अजा एकादशी (Aja Ekadashi) भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भगवान विष्णु के हृषीकेश रूप की पूजा और व्रत किया जाता है। इसे अन्नदा एकादशी (Annada Ekadashi) भी कहते हैं। यह जन्माष्टमी के कुछ ही दिन बाद आती है, इसलिए कई भक्त कृष्ण जन्मोत्सव के बाद इसे भक्ति का अगला पड़ाव मानते हैं।
इस एकादशी की कथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की है। सत्य का पालन करते हुए उन्होंने राज्य, परिवार और सम्मान सब कुछ खो दिया, फिर भी अपने वचन से नहीं हटे। गौतम ऋषि के कहने पर उन्होंने अजा एकादशी का व्रत किया और परंपरा के अनुसार उन्हें अपना परिवार और राज्य फिर से मिल गया।
मान्यता है कि यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों को दूर करता है और इसकी कथा सुनने का पुण्य अश्वमेध यज्ञ के समान है। इस लेख में आप अजा एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, व्रत के नियम और इससे जुड़ी मान्यताओं को सरल भाषा में जानेंगे।
अजा एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: अजा एकादशी 2026 (7 सितंबर) बीत चुकी है। अगली अजा एकादशी शनिवार, 28 अगस्त 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 27 अगस्त 2027 को दोपहर लगभग 3:26 बजे से 28 अगस्त को दोपहर लगभग 12:43 बजे तक रहेगी, और पारण 29 अगस्त 2027 की सुबह किया जाएगा — अपने शहर का सटीक पारण समय नीचे की तालिका में देखें।
अगली अजा एकादशी
अजा एकादशी 2027
28 अगस्त 2027, शनिवार 300 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- भाद्रपद कृष्ण
- एकादशी तिथि
- 27 अग 15:27 – 28 अग 12:44
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 29 अग, 05:57 – 08:31
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 7 सितंबर 2026, सोमवार | 6 सितं 19:30 – 7 सितं 17:05 | 8 सितं, 06:02 – 08:33 |
| 2027 | 28 अगस्त 2027, शनिवार | 27 अग 15:27 – 28 अग 12:44 | 29 अग, 05:57 – 08:31 |
| 2028 | 16 अगस्त 2028, बुधवार वैष्णव: 17 अग | 16 अग 05:13 – 17 अग 03:51 | 17 अग, 13:43 – 16:20 |
| 2029 | 4 सितंबर 2029, मंगलवार | 4 सितं 00:53 – 5 सितं 00:38 | 5 सितं, 06:22 – 08:32 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदल जाता है। भारत में 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में यह व्रत एक ही दिन है। विदेश के कुछ शहरों में दोनों की तारीख अलग हो सकती है, इसलिए वहाँ रहने वाले भक्त तालिका ज़रूर देखें।
अजा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“अज” शब्द का अर्थ है जिसका जन्म न हुआ हो, यानी अजन्मा और शाश्वत। यह भगवान विष्णु का एक नाम है। अजा एकादशी का अर्थ हुआ उस अजन्मा, अनादि परमात्मा को समर्पित एकादशी। यह नाम याद दिलाता है कि शरीर, धन और पद बदलते रहते हैं, पर आत्मा और परमात्मा सदा रहते हैं।
अजा एकादशी के अन्य नाम
- अन्नदा एकादशी (Annada Ekadashi): इस्कॉन और कई वैष्णव पंचांगों में यही नाम प्रचलित है। “अन्नदा” का अर्थ है अन्न देने वाली, यानी समृद्धि और पोषण देने वाली।
- भाद्रपद कृष्ण एकादशी: उत्तर भारत के पंचांगों में तिथि के आधार पर यही नाम लिखा मिलता है।
- श्रावण कृष्ण एकादशी: अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में इसी एकादशी को यह नाम दिया जाता है।
पूर्णिमांत और अमांत पंचांग में महीना
उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इसमें अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष में आती है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में चलने वाले अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ यही एकादशी श्रावण कृष्ण पक्ष की कहलाती है।
ध्यान दें कि दोनों में व्रत की तारीख एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। यही कारण है कि कुछ कथा-पाठों में युधिष्ठिर “श्रावण कृष्ण” और कुछ में “भाद्रपद कृष्ण” एकादशी के बारे में पूछते हैं। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर में आती है।
अजा एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
कथा में भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि अजा एकादशी सब पापों का नाश करने वाली है और इस लोक तथा परलोक में इसके समान दूसरा व्रत कम ही है। परंपरा के अनुसार इस व्रत को श्रद्धा से करने वाले को पिछले कर्मों के बोझ से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है।
इस एकादशी पर भगवान विष्णु के हृषीकेश रूप की पूजा का विधान बताया जाता है। हृषीकेश का अर्थ है इंद्रियों के स्वामी। व्रत का मूल भाव भी यही है कि हम एक दिन के लिए अपनी इंद्रियों और मन को संयम में रखकर भगवान की ओर मोड़ें।
आध्यात्मिक संदेश
अजा एकादशी का सबसे बड़ा संदेश है सत्य (सत्य निष्ठा)। राजा हरिश्चंद्र के पास जब कुछ भी नहीं बचा, तब भी उन्होंने सत्य नहीं छोड़ा। यह कथा सिखाती है कि कठिन समय में भी धर्म और ईमानदारी पर टिके रहना ही असली तपस्या है।
दूसरा संदेश है धैर्य और आशा का। हरिश्चंद्र वर्षों तक दुख में रहे, पर उन्होंने उद्धार का रास्ता खोजना नहीं छोड़ा। जब सही मार्गदर्शन मिला, तो उन्होंने पूरे मन से उसका पालन किया। जीवन में भी कठिन दौर स्थायी नहीं होता; श्रद्धा, प्रयास और सही संगति से रास्ता निकलता है।
तीसरा संदेश है कर्तव्य का। श्मशान में काम करते हुए भी हरिश्चंद्र ने अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाया, यहाँ तक कि अपने ही परिवार के लिए नियम नहीं तोड़ा। यह कथा बताती है कि कोई भी काम छोटा नहीं होता, अगर उसे सच्चाई से किया जाए।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार अजा एकादशी का माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है। इस्कॉन की परंपरा में यही स्रोत बताया जाता है। कुछ अन्य स्रोत इसे ब्रह्माण्ड पुराण से जोड़ते हैं, जबकि हिंदी के अधिकतर कथा-पाठ केवल “पुराणों में” कहकर कथा सुनाते हैं।
राजा हरिश्चंद्र की विस्तृत कथा, जिसमें विश्वामित्र की परीक्षा, काशी में बिकना और पुत्र की मृत्यु आती है, मुख्य रूप से मार्कण्डेय पुराण और देवी भागवत पुराण में मिलती है। एकादशी की कथा उसी प्रसिद्ध कथा के अंत को अजा एकादशी के व्रत से जोड़ती है।
अजा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन! भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसका व्रत कैसे किया जाता है और उसका क्या फल है? कृपया विस्तार से बताइए।” (कुछ कथा-पाठों में यह प्रश्न अर्जुन पूछते हैं।)
श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! इस एकादशी का नाम अजा है। यह सब पापों का नाश करने वाली है। जो मनुष्य इस दिन भगवान हृषीकेश की पूजा करके व्रत रखता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। अब मैं तुम्हें इसकी कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र
प्राचीन समय में अयोध्या में सूर्यवंश के चक्रवर्ती राजा हरिश्चंद्र राज्य करते थे। वे पूरी पृथ्वी के सम्राट, प्रतापी और धर्मात्मा थे। उनकी सबसे बड़ी पहचान थी उनकी सत्यनिष्ठा। वे जो वचन दे देते, उसे हर हाल में निभाते थे। उनकी पत्नी का नाम तारामती और पुत्र का नाम रोहिताश्व था।
(कुछ परंपराओं में रानी को शैव्या और दक्षिण भारत तथा इस्कॉन के कथा-पाठ में चंद्रमती कहा गया है। पुत्र का नाम कहीं रोहित तो कहीं लोहिताश्व मिलता है।)
सपने में दिया दान और राज्य का त्याग
प्रचलित कथा के अनुसार देवताओं ने राजा की सत्यनिष्ठा की परीक्षा लेने का निश्चय किया। एक रात राजा ने सपने में देखा कि उन्होंने महर्षि विश्वामित्र को अपना पूरा राज्य दान कर दिया है। अगले दिन विश्वामित्र सचमुच राजदरबार में आए और सपने में दिए गए दान की याद दिलाई।
कोई और होता तो कहता कि सपना तो सपना है। पर हरिश्चंद्र ने कहा कि वचन सपने में दिया हो या जागते हुए, वचन वचन है। उन्होंने बिना संकोच पूरा राज्य विश्वामित्र को सौंप दिया और पत्नी तथा पुत्र के साथ महल छोड़ दिया।
(कुछ कथा-पाठों में सपने का प्रसंग नहीं है। वहाँ केवल इतना कहा गया है कि किसी कर्म के फल या भाग्य के कारण राजा का सब कुछ छिन गया।)
परिवार का बिछड़ना और श्मशान की सेवा
वचन और दक्षिणा पूरी करने के लिए राजा को अपनी पत्नी और पुत्र को बेचना पड़ा। अंत में उन्होंने स्वयं को भी एक डोम (चांडाल) के हाथ बेच दिया। जो कभी पृथ्वी के सम्राट थे, वे अब श्मशान घाट के रखवाले बन गए। उनका काम था मृतकों के परिजनों से कर लेना और कफ़न (वस्त्र) एकत्र करना। प्रचलित कथाओं में यह सब काशी में हुआ बताया जाता है।
इतने कठिन दिनों में भी हरिश्चंद्र ने सत्य नहीं छोड़ा। वे अपने स्वामी के नियम का पालन पूरी ईमानदारी से करते रहे। लेकिन भीतर से वे बहुत दुखी थे। वे सोचते रहते, “मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा उद्धार कैसे होगा?” इसी चिंता में कई वर्ष बीत गए।
पुत्र की मृत्यु और सबसे कठिन परीक्षा
लोक में प्रचलित हरिश्चंद्र कथा के अनुसार एक दिन उनके पुत्र रोहिताश्व को साँप ने डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई। रोती-बिलखती रानी पुत्र का शव लेकर उसी श्मशान में पहुँची, जहाँ हरिश्चंद्र पहरा देते थे।
हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी और पुत्र को पहचान लिया, फिर भी उन्होंने कर्तव्य नहीं छोड़ा। उन्होंने कहा कि श्मशान का कर दिए बिना दाह संस्कार नहीं हो सकता, यह मेरे स्वामी का नियम है। रानी के पास देने को कुछ नहीं था। यह राजा के सत्य की सबसे कठिन परीक्षा थी। (अजा एकादशी के कुछ कथा-पाठ इस प्रसंग को विस्तार से नहीं सुनाते, केवल इतना बताते हैं कि अंत में मृत पुत्र जीवित हो गया।)
गौतम ऋषि का उपदेश
इसी दुख के समय राजा के पिछले पुण्यों के प्रभाव से महर्षि गौतम वहाँ आ पहुँचे। राजा ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी पूरी दुखभरी कथा सुनाई। ऋषि का हृदय करुणा से भर गया।
गौतम ऋषि ने कहा, “हे राजन! तुम्हारा बड़ा सौभाग्य है। आज से सातवें दिन भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा नाम की एकादशी आने वाली है। तुम उस दिन विधिपूर्वक उपवास करो और रात भर जागरण करके भगवान का स्मरण करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे सब पाप नष्ट हो जाएँगे।” इतना कहकर ऋषि अंतर्धान हो गए। (सात दिन वाली बात इस्कॉन के कथा-पाठ में मिलती है; कई हिंदी पाठों में केवल व्रत का उपदेश है।)
व्रत, जागरण और उद्धार
ऋषि के बताए अनुसार अजा एकादशी आने पर राजा हरिश्चंद्र ने पूरी श्रद्धा से उपवास किया और रात भर जागरण करते हुए भगवान का ध्यान किया। व्रत के प्रभाव से उनके सारे पाप उसी क्षण नष्ट हो गए।
तभी आकाश में दुंदुभियाँ बजने लगीं और देवताओं ने फूलों की वर्षा की। राजा ने देखा कि उनके सामने ब्रह्मा, विष्णु, महादेव और इंद्र आदि देवता खड़े हैं। उनका मृत पुत्र जीवित हो उठा और रानी राजसी वस्त्रों और आभूषणों में उनके पास आ गई। राजा को अपना खोया हुआ राज्य भी वापस मिल गया।
कुछ कथा-पाठों में यह भी बताया गया है कि यह पूरी घटना देवताओं और विश्वामित्र की रची हुई माया थी, जो राजा के सत्य की परीक्षा के लिए थी। व्रत के प्रभाव से वह माया समाप्त हो गई। अंत में राजा हरिश्चंद्र अपने परिवार और प्रजा सहित स्वर्ग (परम धाम) को गए।
कथा का फल
श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! यह सब अजा एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य विधि से यह व्रत करता है और रात्रि जागरण करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और अंत में उसे उत्तम लोक मिलता है। इस एकादशी की कथा पढ़ने या सुनने मात्र से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।”
बोलो श्री हरि विष्णु भगवान की जय।
अजा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
नीचे दी गई विधि गृहस्थ भक्तों के लिए सरल रूप में है। अपनी कुल परंपरा या गुरु के बताए नियम हों, तो उन्हीं का पालन करें।
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार सादा, सात्विक भोजन करें। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से बचें।
- रात में हल्का रहें और मन में अगले दिन के व्रत का संकल्प याद रखें।
- पूजा स्थान साफ़ कर लें और पूजा सामग्री पहले से तैयार रख लें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और साफ़ (हो सके तो पीले) वस्त्र पहनें।
- सूर्य देव को जल अर्पित करें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं आज अजा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखूँगा/रखूँगी।” साथ ही मन में यह भी संकल्प लें कि आज सत्य बोलेंगे।
भगवान विष्णु (हृषीकेश) की पूजा
- चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र रखें। चाहें तो पास में जल से भरा कलश और आम के पत्ते रखें।
- भगवान को गंगाजल से स्नान कराएँ या जल छिड़कें, फिर पीला चंदन लगाएँ।
- पीले फूल, तुलसी दल, धूप और घी का दीपक अर्पित करें। एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें; पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
- फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। समय हो तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- अजा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।
दिन भर और शाम की पूजा
- दिन भर भजन, नाम-जप या गीता पाठ में मन लगाएँ। झूठ, क्रोध, निंदा और कटु वचन से बचें।
- दिन में सोने से बचें, यह व्रत के नियमों में बताया जाता है।
- शाम को फिर से दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें और तुलसी जी के पास दीपक रखें।
रात्रि जागरण
अजा एकादशी की कथा में गौतम ऋषि ने राजा हरिश्चंद्र को उपवास के साथ रात्रि जागरण करने को कहा था, इसलिए इस एकादशी पर जागरण का विशेष महत्व माना जाता है। रात में भजन-कीर्तन, कथा या नाम-जप करें। पूरी रात जागना संभव न हो, तो जितना हो सके उतनी देर भगवान का स्मरण करें।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
- किसी ज़रूरतमंद, ब्राह्मण या गौशाला को अपनी सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र या दक्षिणा दान करें।
- तालिका में दिए पारण समय के भीतर तुलसी दल और जल लेकर व्रत खोलें, फिर सात्विक भोजन करें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र
- चौकी और पीला वस्त्र
- कलश, जल, गंगाजल और आम के पत्ते
- पीला चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल, केवल पूजा के लिए)
- पीले फूल और फूलमाला
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
- धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, रुई की बत्ती और कपूर
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- मौसमी फल, मेवे और मिठाई का भोग
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची
- तुलसी की माला (जप के लिए)
- व्रत कथा की पुस्तक या यह पेज, और आरती संग्रह
- दान के लिए अन्न, वस्त्र या दक्षिणा
अजा एकादशी के मंत्र
मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का अपनी सुविधा से जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: सब प्राणियों के भीतर बसने वाले भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमस्कार है। बारह अक्षरों का यह मंत्र हर एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है।
2. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करें।
3. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी और पूरे संसार के आधार हैं, जो आकाश के समान व्यापक और मेघ के समान श्याम वर्ण के हैं, जो लक्ष्मीपति और कमल-नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, उन संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
4. हरे कृष्ण महामंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
अर्थ: इसमें भगवान के हरि, कृष्ण और राम नामों से बार-बार उन्हें पुकारा जाता है। यह प्रेमपूर्ण भक्ति और निरंतर स्मरण की प्रार्थना है। जन्माष्टमी के तुरंत बाद आने के कारण अजा एकादशी पर बहुत से वैष्णव भक्त इसी महामंत्र का जप और कीर्तन करते हैं।
अजा एकादशी के लिए अलग से कोई विशेष मंत्र प्रामाणिक स्रोतों में नहीं मिलता। इसलिए ऊपर दिए भगवान विष्णु के प्रसिद्ध मंत्र ही इस दिन जपे जाते हैं।
अजा एकादशी और राजा हरिश्चंद्र: सत्य का संदेश
“सत्यवादी हरिश्चंद्र” आज भी भारत में सच्चाई का दूसरा नाम है। अजा एकादशी की कथा उन्हीं के जीवन के सबसे कठिन दौर को इस व्रत से जोड़ती है। इसलिए इस एकादशी का व्रत केवल भोजन छोड़ने का नहीं, बल्कि सत्य को अपनाने का व्रत भी माना जा सकता है।
हरिश्चंद्र की कथा से हम क्या सीखें
- वचन का मान: दिया हुआ वचन छोटा हो या बड़ा, उसे निभाने की कोशिश करें।
- कठिन समय में ईमानदारी: परिस्थिति खराब होने पर भी गलत रास्ता न चुनें।
- कर्तव्य का सम्मान: जो भी काम मिला है, उसे पूरी निष्ठा से करें। कोई भी ईमानदार काम छोटा नहीं होता।
- परिवार के प्रति करुणा: हरिश्चंद्र की कथा में परिवार का दुख भी है। यह याद दिलाती है कि सत्य के साथ करुणा भी ज़रूरी है।
- मार्गदर्शन की तलाश: दुख में अकेले न घुटें। गौतम ऋषि की तरह सही सलाह देने वाले लोगों से बात करें।
इस एकादशी पर “सत्य व्रत” कैसे रखें
बहुत से भक्त इस दिन उपवास के साथ एक छोटा संकल्प भी लेते हैं, जैसे पूरा दिन झूठ न बोलना, किसी को दिया पुराना वचन पूरा करना, या किसी से हुई गलती के लिए क्षमा माँगना। यह कथा के भाव के अनुरूप है और व्रत को अर्थपूर्ण बनाता है।
जन्माष्टमी के बाद अजा एकादशी
अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के लगभग तीन दिन बाद आती है। इसलिए बहुत से परिवार जन्माष्टमी का व्रत खोलने के कुछ ही दिन बाद फिर से एकादशी का व्रत रखते हैं। इस्कॉन मंदिरों में इसे अन्नदा एकादशी के नाम से मनाया जाता है।
अगर आपने जन्माष्टमी का कठोर व्रत रखा है और शरीर अभी पूरी तरह सामान्य नहीं हुआ है, तो अजा एकादशी पर फलाहार या एक समय भोजन वाला हल्का व्रत रखना बेहतर है। भगवान भाव देखते हैं, कठोरता नहीं। दोनों व्रतों के बीच पौष्टिक, सात्विक भोजन और पर्याप्त पानी लें।
अश्वमेध यज्ञ के समान फल और अन्नदान
कथा में कहा गया है कि अजा एकादशी की कथा सुनने या पढ़ने मात्र से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। अश्वमेध यज्ञ प्राचीन काल में चक्रवर्ती राजाओं द्वारा किया जाने वाला सबसे बड़ा यज्ञ माना जाता था। यह तुलना बताती है कि सच्चे मन से सुनी गई धर्म-कथा भी बड़े अनुष्ठान जितनी मूल्यवान मानी गई है।
इस कथन को इस तरह समझना अच्छा है कि कथा सुनने का असली फल तब मिलता है, जब उसका संदेश जीवन में उतरे। केवल सुन लेना पर्याप्त नहीं, उसके अनुसार सत्य और धर्म का पालन करना ही इसका सार है।
अन्नदा एकादशी पर दान
“अन्नदा” नाम के कारण इस दिन अन्नदान को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। ध्यान रखें कि एकादशी पर स्वयं अनाज नहीं खाया जाता, पर द्वादशी को पारण के बाद या दान के रूप में अन्न देना परंपरा में अच्छा माना गया है।
- चावल, आटा, दाल जैसे अन्न का दान
- भूखे लोगों या ज़रूरतमंद बच्चों को भोजन कराना
- फल, वस्त्र और दक्षिणा
- गौशाला में हरा चारा या गुड़
अजा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
क्या खा सकते हैं
- मौसमी फल, केला, सेब, पपीता, नारियल
- दूध, दही, छाछ, पनीर, मक्खन
- सूखे मेवे: बादाम, काजू, किशमिश, अखरोट, मखाना
- साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, राजगिरा (परंपरा के अनुसार)
- आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू, लौकी
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
- नारियल पानी, नींबू पानी, सादा पानी
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़ (एकादशी पर चावल वर्जित माना जाता है)
- गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा जैसे सभी अनाज
- दालें और फलियाँ
- प्याज, लहसुन
- मांस, मछली, अंडा, मदिरा, तंबाकू
- साधारण (आयोडीन वाला) नमक, अगर आप परंपरा के अनुसार सेंधा नमक लेते हैं
- बहुत तला-भुना और भारी भोजन
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों नहीं लिए जाते। यह सबसे कठोर रूप है और केवल स्वस्थ लोगों को, अपनी क्षमता समझकर ही रखना चाहिए। अगस्त-सितंबर में उमस और गर्मी रहती है, इसलिए शरीर में पानी की कमी का ध्यान रखें।
फलाहार व्रत
फलाहार व्रत में अनाज छोड़कर फल, दूध, मेवे और व्रत के अनुकूल चीज़ें ली जाती हैं। ज़्यादातर गृहस्थ भक्त यही व्रत रखते हैं। इसमें पानी, दूध और फलों का रस लिया जा सकता है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरे दिन उपवास नहीं कर सकते, वे एक समय सात्विक, बिना अनाज वाला भोजन कर सकते हैं, जैसे साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू की रोटी और आलू की सब्ज़ी। बुज़ुर्गों, कामकाजी लोगों और कमज़ोर स्वास्थ्य वालों के लिए यह अच्छा विकल्प है।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग, गर्भावस्था, स्तनपान, बढ़ती उम्र या नियमित दवा लेने की स्थिति में कठोर या निर्जला व्रत से पहले अपने डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। ऐसी स्थिति में फलाहार, एक समय भोजन या केवल पूजा और नाम-जप भी पूरी श्रद्धा का व्रत है।
अजा एकादशी पारण कब और कैसे करें
एकादशी व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में खोला जाता है, इसे पारण कहते हैं। पारण का सही समय आपके शहर के सूर्योदय और द्वादशी तिथि पर निर्भर करता है। अपने शहर का सटीक पारण समय ऊपर दी गई तालिका में देखें।
- द्वादशी में पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना अच्छा नहीं माना जाता।
- हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरि वासर समाप्त होने का इंतज़ार करें।
- प्रातःकाल सबसे अच्छा: पारण के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है। सुबह संभव न हो, तो मध्याह्न के बाद करें।
- स्मार्त और वैष्णव: जिन वर्षों में एकादशी दो दिन होती है, स्मार्त (गृहस्थ) पहले दिन और वैष्णव (संन्यासी, इस्कॉन, विधवा आदि की परंपरा में) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार दिन चुनें; तालिका में दोनों दिखाई देते हैं।
पारण कैसे करें
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
- हो सके तो पहले किसी ज़रूरतमंद को भोजन या अन्न दान करें।
- तुलसी दल और थोड़ा जल लेकर व्रत खोलें।
- फिर हल्का, सात्विक भोजन लें। लंबे उपवास के बाद बहुत भारी या तला भोजन एकदम न खाएँ।
अजा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु के हृषीकेश रूप का ध्यान करें और तुलसी दल अर्पित करें।
- अजा एकादशी की कथा (राजा हरिश्चंद्र की कथा) पढ़ें या सुनें।
- पूरे दिन सत्य बोलने का विशेष प्रयास करें; यह इस एकादशी का मूल संदेश है।
- संभव हो तो रात्रि जागरण करें, भजन-कीर्तन करें।
- अन्न, वस्त्र या भोजन का दान करें।
- बड़ों, माता-पिता और गुरु का सम्मान करें।
- द्वादशी को सही समय पर पारण करें।
क्या न करें
- चावल और अनाज न खाएँ।
- झूठ, छल, क्रोध, चुगली और किसी की निंदा से बचें।
- तुलसी के पत्ते एकादशी के दिन न तोड़ें।
- मांस, मदिरा, तंबाकू और तामसिक चीज़ों से दूर रहें।
- दिन में सोने से बचें।
- किसी का अपमान न करें, विशेषकर ज़रूरतमंद और कमज़ोर लोगों का।
- हरि वासर में या द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न करें।
- स्वास्थ्य की अनदेखी करके कठोर व्रत न रखें।
अजा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: अजा एकादशी का व्रत रखने से खोया हुआ धन, नौकरी या पद अपने आप लौट आता है, कुछ करने की ज़रूरत नहीं।
सच्चाई: कथा में राजा हरिश्चंद्र को राज्य वापस मिलता है, इसलिए यह व्रत कठिन समय में आशा का प्रतीक माना जाता है। पर परंपरा व्रत को मन की शुद्धि और भगवान की कृपा का साधन बताती है, मेहनत का विकल्प नहीं। श्रद्धा के साथ ईमानदार प्रयास भी ज़रूरी है।
मिथक: कथा सुनने भर से अश्वमेध यज्ञ का फल मिल जाता है, इसलिए आचरण से कोई फर्क नहीं पड़ता।
सच्चाई: यह कथन कथा सुनने के महत्व को बताने के लिए है। इसी कथा का नायक वह राजा है जिसने सब कुछ खोकर भी सत्य नहीं छोड़ा। इसलिए कथा का सार यही है कि सुनने के साथ उसका संदेश, यानी सत्य और कर्तव्य, जीवन में उतारा जाए।
मिथक: हरिश्चंद्र पर दुख इसलिए आए क्योंकि भगवान उनसे नाराज़ थे; जिस पर दुख आए, वह पापी है।
सच्चाई: प्रचलित कथा में राजा के दुख उनके सत्य की परीक्षा के रूप में बताए गए हैं, सज़ा के रूप में नहीं। किसी के कठिन समय को उसके पाप से जोड़कर देखना न कथा का भाव है, न करुणा का। दुखी व्यक्ति को सहारा देना ही धर्म है।
मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो अजा एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।
सच्चाई: शास्त्रों और परंपरा में सामर्थ्य के अनुसार निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन, सभी रूपों को मान्यता है। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से हल्का व्रत या केवल पूजा और जप कर सकते हैं। भाव सबसे बड़ा है।
मिथक: एकादशी पर चावल का एक दाना भी खा लिया तो बड़ा पाप लगता है और अगला जन्म बुरा होता है।
सच्चाई: एकादशी पर चावल और अनाज न खाने का नियम परंपरा में बहुत प्रचलित है और इसका पालन करना अच्छा है। पर डर के कारण व्रत रखना इसका उद्देश्य नहीं है। भूल से कुछ खा लिया हो, तो भगवान से क्षमा माँगकर नियम से व्रत जारी रखें।
मिथक: गलती से व्रत टूट गया तो अपशकुन होगा और सारा पुण्य नष्ट हो जाएगा।
सच्चाई: परंपरा में भूल को क्षमा योग्य माना गया है। ऐसा हो जाए तो शांत मन से भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, नाम-जप करें और यदि चाहें तो कुछ दान करें। अगली एकादशी पर फिर से श्रद्धा से व्रत रखें। डरने की कोई बात नहीं।
मिथक: जन्माष्टमी का व्रत रख लिया, तो अजा एकादशी का व्रत रखने की ज़रूरत नहीं, या दोनों रखने से नुकसान ही होगा।
सच्चाई: दोनों अलग पर्व हैं और दोनों का अपना महत्व है। जो लोग दोनों व्रत रखते हैं, वे बीच के दिनों में पौष्टिक भोजन और पानी का ध्यान रखें और ज़रूरत हो तो एकादशी पर हल्का फलाहार व्रत रखें। स्वास्थ्य की स्थिति हो तो डॉक्टर से सलाह लें।
अजा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे दिए लाभ परंपरा और श्रद्धा पर आधारित मान्यताएँ हैं। हर व्यक्ति का अनुभव उसकी भावना और आचरण के अनुसार अलग हो सकता है।
- पापों से मुक्ति: मान्यता है कि यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों का प्रभाव कम करता है।
- कठिन समय में आशा: हरिश्चंद्र की कथा के कारण यह व्रत संकट, हानि या परिवार से बिछड़ने के दुख में धैर्य देने वाला माना जाता है।
- सत्यनिष्ठा का अभ्यास: एक दिन सत्य, संयम और भक्ति में बिताने से मन में ईमानदारी का भाव मज़बूत होता है।
- पारिवारिक सुख-शांति: परिवार के साथ कथा सुनना और पूजा करना आपसी प्रेम और एकता बढ़ाता है।
- अन्न और समृद्धि: अन्नदा नाम के कारण मान्यता है कि इस दिन किया गया अन्नदान घर में अन्न और समृद्धि का आशीर्वाद लाता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: परंपरा के अनुसार श्रद्धा से किया गया एकादशी व्रत भगवान विष्णु की कृपा और परम धाम की ओर ले जाने वाला माना जाता है।
संबंधित एकादशी और पाठ
अजा एकादशी से पहले श्रावण शुक्ल पक्ष में श्रावण पुत्रदा एकादशी आती है, और इसके बाद भाद्रपद शुक्ल पक्ष में परिवर्तिनी एकादशी आती है, जब चातुर्मास में भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। साल की सभी एकादशियों की तारीख और सूची के लिए हमारा एकादशी कब है पेज देखें।
पूजा के समय ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती गा सकते हैं। सत्य के देवता के रूप में पूजे जाने वाले भगवान सत्यनारायण की सत्यनारायण जी की आरती भी इस दिन के भाव से मेल खाती है। रोज़ की तिथि के लिए आज का पंचांग और सभी आरतियों के लिए आरती संग्रह PDF देखें।
अजा एकादशी हमें याद दिलाती है कि सबसे अंधेरे समय में भी सत्य का दीपक बुझने न दें। राजा हरिश्चंद्र की तरह धैर्य, ईमानदारी और भगवान पर भरोसा रखें, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से यह व्रत करें। भगवान हृषीकेश आपके मन को शांति और जीवन को सत्य के प्रकाश से भर दें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
अजा एकादशी 2027 कब है?
अजा एकादशी 2026 (7 सितंबर) बीत चुकी है। 2027 की तारीख, एकादशी तिथि और पारण समय इस पेज के ऊपर दिए संक्षिप्त उत्तर और शहर-वार तारीख तालिका में देखें।
अजा एकादशी किस महीने में आती है?
यह पूर्णिमांत (उत्तर भारत) पंचांग में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की और अमांत पंचांग में श्रावण कृष्ण पक्ष की एकादशी है। तारीख एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। यह प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर में आती है।
अजा एकादशी को अन्नदा एकादशी क्यों कहते हैं?
इस्कॉन और कई वैष्णव पंचांगों में इसका नाम अन्नदा एकादशी है। अन्नदा का अर्थ है अन्न देने वाली, इसलिए इस दिन अन्नदान को विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
अजा शब्द का अर्थ क्या है?
अज का अर्थ है अजन्मा या शाश्वत, जो भगवान विष्णु का एक नाम है। अजा एकादशी उसी अजन्मा परमात्मा को समर्पित है।
अजा एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु के हृषीकेश रूप की पूजा की जाती है। हृषीकेश का अर्थ है इंद्रियों के स्वामी। बहुत से भक्त श्रीकृष्ण की भी पूजा करते हैं।
अजा एकादशी की व्रत कथा किसकी है?
यह कथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की है। सब कुछ खोकर श्मशान में सेवा करते हुए उन्होंने गौतम ऋषि की सलाह पर अजा एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण किया, जिससे परंपरा के अनुसार उन्हें परिवार और राज्य वापस मिला।
राजा हरिश्चंद्र की पत्नी और पुत्र का नाम क्या था?
उत्तर भारत में रानी को तारामती और पुत्र को रोहिताश्व कहा जाता है। पुराणों में रानी का नाम शैव्या और दक्षिण भारत व इस्कॉन के पाठ में चंद्रमती मिलता है; पुत्र को कहीं लोहिताश्व भी कहा गया है।
अजा एकादशी की कथा किस पुराण में है?
परंपरा के अनुसार अजा एकादशी का माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर संवाद के रूप में है; कुछ स्रोत ब्रह्माण्ड पुराण बताते हैं। हरिश्चंद्र की विस्तृत कथा मार्कण्डेय पुराण में मिलती है।
क्या अजा एकादशी पर पानी पी सकते हैं?
हाँ, अगर आप निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं तो पानी, दूध, नारियल पानी और फलों का रस ले सकते हैं। निर्जला व्रत केवल स्वस्थ लोग अपनी क्षमता समझकर रखें।
क्या अजा एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, परंपरा के अनुसार एकादशी पर चावल और सभी अनाज वर्जित माने जाते हैं। चावल से बनी चीज़ें द्वादशी को पारण के बाद ही लें।
अजा एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
फल, दूध, दही, मेवे, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक ले सकते हैं। प्याज, लहसुन, अनाज और दालों से बचें।
अजा एकादशी का पारण कब करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद, हरि वासर बीतने पर और द्वादशी समाप्त होने से पहले करें। सुबह का समय सबसे उत्तम है; अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।
हरि वासर क्या है?
द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। परंपरा के अनुसार इस समय पारण नहीं किया जाता।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी दो दिन पड़ती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) पहले दिन और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार दिन चुनें; तालिका में दोनों दिखाई देते हैं।
अजा एकादशी और जन्माष्टमी में कितना अंतर होता है?
अजा एकादशी भाद्रपद कृष्ण अष्टमी (जन्माष्टमी) के लगभग तीन दिन बाद आती है। दोनों व्रत रखने वाले बीच के दिनों में पौष्टिक भोजन और पानी का ध्यान रखें।
अजा एकादशी के मंत्र कौन से हैं?
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, विष्णु गायत्री मंत्र, शान्ताकारं भुजगशयनं ध्यान मंत्र और हरे कृष्ण महामंत्र इस दिन जपे जाते हैं। इस एकादशी के लिए अलग से कोई विशेष मंत्र प्रामाणिक स्रोतों में नहीं मिलता।
क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग अजा एकादशी का व्रत रख सकते हैं?
वे डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन वाला हल्का व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा और नाम-जप कर सकते हैं। डायबिटीज़ या नियमित दवा लेने वाले भी कठोर व्रत से पहले डॉक्टर से पूछें।
अगर अजा एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, नाम-जप करें और चाहें तो कुछ दान करें, फिर अगली एकादशी पर श्रद्धा से व्रत रखें।
अजा एकादशी पर क्या दान करें?
अन्नदा नाम के कारण अन्नदान सबसे शुभ माना जाता है। चावल, आटा, दाल, भोजन, फल, वस्त्र या दक्षिणा ज़रूरतमंदों को दें, और द्वादशी को पारण से पहले या बाद में दान करें।