इंदिरा एकादशी (Indira Ekadashi) आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जो पितृ पक्ष के बीच आती है। इस दिन भगवान विष्णु के हृषीकेश और शालिग्राम रूप की पूजा की जाती है और व्रत का पुण्य अपने पितरों (पूर्वजों) को समर्पित करने की परंपरा है। पितृ पक्ष में पड़ने वाली यह अकेली एकादशी है, इसलिए श्राद्ध और एकादशी, दोनों का भाव इस दिन एक साथ जुड़ जाता है।
इस एकादशी की कथा माहिष्मती नगरी के राजा इंद्रसेन की है। देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि उनके पिता यमलोक में हैं और अपने पुत्र से इंदिरा एकादशी का व्रत करने की प्रार्थना कर रहे हैं। राजा ने नारद जी की बताई विधि से व्रत किया और परंपरा के अनुसार उनके पिता को यमलोक से मुक्ति मिली।
इस लेख में आप इंदिरा एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, एकादशी श्राद्ध के नियम, पितृ पक्ष से इसका संबंध और व्रत के खान-पान के नियम सरल भाषा में जानेंगे।
इंदिरा एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: इंदिरा एकादशी 2026 (6 अक्टूबर) बीत चुकी है। अगली इंदिरा एकादशी रविवार, 26 सितंबर 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 25 सितंबर 2027 की रात लगभग 10:30 बजे से 26 सितंबर की शाम लगभग 7:49 बजे तक रहेगी, और पारण 27 सितंबर 2027 को सुबह लगभग 6:12 से 8:36 बजे के बीच होगा — अपने शहर का सटीक समय नीचे की तालिका में देखें।
अगली इंदिरा एकादशी
इंदिरा एकादशी 2027
26 सितंबर 2027, रविवार 329 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- आश्विन कृष्ण
- एकादशी तिथि
- 25 सितं 22:32 – 26 सितं 19:51
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 27 सितं, 06:11 – 08:35
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 6 अक्टूबर 2026, मंगलवार | 6 अक्टू 02:09 – 7 अक्टू 00:36 | 7 अक्टू, 06:17 – 08:37 |
| 2027 | 26 सितंबर 2027, रविवार | 25 सितं 22:32 – 26 सितं 19:51 | 27 सितं, 06:11 – 08:35 |
| 2028 | 15 सितंबर 2028, शुक्रवार | 14 सितं 15:57 – 15 सितं 13:44 | 16 सितं, 06:06 – 08:34 |
| 2029 | 4 अक्टूबर 2029, गुरुवार | 3 अक्टू 14:32 – 4 अक्टू 13:03 | 5 अक्टू, 06:16 – 08:37 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर की तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदल जाता है। भारत में 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में यह व्रत एक ही दिन है। विदेश के कुछ शहरों में दोनों की तारीख अलग हो सकती है, इसलिए वहाँ रहने वाले भक्त तालिका ज़रूर देखें।
इंदिरा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
संस्कृत में “इंदिरा” माता लक्ष्मी का एक नाम है, जो भगवान विष्णु की अर्धांगिनी हैं। इस शब्द में शोभा और ऐश्वर्य का भाव भी है। इसलिए एक व्याख्या यह है कि यह एकादशी लक्ष्मी-नारायण की कृपा देने वाली मानी जाती है। गर्ग संहिता की एकादशियों की सूची में भी इंदिरा एकादशी का नाम मिलता है।
शास्त्रों में इस नाम का कोई एक तय अर्थ नहीं बताया गया है। कथा में भी नाम का कारण अलग से नहीं समझाया गया, इसलिए ऊपर की बात को परंपरागत व्याख्या ही समझें, कोई पक्का नियम नहीं।
इंदिरा एकादशी के अन्य नाम
- आश्विन कृष्ण एकादशी: उत्तर भारत के पंचांगों में तिथि के आधार पर यही नाम लिखा मिलता है।
- भाद्रपद कृष्ण एकादशी: अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में इसी एकादशी को यह नाम दिया जाता है।
- पितृ पक्ष की एकादशी / श्राद्ध पक्ष की एकादशी: बोलचाल में कई लोग इसे इसी नाम से पहचानते हैं।
- ग्यारस: गाँवों और कई क्षेत्रों में एकादशी को ग्यारस कहा जाता है, इसलिए “श्राद्ध की ग्यारस” नाम भी सुनने को मिलता है।
पूर्णिमांत और अमांत पंचांग में महीना
उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इसमें इंदिरा एकादशी आश्विन कृष्ण पक्ष की एकादशी है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत में चलने वाले अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ यही एकादशी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की कहलाती है।
दोनों पंचांगों में व्रत का दिन एक ही होता है, केवल महीने का नाम बदलता है। यही कारण है कि पितृ पक्ष को उत्तर भारत में आश्विन कृष्ण पक्ष और अमांत क्षेत्रों में भाद्रपद कृष्ण पक्ष कहा जाता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह एकादशी प्रायः सितंबर के अंत या अक्टूबर की शुरुआत में आती है।
इंदिरा एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
हर एकादशी भगवान विष्णु को प्रिय मानी जाती है, पर इंदिरा एकादशी का स्थान अलग है, क्योंकि यह पितरों की स्मृति के पखवाड़े में आती है। परंपरा के अनुसार इस व्रत को करने और उसका पुण्य पितरों को अर्पित करने से उन्हें सद्गति मिलती है। जो पूर्वज अपने कर्मों के कारण कष्ट में हों, उन्हें भी इस व्रत के पुण्य से शांति मिलने की मान्यता है।
कथा में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस व्रत से व्रती के पाप नष्ट होते हैं और वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णु लोक को जाता है। इस्कॉन की परंपरा में यह भी कहा जाता है कि इस एकादशी का माहात्म्य सुनने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलता है, जबकि कुछ हिंदी कथा-पाठों में वाजपेय यज्ञ के फल की बात आती है।
आध्यात्मिक संदेश
- कृतज्ञता: हम जो कुछ हैं, उसमें हमारे पूर्वजों का योगदान है। यह एकादशी उनके प्रति धन्यवाद व्यक्त करने का दिन है।
- व्रत का सम्मान: कथा में पिता को कष्ट इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने एकादशी का व्रत भंग किया था। संदेश यह है कि जो संकल्प लें, उसे मन, वचन और कर्म से पूरा करें।
- परिवार का बंधन: पुत्र की श्रद्धा ने पिता की सहायता की। यह कथा बताती है कि परिवार का प्रेम मृत्यु के बाद भी समाप्त नहीं होता।
- सेवा और दान: नारद जी की विधि में ब्राह्मण, गाय और परिवार को भोजन कराना शामिल है। पितरों का सम्मान केवल अनुष्ठान से नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा से भी होता है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार इंदिरा एकादशी का माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ा माना जाता है। इस्कॉन और कई वैष्णव संस्थाएँ इसी पुराण का नाम देती हैं। कुछ स्रोत इस कथा को पद्म पुराण के एकादशी माहात्म्य से जोड़ते हैं, और कुछ भविष्य पुराण का उल्लेख करते हैं, जिसमें व्रत का पुण्य पितरों को देने की बात कही गई है।
गरुड़ पुराण को प्रायः इस बात के समर्थन में याद किया जाता है कि वंशजों के दान-पुण्य से कष्ट में पड़ी आत्मा को सहायता मिलती है। विभिन्न पुराणों और कथा-संग्रहों में विवरण थोड़े अलग हो सकते हैं, इसलिए यहाँ हम सबसे अधिक प्रचलित कथा दे रहे हैं।
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी का माहात्म्य सुनने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे मधुसूदन, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है? उसका नाम क्या है, उसकी विधि क्या है और उसका फल क्या है?”
भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन, इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह बड़े-बड़े पापों को नष्ट करने वाली है और अधोगति में पड़े पितरों को भी सद्गति देने वाली है। इसकी कथा ध्यान से सुनो, क्योंकि इसे सुनने मात्र से भी बहुत पुण्य मिलता है।”
माहिष्मती के राजा इंद्रसेन
सतयुग में माहिष्मती नाम की एक सुंदर नगरी थी, जहाँ इंद्रसेन नाम के प्रतापी राजा राज करते थे। वे धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करते थे। उनके पास पुत्र, पौत्र, धन-धान्य और सब प्रकार का ऐश्वर्य था। उनके शत्रु भी उनसे भय मानते थे।
राजा इंद्रसेन भगवान विष्णु के परम भक्त थे। वे नित्य भगवान के नाम का जप करते और अध्यात्म के विचार में मन लगाते थे। इतना सब होते हुए भी उन्हें यह पता नहीं था कि उनके स्वर्गवासी पिता परलोक में किस दशा में हैं।
देवर्षि नारद का आगमन
एक दिन राजा अपनी राजसभा में सुख से बैठे थे, तभी देवर्षि नारद आकाश मार्ग से वहाँ पधारे। राजा तुरंत उठ खड़े हुए, हाथ जोड़कर प्रणाम किया, आसन दिया और अर्घ्य से उनका स्वागत किया।
नारद जी ने राजा का कुशल-क्षेम पूछा और यह भी पूछा कि क्या उनका मन भगवान विष्णु की भक्ति में लगा रहता है। राजा ने विनम्रता से कहा, “हे देवर्षि, आपकी कृपा से सब कुशल है। आज आपके दर्शन से मेरा जीवन धन्य हो गया। कृपया बताइए, आपका आगमन किस कारण से हुआ है?”
यमलोक में पिता का संदेश
नारद जी बोले, “हे राजन, मैं ब्रह्मलोक से यमलोक गया था। वहाँ यमराज की सभा में मैंने तुम्हारे पिता को देखा। वे ज्ञानी, दानी और धर्मात्मा थे, फिर भी एकादशी का व्रत भंग होने के कारण उन्हें यमलोक में रहना पड़ रहा है।”
नारद जी ने आगे कहा, “तुम्हारे पिता ने तुम्हारे लिए यह संदेश भेजा है: ‘पुत्र, पिछले जन्म के किसी विघ्न के कारण मैं यमराज के पास रह गया हूँ। तुम आश्विन कृष्ण पक्ष की इंदिरा एकादशी का व्रत करो और उसका पुण्य मुझे दे दो, जिससे मैं यहाँ से मुक्त होकर स्वर्ग जा सकूँ।'”
यह सुनकर राजा का मन व्याकुल हो गया। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “हे मुनिवर, मैं अपने पिता के लिए यह व्रत अवश्य करूँगा। कृपया मुझे इसकी पूरी विधि बताइए।”
नारद जी द्वारा बताई गई विधि
नारद जी ने कहा, “दशमी के दिन प्रातः श्रद्धा से स्नान करो। दोपहर में फिर से नदी या बहते जल में स्नान करो और पितरों का श्राद्ध करो। उस दिन केवल एक बार भोजन करो और रात को भूमि पर सोओ।”
“एकादशी के दिन प्रातः दातुन और स्नान करके यह संकल्प लो कि आज मैं सब भोगों को त्यागकर निराहार रहूँगा और कल भोजन करूँगा। फिर भगवान से प्रार्थना करो, ‘हे पुंडरीकाक्ष, हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें।'”
“दोपहर के समय शालिग्राम शिला के सामने विधि से श्राद्ध करो। योग्य ब्राह्मणों को फलाहार कराओ और दक्षिणा दो। पितरों के लिए बने पिंड को सूँघकर गाय को खिला दो। फिर धूप, दीप, गंध, पुष्प और नैवेद्य से भगवान हृषीकेश की पूजा करो और रात भर भगवान के पास जागरण करो।”
“द्वादशी के दिन प्रातः भगवान की पूजा करके ब्राह्मणों को भोजन कराओ। इसके बाद अपने भाई-बंधुओं और परिवार के साथ मौन रहकर भोजन करो। हे राजन, इस विधि से व्रत करने पर तुम्हारे पिता अवश्य विष्णु लोक को जाएँगे।” इतना कहकर नारद जी अंतर्धान हो गए।
व्रत का पालन और पिता की मुक्ति
राजा इंद्रसेन ने अपनी रानियों, पुत्रों, भाई-बंधुओं और सेवकों के साथ नारद जी की बताई विधि से इंदिरा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा से किया। जब द्वादशी को उन्होंने पारण किया, तब आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी।
उस व्रत के पुण्य से राजा के पिता यमलोक से मुक्त हो गए और गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले गए। राजा इंद्रसेन ने भी कई वर्षों तक बिना किसी बाधा के राज किया। अंत में उन्होंने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और स्वयं भी परम धाम को प्राप्त हुए।
कथा का फल
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “हे राजन, जो मनुष्य इंदिरा एकादशी का यह माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में बैकुंठ को प्राप्त होता है।”
कथा के पाठ-भेद: अधिकतर कथाओं में श्रोता युधिष्ठिर हैं, पर कुछ पाठों में भगवान यह कथा अर्जुन को सुनाते हैं। अधिकतर पाठों में पिता के कष्ट का कारण एकादशी व्रत का भंग होना बताया गया है, जबकि कुछ में पिछले जन्म के अनजाने पाप भी जोड़े गए हैं। कुछ कथाओं में पिता विमान से स्वर्ग जाते हैं, तो कुछ में गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक जाते हैं। मूल संदेश सब में एक ही है।
इंदिरा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
नीचे दी गई विधि कथा में नारद जी के बताए क्रम और आज प्रचलित पूजा-पद्धति, दोनों पर आधारित है। अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार इसमें बदलाव कर सकते हैं।
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्त्विक भोजन करें। प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन न लें।
- परंपरा के अनुसार दशमी की दोपहर में पितरों का श्राद्ध या तर्पण किया जाता है। जिन परिवारों में यह प्रथा है, वे अपने पुरोहित से समय और विधि पूछ लें।
- रात को संभव हो तो भूमि पर या सादे बिस्तर पर सोएँ और मन में भगवान का स्मरण करें।
- पूजा की सामग्री, तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रख लें) और पूजा स्थान पहले से तैयार कर लें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें, दातुन करें और स्नान करें। स्वच्छ, संभव हो तो पीले वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थान पर भगवान विष्णु की प्रतिमा, चित्र या शालिग्राम स्थापित करें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें। संकल्प में अपना नाम, गोत्र और यह भाव कहें कि “मैं यह व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए करता/करती हूँ और इसका पुण्य अपने पितरों को अर्पित करता/करती हूँ।”
- संकल्प के समय नीचे मंत्र खंड में दिया गया संकल्प मंत्र भी बोल सकते हैं।
भगवान विष्णु (हृषीकेश) और शालिग्राम की पूजा
- शालिग्राम या भगवान की प्रतिमा को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएँ। चाहें तो पंचामृत से अभिषेक करें।
- पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी को विशेष स्थान दिया जाता है।
- धूप और घी का दीपक जलाएँ। फल, मेवा या सात्त्विक मिठाई का नैवेद्य लगाएँ।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ भी कर सकते हैं।
- इंदिरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।
दोपहर: पितरों का स्मरण और तर्पण
- कथा में दोपहर के समय शालिग्राम के सामने श्राद्ध का विधान है। आज कई परिवार इस समय काले तिल मिले जल से पितरों को तर्पण करते हैं।
- दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, हाथ में कुश लेकर पितरों का नाम लेते हुए जल अर्पित करें।
- ब्राह्मण या किसी ज़रूरतमंद को फलाहार, वस्त्र या दक्षिणा दें। गाय को चारा या रोटी खिलाएँ।
- यदि आपके परिवार में एकादशी तिथि का श्राद्ध है, तो नीचे दिए “एकादशी श्राद्ध” खंड को ध्यान से पढ़ें।
शाम की पूजा और रात्रि जागरण
- शाम को फिर से दीपक जलाएँ और तुलसी के पौधे के पास भी दीपक रखें।
- भगवान की आरती करें और भजन-कीर्तन करें।
- कथा में रात भर जागरण का विधान है। पूरी रात जागना संभव न हो, तो देर रात तक भजन, नाम-जप या कथा-श्रवण करें।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
- ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और अपनी सामर्थ्य से दान दें।
- ऊपर की तालिका में दिए पारण समय के भीतर व्रत खोलें। कथा के अनुसार परिवार के साथ मौन रहकर भोजन करना शुभ माना गया है।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र, संभव हो तो शालिग्राम शिला
- चौकी और पीला कपड़ा
- गंगाजल या शुद्ध जल, कलश
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, मिश्री)
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
- पीले फूल और फूलों की माला
- पीला चंदन, रोली, अक्षत
- धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, कपूर
- फल, मेवा और सात्त्विक मिठाई का नैवेद्य
- पान, सुपारी और दक्षिणा
- तर्पण के लिए काले तिल, जौ, कुश और तांबे का लोटा
- गाय के लिए चारा, गुड़ या रोटी
- दान के लिए अन्न, वस्त्र या फल
- तुलसी की माला (जप के लिए) और व्रत कथा की पुस्तक
इंदिरा एकादशी के मंत्र
मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का अपनी सुविधा से जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।
1. एकादशी व्रत संकल्प मंत्र
अद्य स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः। श्वो भोक्ष्ये पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत॥
अर्थ: हे कमल-नयन (पुंडरीकाक्ष) भगवान, आज मैं सब भोगों को त्यागकर निराहार रहूँगा और कल भोजन करूँगा। हे अच्युत, आप मेरी शरण बनें। इंदिरा एकादशी की कथा में नारद जी इसी भाव से संकल्प लेने को कहते हैं। वराह पुराण में इसी भाव का एक श्लोक थोड़े अलग शब्दों में मिलता है।
2. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: सब प्राणियों के भीतर बसने वाले भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमस्कार है। बारह अक्षरों का यह मंत्र हर एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम नारायण का मनन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें।
4. हरे कृष्ण महामंत्र
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
अर्थ: भगवान के पवित्र नामों का स्मरण, जिससे मन शुद्ध और शांत होता है। वैष्णव परंपरा में एकादशी पर इसका जप विशेष रूप से किया जाता है।
इंदिरा एकादशी के लिए अलग से कोई प्रसिद्ध “विशेष मंत्र” प्रामाणिक स्रोतों में नहीं मिलता। पितरों के लिए अलग मंत्र जानना हो, तो अपने कुल-पुरोहित से पूछें, क्योंकि श्राद्ध के मंत्र परिवार और गोत्र के अनुसार बोले जाते हैं।
इंदिरा एकादशी और पितृ पक्ष का संबंध
पितृ पक्ष, जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं, भाद्रपद पूर्णिमा या उसके अगले दिन (प्रतिपदा) से आश्विन अमावस्या (सर्व पितृ अमावस्या) तक का लगभग पंद्रह दिनों का समय है। इन दिनों में लोग अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और दान करते हैं। इंदिरा एकादशी इसी पखवाड़े की एकादशी है।
पितृ पक्ष की एकमात्र एकादशी
एक पक्ष में एक ही एकादशी आती है, इसलिए पितृ पक्ष में केवल यही एकादशी पड़ती है। श्राद्ध पितरों की तृप्ति के लिए किया जाता है और एकादशी भगवान विष्णु की भक्ति के लिए। इंदिरा एकादशी में ये दोनों धाराएँ मिल जाती हैं, क्योंकि इसकी कथा में ही श्राद्ध और व्रत दोनों का विधान है।
व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित करना
राजा इंद्रसेन ने व्रत का पुण्य अपने पिता को अर्पित किया था। इसी आधार पर आज भी भक्त संकल्प के समय या पारण से पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं कि इस व्रत का पुण्य उनके पितरों को मिले। इसके लिए कोई कठिन विधि ज़रूरी नहीं है; सच्चे मन से हाथ जोड़कर अपने पूर्वजों का नाम लेकर प्रार्थना करना ही पर्याप्त माना जाता है।
श्राद्ध और इंदिरा एकादशी व्रत में अंतर
श्राद्ध पितरों के निमित्त किया जाने वाला कर्म है, जिसमें तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और दान होता है। इंदिरा एकादशी व्रत भगवान विष्णु की उपासना है, जिसमें संयम, पूजा और उपवास होता है। दोनों का उद्देश्य अलग है, इसलिए जिसने श्राद्ध कर लिया है, वह भी यह व्रत रख सकता है, और जो व्रत रख रहा है, वह अपने परिवार की तिथि पर श्राद्ध भी कर सकता है।
एकादशी श्राद्ध: किनका किया जाता है और कैसे करें
पितृ पक्ष में हर तिथि का अपना श्राद्ध होता है। एकादशी श्राद्ध (जिसे ग्यारस श्राद्ध भी कहते हैं) उन परिजनों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी महीने के शुक्ल या कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो। पितृ पक्ष में यह श्राद्ध प्रायः इंदिरा एकादशी के दिन या उसके आसपास पड़ता है; सही दिन अपने पंचांग में देखें।
श्राद्ध का समय
पंचांगों के अनुसार पितृ पक्ष के श्राद्ध दोपहर में किए जाते हैं। इसके लिए कुतुप मुहूर्त, रौहिण मुहूर्त और उसके बाद अपराह्न काल को उपयुक्त माना जाता है। श्राद्ध सुबह जल्दी या सूर्यास्त के बाद नहीं किया जाता। अपने शहर का मुहूर्त आज का पंचांग में देख सकते हैं।
एकादशी श्राद्ध की सामान्य विधि
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और पूजा स्थान को साफ़ करें।
- दक्षिण दिशा की ओर मुख करके कुश, काले तिल, जौ और जल से पितरों का तर्पण करें।
- परिवार की परंपरा हो तो पिंडदान करें।
- गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन का अंश निकालें। कई परिवार चींटियों के लिए भी अंश रखते हैं।
- ब्राह्मण को भोजन कराएँ और वस्त्र तथा दक्षिणा दें, या किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ।
- अपनी सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
एकादशी के दिन श्राद्ध का भोजन: अन्न या फलाहार?
यह सबसे अधिक पूछा जाने वाला प्रश्न है। इंदिरा एकादशी की कथा में नारद जी ब्राह्मणों को फलाहार (अन्न-रहित भोजन) कराने को कहते हैं, और पिंड को स्वयं खाने के बजाय सूँघकर गाय को देने को कहते हैं। इसी कारण कई परिवार एकादशी के दिन पड़ने वाले श्राद्ध में फलाहारी भोजन बनाते हैं।
दूसरी ओर, कई परिवारों में श्राद्ध का पारंपरिक भोजन ही बनता है और व्रती स्वयं उसे नहीं खाता। इस विषय में अलग-अलग क्षेत्रों और कुलों की अलग परंपराएँ हैं, इसलिए अपने कुल-पुरोहित या घर के बड़ों की बताई रीति का पालन करें। व्रत रखने वाला व्यक्ति अपना व्रत पारण तक बनाए रखे।
श्राद्ध कौन कर सकता है
परंपरागत रूप से श्राद्ध सबसे बड़ा पुत्र या परिवार का कोई पुरुष सदस्य करता है, पर जहाँ ऐसा संभव न हो, वहाँ परिवार की परंपरा के अनुसार कोई दूसरा ज़िम्मेदार सदस्य भी करता है। इंदिरा एकादशी का व्रत रखने के लिए ऐसी कोई शर्त नहीं है; परिवार का कोई भी सदस्य श्रद्धा से यह व्रत रख सकता है।
राजा इंद्रसेन की कथा से क्या सीखें
- पूर्वजों की चिंता: सब सुख होते हुए भी राजा ने पिता का संदेश सुनते ही सब कुछ छोड़कर उनकी सहायता का निश्चय किया।
- संत की बात पर विश्वास: राजा ने नारद जी से पूरी विधि पूछी और उसे ठीक वैसे ही निभाया। आज भी किसी अनुष्ठान से पहले जानकार से सलाह लेना अच्छा है।
- परिवार के साथ भक्ति: राजा ने यह व्रत अकेले नहीं, पूरे परिवार और सेवकों के साथ किया। पितरों की स्मृति पूरे परिवार को जोड़ती है।
- संकल्प न तोड़ें: पिता की कथा बताती है कि लिया हुआ व्रत या वचन हल्के में न लें। यदि कभी भूल हो जाए, तो क्षमा माँगकर फिर से श्रद्धा से प्रयास करें।
इंदिरा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
एकादशी व्रत का मूल नियम है कि इस दिन अन्न, विशेषकर चावल, नहीं खाया जाता। व्रत का प्रकार आप अपनी सेहत और सामर्थ्य के अनुसार चुन सकते हैं।
क्या खा सकते हैं
- मौसमी फल, जैसे केला, सेब, पपीता, अनार
- दूध, दही, छाछ और पनीर
- सूखे मेवे, जैसे बादाम, किशमिश, अखरोट
- साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा (परिवार की परंपरा के अनुसार)
- आलू, शकरकंद और लौकी जैसी सब्ज़ियाँ (कई परंपराओं में मान्य)
- सामान्य नमक के बजाय सेंधा नमक
- पानी, नारियल पानी और फलों का रस
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़
- गेहूँ, दालें, मक्का और अन्य अनाज
- प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन
- मांस, मछली, अंडा और मदिरा
- तंबाकू और अन्य नशीले पदार्थ
- दूसरों के घर बना श्राद्ध का अन्न-भोजन (व्रत के दिन)
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है और पारण तक कुछ नहीं लिया जाता। कथा में “निराहार” रहने की बात है, पर आज के समय में निर्जला व्रत केवल वही रखें जिनका स्वास्थ्य इसकी अनुमति दे।
फलाहार व्रत
सबसे अधिक लोग फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें फल, दूध, मेवे और व्रत में मान्य चीज़ें ली जाती हैं, पर अन्न नहीं। यह व्रत शरीर को ऊर्जा देते हुए संयम बनाए रखता है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरा उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार व्रत में मान्य सात्त्विक भोजन कर सकते हैं। इसमें भी अन्न और चावल नहीं लिए जाते।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग, गर्भावस्था, स्तनपान, बढ़ती उम्र या नियमित दवा लेने की स्थिति में कठोर या निर्जला व्रत से पहले अपने डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। ऐसी स्थिति में फलाहार, एक समय भोजन या केवल पूजा और नाम-जप भी पूरी श्रद्धा का व्रत है।
इंदिरा एकादशी पारण कब और कैसे करें
एकादशी व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में खोला जाता है, इसे पारण कहते हैं। पारण का सही समय आपके शहर के सूर्योदय और द्वादशी तिथि पर निर्भर करता है। अपने शहर का सटीक पारण समय ऊपर दी गई तालिका में देखें।
- द्वादशी में पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना अच्छा नहीं माना जाता।
- हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरि वासर समाप्त होने का इंतज़ार करें।
- प्रातःकाल सबसे अच्छा: पारण के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है।
- स्मार्त और वैष्णव: जिन वर्षों में एकादशी दो दिन होती है, स्मार्त (गृहस्थ) पहले दिन और वैष्णव (संन्यासी, इस्कॉन आदि की परंपरा में) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार दिन चुनें; तालिका में दोनों दिखाई देते हैं।
पारण कैसे करें
- द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें।
- मन में प्रार्थना करें कि इस व्रत का पुण्य आपके पितरों को मिले।
- ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ, या उनके लिए भोजन और दक्षिणा अलग रख दें।
- भगवान को लगाए भोग का प्रसाद, तुलसी दल या जल लेकर व्रत खोलें।
- पहले हल्का और सात्त्विक भोजन लें। कथा के अनुसार परिवार के साथ मौन रहकर भोजन करना शुभ माना गया है।
इंदिरा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- भगवान विष्णु और शालिग्राम की पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें।
- इंदिरा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- पितरों का नाम लेकर तर्पण करें या कम से कम उन्हें श्रद्धा से याद करें।
- गाय, कौवे, कुत्ते और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ।
- अपनी सामर्थ्य से अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
- दिन भर नाम-जप, भजन और सत्संग में मन लगाएँ।
- घर के बड़ों का सम्मान करें और उनका आशीर्वाद लें।
- समय पर, सही विधि से पारण करें।
क्या न करें
- चावल, अनाज, प्याज़, लहसुन और मांसाहार का सेवन न करें।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए एक दिन पहले तोड़कर रखें।
- क्रोध, झूठ, निंदा और कठोर वचन से बचें।
- दिन में सोने से बचें, जहाँ तक संभव हो।
- पितृ पक्ष के भाव के अनुसार इन दिनों भोग-विलास और उत्सवों से दूर रहें।
- किसी भिखारी, पशु या अतिथि का अपमान न करें।
- हरि वासर में या द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न करें।
इंदिरा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: इंदिरा एकादशी का व्रत रखने से पितरों को निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
सच्चाई: पितरों की सद्गति इस व्रत से जुड़ी एक गहरी धार्मिक मान्यता है, जो कथा और पुराणों की परंपरा पर आधारित है। इसे श्रद्धा का विषय समझें, कोई गारंटी नहीं। परलोक के बारे में कोई भी दावा आस्था पर टिका होता है, और यही आस्था इस व्रत को अर्थ देती है।
मिथक: पितृ पक्ष श्राद्ध का समय है, इसलिए इन दिनों एकादशी का व्रत नहीं रखना चाहिए।
सच्चाई: इंदिरा एकादशी की कथा में ही दशमी के श्राद्ध, एकादशी के व्रत और द्वादशी के ब्राह्मण भोजन का विधान है। परंपरा में श्राद्ध और एकादशी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि साथ चलने वाले माने गए हैं।
मिथक: यह व्रत केवल पुत्र ही रख सकता है, बेटी या पत्नी के व्रत का फल पितरों को नहीं मिलता।
सच्चाई: कथा में पुत्र ने व्रत किया, पर एकादशी व्रत रखने के लिए कोई लिंग या रिश्ते की शर्त नहीं है। स्त्री, पुरुष, बेटी, बहू या कोई भी भक्त श्रद्धा से यह व्रत रखकर पुण्य पितरों को अर्पित कर सकता है। श्राद्ध कर्म कौन करे, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर है।
मिथक: जिसने पितृ पक्ष में श्राद्ध कर दिया, उसे इंदिरा एकादशी का व्रत रखने की ज़रूरत नहीं।
सच्चाई: श्राद्ध और एकादशी व्रत के उद्देश्य अलग हैं। श्राद्ध पितरों की तृप्ति का कर्म है और एकादशी भगवान विष्णु की उपासना। दोनों अलग-अलग रखे जा सकते हैं, और दोनों साथ करना भी परंपरा के अनुकूल है।
मिथक: इंदिरा एकादशी का व्रत न रखा, तो पितर नाराज़ होकर परिवार को कष्ट देंगे।
सच्चाई: पितरों को परिवार का हितैषी माना गया है, सज़ा देने वाला नहीं। व्रत डर से नहीं, प्रेम और कृतज्ञता से किया जाता है। यदि आप व्रत नहीं रख सकते, तो पितरों का स्मरण, तर्पण, दान या कथा-श्रवण भी श्रद्धा का ही रूप है। “पितृ दोष” के नाम पर डराने वाली बातों से सावधान रहें।
मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो इंदिरा एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।
सच्चाई: शास्त्रों में अपनी क्षमता के अनुसार व्रत करने की बात कही गई है। फलाहार और एक समय भोजन भी मान्य व्रत हैं। बीमार, गर्भवती, बुज़ुर्ग या दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से हल्का व्रत रखें; भाव ही सबसे बड़ा है।
मिथक: गलती से व्रत टूट गया, तो पितरों को मिलने वाला सारा पुण्य नष्ट हो जाता है।
सच्चाई: अनजाने में हुई भूल पर मन में अपराध-बोध न रखें। भगवान से क्षमा माँगें, बाकी दिन संयम से बिताएँ और अगली एकादशी पर फिर श्रद्धा से व्रत करें। भक्ति परंपरा में मन का सच्चा भाव नियमों से भी बड़ा माना गया है।
इंदिरा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे दिए लाभ परंपरा और कथाओं में बताई गई मान्यताएँ हैं। इन्हें श्रद्धा से समझें, किसी परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।
- पितरों की सद्गति: मान्यता है कि इस व्रत का पुण्य कष्ट में पड़े पितरों को शांति और ऊँचे लोक की ओर ले जाता है।
- पापों का क्षय: कथा के अनुसार यह व्रत जाने-अनजाने हुए पापों को कम करता है।
- पितरों का आशीर्वाद: माना जाता है कि प्रसन्न पितरों का आशीर्वाद परिवार में सुख, शांति और वंश की उन्नति लाता है।
- मन की शांति: उपवास, जप और ध्यान से मन शांत होता है और पूर्वजों से जुड़ाव का भाव गहरा होता है।
- कथा श्रवण का पुण्य: परंपरा में कहा गया है कि इसकी कथा पढ़ने या सुनने से भी बड़ा पुण्य मिलता है।
- विष्णु भक्ति: मान्यता है कि यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा और अंत में परम धाम की ओर ले जाता है।
संबंधित एकादशी और पाठ
इंदिरा एकादशी से पहले भाद्रपद शुक्ल पक्ष में परिवर्तिनी एकादशी आती है, जब चातुर्मास में भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष में, पितृ पक्ष और नवरात्रि के बाद, पापांकुशा एकादशी आती है। साल की सभी एकादशियों की तारीख और सूची के लिए हमारा एकादशी कब है पेज देखें।
पूजा के समय ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती गा सकते हैं। पितृ पक्ष की तिथियों और श्राद्ध मुहूर्त के लिए आज का पंचांग और सभी आरतियों के लिए आरती संग्रह PDF देखें।
इंदिरा एकादशी हमें याद दिलाती है कि हमारी जड़ें हमारे पूर्वजों में हैं, और उनके प्रति कृतज्ञता भी भक्ति का ही एक रूप है। राजा इंद्रसेन की तरह प्रेम और श्रद्धा से अपने पितरों को याद करें, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार यह व्रत करें। भगवान हृषीकेश आपके पितरों को शांति दें और आपके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
इंदिरा एकादशी 2027 कब है?
इंदिरा एकादशी 2026 (6 अक्टूबर) बीत चुकी है। 2027 की तारीख, एकादशी तिथि और पारण समय इस पेज के ऊपर दिए संक्षिप्त उत्तर और शहर-वार तारीख तालिका में देखें।
इंदिरा एकादशी किस महीने में आती है?
यह पूर्णिमांत (उत्तर भारत) पंचांग में आश्विन कृष्ण पक्ष की और अमांत पंचांग में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी है। दोनों में तारीख एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। यह प्रायः सितंबर के अंत या अक्टूबर की शुरुआत में आती है।
इंदिरा एकादशी को पितृ पक्ष की एकादशी क्यों कहते हैं?
क्योंकि यह पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) के बीच आने वाली एकमात्र एकादशी है। इसकी कथा में भी श्राद्ध और व्रत दोनों का विधान है, इसलिए इसे पितरों की एकादशी माना जाता है।
इंदिरा एकादशी का नाम इंदिरा क्यों है?
संस्कृत में इंदिरा माता लक्ष्मी का नाम है, इसलिए एक व्याख्या यह है कि यह एकादशी लक्ष्मी-नारायण की कृपा देने वाली है। कथा में नाम का अलग से कारण नहीं बताया गया, इसलिए इसे परंपरागत व्याख्या ही समझें।
इंदिरा एकादशी की व्रत कथा क्या है?
सतयुग में माहिष्मती के राजा इंद्रसेन को नारद जी ने बताया कि उनके पिता एकादशी व्रत भंग होने के कारण यमलोक में हैं। नारद जी की बताई विधि से राजा ने इंदिरा एकादशी का व्रत किया और उसका पुण्य पिता को दिया, जिससे परंपरा के अनुसार पिता को विष्णु लोक मिला।
इंदिरा एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु की, विशेष रूप से उनके हृषीकेश रूप और शालिग्राम शिला की पूजा की जाती है। साथ ही पितरों का स्मरण और तर्पण भी किया जाता है।
इंदिरा एकादशी किस पुराण में है?
परंपरा के अनुसार इसका माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ा माना जाता है। कुछ स्रोत पद्म पुराण और कुछ भविष्य पुराण का उल्लेख करते हैं।
एकादशी श्राद्ध किसका किया जाता है?
एकादशी श्राद्ध (ग्यारस श्राद्ध) उन परिजनों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो। पितृ पक्ष में यह प्रायः इंदिरा एकादशी के आसपास पड़ता है; सही दिन अपने पंचांग में देखें।
क्या एकादशी के दिन श्राद्ध में चावल या अन्न बना सकते हैं?
इस पर परिवारों की परंपराएँ अलग हैं। कथा में ब्राह्मणों को फलाहार कराने की बात है, इसलिए कई परिवार फलाहारी श्राद्ध भोजन बनाते हैं, जबकि कुछ सामान्य श्राद्ध भोजन बनाते हैं और व्रती उसे नहीं खाता। अपने कुल-पुरोहित या बड़ों की रीति मानें।
श्राद्ध कर लिया तो क्या इंदिरा एकादशी का व्रत भी रखना चाहिए?
हाँ, रख सकते हैं। श्राद्ध पितरों के लिए किया जाने वाला कर्म है और एकादशी भगवान विष्णु की उपासना, इसलिए दोनों अलग हैं और साथ किए जा सकते हैं।
क्या इंदिरा एकादशी में पानी पी सकते हैं?
हाँ, जो निर्जला व्रत नहीं रख रहे, वे पानी, नारियल पानी, दूध और फलों का रस ले सकते हैं। निर्जला व्रत केवल वही रखें जिनका स्वास्थ्य अनुमति दे।
क्या इंदिरा एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी पर चावल और अन्य अनाज नहीं खाए जाते। फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू और सिंघाड़ा जैसी व्रत की चीज़ें ली जा सकती हैं।
इंदिरा एकादशी का पारण कब करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी बीतने से पहले किया जाता है। अपने शहर का सटीक पारण समय इस पेज की तालिका में देखें।
स्मार्त और वैष्णव इंदिरा एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो दिन पड़ती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) पहले दिन और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। जिस साल दोनों एक ही दिन हों, सब एक साथ व्रत रखते हैं; तालिका में दोनों दिन दिखते हैं।
इंदिरा एकादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” सबसे प्रचलित मंत्र है। विष्णु गायत्री मंत्र, हरे कृष्ण महामंत्र और कथा में बताए भाव वाला संकल्प मंत्र “अद्य स्थित्वा निराहारः…” भी बोला जाता है।
क्या महिलाएँ और बेटियाँ इंदिरा एकादशी का व्रत रख सकती हैं?
हाँ, एकादशी व्रत कोई भी भक्त रख सकता है और उसका पुण्य पितरों को अर्पित कर सकता है। श्राद्ध कर्म कौन करे, यह परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है।
क्या गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग या बीमार लोग यह व्रत रख सकते हैं?
ऐसे लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें और कठोर या निर्जला व्रत से बचें। फलाहार, एक समय भोजन या केवल पूजा, जप और पितरों का स्मरण भी श्रद्धा का व्रत है।
गलती से इंदिरा एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, बाकी दिन संयम से बिताएँ, जप करें और अगली एकादशी पर फिर श्रद्धा से व्रत रखें।
इंदिरा एकादशी के बाद कौन-सी एकादशी आती है?
इसके बाद आश्विन शुक्ल पक्ष में पापांकुशा एकादशी आती है, और इससे पहले भाद्रपद शुक्ल पक्ष की परिवर्तिनी एकादशी आती है।