सुबह किया जाएगा। कैलेंडर वर्ष 2026 में अधिक मास होने के कारण पौष कृष्ण एकादशी जनवरी 2027 में पड़ रही है।

अगली सफला एकादशी · देहरादून

सफला एकादशी 2027

3 जनवरी 2027, रविवार 63 दिन बाकी

मास और पक्ष
पौष कृष्ण
एकादशी तिथि
2 जन 14:26 – 3 जन 16:10
पारण (व्रत खोलने का समय)
4 जन, 07:15 – 09:18
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
20273 जनवरी 2027, रविवार2 जन 14:26 –
3 जन 16:10
4 जन, 07:15 – 09:18
202723 दिसंबर 2027, गुरुवार22 दिसं 23:42 –
23 दिसं 23:13
24 दिसं, 07:11 – 09:13
202812 दिसंबर 2028, मंगलवार11 दिसं 17:34 –
12 दिसं 15:14
13 दिसं, 07:05 – 09:08
202931 दिसंबर 2029, सोमवार30 दिसं 21:52 –
31 दिसं 19:13
1 जन, 07:14 – 09:17

तारीखें देहरादून के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका में आपके शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय अपने आप अपडेट होता रहता है। इस बार स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन सहित) दोनों परंपराओं में व्रत एक ही दिन है; जिन वर्षों में तिथि दो दिनों में बँटती है, उनमें वैष्णव व्रत अक्सर अगले दिन होता है — ऐसे में तालिका में दिखाई गई अपनी परंपरा की तारीख मानें।

सफला एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“सफला” शब्द “सफल” से बना है, जिसका अर्थ है — फल देने वाली, सफलता देने वाली। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसके रुके हुए काम आगे बढ़ते हैं और उसके प्रयासों को सही दिशा मिलती है। इसी कारण इसे कई जगह “सफल एकादशी” या “सफला एकादशी व्रत” भी लिखा और बोला जाता है।

इसे पौष कृष्ण एकादशी भी कहते हैं। अंग्रेज़ी में इसे Saphala Ekadashi, Safala Ekadashi या Saphala Ekadasi लिखा जाता है। इस्कॉन पंचांग में भी यही नाम प्रयोग होता है।

सफला एकादशी किस महीने में आती है?

भारत में महीनों की गणना दो तरीकों से होती है, इसलिए एक ही एकादशी का महीना अलग-अलग बताया जाता है। तिथि और दिन दोनों में एक ही रहते हैं, केवल महीने का नाम बदलता है।

पंचांग पद्धतिकहाँ प्रचलितसफला एकादशी का महीना
पूर्णिमांत (Purnimanta)उत्तर भारत — उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदिपौष कृष्ण पक्ष
अमांत (Amanta)दक्षिण और पश्चिम भारत — महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदिमार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष

सफला एकादशी से ठीक पहले मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी आती है और इसके बाद पौष शुक्ल पक्ष की पौष पुत्रदा एकादशी। इस तरह यह शीत ऋतु की तीन लगातार महत्वपूर्ण एकादशियों में बीच की कड़ी है।

“सफला” नाम क्यों पड़ा? (कार्य में सफलता का भाव)

व्रत कथा में लुम्पक नाम का राजकुमार बिना जाने-समझे इस एकादशी का उपवास और जागरण कर लेता है, और उसका पूरा जीवन बदल जाता है — खोया हुआ राज्य, परिवार और सम्मान वापस मिल जाता है। जो जीवन पूरी तरह असफल हो चुका था, वह इस एक व्रत से “सफल” हो गया। इसी कारण परंपरा इसे सफला यानी सफलता देने वाली एकादशी कहती है।

एक और भाव यह भी है कि इस दिन भगवान को “फल” अर्पित करने का विशेष विधान है। फल अर्पण और सफलता — दोनों अर्थ इस नाम में साथ-साथ जुड़ जाते हैं। इसलिए नौकरी, व्यापार, पढ़ाई, परीक्षा या किसी नए काम की शुरुआत करने वाले लोग इस व्रत को विशेष श्रद्धा से रखते हैं।

सफला एकादशी का महत्व

वर्ष भर में आने वाली सभी एकादशियाँ भगवान विष्णु को समर्पित हैं, लेकिन हर एकादशी का अपना अलग भाव है। सफला एकादशी का केंद्रीय संदेश है — भगवान की कृपा से असफलता भी सफलता में बदल सकती है, बस मन में सच्चा पश्चाताप और समर्पण होना चाहिए।

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार सफला एकादशी के अधिष्ठाता देव भगवान नारायण हैं। इस दिन व्रत, पूजा, दीपदान और रात्रि जागरण को पापों का नाश करने वाला और मनोकामना पूर्ण करने वाला माना गया है। कथा के माहात्म्य में कहा गया है कि इस एकादशी की महिमा पढ़ने या सुनने मात्र से बड़े यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।

शास्त्रीय वर्णन में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, ग्रहों में चंद्रमा और देवताओं में भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, वैसे ही सभी व्रतों में एकादशी का व्रत श्रेष्ठ है। सफला एकादशी इसी श्रेष्ठ व्रत-परंपरा का एक विशेष रूप से कल्याणकारी दिन मानी जाती है।

आध्यात्मिक संदेश

सफला एकादशी की कथा बताती है कि भगवान के द्वार किसी के लिए बंद नहीं होते। लुम्पक ने आँसुओं के साथ फल अर्पित किए और उसका जीवन बदल गया।

इसका अर्थ यह नहीं कि गलत काम करते रहें और एक दिन व्रत कर लें। संदेश यह है कि सच्चा पश्चाताप, विनम्रता और जो कुछ पास है उसे प्रेम से भगवान को सौंप देना — यही भक्ति का मूल है। भगवान वस्तु का मूल्य नहीं, भाव का मूल्य देखते हैं।

दूसरा संदेश “सफलता” की परिभाषा से जुड़ा है। कथा में लुम्पक की असली सफलता राज्य पाना नहीं, बल्कि जीवन की दिशा बदल जाना है — अंत में वह राज्य पुत्र को सौंपकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है। यानी धर्म के अनुसार सफलता वह है जो व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाए।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार सफला एकादशी की कथा और माहात्म्य पद्म पुराण (उत्तर खंड के एकादशी माहात्म्य) और भविष्योत्तर पुराण में मिलता है। अधिकांश ग्रंथों और कथा-पुस्तकों में यह कथा धर्मराज युधिष्ठिर और भगवान श्रीकृष्ण के संवाद के रूप में आती है — युधिष्ठिर पूछते हैं कि पौष कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी विधि क्या है, तब श्रीकृष्ण यह कथा सुनाते हैं।

कुछ पंचांगों और कथा-संग्रहों में यह संवाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच बताया गया है। कथा का मूल भाव, पात्र और शिक्षा दोनों रूपों में एक जैसे हैं।

सफला एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से निवेदन किया — “हे प्रभु! पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है, उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता की पूजा होती है? कृपा करके विस्तार से बताइए।” तब भगवान श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन! इस एकादशी का नाम सफला है। इसके देवता भगवान नारायण हैं। मैं तुम्हें इसकी कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”

प्राचीन समय में चम्पावती नाम की एक सुंदर नगरी थी, जहाँ राजा महिष्मान राज्य करते थे। वे धर्मात्मा और प्रजा का ध्यान रखने वाले राजा थे। उनके चार पुत्र थे, जिनमें सबसे बड़ा पुत्र लुम्पक था। लुम्पक बहुत दुराचारी था। वह पिता का धन बुरे कामों और भोग-विलास में उड़ाता था, देवताओं, ब्राह्मणों और वैष्णवों की निंदा करता था और अच्छे लोगों का अपमान करता था।

राजा ने उसे कई बार समझाया, पर उसका स्वभाव नहीं बदला। अंत में जब उसके कुकर्म सीमा पार कर गए, तो राजा महिष्मान ने दुखी मन से उसे राज्य से निकाल दिया। परिवार और मित्रों में से किसी ने उसका साथ नहीं दिया।

राज्य से निकाले जाने के बाद लुम्पक घने वन में रहने लगा। वह दिन में पशु-पक्षियों का शिकार करके पेट भरता और रात में चुपके से अपने ही पिता की नगरी में जाकर चोरी करता और लोगों को परेशान करता। नगरवासी और सिपाही कई बार उसे पकड़ लेते, पर राजा का पुत्र होने के डर से छोड़ देते थे।

वन में एक बहुत पुराना और विशाल पीपल का वृक्ष था। लोग उस वृक्ष को देवता मानकर पूजते थे और वह वन देवताओं की क्रीड़ा-स्थली माना जाता था। लुम्पक उसी पीपल के नीचे रहता था, लेकिन उसे इस स्थान की पवित्रता का कोई ज्ञान नहीं था।

पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी की रात आई। उस रात कड़ाके की ठंड पड़ी। लुम्पक के पास शरीर ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र नहीं थे। पूरी रात ठंड से काँपते हुए उसे नींद नहीं आई, उसके हाथ-पैर अकड़ गए और सूर्योदय होते-होते वह मूर्छित हो गया।

अगले दिन, यानी एकादशी को, दोपहर तक वह बेहोश पड़ा रहा। जब सूर्य की गर्मी से उसके शरीर में कुछ जान आई, तब वह उठ पाया। कमज़ोरी इतनी थी कि वह शिकार नहीं कर सका। भूख से व्याकुल होकर वह पेड़ों से गिरे हुए फल बीनने लगा। फल इकट्ठे करते-करते सूरज ढल गया और वह उसी पीपल के नीचे लौट आया।

उस दिन उसका मन बहुत दुखी था। उसने वे फल खाए नहीं, बल्कि पीपल की जड़ के पास रख दिए और रोते हुए बोला — “हे भगवान! ये फल मैं आपको अर्पित करता हूँ, आप ही इनसे प्रसन्न हों।” अपने दुख, भूख और पश्चाताप के कारण वह उस पूरी रात भी जागता रहा।

इस प्रकार अनजाने में ही लुम्पक का एकादशी का उपवास, भगवान को फल अर्पण और रात्रि जागरण — तीनों पूरे हो गए। उसके इस भाव से भगवान नारायण प्रसन्न हुए और उसके सारे पाप नष्ट हो गए।

द्वादशी की सुबह उसके सामने सुंदर सजा हुआ एक दिव्य घोड़ा आकर खड़ा हो गया। तभी आकाशवाणी हुई — “हे राजकुमार! भगवान नारायण की कृपा और सफला एकादशी के पुण्य से तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो गए हैं। अब तुम अपने पिता के पास जाओ और राज्य प्राप्त करो।”

आकाशवाणी सुनकर लुम्पक बहुत प्रसन्न हुआ। उसने भगवान की स्तुति की, दिव्य वस्त्र धारण किए और घोड़े पर बैठकर अपने पिता के पास पहुँचा। उसने पिता के चरणों में प्रणाम करके अपनी सारी कथा सुनाई। पुत्र को इस बदले हुए रूप में देखकर राजा महिष्मान बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने पूरा राज्य लुम्पक को सौंप दिया और स्वयं तपस्या के लिए वन चले गए।

अब लुम्पक शास्त्रों के अनुसार धर्म से राज्य करने लगा। उसकी पत्नी, पुत्र और पूरा परिवार भगवान नारायण का भक्त बन गया। बुढ़ापे में उसने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और वन में जाकर भगवान का भजन करने लगा। अंत समय में उसे वैकुंठ धाम की प्राप्ति हुई।

कथा के अंत में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं — “हे राजन! जो मनुष्य श्रद्धा से सफला एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और अंत में वह मोक्ष का अधिकारी बनता है। जो इस एकादशी की महिमा पढ़ता या सुनता है, उसे भी बड़े यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।” परंपरा में इस पुण्य की तुलना कहीं राजसूय यज्ञ से और कहीं अश्वमेध यज्ञ से की गई है।

कथा में मिलने वाले कुछ अंतर: कुछ परंपराओं में राजा का नाम “महिष्मत” या “महिष्मता” और पुत्र का नाम “लुम्भक” मिलता है। कुछ कथा-संग्रहों में राजा के पाँच पुत्र बताए गए हैं। इस्कॉन की कुछ पुस्तकों में पीपल की जगह बरगद (वट) का वृक्ष आता है, और कुछ पंचांगों में घोड़े की जगह दिव्य रथ का वर्णन है। कथा का मूल संदेश सभी में एक ही है।

सफला एकादशी व्रत कथा की सीख

  • भगवान भाव के भूखे हैं — लुम्पक के पास अर्पित करने को केवल गिरे हुए फल थे, फिर भी वे स्वीकार हुए।
  • सच्चा पश्चाताप जीवन की दिशा बदल सकता है।
  • उपवास, अर्पण और जागरण — ये तीनों सफला एकादशी के मुख्य अंग हैं।
  • असली सफलता वह है जिसके बाद व्यक्ति धर्म, परिवार और समाज के प्रति ज़िम्मेदार बने।

सफला एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

यह विधि घर पर सरलता से की जा सकती है; पारिवारिक परंपरा के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है।

  1. दशमी को तैयारी: एकादशी से एक दिन पहले (दशमी) सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन करें। चावल, लहसुन, प्याज़, मांस-मदिरा से दूर रहें। मन में संकल्प करें कि कल भगवान नारायण की प्रसन्नता के लिए व्रत करेंगे। ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करें।
  2. पूजा सामग्री पहले से रखें: दशमी की शाम ही फल, घी, दीपक और धूप की व्यवस्था कर लें। तुलसी के पत्ते एकादशी को नहीं तोड़े जाते, इसलिए उन्हें दशमी को ही तोड़कर रख लें।
  3. एकादशी की सुबह स्नान: ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें। स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ। ठंड का मौसम है, इसलिए गुनगुने पानी से स्नान करने में कोई दोष नहीं है। स्वच्छ, हो सके तो पीले या हल्के रंग के वस्त्र पहनें।
  4. व्रत का संकल्प: पूजा स्थान पर बैठकर हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें — “मैं (अपना नाम) आज सफला एकादशी का व्रत भगवान नारायण की प्रसन्नता और अपने तथा परिवार के कल्याण के लिए कर रहा/रही हूँ।” अपनी क्षमता के अनुसार निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन का संकल्प लें।
  5. चौकी और प्रतिमा की स्थापना: एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, नारायण या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। साथ में माता लक्ष्मी का चित्र भी रख सकते हैं। प्रतिमा को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएँ।
  6. षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा: भगवान को चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल अर्पित करें। धूप और घी का दीपक जलाएँ। समय कम हो तो गंध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य — इन पाँच उपचारों से भी पूजा पूरी मानी जाती है।
  7. फल अर्पण: सफला एकादशी पर यह सबसे विशेष चरण है। नारियल, सुपारी, आंवला, अनार, नींबू, बेर, केला जैसे मौसमी फल एक थाली में सजाकर भगवान को अर्पित करें। अर्पण करते समय मन में लुम्पक की कथा का भाव रखें — जो है, वह प्रेम से समर्पित है।
  8. मंत्र जाप और पाठ: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम एक माला (108 बार) जाप करें। विष्णु सहस्रनाम, गीता का कोई अध्याय या सफला एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  9. आरती: पूजा के अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें। भूल-चूक के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
  10. दिन भर का आचरण: दिन में सोने से बचें, क्रोध और निंदा से दूर रहें, जितना हो सके भगवान का नाम लें। ज़रूरतमंदों को भोजन, गर्म कपड़े या कंबल दान करना इस मौसम में बहुत उपयोगी सेवा है।
  11. शाम को दीपदान: सूर्यास्त के समय घर के मंदिर में, तुलसी के पास और संभव हो तो किसी मंदिर या पीपल के वृक्ष के नीचे घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ। संध्या आरती करें।
  12. रात्रि जागरण: सफला एकादशी पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व बताया गया है। परिवार या सत्संग के साथ भजन-कीर्तन, कथा और नाम जाप करें। पूरी रात जागना संभव न हो तो कम से कम रात के पहले पहर तक भजन करें — स्वास्थ्य से समझौता न करें।
  13. द्वादशी को पूजा और दान: द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें। किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दक्षिणा दें।
  14. पारण: ऊपर तालिका में दिए गए पारण समय के भीतर व्रत खोलें। पहले भगवान को भोग लगाएँ, फिर तुलसी दल या प्रसाद के फल से पारण करें, उसके बाद सात्विक भोजन लें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु / नारायण / श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • गंगाजल और साफ़ जल से भरा कलश
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल — केवल पूजा के लिए)
  • पीले फूल और फूलमाला
  • तुलसी दल (दशमी को तोड़कर रखे हुए)
  • मौसमी फल — नारियल, सुपारी, आंवला, अनार, नींबू, बेर, केला, अमरूद, संतरा
  • लौंग, इलायची और पान के पत्ते
  • धूप, अगरबत्ती और कपूर
  • घी का दीपक और दीपदान के लिए अतिरिक्त दीये, रुई की बत्तियाँ
  • तिल का तेल (पीपल के नीचे दीपक के लिए, यदि करना चाहें)
  • पंचमेवा, मिश्री या फलाहारी मिठाई का भोग
  • सफला एकादशी व्रत कथा की पुस्तक या प्रिंट
  • आरती की थाली और घंटी
  • दान के लिए अन्न, गर्म कपड़े, कंबल या दक्षिणा

सफला एकादशी के मंत्र

मंत्र जाप शांत मन से, साफ़ उच्चारण के साथ करें। तुलसी की माला से जाप करना परंपरा में शुभ माना जाता है। नीचे कुछ प्रचलित मंत्र और उनके सरल अर्थ दिए गए हैं।

1. द्वादशाक्षर वासुदेव मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अर्थ: मैं सर्वव्यापी भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण / विष्णु) को नमन करता हूँ। यह एकादशी व्रत का सबसे प्रमुख मंत्र है और इसे दिन भर जपा जा सकता है।

2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र

ॐ नमो नारायणाय

अर्थ: मैं भगवान नारायण को नमस्कार करता हूँ। चूँकि सफला एकादशी के अधिष्ठाता देव नारायण माने गए हैं, इसलिए इस दिन यह मंत्र विशेष रूप से जपा जाता है।

3. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम नारायण को जानते हैं, वासुदेव का ध्यान करते हैं; वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें। कार्य में सफलता और सही निर्णय की कामना के साथ इसका जाप किया जाता है।

4. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के समान श्याम वर्ण वाले, लक्ष्मीपति और कमल-नयन हैं — संसार के भय को हरने वाले उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। पूजा की शुरुआत में इससे ध्यान किया जाता है।

5. फल अर्पण मंत्र

इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव। तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥

अर्थ: हे देव! यह फल मैंने आपके सामने रखा है; इसके द्वारा मुझे जन्म-जन्म में सफलता प्राप्त हो। यह मंत्र पूजा पद्धतियों में फल अर्पण के समय बोला जाता है और सफला एकादशी के भाव से बहुत मेल खाता है। संस्कृत कठिन लगे तो सरल हिंदी में यही प्रार्थना कर सकते हैं।

सफला एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि इंद्रियों पर संयम और मन को भगवान में लगाना है। इसलिए अपनी उम्र, स्वास्थ्य और काम की ज़िम्मेदारियों के अनुसार व्रत का प्रकार चुनें।

निर्जला व्रत

इसमें एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक न अन्न लिया जाता है, न जल। यह सबसे कठिन रूप है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोगों को, अपनी क्षमता देखकर ही करना चाहिए। मधुमेह, हृदय रोग, रक्तचाप, किडनी की समस्या, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग अवस्था या नियमित दवाएँ लेने वालों को निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह अवश्य लेनी चाहिए।

फलाहार व्रत

यह सबसे प्रचलित तरीका है। इसमें दिन में फल, दूध, दही, मेवे और फलाहारी व्यंजन लिए जाते हैं। सफला एकादशी पर फलों का विशेष महत्व होने से कई परिवार केवल फल और दूध पर ही व्रत रखते हैं।

एक समय भोजन (एकभुक्त) व्रत

जो लोग पूरा दिन उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार फलाहारी या सात्विक व्रत-भोजन कर सकते हैं। बुज़ुर्ग, विद्यार्थी और कड़ी मेहनत वाला काम करने वाले लोग यह विकल्प चुन सकते हैं। भाव और संयम ही व्रत का असली आधार है।

व्रत में क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल — केला, सेब, अमरूद, संतरा, अनार, पपीता, बेर
  • दूध, दही, छाछ, पनीर, मक्खन
  • मेवे — बादाम, काजू, अखरोट, किशमिश, मखाना
  • कुट्टू (बकव्हीट) का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा, साबूदाना, समा के चावल (व्रत के चावल)
  • आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
  • नारियल पानी और पर्याप्त पानी (निर्जला न हो तो)

व्रत में क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी चीज़ें — एकादशी पर चावल वर्जित माना गया है
  • गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा जैसे सभी अनाज
  • दालें और फलियाँ (चना, मूंग, राजमा आदि)
  • प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा, मछली, मदिरा और तंबाकू
  • साधारण नमक (सेंधा नमक प्रयोग करें)
  • बहुत तला-भुना और पैकेट वाला “व्रत स्नैक्स”, जिसमें अनाज या साधारण नमक मिला हो सकता है

वैष्णव परंपरा में एकादशी पर सभी अनाज और दालें त्यागी जाती हैं, और चावल को विशेष रूप से वर्जित माना गया है।

सफला एकादशी पारण कब और कैसे करें

एकादशी व्रत का पारण यानी व्रत खोलना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्रत रखना। परंपरा के अनुसार सही समय पर पारण न करने से व्रत अधूरा माना जाता है। अपने शहर का सटीक पारण समय ऊपर दी गई तालिका में देखें।

  • द्वादशी में ही पारण: पारण एकादशी के अगले दिन, द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है। द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण कर लेना चाहिए।
  • हरिवासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि के पहले एक-चौथाई भाग को हरिवासर कहते हैं। इस अवधि में पारण नहीं किया जाता; हरिवासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलें।
  • प्रातःकाल सबसे उत्तम: पारण के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना गया है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण करने से बचने की सलाह दी जाती है; यदि सुबह संभव न हो तो मध्याह्न के बाद करें।
  • स्मार्त और वैष्णव: जिन वर्षों में व्रत दो दिन का दिखाया जाता है, उनमें गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव / संन्यासी दूसरे दिन व्रत रखते हैं — दोनों के पारण का दिन और समय भी अलग होता है। तालिका में अपनी परंपरा का समय देखें।
  • पारण की विधि: स्नान करके भगवान की पूजा करें, भोग लगाएँ, किसी ज़रूरतमंद को कुछ दान दें। फिर तुलसी दल, आंवला या प्रसाद के फल से व्रत खोलें और उसके बाद हल्का सात्विक भोजन लें।
  • पारण के बाद भी संयम: द्वादशी को भी तामसिक भोजन, मांस-मदिरा से दूर रहें। निर्जला व्रत के बाद पहले पानी या नारियल पानी लें और धीरे-धीरे भोजन शुरू करें।

सफला एकादशी पर फल अर्पण का महत्व

सफला एकादशी की सबसे बड़ी पहचान है — भगवान को फल अर्पित करना। कथा में लुम्पक के पास और कुछ नहीं था, केवल पेड़ों से गिरे फल थे, और वही उसकी पूजा बन गए। इसलिए इस दिन भगवान नारायण को मौसमी फलों का भोग लगाने की परंपरा है।

शास्त्रीय वर्णन में इस दिन नारियल (श्रीफल), सुपारी, बिजौरा (नींबू जैसा बड़ा फल), नींबू, अनार, आंवला, लौंग, बेर और आम जैसे फलों से पूजा का उल्लेख मिलता है। आज लोग अपने क्षेत्र और मौसम में उपलब्ध फल अर्पित करते हैं।

कौन सा फल किस भाव से अर्पित किया जाता है

फल / वस्तुपरंपरागत भाव
नारियल (श्रीफल)पूर्ण समर्पण और शुभ शुरुआत का प्रतीक; कई घरों में इस दिन नारियल अवश्य चढ़ाया जाता है
सुपारीपूजा की पूर्णता और संकल्प की दृढ़ता का प्रतीक
आंवलाभगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है; सर्दियों का प्रमुख फल, पारण में भी लिया जाता है
अनारअनेक दानों के कारण समृद्धि और परिवार की वृद्धि का भाव
नींबू / बिजौराशास्त्रीय वर्णन में उल्लिखित; शुद्धता का भाव
केला, बेर, अमरूद, संतरास्थानीय मौसमी फल, जो आसानी से उपलब्ध हों
लौंग, इलायची, पानसुगंधित द्रव्य, जो पूजा में भोग के साथ रखे जाते हैं

ध्यान रखें कि फल ताज़े, साफ़ और अखंडित हों। अर्पण के बाद ये फल प्रसाद के रूप में परिवार, पड़ोसियों और ज़रूरतमंदों में बाँटें। फलों की गिनती या कीमत से अधिक महत्व मन के भाव का है — यही इस एकादशी की कथा का सार है।

सफला एकादशी पर दीपदान

सफला एकादशी के विधान में दीपदान को विशेष पुण्यदायी बताया गया है। पौष मास की लंबी और ठंडी रातों में दीपक जलाना अंधकार पर प्रकाश की जीत और अज्ञान पर ज्ञान का प्रतीक माना जाता है।

दीपदान कैसे करें

  • शाम को सूर्यास्त के समय भगवान विष्णु के सामने गाय के घी का दीपक जलाएँ।
  • एक दीपक तुलसी के पौधे के पास रखें और तुलसी माता की आरती करें।
  • कथा में पीपल का वृक्ष आता है, इसलिए उत्तर भारत के कई परिवार पीपल के नीचे तिल के तेल या घी का दीपक जलाते हैं।
  • संभव हो तो किसी विष्णु या कृष्ण मंदिर में जाकर दीपदान करें।
  • दीपक जलाते समय “ॐ नमो नारायणाय” या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें।

सुरक्षा का ध्यान रखें — दीपक को पर्दों, कपड़ों, सूखे पत्तों और बच्चों की पहुँच से दूर रखें।

नए साल का पहला व्रत: सफला एकादशी

सफला एकादशी अक्सर दिसंबर के अंतिम सप्ताह या जनवरी के पहले सप्ताह में आती है। जब यह जनवरी में पड़ती है, तो अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार यह साल की पहली एकादशी होती है — जैसे 2027 में। जब यह दिसंबर में आती है, तो इसे साल की आखिरी एकादशी कहा जाता है।

बहुत से लोग नए साल की शुरुआत व्रत और पूजा से करना पसंद करते हैं, और “सफला” नाम इस भाव को और गहरा कर देता है।

नए साल पर सफला एकादशी कैसे मनाएँ

  • व्रत के संकल्प के साथ आने वाले वर्ष के लिए अपने एक-दो अच्छे संकल्प भी लिखें — जैसे रोज़ थोड़ा पाठ करना, किसी बुरी आदत को छोड़ना।
  • नई पढ़ाई, नौकरी या व्यापार की योजना भगवान के सामने रखकर प्रार्थना करें।
  • परिवार के साथ मिलकर कथा सुनें और बच्चों को लुम्पक की कहानी का संदेश समझाएँ।
  • ठंड में ज़रूरतमंदों को कंबल, गर्म कपड़े या भोजन दान करें।
  • साल की शुरुआत में ही आने वाली सभी एकादशियों की तारीखें देखने के लिए एकादशी कब है पेज सेव कर लें।

सफला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • दशमी से ही सात्विक भोजन और संयम का पालन करें।
  • सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान नारायण को मौसमी फल, तुलसी दल और पीले फूल अर्पित करें।
  • शाम को घी का दीपक जलाएँ और दीपदान करें।
  • सफला एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें, विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें।
  • रात में अपनी क्षमता के अनुसार भजन-कीर्तन और जागरण करें।
  • ज़रूरतमंदों को अन्न, कंबल या गर्म कपड़े दान करें।
  • द्वादशी को सही समय पर पारण करें।

क्या न करें

  • चावल, अनाज, दाल, प्याज़-लहसुन और तामसिक भोजन न करें।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • दिन में सोने से बचें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और झगड़े से दूर रहें।
  • मांस, मदिरा, तंबाकू और नशे का सेवन न करें।
  • किसी का अपमान न करें — कथा में लुम्पक की सबसे बड़ी भूल यही थी।
  • हरिवासर में या द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न करें।
  • स्वास्थ्य ठीक न हो तो ज़िद में निर्जला व्रत न रखें।

सफला एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: सफला एकादशी का व्रत करने से हर काम अपने आप सफल हो जाता है।

सच्चाई: परंपरा इस व्रत को सफलता देने वाला मानती है, लेकिन यह मान्यता परिश्रम की जगह नहीं लेती। कथा में भी लुम्पक का जीवन तब बदला जब उसका स्वभाव बदला। व्रत को मन की शुद्धि और सही दिशा के लिए करें, और साथ में मेहनत जारी रखें।

मिथक: केवल निर्जला व्रत ही सफल माना जाता है।

सच्चाई: शास्त्रों और परंपरा में फलाहार, एक समय भोजन जैसे कई विकल्प हैं। व्रत का मूल्य भाव, संयम और भक्ति से है, भूख-प्यास की मात्रा से नहीं। अपनी स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार व्रत चुनना ही सही है।

मिथक: व्रत टूट गया तो बड़ा पाप लग जाता है।

सच्चाई: अनजाने में या स्वास्थ्य कारणों से व्रत टूट जाए तो भगवान से क्षमा प्रार्थना करें, नाम जाप करें और अगली एकादशी पर फिर श्रद्धा से व्रत रखें। परंपरा डराने के लिए नहीं, सुधारने के लिए है। कथा का संदेश ही यह है कि भगवान दयालु हैं।

मिथक: बीमार, गर्भवती या बुज़ुर्ग भी कठोर व्रत न रखें तो फल नहीं मिलता।

सच्चाई: परंपरा में बीमार, बहुत वृद्ध, बच्चों और गर्भवती महिलाओं को कठोर उपवास से छूट दी गई है। मधुमेह, रक्तचाप या नियमित दवाएँ लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत करें। ऐसे लोग पूजा, कथा, जाप और दान से भी व्रत का भाव निभा सकते हैं।

मिथक: सफला एकादशी पर महँगे फल चढ़ाने से ही भगवान प्रसन्न होते हैं।

सच्चाई: कथा में लुम्पक ने केवल ज़मीन पर गिरे जंगली फल अर्पित किए थे। परंपरा का संदेश साफ़ है — भगवान भाव देखते हैं, कीमत नहीं। जो फल आसानी से मिल जाए, वही प्रेम से चढ़ाएँ।

मिथक: घर में कोई भी चावल खा ले तो व्रत रखने वाले का व्रत भंग हो जाता है।

सच्चाई: चावल का नियम मुख्य रूप से व्रत रखने वाले के लिए है। कई परिवार श्रद्धा से इस दिन घर में चावल नहीं बनाते, पर दूसरे सदस्य के खाने से आपका व्रत भंग नहीं होता।

मिथक: रात भर जागना अनिवार्य है, वरना व्रत अधूरा है।

सच्चाई: सफला एकादशी पर जागरण का विशेष महत्व बताया गया है, पर जो लोग स्वास्थ्य या काम के कारण पूरी रात नहीं जाग सकते, वे रात के कुछ घंटे भजन-कीर्तन करके भी इस भाव को निभा सकते हैं। अगले दिन की ज़िम्मेदारियाँ और स्वास्थ्य भी महत्वपूर्ण हैं।

सफला एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे बताए गए लाभ शास्त्रों और परंपरा में वर्णित धार्मिक मान्यताएँ हैं। इन्हें श्रद्धा के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।

  • कार्यों में सफलता की कामना: मान्यता है कि यह व्रत रुके हुए कामों में बाधाएँ कम करता है और प्रयासों को सफल बनाने में सहायक होता है।
  • पापों का नाश: कथा के अनुसार श्रद्धा और पश्चाताप के साथ किया गया यह व्रत पिछले पापों के प्रभाव को कम करने वाला माना जाता है।
  • मोक्ष की प्राप्ति: माहात्म्य में कहा गया है कि इस व्रत को करने वाला अंत में भगवान के धाम का अधिकारी बनता है।
  • यज्ञ के समान पुण्य: परंपरा के अनुसार इसकी कथा पढ़ने या सुनने से भी बड़े यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।
  • पारिवारिक सुख: कथा में लुम्पक का पूरा परिवार भक्त बन गया था; इसलिए यह व्रत परिवार में सौहार्द और धर्म की भावना बढ़ाने वाला माना जाता है।
  • मन की शांति और अनुशासन: एक दिन का संयम, जाप और जागरण मन को शांत करता है और आत्म-अनुशासन का अभ्यास कराता है।
  • दान और सेवा का अवसर: सर्दियों में ज़रूरतमंदों को कंबल, कपड़े और भोजन देना इस व्रत को सामाजिक रूप से भी सार्थक बनाता है।

संबंधित एकादशी और पाठ

सफला एकादशी से पहले मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी आती है, जिस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है। इसके बाद पौष शुक्ल पक्ष में पौष पुत्रदा एकादशी आती है, जो संतान सुख की कामना से रखी जाती है। वर्ष की सभी 24 एकादशियों की सूची और तारीखें एकादशी कब है पेज पर देखें।

पूजा के समय ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती गाएँ। सभी आरतियाँ एक साथ पढ़ने के लिए आरती संग्रह PDF डाउनलोड करें, और रोज़ की तिथि, नक्षत्र और शुभ समय के लिए दैनिक पंचांग देखें।

सफला एकादशी हमें याद दिलाती है कि जीवन में कितनी भी गलतियाँ हुई हों, सच्चे मन से भगवान की ओर एक कदम बढ़ाने पर रास्ता बदल सकता है। इस एकादशी पर जो भी फल आपके पास हो, उसे प्रेम से भगवान नारायण को अर्पित करें, एक दीपक जलाएँ और अपने कामों की सफलता के लिए प्रार्थना करें। भगवान नारायण आपके हर शुभ प्रयास को सफल करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

सफला एकादशी 2026-27 में कब है?

2026-27 में सफला एकादशी रविवार, 3 जनवरी 2027 को है और पारण 4 जनवरी की सुबह होगा। आपके शहर का सटीक पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीखें इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

क्या 2026 में सफला एकादशी है?

कैलेंडर वर्ष 2026 में अधिक मास होने के कारण पौष कृष्ण एकादशी जनवरी 2027 में पड़ रही है। इसलिए इस चक्र की सफला एकादशी 3 जनवरी 2027 को है।

सफला एकादशी का नाम सफला क्यों पड़ा?

सफला का अर्थ है सफलता या फल देने वाली। कथा में दुराचारी राजकुमार लुम्पक का असफल जीवन इस व्रत से फिर सफल हो गया, और इस दिन भगवान को फल अर्पित करने का विशेष विधान है — इसलिए इसे सफला एकादशी कहते हैं।

सफला एकादशी किस महीने में आती है?

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह पौष मास के कृष्ण पक्ष में आती है, जबकि दक्षिण और पश्चिम भारत के अमांत पंचांग में इसे मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी कहा जाता है। दोनों में दिन एक ही होता है।

सफला एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप की पूजा होती है, जिन्हें इस एकादशी का अधिष्ठाता देव माना गया है। कई परिवार श्रीकृष्ण या लक्ष्मी-नारायण की पूजा भी करते हैं।

सफला एकादशी व्रत कथा संक्षेप में क्या है?

चम्पावती के राजा महिष्मान ने अपने दुराचारी पुत्र लुम्पक को राज्य से निकाल दिया। वन में ठंड से बेहोश होने के कारण उसने अनजाने में एकादशी का उपवास किया, पीपल के नीचे फल भगवान को अर्पित किए और रात भर जागा; भगवान नारायण की कृपा से उसके पाप नष्ट हुए और उसे राज्य वापस मिला।

सफला एकादशी पर कौन से फल चढ़ाने चाहिए?

परंपरा में नारियल, सुपारी, आंवला, अनार, नींबू या बिजौरा, बेर, लौंग और आम का उल्लेख मिलता है। आज लोग अपने क्षेत्र में मिलने वाले ताज़े मौसमी फल जैसे केला, अमरूद और संतरा भी अर्पित करते हैं।

सफला एकादशी पर दीपदान कैसे करें?

शाम को भगवान विष्णु के सामने घी का दीपक जलाएँ, एक दीपक तुलसी के पास रखें और संभव हो तो मंदिर या पीपल के नीचे भी दीपक जलाएँ। दीपक जलाते समय ॐ नमो नारायणाय का जाप करें।

सफला एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक से बने फलाहारी व्यंजन खा सकते हैं। चावल, गेहूँ, दालें, प्याज़ और लहसुन से परहेज़ करें।

क्या एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

निर्जला व्रत में पानी नहीं पिया जाता, लेकिन फलाहार या एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। स्वास्थ्य की कोई समस्या हो तो पानी अवश्य पिएँ और डॉक्टर की सलाह लें।

सफला एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?

परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन चावल और सभी अनाज वर्जित माने गए हैं, क्योंकि यह व्रत अन्न त्याग और संयम का दिन है। व्रत न रखने वाले लोग भी अक्सर इस दिन चावल नहीं बनाते।

सफला एकादशी का पारण कब और कैसे करें?

पारण द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद, हरिवासर समाप्त होने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले करें। पूजा के बाद तुलसी दल या प्रसाद के फल से व्रत खोलें; अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो दिनों में बँटती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव, इस्कॉन व संन्यासी अक्सर दूसरे दिन व्रत रखते हैं। 2026-27 की सफला एकादशी पर दोनों परंपराओं का व्रत 3 जनवरी को ही है।

सफला एकादशी के मुख्य मंत्र कौन से हैं?

सबसे प्रमुख मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय है। इसके अलावा ॐ नमो नारायणाय, विष्णु गायत्री मंत्र और फल अर्पण के समय इदं फलं मया देव मंत्र बोला जाता है।

क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग सफला एकादशी का व्रत रख सकते हैं?

हाँ, लेकिन कठोर या निर्जला व्रत के बजाय फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें, और पहले डॉक्टर से सलाह लें। मधुमेह या नियमित दवा लेने वालों के लिए भी यही सावधानी है; पूजा, कथा और जाप से भी व्रत का भाव निभाया जा सकता है।

अगर सफला एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं — भगवान विष्णु से क्षमा प्रार्थना करें, नाम जाप करें और यथाशक्ति दान करें। अगली एकादशी पर फिर श्रद्धा से व्रत रखें।

क्या सफला एकादशी पर रात्रि जागरण ज़रूरी है?

परंपरा में सफला एकादशी पर जागरण का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि कथा में लुम्पक ने रात भर जागकर व्रत पूरा किया था। स्वास्थ्य या काम के कारण पूरी रात न जाग सकें तो कुछ घंटे भजन-कीर्तन करना भी पर्याप्त भाव माना जाता है।

सफला एकादशी पर तुलसी के पत्ते तोड़ सकते हैं?

नहीं, परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। पूजा के लिए तुलसी दल दशमी के दिन ही तोड़कर रख लें।

सफला एकादशी के बाद अगली एकादशी कौन सी है?

सफला एकादशी के बाद पौष शुक्ल पक्ष की पौष पुत्रदा एकादशी आती है, और इससे पहले मार्गशीर्ष शुक्ल की मोक्षदा एकादशी आती है। दोनों की तारीखें उनके पेज पर दी गई तालिका में देखें।

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