उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) वह पावन तिथि है जिस दिन, परंपरा के अनुसार, भगवान विष्णु के शरीर से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर नाम के दैत्य का वध किया। भगवान ने उन्हें “एकादशी” नाम दिया। इसीलिए इस दिन को एकादशी माता का प्राकट्य दिवस, यानी एकादशी का जन्मदिन भी माना जाता है।
यह एकादशी मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्ण पक्ष में आती है। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में इसे मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी कहते हैं, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में यही तिथि कार्तिक कृष्ण एकादशी कहलाती है। तारीख एक ही रहती है, केवल महीने का नाम बदलता है।
जो भक्त साल भर की एकादशी का व्रत शुरू करना चाहते हैं, उनमें से बहुत से लोग उत्पन्ना एकादशी से ही आरंभ करते हैं, क्योंकि यही वह दिन है जब एकादशी देवी प्रकट हुईं। इस लेख में आप उत्पन्ना एकादशी 2026 की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, नियम और व्रत आरंभ करने का सही तरीका जानेंगे।
उत्पन्ना एकादशी कब है? 2026 की तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: 2026 में उत्पन्ना एकादशी का व्रत शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 3 दिसंबर रात 11:03 बजे से 4 दिसंबर रात 11:44 बजे तक है, और पारण 5 दिसंबर 2026 को (नई दिल्ली में लगभग सुबह 6:59 से 9:04 बजे के बीच) किया जाएगा।
अगली उत्पन्ना एकादशी
उत्पन्ना एकादशी 2026
4 दिसंबर 2026, शुक्रवार 33 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- मार्गशीर्ष कृष्ण
- एकादशी तिथि
- 3 दिसं 23:05 – 4 दिसं 23:46
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 5 दिसं, 06:59 – 09:04
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 4 दिसंबर 2026, शुक्रवार | 3 दिसं 23:05 – 4 दिसं 23:46 | 5 दिसं, 06:59 – 09:04 |
| 2027 | 24 नवंबर 2027, बुधवार | 23 नवं 13:46 – 24 नवं 12:13 | 25 नवं, 06:51 – 08:57 |
| 2028 | 13 नवंबर 2028, सोमवार | 12 नवं 09:32 – 13 नवं 06:43 | 14 नवं, 06:43 – 08:52 |
| 2029 | 2 दिसंबर 2029, रविवार | 1 दिसं 12:41 – 2 दिसं 09:53 | 3 दिसं, 06:57 – 09:03 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पारण का समय भी थोड़ा बदल सकता है। आने वाले वर्षों की तारीख के लिए हमेशा ऊपर की तालिका ही देखें।
स्मार्त और वैष्णव व्रत: जब एकादशी तिथि दो दिनों में बँटती है, तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। 2026 में उत्पन्ना एकादशी पर दोनों परंपराओं का व्रत एक ही दिन, 4 दिसंबर को है।
उत्पन्ना एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“उत्पन्ना” शब्द का अर्थ है “जो उत्पन्न हुई” या “जिसका जन्म हुआ”। यह नाम सीधे उस कथा से जुड़ा है जिसमें भगवान विष्णु के शरीर से एक कन्या उत्पन्न हुई। उस कन्या का नाम ही एकादशी पड़ा, और जिस तिथि पर वह प्रकट हुईं, वह “उत्पन्ना एकादशी” कहलाई।
इस एकादशी के कुछ और नाम भी प्रचलित हैं:
- उत्पत्ति एकादशी (Utpatti Ekadashi) — गुजरात और स्वामीनारायण परंपरा में यही नाम अधिक चलता है।
- उत्पत्तिका एकादशी — कुछ ग्रंथों और वैष्णव पंचांगों में।
- मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी / अगहन बदी एकादशी — उत्तर भारत में तिथि के आधार पर।
- कार्तिक कृष्ण एकादशी — अमांत पंचांग (महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि) में।
- एकादशी माता का जन्मदिवस — लोक-परंपरा में।
| पंचांग | महीना और पक्ष | किन क्षेत्रों में प्रचलित |
|---|---|---|
| पूर्णिमांत (उत्तर भारत) | मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष एकादशी | उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा |
| अमांत (दक्षिण/पश्चिम भारत) | कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी | गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना |
उत्तर भारत के क्रम में यह देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी के बाद आने वाली पहली एकादशी है, और इसके बाद मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में मोक्षदा एकादशी आती है, जिस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है।
उत्पन्ना एकादशी का महत्व
हर महीने दो एकादशी आती हैं और सबका अपना महत्व है, लेकिन उत्पन्ना एकादशी को एक विशेष स्थान मिला हुआ है। कारण सरल है — यह सब एकादशियों की “मूल” मानी जाती है। जिस शक्ति के नाम पर पूरे वर्ष की चौबीस (अधिक मास होने पर छब्बीस) एकादशियाँ मनाई जाती हैं, उसी शक्ति का प्राकट्य इस दिन हुआ।
धार्मिक महत्व
परंपरा के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु के साथ एकादशी देवी की पूजा करने से पापों का क्षय होता है और मन शुद्ध होता है। कथा में स्वयं भगवान विष्णु एकादशी देवी को वरदान देते हैं कि जो भी इस तिथि पर श्रद्धा से व्रत करेगा, उसे उनकी कृपा प्राप्त होगी। इसीलिए वैष्णव भक्त इस दिन को बहुत आदर के साथ मनाते हैं।
कथा में यह भी कहा गया है कि इस व्रत का पुण्य कई तीर्थों के स्नान और दान के बराबर है। कुछ कथाओं में इसे शंखोद्धार तीर्थ में स्नान करके भगवान के दर्शन करने जैसा फल देने वाला बताया गया है। इन बातों को आस्था और श्रद्धा की भाषा में समझना चाहिए — इनका उद्देश्य भक्त के मन में व्रत के प्रति प्रेम और निष्ठा जगाना है।
आध्यात्मिक संदेश
उत्पन्ना एकादशी की कथा का गहरा संदेश यह है कि जब हम थककर “सो जाते हैं”, यानी जब हमारी जागरूकता कम हो जाती है, तब भीतर के दोष (मुर दैत्य) हम पर हमला करते हैं। ऐसे समय में भगवान की दी हुई आंतरिक शक्ति — संयम, व्रत और भक्ति — हमारी रक्षा करती है। एकादशी देवी इसी संयम-शक्ति का प्रतीक हैं।
“एकादश” का अर्थ है ग्यारह। परंपरा में इसे पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और एक मन — इन ग्यारह को साधने से जोड़ा जाता है। इस दृष्टि से एकादशी का व्रत केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि इंद्रियों और मन पर थोड़ा-सा नियंत्रण सीखने का अभ्यास है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार उत्पन्ना एकादशी की कथा भविष्योत्तर पुराण (भविष्य पुराण का उत्तर भाग) में मिलती है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को एकादशी की उत्पत्ति और उसकी महिमा बताते हैं। कुछ कथा-संग्रहों में यही संवाद श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच बताया गया है। एकादशी माहात्म्य की कथाएँ पद्म पुराण से जुड़ी परंपराओं में भी सुनाई जाती हैं।
अलग-अलग क्षेत्रों में कथा के छोटे-छोटे विवरण (जैसे युद्ध कितने वर्ष चला) थोड़े भिन्न मिलते हैं, लेकिन मूल कथा — मुर दैत्य, बदरिकाश्रम की गुफा, भगवान की योगनिद्रा और देवी का प्राकट्य — सभी परंपराओं में एक जैसी है।
उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा
एक बार अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन, एकादशी के व्रत की इतनी महिमा क्यों है? यह तिथि कैसे उत्पन्न हुई और इसका व्रत करने की विधि क्या है?” तब भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी की यह कथा सुनाई।
सतयुग में मुर नाम का एक अत्यंत बलवान और भयंकर दैत्य था। वह नाड़ीजंघ नामक दैत्य का पुत्र था और चंद्रावती नाम की नगरी में रहता था। अपने बल के घमंड में मुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया और इंद्र सहित सभी देवताओं को पराजित करके स्वर्ग से निकाल दिया। उसने इंद्र, अग्नि, वरुण, यम, वायु और चंद्रमा जैसे देवताओं के स्थानों पर अपने दैत्यों को बैठा दिया।
स्वर्ग छिन जाने के बाद दुखी देवता मृत्युलोक में भटकने लगे। तब देवराज इंद्र सभी देवताओं को लेकर भगवान शंकर के पास गए और अपना दुख सुनाया। भगवान शिव ने कहा, “हे देवेंद्र, तुम सब तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु की शरण में जाओ। वही तुम्हारा कष्ट दूर करेंगे।”
शिवजी की आज्ञा मानकर देवता क्षीरसागर पहुँचे, जहाँ भगवान विष्णु शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में लीन थे। देवताओं ने हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की और कहा, “हे प्रभु, मुर नाम के दैत्य ने हमें स्वर्ग से निकाल दिया है। हम आपकी शरण में आए हैं, हमारी रक्षा कीजिए।”
भगवान विष्णु ने पूछा कि वह दैत्य कौन है और कहाँ रहता है। इंद्र ने मुर, उसके पिता नाड़ीजंघ और उसकी नगरी चंद्रावती के बारे में बताया। भगवान ने देवताओं को आश्वासन दिया और उनके साथ चंद्रावती नगरी की ओर चल पड़े।
चंद्रावती पहुँचते ही मुर की विशाल सेना से युद्ध शुरू हो गया। दैत्यों की संख्या इतनी अधिक थी कि देवता डरकर भागने लगे। तब भगवान विष्णु ने स्वयं मोर्चा संभाला। उनके बाणों, सुदर्शन चक्र और गदा से असंख्य दैत्य मारे गए, पर मुर अकेला डटा रहा। भगवान जो भी अस्त्र चलाते, मुर पर उसका पूरा असर नहीं होता था।
अस्त्र-शस्त्रों के बाद दोनों में बाहु-युद्ध (मल्लयुद्ध) होने लगा। कथा के अनुसार यह युद्ध हजारों वर्षों तक चलता रहा। अधिकतर कथाओं में इसे दस हजार वर्ष बताया गया है, जबकि कुछ संस्करणों में एक हजार वर्ष का उल्लेख है। इतने लंबे युद्ध के बाद भी मुर पराजित नहीं हुआ।
युद्ध से थककर भगवान विष्णु विश्राम के लिए बदरिकाश्रम चले गए। वहाँ हेमवती नाम की एक सुंदर गुफा थी, जिसका केवल एक ही द्वार था। भगवान उस गुफा में जाकर योगनिद्रा में लेट गए।
मुर भगवान का पीछा करते हुए वहाँ भी पहुँच गया। भगवान को सोया हुआ देखकर उसने सोचा कि यही सबसे अच्छा अवसर है, और वह उन्हें मारने के लिए आगे बढ़ा। उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी और सुंदर कन्या प्रकट हुई। वह दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी।
उस देवी ने मुर को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। देवी ने मुर के अस्त्र-शस्त्र और रथ नष्ट कर दिए, और अंत में उसका सिर काटकर उसका वध कर दिया। मुर के मरते ही बाकी दैत्य भयभीत होकर पाताल लोक भाग गए।
जब भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागे, तो उन्होंने मुर को मरा हुआ और सामने एक तेजस्वी कन्या को हाथ जोड़े खड़ा देखा। भगवान ने आश्चर्य से पूछा, “इस बलवान दैत्य को किसने मारा?” कन्या ने विनम्रता से उत्तर दिया, “हे प्रभु, मैं आपके ही शरीर से उत्पन्न हुई हूँ। यह दुष्ट आपको सोते हुए मारना चाहता था, इसलिए मैंने इसका वध किया।”
भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए और बोले, “हे कल्याणी, तुमने देवताओं और तीनों लोकों का बड़ा उपकार किया है। तुम जो चाहो, वर माँग लो।” देवी ने कहा, “हे प्रभु, यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दीजिए कि जो भी मनुष्य मेरे दिन उपवास करे, उसके पाप नष्ट हों और उसे आपकी कृपा तथा वैकुंठ की प्राप्ति हो। जो व्रत के दिन केवल एक समय भोजन करे, उसे भी धन-धान्य और पुण्य मिले।”
भगवान ने प्रसन्न होकर कहा, “ऐसा ही होगा। तुम ग्यारहवीं तिथि (एकादशी) को उत्पन्न हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम एकादशी होगा। जो मेरे भक्त हैं, वे तुम्हारे भी भक्त होंगे। सभी तिथियों में तुम मुझे सबसे प्रिय रहोगी, और तुम्हारे व्रत का पुण्य सब तीर्थों से बढ़कर होगा।” यह कहकर भगवान अंतर्धान हो गए।
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, “हे पार्थ, उसी दिन से एकादशी का व्रत संसार में प्रचलित हुआ। जो व्यक्ति श्रद्धा से इस व्रत को करता है और यह कथा सुनता या सुनाता है, परंपरा के अनुसार उसके पाप नष्ट होते हैं और वह भगवान विष्णु का प्रिय बनता है।”
बोलिए एकादशी माता की जय! बोलिए श्री हरि विष्णु भगवान की जय!
देवी एकादशी का प्राकट्य और मुर दैत्य की कथा का अर्थ
उत्पन्ना एकादशी की कथा सुनने के बाद बहुत से लोग पूछते हैं कि इसका भाव क्या है। संतों और कथावाचकों ने इस कथा के कई सुंदर अर्थ बताए हैं। इन्हें आस्था के साथ-साथ जीवन की सीख के रूप में भी देखा जा सकता है।
- मुर दैत्य — कई संत इसे मन की उन बुराइयों का प्रतीक मानते हैं जो बार-बार लौटकर आती हैं, जैसे लोभ, क्रोध, आलस्य और अहंकार। ऐसी बुराइयाँ लंबे “युद्ध” के बाद भी आसानी से नहीं हारतीं।
- भगवान का विश्राम — जब साधक थक जाता है या असावधान हो जाता है, तब यही बुराइयाँ सबसे ज़्यादा हमला करती हैं।
- देवी एकादशी — भगवान के भीतर से निकली शक्ति, यानी व्रत, संयम और भक्ति। यही शक्ति कठिन समय में साधक की रक्षा करती है।
- हेमवती गुफा का एक द्वार — कुछ कथावाचक इसे एकाग्र मन से जोड़ते हैं, जहाँ प्रवेश का एक ही मार्ग है — भगवान का स्मरण।
इस कथा का एक सुंदर पक्ष यह भी है कि यहाँ एक देवी — स्त्री-शक्ति — ने वह कार्य किया जो हजारों वर्षों के युद्ध से नहीं हो पाया था। इसीलिए एकादशी को “एकादशी माता” कहकर भी पूजा जाता है, और कई घरों में इस दिन एकादशी माता की आरती विशेष रूप से गाई जाती है।
एकादशी व्रत आरंभ करने का दिन: उत्पन्ना एकादशी से व्रत क्यों शुरू करें
उत्तर भारत में एक बहुत पुरानी और प्रचलित परंपरा है कि जो व्यक्ति नियमित रूप से एकादशी व्रत शुरू करना चाहता है, वह उत्पन्ना एकादशी से आरंभ करे। इसके पीछे कुछ सीधे-सादे कारण हैं:
- यह एकादशी का प्राकट्य दिवस है — जिस दिन एकादशी देवी प्रकट हुईं, उसी दिन से उनका व्रत शुरू करना स्वाभाविक रूप से शुभ माना जाता है।
- कथा में व्रत का आरंभ यहीं से है — कथा के अंत में भगवान स्वयं कहते हैं कि इसी दिन से एकादशी व्रत संसार में प्रचलित हुआ।
- मौसम अनुकूल है — मार्गशीर्ष में ठंड की शुरुआत होती है, प्यास कम लगती है, इसलिए पहली बार व्रत करने वालों के लिए यह समय अपेक्षाकृत आसान रहता है।
- मार्गशीर्ष मास की पवित्रता — गीता में भगवान कहते हैं “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”, यानी महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। इस पवित्र मास में नया संकल्प लेना शुभ माना जाता है।
पहली बार एकादशी व्रत कैसे शुरू करें
- अपने परिवार के बड़ों, कुल-पुरोहित या गुरु से सलाह लें कि आपकी परंपरा में कौन-सा नियम (निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन) चलता है।
- दशमी की शाम से ही सात्विक भोजन करें और मन में तय करें कि आप कितनी एकादशी करेंगी/करेंगे — जैसे एक वर्ष की सभी 24 एकादशी, या केवल शुक्ल पक्ष की एकादशी।
- उत्पन्ना एकादशी की सुबह भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें।
- पहले वर्ष में अपनी क्षमता के अनुसार हल्का व्रत (फलाहार) रखें। शरीर को धीरे-धीरे आदत पड़ने दें।
- हर एकादशी पर उस एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें, और द्वादशी को सही समय पर पारण करें।
- संकल्प की अवधि पूरी होने पर (जैसे एक वर्ष बाद) परंपरा के अनुसार उद्यापन किया जाता है, जिसमें पूजा, हवन, ब्राह्मण भोजन और दान शामिल होते हैं। कई परिवार उद्यापन भी उत्पन्ना एकादशी या मोक्षदा एकादशी पर करते हैं।
ध्यान रखें, यह एक प्रचलित परंपरा है, कोई कठोर नियम नहीं। कुछ परिवार और संप्रदाय अपने गुरु के निर्देश पर किसी अन्य शुभ एकादशी से भी व्रत आरंभ करते हैं।
पहली एकादशी कौन-सी है?
यह प्रश्न बहुत खोजा जाता है और इसके दो उत्तर हैं। उत्पत्ति के आधार पर उत्पन्ना एकादशी को ही पहली एकादशी माना जाता है, क्योंकि इसी दिन एकादशी देवी प्रकट हुईं। हिंदू नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) से गिनती करें तो वर्ष की पहली एकादशी कामदा एकादशी (चैत्र शुक्ल) आती है। व्रत आरंभ करने की परंपरा में पहला अर्थ ही लिया जाता है।
उत्पन्ना एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
नीचे दी गई विधि सरल है और घर पर आसानी से की जा सकती है। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार इसमें बदलाव कर सकते हैं।
- दशमी की तैयारी: एकादशी से एक दिन पहले (दशमी) सूर्यास्त से पहले हल्का, सात्विक भोजन करें। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से बचें। रात में भगवान का स्मरण करते हुए सोएँ और मन में व्रत का भाव रखें।
- ब्रह्म मुहूर्त में जागरण: एकादशी की सुबह सूर्योदय से पहले उठें। स्नान करें; संभव हो तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें। स्वच्छ, हो सके तो पीले या सफेद वस्त्र पहनें।
- पूजा स्थान की तैयारी: घर के मंदिर को साफ करें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु (या श्रीकृष्ण, शालिग्राम) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। गंगाजल छिड़ककर स्थान को पवित्र करें।
- संकल्प: दाहिने हाथ में जल, अक्षत, फूल और थोड़ी दक्षिणा लेकर अपना नाम, गोत्र और स्थान बोलें, फिर कहें — “मैं आज उत्पन्ना एकादशी का व्रत भगवान विष्णु और एकादशी माता की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा से कर रहा/रही हूँ, प्रभु इसे निर्विघ्न पूर्ण करें।” फिर जल भूमि पर छोड़ दें।
- दीप और आवाहन: घी का दीपक जलाएँ। भगवान का ध्यान करें और उन्हें पूजा में आमंत्रित करें। एकादशी माता का भी मन में स्मरण करें।
- षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा: भगवान को जल या पंचामृत से स्नान कराएँ (प्रतिमा हो तो), फिर वस्त्र, चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। धूप-दीप दिखाएँ। तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी के दिन तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
- भोग: फल, मिठाई (बिना अनाज की), पंचामृत, मखाने की खीर या मौसमी फलों का भोग लगाएँ। हर भोग में तुलसी दल अवश्य रखें, क्योंकि परंपरा में तुलसी के बिना विष्णु भोग अधूरा माना जाता है।
- मंत्र जाप: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। विष्णु सहस्रनाम या श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ अध्याय पढ़ना भी उत्तम है।
- कथा पाठ: उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा स्वयं पढ़ें या परिवार के साथ बैठकर सुनें। परंपरा में कथा के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
- आरती: कथा के बाद ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती गाएँ।
- दिन भर का आचरण: दिन में सोने से बचें, कम बोलें, किसी की निंदा या झगड़ा न करें। जितना हो सके भगवान का नाम लें।
- संध्या पूजा: शाम को फिर से दीपक जलाएँ, तुलसी के पास दीपदान करें और भगवान की आरती करें।
- रात्रि जागरण (यदि संभव हो): रात में भजन-कीर्तन करें या भगवान की कथाएँ पढ़ें। पूरी रात जागना संभव न हो तो देर रात तक भजन करके सोएँ — स्वास्थ्य का ध्यान रखें।
- द्वादशी का पारण: अगले दिन सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें, किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन/दान दें, और फिर ऊपर दी गई तालिका में बताए गए पारण समय के भीतर व्रत खोलें। सबसे पहले तुलसी दल डला जल या चरणामृत लें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण की प्रतिमा, चित्र या शालिग्राम
- चौकी और पीला वस्त्र
- गंगाजल और साफ जल से भरा कलश
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखे हुए)
- पीले फूल और फूलों की माला
- चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत (साबुत चावल — केवल पूजा के लिए, खाने के लिए नहीं)
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, माचिस
- धूप या अगरबत्ती, कपूर
- मौसमी फल, केले, नारियल
- भोग के लिए मखाने, सूखे मेवे या बिना अनाज की मिठाई
- पान के पत्ते, सुपारी, लौंग, इलायची
- पीला वस्त्र या जनेऊ (भगवान को अर्पित करने के लिए)
- दक्षिणा और दान की सामग्री (अन्न, कंबल, गर्म कपड़े)
- व्रत कथा की पुस्तक और आरती संग्रह
आरतियाँ एक जगह पढ़ने के लिए आप हमारा आरती संग्रह PDF भी डाउनलोड कर सकते हैं।
उत्पन्ना एकादशी के मंत्र
इन मंत्रों का जाप तुलसी या चंदन की माला से, शांत मन से करें। उच्चारण साफ हो, यह संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है।
1. वासुदेव द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु) को नमन करता हूँ। यह एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाने वाला मंत्र है।
2. नारायण अष्टाक्षर मंत्र
ॐ नमो नारायणाय
अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। यह छोटा और सरल मंत्र दिन भर चलते-फिरते भी जपा जा सकता है।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम नारायण को जानें, वासुदेव का ध्यान करें; वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें।
4. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी, संसार के आधार, आकाश की तरह व्यापक और मेघ के समान श्याम हैं — लक्ष्मीपति, कमलनयन, योगियों के ध्यान में आने वाले, संसार का भय हरने वाले उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। यह मंत्र उत्पन्ना एकादशी की कथा से विशेष रूप से जुड़ता है, क्योंकि कथा में भगवान शेषशय्या और योगनिद्रा में ही दिखाई देते हैं।
5. श्रीकृष्ण प्रणाम मंत्र
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
अर्थ: श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा और शरणागतों के कष्ट मिटाने वाले गोविंद को बार-बार नमस्कार है। चूँकि यह कथा श्रीकृष्ण ने ही सुनाई थी, इसलिए कथा के बाद यह मंत्र बोलना सुंदर माना जाता है।
उत्पन्ना एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
एकादशी व्रत का सबसे प्रसिद्ध नियम है — अन्न (अनाज) न खाना, विशेषकर चावल। इसके अलावा आप अपनी क्षमता और परंपरा के अनुसार व्रत का प्रकार चुन सकते हैं।
| क्या खा सकते हैं (फलाहार) | क्या न खाएँ |
|---|---|
| सभी मौसमी फल, केला, सेब, पपीता, अनार | चावल और चावल से बनी चीज़ें |
| दूध, दही, छाछ, पनीर, मक्खन | गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा और उनका आटा |
| साबूदाना, मखाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, राजगिरा | दालें, चना, राजमा, सोयाबीन |
| आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला, लौकी, कद्दू | प्याज और लहसुन |
| मूँगफली, सूखे मेवे, नारियल | मांस, मछली, अंडा, शराब, तंबाकू |
| सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हरी मिर्च | साधारण (आयोडीन) नमक, हल्दी-हींग जैसे कई मसाले (परंपरा अनुसार) |
कुछ परिवारों में व्रत में बैंगन, गोभी जैसी कुछ सब्ज़ियाँ भी नहीं खाई जातीं, और इस्कॉन जैसी वैष्णव परंपराओं में फलाहार के नियम थोड़े अलग होते हैं। अपने घर की परंपरा का पालन करें।
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में सूर्योदय से अगले दिन पारण तक न भोजन किया जाता है, न जल पिया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है। इसे केवल वही करें जो पूरी तरह स्वस्थ हों और पहले से व्रत के अभ्यस्त हों। पहली बार व्रत शुरू कर रहे हों तो निर्जला से शुरुआत न करें।
फलाहार व्रत
यह सबसे प्रचलित तरीका है। इसमें अनाज छोड़कर फल, दूध और ऊपर बताई गई व्रत की चीज़ें ली जाती हैं। जल पीने की पूरी अनुमति रहती है। अधिकांश गृहस्थ इसी तरह व्रत रखते हैं, और पहली बार व्रत शुरू करने वालों के लिए यही सबसे उचित है।
एक समय भोजन (एकभुक्त) व्रत
इसमें दिन में केवल एक बार फलाहारी भोजन किया जाता है, बाकी समय केवल जल या दूध लिया जाता है। उत्पन्ना एकादशी की कथा में स्वयं एकादशी देवी वर माँगती हैं कि जो इस दिन केवल एक समय भोजन करे, उसे भी पुण्य मिले। इसलिए यह विकल्प भी पूरी तरह परंपरा-सम्मत है।
स्वास्थ्य संबंधी ज़रूरी सावधानी: मधुमेह (डायबिटीज़), ब्लड प्रेशर, हृदय या किडनी रोग के मरीज़, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे और जो लोग नियमित दवाइयाँ लेते हैं — वे निर्जला या लंबा उपवास रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। ऐसे लोग फलाहार या केवल अन्न-त्याग करके भी श्रद्धा से व्रत कर सकते हैं। दवाइयाँ बंद न करें।
उत्पन्ना एकादशी पारण कब और कैसे करें
एकादशी व्रत का पूरा फल तभी माना जाता है जब उसका पारण सही समय पर, सही तरीके से हो। पारण का अर्थ है व्रत खोलना। इसके मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
- पारण द्वादशी तिथि में ही करें: व्रत अगले दिन, सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले खोलना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना दोषपूर्ण माना जाता है।
- हरिवासर में पारण न करें: द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग “हरिवासर” कहलाता है। इस समय व्रत नहीं खोला जाता। हरिवासर समाप्त होने के बाद ही पारण करें।
- प्रातःकाल सबसे उत्तम: पारण के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है; यदि सुबह संभव न हो तो दोपहर के बाद करें।
- स्मार्त और वैष्णव: जिस वर्ष दोनों परंपराओं का व्रत अलग-अलग दिन हो, उस वर्ष पारण का दिन और समय भी अलग होगा। अपनी परंपरा के अनुसार ही पारण करें।
- शहर के अनुसार समय: पारण का समय सूर्योदय पर निर्भर है, इसलिए अपने शहर का समय ऊपर दी गई तालिका में देखें। रोज़ का पंचांग देखने के लिए हमारा दैनिक पंचांग भी उपयोगी है।
पारण की सरल विधि
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और दीपक जलाएँ।
- भगवान को भोग लगाएँ और व्रत पूरा होने के लिए धन्यवाद दें। अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा माँगें।
- किसी ब्राह्मण, गरीब या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या गर्म वस्त्र दान करें।
- सबसे पहले तुलसी दल डाला हुआ जल या चरणामृत ग्रहण करें।
- इसके बाद सात्विक भोजन करें। कई परिवारों में पारण चावल से किया जाता है, ताकि यह स्पष्ट हो जाए कि अन्न-त्याग का नियम पूरा हुआ।
- पारण के भोजन में भी प्याज, लहसुन और तामसिक चीज़ों से बचें।
उत्पन्ना एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- भगवान विष्णु के साथ एकादशी माता का भी स्मरण और पूजन करें।
- उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें और विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें।
- तुलसी के पास शाम को घी का दीपक जलाएँ।
- ठंड का मौसम है, इसलिए ज़रूरतमंदों को कंबल, गर्म कपड़े, अन्न या फल दान करें।
- दिन भर मन शांत रखें, मीठा और सच बोलें।
- अगर एकादशी व्रत शुरू करना चाहते हैं, तो आज ही संकल्प लें।
- द्वादशी को सही पारण समय का ध्यान रखें।
क्या न करें
- चावल और किसी भी प्रकार का अनाज न खाएँ।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
- प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और नशे की चीज़ों से दूर रहें।
- किसी से झगड़ा, क्रोध, झूठ या निंदा न करें।
- संभव हो तो दिन में न सोएँ।
- बाल, नाखून काटने और शेविंग से बचें (परंपरा अनुसार)।
- किसी का दिया हुआ अन्न (पराया अन्न) ग्रहण न करें, यह नियम कई परिवारों में माना जाता है।
- हरिवासर में या द्वादशी समाप्त होने के बाद पारण न करें।
- स्वास्थ्य ठीक न हो तो ज़बरदस्ती कठोर व्रत न रखें।
उत्पन्ना एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: केवल निर्जला व्रत करने से ही उत्पन्ना एकादशी का फल मिलता है।
सच्चाई: परंपरा में निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन — तीनों प्रकार के व्रत मान्य हैं। उत्पन्ना एकादशी की कथा में ही एकादशी देवी एक समय भोजन करने वालों के लिए भी पुण्य का वर माँगती हैं। शास्त्रों का ज़ोर श्रद्धा, संयम और भगवान के स्मरण पर है, शरीर को कष्ट देने पर नहीं।
मिथक: एकादशी व्रत केवल उत्पन्ना एकादशी से ही शुरू किया जा सकता है।
सच्चाई: उत्पन्ना एकादशी से व्रत आरंभ करना एक बहुत प्रचलित और शुभ परंपरा है, क्योंकि यह एकादशी का प्राकट्य दिवस है। लेकिन यह कोई कठोर बंधन नहीं है। कई परिवार और संप्रदाय अपने गुरु या पुरोहित की सलाह पर किसी अन्य एकादशी से भी व्रत शुरू करते हैं।
मिथक: एकादशी पर चावल खाने से अगला जन्म कीड़े का मिलता है।
सच्चाई: यह लोक-मान्यता में कही जाने वाली बात है, जिसका उद्देश्य अन्न-त्याग के नियम का महत्व बताना है। परंपरा में एकादशी को अनाज, विशेषकर चावल, वर्जित है और भक्त इसका श्रद्धा से पालन करते हैं। लेकिन इसे डर के रूप में नहीं, भगवान के प्रति अनुशासन और प्रेम के रूप में देखना चाहिए। यदि भूलवश अनाज खा लिया जाए, तो भगवान से क्षमा माँगकर आगे नियम का पालन करें।
मिथक: अगर व्रत बीच में टूट गया तो पूरे साल का पुण्य नष्ट हो जाता है।
सच्चाई: बीमारी, दवाई या किसी मजबूरी में व्रत टूट जाए तो घबराने की ज़रूरत नहीं है। परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु से क्षमा-प्रार्थना करें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें और अपनी क्षमता के अनुसार दान करें। अगली एकादशी से फिर से श्रद्धा के साथ व्रत जारी रखें।
मिथक: उत्पन्ना एकादशी पर केवल भगवान विष्णु की पूजा होती है, एकादशी माता की नहीं।
सच्चाई: कथा के अनुसार एकादशी देवी भगवान विष्णु की ही शक्ति हैं, जो उनके शरीर से प्रकट हुईं। इसलिए इस दिन दोनों की पूजा का विशेष महत्व है। भगवान विष्णु की मुख्य पूजा के साथ एकादशी माता का स्मरण और उनकी आरती करना पूरी तरह परंपरा के अनुकूल है।
मिथक: द्वादशी के दिन कभी भी पारण कर लें, कोई फर्क नहीं पड़ता।
सच्चाई: परंपरा में पारण के स्पष्ट नियम हैं — द्वादशी तिथि के भीतर, सूर्योदय के बाद और हरिवासर समाप्त होने पर। इसीलिए हर वर्ष पंचांग में पारण का निश्चित समय दिया जाता है। अपने शहर का समय ऊपर की तालिका में देखें।
मिथक: व्रत सबके लिए एक जैसा कठोर होना चाहिए, चाहे स्वास्थ्य कैसा भी हो।
सच्चाई: धर्मशास्त्रों में बीमार, बुज़ुर्ग, बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए व्रत में छूट की बात कही गई है। मधुमेह, ब्लड प्रेशर या नियमित दवा लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह के बिना निर्जला व्रत न रखें। ऐसे लोग फलाहार, अन्न-त्याग, जप और कथा-श्रवण से भी श्रद्धापूर्वक व्रत कर सकते हैं।
उत्पन्ना एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे बताए गए लाभ धार्मिक मान्यता और परंपरा पर आधारित हैं। इन्हें आस्था के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।
- पापों का क्षय: कथा में भगवान विष्णु का वरदान है कि इस दिन श्रद्धा से व्रत करने वालों के पाप नष्ट होते हैं।
- भगवान विष्णु की कृपा: मान्यता है कि जो एकादशी माता के भक्त हैं, वे भगवान के प्रिय होते हैं।
- तीर्थ और दान के समान पुण्य: परंपरा में इस व्रत का पुण्य कई तीर्थ-स्नान और यज्ञ के बराबर बताया गया है।
- मन की शांति और संयम: एक दिन का अन्न-त्याग, जप और कथा मन को शांत करने और इंद्रियों पर नियंत्रण सीखने में सहायक माने जाते हैं।
- सुख-समृद्धि की कामना: कथा के अनुसार एक समय भोजन करके व्रत रखने वालों को भी धन-धान्य का आशीर्वाद मिलता है।
- मोक्ष की ओर कदम: वैष्णव परंपरा में नियमित एकादशी व्रत को भगवान की भक्ति और मोक्ष के मार्ग का एक साधन माना गया है।
- नए आध्यात्मिक संकल्प की शुरुआत: एकादशी व्रत आरंभ करने का दिन होने के कारण यह जीवन में नियमित साधना शुरू करने का अच्छा अवसर माना जाता है।
संबंधित एकादशी और पाठ
उत्पन्ना एकादशी से ठीक पहले कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी आती है, जिस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसके बाद कार्तिक मास का समापन कार्तिक पूर्णिमा से होता है और मार्गशीर्ष शुरू होता है।
उत्पन्ना एकादशी के बाद मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी आती है, जिस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है। पूरे वर्ष की सभी एकादशियों की सूची और तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
पूजा के समय गाने के लिए एकादशी माता की आरती, ओम जय जगदीश हरे आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें।
उत्पन्ना एकादशी हमें याद दिलाती है कि भगवान की दी हुई शक्ति हमारे भीतर ही है — जब भी जीवन में “मुर” जैसी कठिनाइयाँ आएँ, संयम, श्रद्धा और नाम-स्मरण ही हमारी रक्षा करते हैं। यदि आप लंबे समय से एकादशी व्रत शुरू करने की सोच रहे हैं, तो एकादशी माता के इस प्राकट्य दिवस से बेहतर दिन शायद ही कोई हो। एकादशी माता और श्री हरि आप और आपके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। जय एकादशी माता!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
उत्पन्ना एकादशी कब है 2026 में?
2026 में उत्पन्ना एकादशी का व्रत शुक्रवार, 4 दिसंबर 2026 को है और पारण 5 दिसंबर की सुबह होगा। अपने शहर का सही पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तालिका में देखें।
उत्पन्ना एकादशी किस महीने में आती है?
उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण पक्ष की एकादशी है। अमांत पंचांग (गुजरात, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत) में यही तिथि कार्तिक कृष्ण एकादशी कहलाती है।
इसे उत्पन्ना एकादशी क्यों कहते हैं?
कथा के अनुसार इसी तिथि पर भगवान विष्णु के शरीर से एकादशी देवी उत्पन्न हुईं और उन्होंने मुर दैत्य का वध किया। ‘उत्पन्ना’ का अर्थ है ‘जो उत्पन्न हुई’, इसलिए यह नाम पड़ा।
उत्पन्ना एकादशी की व्रत कथा क्या है?
सतयुग में मुर दैत्य ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। भगवान विष्णु ने उससे लंबा युद्ध किया और फिर बदरिकाश्रम की हेमवती गुफा में विश्राम करने लगे; तभी उनके शरीर से प्रकट देवी ने मुर का वध किया और भगवान ने उन्हें एकादशी नाम दिया।
मुर दैत्य कौन था?
मुर नाड़ीजंघ नामक दैत्य का पुत्र था और चंद्रावती नगरी में रहता था। उसने इंद्र सहित सभी देवताओं को पराजित कर दिया था।
क्या एकादशी व्रत उत्पन्ना एकादशी से शुरू करना चाहिए?
हाँ, यह एक बहुत प्रचलित परंपरा है, क्योंकि यह एकादशी देवी का प्राकट्य दिवस है। फिर भी यह अनिवार्य नियम नहीं है; अपने परिवार या गुरु की परंपरा के अनुसार निर्णय लें।
पहली एकादशी कौन-सी है?
उत्पत्ति के आधार पर उत्पन्ना एकादशी को पहली एकादशी माना जाता है। हिंदू नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) से गिनें तो वर्ष की पहली एकादशी कामदा एकादशी है।
उत्पन्ना एकादशी पर किसकी पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु (या श्रीकृष्ण) की पूजा की जाती है और साथ में एकादशी माता का स्मरण और आरती की जाती है।
उत्पन्ना एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
फल, दूध, दही, साबूदाना, मखाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक से बनी चीज़ें खाई जा सकती हैं। अपनी पारिवारिक परंपरा का भी ध्यान रखें।
क्या एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?
फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पीने की अनुमति है। केवल निर्जला व्रत में पारण तक जल नहीं लिया जाता।
क्या एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, परंपरा के अनुसार एकादशी पर चावल और सभी अनाज वर्जित हैं। व्रत न रखने वाले भी इस दिन चावल से परहेज़ करते हैं।
उत्पन्ना एकादशी का पारण कब और कैसे करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरिवासर समाप्त होने पर करें। पहले तुलसी दल वाला जल या चरणामृत लें, फिर सात्विक भोजन करें; शहर-वार समय इस पेज की तालिका में है।
हरिवासर क्या होता है?
द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग हरिवासर कहलाता है। इस अवधि में एकादशी व्रत का पारण नहीं किया जाता।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो दिन में बँटती है, तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। 2026 में उत्पन्ना एकादशी पर दोनों का व्रत एक ही दिन है।
उत्पन्ना एकादशी का मंत्र कौन-सा है?
सबसे प्रचलित मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ है, जिसे 108 बार जपा जाता है। ‘ॐ नमो नारायणाय’ और विष्णु गायत्री मंत्र भी जपे जाते हैं।
क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग यह व्रत रख सकते हैं?
हाँ, लेकिन वे निर्जला व्रत न रखें और पहले डॉक्टर से सलाह लें। फलाहार, अन्न-त्याग, जप और कथा-श्रवण से भी व्रत श्रद्धापूर्वक पूरा होता है।
अगर एकादशी व्रत टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं; भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, मंत्र जाप करें और अपनी क्षमता के अनुसार दान करें। अगली एकादशी से फिर श्रद्धा से व्रत जारी रखें।
उत्पन्ना एकादशी के बाद कौन-सी एकादशी आती है?
उत्पन्ना एकादशी के बाद मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की मोक्षदा एकादशी आती है, जिस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती है।