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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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मोक्षदा एकादशी 2026 (Mokshada Ekadashi): कब है, व्रत कथा, पूजा विधि, पारण और गीता जयंती

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे भगवान विष्णु की कृपा और मोक्ष की कामना से जुड़ा सबसे पावन व्रत माना जाता है। “मोक्षदा” का सीधा अर्थ है — मोक्ष देने वाली। परंपरा के अनुसार यह व्रत केवल अपने लिए ही नहीं, बल्कि अपने पितरों (पूर्वजों) की सद्गति के लिए भी किया जाता है।

इस एकादशी का एक और बड़ा महत्व है — इसी तिथि को गीता जयंती मनाई जाती है। मान्यता है कि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन ही कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश दिया था। इसलिए इस दिन व्रत, विष्णु पूजा और गीता पाठ — तीनों का संगम होता है।

दक्षिण भारत में जब यह एकादशी धनुर्मास (मार्गली) में पड़ती है, तब इसे वैकुंठ एकादशी के रूप में भी मनाया जाता है। नीचे आपको मोक्षदा एकादशी की तारीख, पारण समय, व्रत कथा, स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि, मंत्र, गीता पाठ का तरीका, पितरों के लिए दान और वैकुंठ एकादशी से इसका संबंध — सब कुछ सरल भाषा में मिलेगा।

मोक्षदा एकादशी 2026 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: मोक्षदा एकादशी 2026 का व्रत रविवार, 20 दिसंबर 2026 को रखा जाएगा। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 19 दिसंबर रात 10:09 बजे शुरू होकर 20 दिसंबर रात 8:14 बजे समाप्त होगी, और पारण 21 दिसंबर को सुबह 7:10 से 9:13 बजे के बीच किया जा सकता है। इसी दिन गीता जयंती भी है।

अगली मोक्षदा एकादशी

मोक्षदा एकादशी 2026

20 दिसंबर 2026, रविवार 49 दिन बाकी

मास और पक्ष
मार्गशीर्ष शुक्ल
एकादशी तिथि
19 दिसं 22:11 – 20 दिसं 20:16
पारण (व्रत खोलने का समय)
21 दिसं, 07:09 – 09:13
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202620 दिसंबर 2026, रविवार19 दिसं 22:11 –
20 दिसं 20:16
21 दिसं, 07:09 – 09:13
20279 दिसंबर 2027, गुरुवार9 दिसं 03:00 –
10 दिसं 03:21
10 दिसं, 13:15 – 15:20
202827 नवंबर 2028, सोमवार27 नवं 00:00 –
28 नवं 02:18
28 नवं, 08:47 – 09:00
202916 दिसंबर 2029, रविवार15 दिसं 16:41 –
16 दिसं 19:19
17 दिसं, 07:07 – 09:11

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय का समय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें।

स्मार्त और वैष्णव: जब एकादशी तिथि दो दिनों में बँटती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। 2026 में नई दिल्ली के पंचांग में दोनों परंपराओं का व्रत 20 दिसंबर को ही है, फिर भी अपने शहर की तालिका एक बार अवश्य देख लें।

मोक्षदा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“मोक्षदा” शब्द दो भागों से बना है — “मोक्ष” यानी जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति, और “दा” यानी देने वाली। इस तरह मोक्षदा एकादशी का अर्थ हुआ “मोक्ष प्रदान करने वाली एकादशी”। कथा में राजा वैखानस के पिता को इसी व्रत के पुण्य से नरक से मुक्ति मिली, इसलिए यह नाम और भी सार्थक माना जाता है।

मोक्षदा एकादशी के अन्य नाम

  • मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी — तिथि के आधार पर सामान्य नाम।
  • अगहन एकादशी — उत्तर भारत में मार्गशीर्ष को अगहन भी कहते हैं।
  • गीता एकादशी / गीता जयंती — क्योंकि इसी दिन गीता का उपदेश दिया गया था।
  • वैकुंठ एकादशी / मुक्कोटि एकादशी — दक्षिण भारत में, जब यह तिथि धनुर्मास (मार्गली) में पड़ती है।
  • धनुर्मास एकादशी — कुछ परंपराओं में, धनु संक्रांति के बाद पड़ने पर।
  • मौन एकादशी (मौन अगियारस) — जैन परंपरा में मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को मौन व्रत और उपवास का विशेष दिन माना जाता है।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर चलता है (महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है) और दक्षिण व पश्चिम भारत में अमांत कैलेंडर (महीना अमावस्या पर समाप्त होता है)। अच्छी बात यह है कि शुक्ल पक्ष का नाम दोनों कैलेंडरों में एक ही रहता है। इसलिए मोक्षदा एकादशी उत्तर और दक्षिण, दोनों जगह मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही कहलाती है।

यह एकादशी आमतौर पर नवंबर के अंत से दिसंबर के बीच आती है। इससे पहले मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी आती है, और इसके बाद पौष कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी।

मोक्षदा एकादशी का महत्व

वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में हर एक का अपना फल बताया गया है। मोक्षदा एकादशी का विशेष संबंध मोक्ष, पितरों की मुक्ति और ज्ञान (गीता) से है। यही तीन बातें इसे बाकी एकादशियों से अलग बनाती हैं।

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार मार्गशीर्ष मास स्वयं भगवान को अत्यंत प्रिय है। श्रीमद्भगवद्गीता (10.35) में श्रीकृष्ण कहते हैं — “मासानां मार्गशीर्षोऽहम्”, अर्थात् महीनों में मैं मार्गशीर्ष हूँ। ऐसे प्रिय मास की शुक्ल एकादशी पर किया गया व्रत, जप और दान विशेष पुण्यदायी माना जाता है।

मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा से व्रत रखने, भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की पूजा करने और व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित करने से उन्हें सद्गति मिलती है। इसी कारण इसे “पितरों को मोक्ष दिलाने वाली एकादशी” भी कहा जाता है।

आध्यात्मिक संदेश

मोक्षदा एकादशी का गहरा संदेश यह है कि सच्ची मुक्ति केवल किसी कर्मकांड से नहीं, बल्कि सही ज्ञान और निष्काम कर्म से आती है। यही बात गीता भी सिखाती है। व्रत हमें इंद्रियों पर संयम सिखाता है, और गीता पाठ मन को स्पष्टता देता है।

कथा का संदेश भी उतना ही सुंदर है — एक पुत्र अपने पिता के कष्ट को अपना कष्ट मानता है और उनके लिए तप करता है। यह परिवार के प्रति कृतज्ञता, पूर्वजों के प्रति सम्मान और अपने कर्मों की जिम्मेदारी का भाव जगाता है।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार मोक्षदा एकादशी का माहात्म्य ब्रह्माण्ड पुराण में बताया गया है, और पद्म पुराण के एकादशी माहात्म्य प्रसंगों में भी इसका वर्णन मिलता है। इन प्रसंगों में धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के बारे में पूछते हैं, और श्रीकृष्ण उन्हें राजा वैखानस की कथा सुनाते हैं।

कथा के अंत में यह भी कहा गया है कि यह एकादशी चिंतामणि के समान मनोकामना पूर्ण करने वाली है, और इसका माहात्म्य श्रद्धा से पढ़ने या सुनने से भी पुण्य मिलता है। ये बातें आस्था की भाषा में कही गई हैं, इन्हें उसी भाव से समझें।

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रता से पूछा — “हे केशव! मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी का माहात्म्य तो मैंने सुन लिया। अब कृपा करके बताइए कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, उसकी विधि क्या है और उसका क्या फल है?”

श्रीकृष्ण प्रसन्न होकर बोले — “हे राजन्! मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की इस एकादशी का नाम मोक्षदा है। यह मनुष्य के पापों का नाश करने वाली और मोक्ष देने वाली है। इसके दिन भगवान दामोदर की धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए। अब मैं तुम्हें इससे जुड़ी एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”

राजा वैखानस का स्वप्न

प्राचीन समय में चंपक नगर नाम का एक सुंदर नगर था (कुछ हिंदी कथा-ग्रंथों में इस नगर का नाम गोकुल बताया गया है)। वहाँ वैखानस नाम के एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान की तरह करते थे। उनके राज्य में चारों वेदों के ज्ञाता विद्वान ब्राह्मण रहते थे और प्रजा सुखी थी।

एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उनके पिता नरक में घोर यातना भोग रहे हैं। पिता दुखी स्वर में उनसे कह रहे थे — “हे पुत्र! मैं यहाँ बहुत कष्ट में हूँ। किसी भी उपाय से मुझे इस नरक से मुक्त कराओ।” यह दृश्य देखकर राजा की नींद टूट गई और उनका मन बेचैन हो उठा।

सुबह होते ही राजा ने विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया और अपना स्वप्न सुनाया। उन्होंने कहा — “मेरे पिता नरक में कष्ट पा रहे हैं और मैं यहाँ राज-सुख भोग रहा हूँ। ऐसे में न मुझे राज्य अच्छा लगता है, न धन, न परिवार। वह पुत्र किस काम का जो अपने पिता को कष्ट से न बचा सके? कृपा करके कोई ऐसा उपाय बताइए, जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिले।”

पर्वत मुनि के आश्रम में

ब्राह्मणों ने कहा — “हे राजन्! यहाँ पास ही पर्वत मुनि का आश्रम है। वे भूत, भविष्य और वर्तमान — तीनों काल के ज्ञाता हैं। आप उनके पास जाइए, वे अवश्य आपकी समस्या का समाधान बताएँगे।”

राजा तुरंत पर्वत मुनि के आश्रम पहुँचे। वहाँ अनेक ऋषि-मुनि और योगी तपस्या कर रहे थे। राजा ने मुनि को विधिपूर्वक प्रणाम किया। मुनि ने राजा और उनके राज्य का कुशल-मंगल पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा — “हे मुनिवर! आपकी कृपा से राज्य में सब कुशल है, परंतु मेरे मन में एक बड़ी पीड़ा है।” और उन्होंने अपना पूरा स्वप्न कह सुनाया।

पर्वत मुनि ने कुछ क्षण आँखें बंद करके ध्यान लगाया। योगबल से उन्होंने राजा के पिता के पिछले कर्म देख लिए। फिर बोले — “हे राजन्! तुम्हारे पिता ने पूर्व जन्म में एक पाप किया था। उनकी दो पत्नियाँ थीं। उन्होंने एक पत्नी के कहने पर दूसरी पत्नी के साथ अन्याय किया और ऋतुकाल में संतान की इच्छा से आई उस पत्नी का उचित अधिकार ठुकरा दिया। पत्नियों के साथ इस भेदभाव और धर्म की अवहेलना के कारण ही उन्हें नरक भोगना पड़ रहा है।”

मोक्षदा एकादशी व्रत का उपाय

राजा ने विनती की — “हे मुनिवर! अब कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पिता इस पाप से मुक्त हो जाएँ।”

मुनि बोले — “हे राजन्! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहते हैं। तुम अपने पूरे परिवार के साथ विधिपूर्वक इस एकादशी का व्रत करो। व्रत पूरा होने पर संकल्प लेकर उसका पुण्य अपने पिता को अर्पित कर दो। इस पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे पिता नरक से मुक्त हो जाएँगे।”

राजा मुनि को प्रणाम करके अपने महल लौट आए। जब मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी आई, तो उन्होंने अपनी रानियों, पुत्रों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ श्रद्धापूर्वक व्रत रखा। दिन भर भगवान विष्णु की पूजा की, रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण किया और द्वादशी को ब्राह्मणों को भोजन व दान देकर पारण किया।

पिता की मुक्ति

व्रत पूरा होने के बाद राजा ने हाथ में जल लेकर संकल्प किया — “इस व्रत का समस्त पुण्य मैं अपने पिता को अर्पित करता हूँ।” जैसे ही उन्होंने यह पुण्य अर्पित किया, आकाश में मंगल ध्वनि होने लगी। राजा के पिता नरक से मुक्त होकर दिव्य रूप में स्वर्ग की ओर जाने लगे।

जाते-जाते उन्होंने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया — “हे पुत्र! तेरा कल्याण हो।” यह सुनकर राजा का मन शांत और प्रसन्न हो गया।

कथा के अंत में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं — “हे राजन्! जो मनुष्य श्रद्धा से मोक्षदा एकादशी का व्रत करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और अंत में वह मोक्ष को प्राप्त करता है। इससे बढ़कर मोक्ष देने वाला कोई दूसरा व्रत नहीं है।”

कथा की सीख: यह कथा बताती है कि हमारे कर्मों का प्रभाव केवल हम तक सीमित नहीं रहता। साथ ही यह भी कि सच्चे मन से किया गया तप और उसका पुण्य अपने प्रियजनों के लिए समर्पित किया जा सकता है। व्रत कथा पढ़ने के बाद एकादशी माता की आरती करने की परंपरा है।

मोक्षदा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

नीचे दी गई विधि सामान्य गृहस्थों के लिए है। आपके परिवार या संप्रदाय की कोई विशेष परंपरा हो, तो उसे प्राथमिकता दें। श्रद्धा और नियम का पालन सबसे महत्वपूर्ण है, सामग्री की कमी से घबराएँ नहीं।

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। चावल, मसूर, प्याज-लहसुन और मांसाहार से बचें।
  2. रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में अगले दिन के व्रत का विचार रखें।
  3. पूजा स्थान साफ कर लें, और गीता की प्रति, तुलसी दल व पूजा सामग्री पहले से तैयार रखें।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और स्वच्छ (संभव हो तो पीले) वस्त्र पहनें।
  2. सूर्य देव को जल अर्पित करें।
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — “मैं आज मोक्षदा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए और अपने पितरों की सद्गति की कामना से कर रहा/रही हूँ।” अपना नाम और गोत्र बोलें।
  4. अपनी क्षमता के अनुसार व्रत का प्रकार (निर्जला, फलाहार या एक समय) तय कर लें।

भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण की पूजा

  1. चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा/चित्र स्थापित करें। पास में श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति भी रखें।
  2. पहले भगवान गणेश का स्मरण करें, फिर कलश स्थापित करें (यदि परंपरा में हो)।
  3. भगवान को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएँ, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें।
  4. पीले वस्त्र, पीला चंदन, पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रखें कि तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें, एकादशी को तुलसी न तोड़ें।
  5. धूप-दीप जलाएँ और फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  6. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) जप करें।
  7. मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  8. गीता का पाठ करें — पूरा न हो सके तो कम से कम एक अध्याय (विशेषकर अध्याय 15 या 18) पढ़ें।
  9. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती करें और भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।

शाम की पूजा और रात्रि जागरण

  1. शाम को फिर से दीपक जलाएँ, तुलसी के पास भी घी का दीपक रखें।
  2. विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ या भजन-कीर्तन करें।
  3. संभव हो तो रात में जागरण करें। पूरी रात जागना संभव न हो तो कुछ समय भजन करके सो सकते हैं।
  4. दिन में सोने से बचें — एकादशी पर दिन में सोना वर्जित माना जाता है।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें।
  2. किसी ब्राह्मण, जरूरतमंद व्यक्ति या गौ को भोजन/दान दें।
  3. हाथ में जल लेकर व्रत का पुण्य भगवान को और अपने पितरों को समर्पित करें।
  4. ऊपर दी गई तालिका में बताए गए पारण समय के भीतर, तुलसी दल या भगवान के प्रसाद से व्रत खोलें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण / लड्डू गोपाल की प्रतिमा या चित्र
  • श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • गंगाजल और तांबे या पीतल का लोटा
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़े हुए)
  • पीले फूल, फूलमाला
  • पीला चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत
  • धूप, अगरबत्ती, कपूर
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती
  • मौसमी फल, केले, मिश्री, मेवे
  • भोग के लिए मिठाई या पंजीरी
  • कलश, आम के पत्ते, नारियल (यदि कलश स्थापना करनी हो)
  • पीले वस्त्र या जनेऊ (भगवान के लिए)
  • तुलसी या चंदन की माला (जप के लिए)
  • दान के लिए अन्न, गरम कपड़े, कंबल या गीता की प्रति

मोक्षदा एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में शुद्ध उच्चारण से ज्यादा जरूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। अपनी सुविधा से इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप कर सकते हैं।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु) को नमन करता हूँ। यह एकादशी का सबसे प्रचलित मंत्र है, इसका 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

2. श्रीकृष्ण स्तुति मंत्र

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतः क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

अर्थ: वसुदेव के पुत्र, हरि, परमात्मा श्रीकृष्ण को प्रणाम, जो शरणागत के कष्ट दूर करते हैं — उन गोविंद को बार-बार नमस्कार।

3. गीता का शरणागति श्लोक

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (गीता 18.66)

अर्थ: सब धर्मों का आश्रय छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो। मोक्षदा एकादशी पर यह श्लोक विशेष रूप से पढ़ा जाता है, क्योंकि इसमें “मोक्ष” का ही वचन है।

4. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो पूरे विश्व के आधार हैं — संसार के भय को हरने वाले उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

5. महामंत्र

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥

अर्थ: भगवान के पवित्र नामों का संकीर्तन। वैष्णव परंपरा में एकादशी के दिन इस महामंत्र का अधिक से अधिक जप किया जाता है।

गीता जयंती और मोक्षदा एकादशी

मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती एक ही दिन मनाई जाती हैं। परंपरा के अनुसार महाभारत युद्ध के आरंभ में, कुरुक्षेत्र में, जब अर्जुन मोह और दुविधा में डूब गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश दिया। यह उपदेश मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन दिया गया माना जाता है।

गीता में 18 अध्याय और लगभग 700 श्लोक हैं, जिनमें कर्म, भक्ति और ज्ञान — तीनों मार्गों की सरल व्याख्या है। इसीलिए यह दिन केवल व्रत का नहीं, बल्कि ज्ञान का उत्सव भी है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र में इस अवसर पर बड़े स्तर पर गीता महोत्सव आयोजित होता है, और इस्कॉन सहित अनेक मंदिरों में गीता पाठ व गीता दान होता है।

गीता जयंती की पूजा का विस्तृत तरीका आप हमारे लेख गीता जयंती पूजा विधि में पढ़ सकते हैं।

मोक्षदा एकादशी पर गीता पाठ कैसे करें

इस दिन गीता पाठ को व्रत का अभिन्न अंग माना जाता है। आप अपने समय और क्षमता के अनुसार नीचे में से कोई भी तरीका चुन सकते हैं।

  1. संपूर्ण गीता पाठ: सुबह से शाम के बीच सभी 18 अध्याय पढ़ें। परिवार के सदस्य अध्याय बाँटकर भी पाठ कर सकते हैं।
  2. एक अध्याय का पाठ: समय कम हो तो एक अध्याय पढ़ें। अध्याय 12 (भक्ति योग), 15 (पुरुषोत्तम योग) और 18 (मोक्ष संन्यास योग) विशेष रूप से पढ़े जाते हैं।
  3. पितरों के निमित्त पाठ: कई परिवार पितरों की शांति की कामना से गीता के सातवें अध्याय या पूरे ग्रंथ का पाठ करते हैं — यह परंपरा अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न है।
  4. श्लोक-चिंतन: यदि संस्कृत पढ़ना कठिन हो तो हिंदी अनुवाद पढ़ें और कुछ श्लोकों का अर्थ समझकर दिन भर उन पर विचार करें।

पाठ से पहले गीता को चौकी पर रखकर उस पर फूल और अक्षत अर्पित करें, और पाठ के बाद भगवान को प्रणाम करके आरती करें। पाठ के समय मोबाइल दूर रखें, ताकि मन एकाग्र रहे।

पितरों के लिए दान और संकल्प

राजा वैखानस की कथा के कारण मोक्षदा एकादशी को पितरों की मुक्ति से जोड़ा जाता है। इस दिन कई लोग अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी या अन्य पूर्वजों को याद करते हुए व्रत का पुण्य उन्हें समर्पित करते हैं।

पुण्य समर्पण का सरल संकल्प

द्वादशी को पारण से पहले हाथ में जल, तिल और तुलसी दल लें और मन में कहें — “मैंने श्रद्धापूर्वक जो मोक्षदा एकादशी का व्रत किया है, उसका पुण्य भगवान विष्णु की कृपा से मेरे पितरों को प्राप्त हो और उन्हें सद्गति मिले।” फिर जल को किसी पौधे या तुलसी की जड़ में छोड़ दें।

मोक्षदा एकादशी पर क्या दान करें

  • श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति — गीता जयंती होने के कारण गीता दान को विशेष माना जाता है।
  • गरम कपड़े और कंबल — दिसंबर की ठंड में जरूरतमंदों को यह दान बहुत उपयोगी होता है।
  • अन्न दान — कच्चा अनाज, आटा, दाल आदि जरूरतमंद परिवारों को दें।
  • तिल और गुड़ — कई परंपराओं में पितरों के निमित्त तिल दान किया जाता है।
  • दीपदान — मंदिर या तुलसी के पास घी का दीपक जलाना।
  • गौ सेवा — गाय को हरा चारा या गुड़ खिलाना।
  • फल और मिठाई — मंदिर, वृद्धाश्रम या बच्चों में बाँटना।

ध्यान दें: एकादशी के दिन विधिवत श्राद्ध, पिंडदान या तर्पण की परंपरा हर क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। यदि आप ऐसी कोई विधि करना चाहते हैं, तो अपनी कुल परंपरा या किसी जानकार पंडित से पूछकर ही करें। सामान्य गृहस्थ के लिए व्रत, पुण्य समर्पण और दान ही पर्याप्त माने जाते हैं।

मोक्षदा एकादशी और वैकुंठ एकादशी का संबंध

यह विषय अक्सर लोगों को उलझन में डालता है, इसलिए इसे सरल तरीके से समझते हैं। वैकुंठ एकादशी दक्षिण भारत (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक) में मनाई जाने वाली बहुत बड़ी एकादशी है। तेलुगु क्षेत्र में इसे मुक्कोटि एकादशी भी कहते हैं।

वैकुंठ एकादशी कैसे तय होती है

मोक्षदा एकादशी चंद्र मास (मार्गशीर्ष शुक्ल) से तय होती है, जबकि वैकुंठ एकादशी सौर मास से। जब सूर्य धनु राशि में होता है, उस महीने को धनुर्मास (तमिल में मार्गली/मार्गळि) कहते हैं, जो सामान्यतः दिसंबर के मध्य से जनवरी के मध्य तक रहता है। इस धनुर्मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की एकादशी ही वैकुंठ एकादशी कहलाती है।

  • यदि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी धनु संक्रांति के बाद पड़े, तो मोक्षदा एकादशी और वैकुंठ एकादशी एक ही दिन होती हैं।
  • यदि मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी धनु संक्रांति से पहले पड़ जाए, तो वैकुंठ एकादशी अगले महीने की पौष शुक्ल एकादशी, यानी पौष पुत्रदा एकादशी के दिन होती है।
  • सौर और चंद्र कैलेंडर के इस अंतर के कारण किसी अंग्रेजी वर्ष में वैकुंठ एकादशी एक बार, दो बार या कभी-कभी एक बार भी नहीं पड़ती।

2026 में मोक्षदा एकादशी धनुर्मास शुरू होने के बाद पड़ रही है, इसलिए दक्षिण भारत के पंचांगों में इस बार वैकुंठ एकादशी, मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती — तीनों एक ही दिन हैं। आगे के वर्षों में यह संयोग बदल सकता है, इसलिए हर साल स्थानीय पंचांग देखें।

वैकुंठ द्वार दर्शन

वैष्णव मान्यता है कि वैकुंठ एकादशी पर भगवान विष्णु के धाम वैकुंठ का द्वार खुलता है। इसी भाव से श्रीरंगम के श्री रंगनाथस्वामी मंदिर में “परमपद वासल” (स्वर्ग द्वार) और तिरुमला (तिरुपति) में “वैकुंठ द्वारम्” से भक्त दर्शन करते हैं। श्रीरंगम में इसके आसपास लगभग 20 दिनों का उत्सव (पगल पत्तु और इरा पत्तु) मनाया जाता है।

उत्तर भारत में इस दिन को मुख्य रूप से मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है, जबकि दक्षिण में वैकुंठ द्वार दर्शन प्रमुख होता है। नाम अलग हैं, पर भाव एक ही है — भगवान विष्णु की शरण और मोक्ष की कामना।

मोक्षदा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का मूल नियम है — अन्न, विशेषकर चावल का त्याग। इसके साथ सात्विकता और संयम का पालन। नीचे सामान्य नियम दिए गए हैं, जिन्हें आप अपनी परंपरा के अनुसार अपना सकते हैं।

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल — केला, सेब, पपीता, अमरूद, संतरा आदि।
  • दूध, दही, छाछ, पनीर, मावा।
  • सूखे मेवे — बादाम, काजू, किशमिश, मखाना।
  • कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा (फलाहारी परंपरा के अनुसार)।
  • साबूदाना, आलू, शकरकंद, अरबी।
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा।
  • मूंगफली और नारियल।

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज।
  • गेहूँ, जौ, मक्का जैसे अनाज और सभी दालें।
  • प्याज, लहसुन और मांसाहार।
  • साधारण (आयोडीन युक्त) नमक — कई लोग केवल सेंधा नमक लेते हैं।
  • शराब, तंबाकू और कोई भी नशा।
  • बासी या बाजार का तला-भुना भोजन।

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे रखें। दिसंबर की ठंड में भी शरीर में पानी की कमी हो सकती है, इसलिए अपनी क्षमता का ईमानदारी से आकलन करें।

फलाहार व्रत

अधिकांश गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं, जिसमें फल, दूध, मेवे और व्रत में मान्य चीजें ली जाती हैं। जल पी सकते हैं। यह संतुलित तरीका है, जिसमें पूजा-पाठ और गीता पाठ के लिए शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार फलाहारी या सात्विक व्रत-भोजन लेकर व्रत रख सकते हैं। ध्यान रखें कि इसमें भी अन्न और चावल नहीं लिया जाता।

स्वास्थ्य सावधानी: मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप, हृदय रोग, किडनी की समस्या, गर्भावस्था, स्तनपान, बढ़ती उम्र या नियमित दवाएँ लेने की स्थिति में कठोर व्रत न रखें। ऐसे में अपने डॉक्टर से सलाह लेकर हल्का फलाहार व्रत रखें और दवाएँ समय पर लें। शास्त्रों में भी बालकों, वृद्धों और रोगियों को व्रत के नियमों में छूट दी गई है।

मोक्षदा एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण यानी व्रत खोलना। एकादशी का पारण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्रत। सही समय पर पारण न करने से व्रत अधूरा माना जाता है।

  • द्वादशी में पारण: पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करें। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना उचित नहीं माना जाता।
  • हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग “हरि वासर” कहलाता है। इस समय पारण नहीं करना चाहिए, हरि वासर समाप्त होने का इंतजार करें।
  • प्रातःकाल श्रेष्ठ: पारण के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचें, किसी कारण से सुबह न हो सके तो मध्याह्न के बाद करें।
  • स्मार्त और वैष्णव: जिस वर्ष दोनों परंपराओं के व्रत अलग दिनों में हों, उस वर्ष पारण का दिन भी अलग होगा। अपनी परंपरा के अनुसार तालिका देखें।

पारण कैसे करें

  1. स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
  2. ब्राह्मण, जरूरतमंद या गौ को भोजन या दान दें।
  3. व्रत का पुण्य भगवान और पितरों को समर्पित करें।
  4. सबसे पहले तुलसी दल, जल या भगवान के प्रसाद से व्रत खोलें।
  5. उसके बाद हल्का सात्विक भोजन लें। पारण के दिन भी प्याज-लहसुन और तामसिक भोजन से बचें।

आपके शहर का सटीक पारण समय ऊपर दी गई तालिका में दिया है। रोज की तिथि जानने के लिए आप हमारा दैनिक पंचांग भी देख सकते हैं।

मोक्षदा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु / श्रीकृष्ण की पूजा में तुलसी दल अवश्य चढ़ाएँ।
  • श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करें या सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
  • अपने पितरों को स्मरण करें और व्रत का पुण्य उन्हें समर्पित करें।
  • गरम कपड़े, अन्न, गीता या दीप का दान करें।
  • सत्य बोलें, शांत रहें और सबके प्रति दया का भाव रखें।
  • संभव हो तो रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
  • सही समय पर पारण करें।

क्या न करें

  • चावल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का सेवन न करें।
  • दिन में न सोएँ।
  • किसी से झगड़ा, कटु वचन, निंदा या झूठ से बचें।
  • बाल, नाखून कटवाने और दाढ़ी बनाने से बचें (कई परिवारों की परंपरा)।
  • घर में कलह या अशुद्धता न रखें।
  • स्वास्थ्य ठीक न हो तो जबरदस्ती कठोर व्रत न रखें।

मोक्षदा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: मोक्षदा एकादशी का व्रत करने से निश्चित रूप से मोक्ष मिल जाता है।

सच्चाई: परंपरा इस व्रत को मोक्ष की ओर ले जाने वाला बताती है, पर यह आस्था का विषय है, कोई गारंटी नहीं। शास्त्र और गीता दोनों कहते हैं कि भक्ति, सदाचार और निष्काम कर्म के साथ किया गया व्रत ही सार्थक है। केवल एक दिन का उपवास जीवन भर के आचरण का विकल्प नहीं है।

मिथक: पितरों के लिए यह व्रत केवल पुत्र ही कर सकता है।

सच्चाई: कथा में राजा वैखानस ने अपनी रानियों और पूरे परिवार के साथ व्रत किया था। एकादशी का व्रत स्त्री-पुरुष कोई भी कर सकता है, और अपने व्रत का पुण्य अपने पूर्वजों को श्रद्धा से समर्पित कर सकता है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो व्रत का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: शास्त्रों में निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन — सभी प्रकार के व्रत बताए गए हैं। अपनी क्षमता के अनुसार चुना गया व्रत, सच्ची श्रद्धा के साथ, उतना ही मान्य है। स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाकर व्रत करना धर्म का उद्देश्य नहीं है।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और पाप लग गया।

सच्चाई: भूल से या मजबूरी में कुछ खा लेने पर घबराने की जरूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को नियम से बड़ा माना गया है।

मिथक: मोक्षदा एकादशी और वैकुंठ एकादशी दो बिलकुल अलग त्योहार हैं जो कभी एक दिन नहीं पड़ते।

सच्चाई: दोनों का आधार अलग है — मोक्षदा चंद्र मास से और वैकुंठ सौर धनुर्मास से तय होती है। जब मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी धनुर्मास में पड़ती है, तो दोनों एक ही दिन होती हैं, जैसे 2026 में। अन्यथा वैकुंठ एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी के दिन आती है।

मिथक: व्रत रखने से शरीर का “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को निर्जला व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी व्रत का उद्देश्य आध्यात्मिक संयम है, किसी बीमारी का इलाज नहीं। उपवास हर शरीर के लिए एक जैसा सुरक्षित नहीं होता। मधुमेह, गर्भावस्था, बुजुर्गों और दवा लेने वालों को डॉक्टर की सलाह से ही व्रत का तरीका तय करना चाहिए।

मिथक: गीता घर में रखने या पढ़ने के लिए विशेष दीक्षा जरूरी है।

सच्चाई: गीता सबके लिए है। कोई भी व्यक्ति श्रद्धा और स्वच्छता के साथ गीता पढ़ सकता है और घर में रख सकता है। गीता जयंती पर इसका पाठ शुरू करना एक सुंदर परंपरा है।

मोक्षदा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं और परंपरा पर आधारित हैं। इनका अनुभव हर व्यक्ति की श्रद्धा, आचरण और भाव पर निर्भर माना जाता है।

  • पितरों की सद्गति: मान्यता है कि व्रत का पुण्य समर्पित करने से पूर्वजों को शांति और सद्गति मिलती है।
  • पापों का क्षय: परंपरा के अनुसार यह एकादशी जाने-अनजाने हुए पापों के प्रायश्चित का अवसर है।
  • मोक्ष की ओर कदम: इसे मोक्ष मार्ग में सहायक व्रत माना गया है।
  • ज्ञान और स्पष्टता: गीता पाठ के साथ यह दिन मन की दुविधा कम करने और सही निर्णय लेने की प्रेरणा देता है।
  • मन की शांति: उपवास, जप और ध्यान से मन शांत और एकाग्र होता है — ऐसा अनेक साधक अनुभव करते हैं।
  • पारिवारिक सौहार्द: परिवार के साथ मिलकर पूजा, पाठ और दान करने से आपसी प्रेम और कृतज्ञता का भाव बढ़ता है।
  • विष्णु कृपा: भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई भक्ति से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।

संबंधित एकादशी और पाठ

मोक्षदा एकादशी से ठीक पहले मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी आती है, जिस दिन एकादशी देवी के प्रकट होने की कथा है — एकादशी व्रत आरंभ करने वाले इसी से शुरुआत करते हैं। मोक्षदा के बाद पौष कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी आती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए गीता जयंती पूजा विधि, ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती भी पढ़ें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

मोक्षदा एकादशी हमें याद दिलाती है कि भक्ति, ज्ञान और कृतज्ञता — तीनों मिलकर ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। इस दिन व्रत रखें, गीता के कुछ श्लोक मन में उतारें और अपने पूर्वजों को प्रेम से याद करें। भगवान श्रीकृष्ण आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

मोक्षदा एकादशी 2026 कब है?

मोक्षदा एकादशी 2026 का व्रत रविवार, 20 दिसंबर 2026 को है और पारण 21 दिसंबर की सुबह होगा (नई दिल्ली)। आने वाले वर्षों की तारीख और अपने शहर का पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

मोक्षदा एकादशी किस महीने में आती है?

मोक्षदा एकादशी मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। पूर्णिमांत और अमांत दोनों कैलेंडरों में इसका नाम मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी ही रहता है, और यह आमतौर पर नवंबर-दिसंबर में आती है।

इसे मोक्षदा एकादशी क्यों कहते हैं?

‘मोक्षदा’ का अर्थ है मोक्ष देने वाली। व्रत कथा के अनुसार राजा वैखानस ने यह व्रत करके इसका पुण्य अपने पिता को दिया, जिससे उनके पिता नरक से मुक्त हो गए, इसलिए इसे मोक्ष देने वाली एकादशी कहा जाता है।

मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती एक ही दिन क्यों होती हैं?

परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी के दिन ही कुरुक्षेत्र में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। इसलिए यह तिथि मोक्षदा एकादशी और गीता जयंती दोनों के रूप में मनाई जाती है।

मोक्षदा एकादशी की व्रत कथा क्या है?

कथा में चंपक नगर (कुछ ग्रंथों में गोकुल) के राजा वैखानस स्वप्न में अपने पिता को नरक में देखते हैं। पर्वत मुनि की सलाह पर वे परिवार सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य पिता को अर्पित करते हैं, जिससे पिता को मुक्ति मिलती है।

क्या मोक्षदा एकादशी ही वैकुंठ एकादशी है?

हमेशा नहीं। वैकुंठ एकादशी धनुर्मास (मार्गली) की शुक्ल एकादशी होती है; जब मोक्षदा एकादशी धनु संक्रांति के बाद पड़ती है तो दोनों एक ही दिन होती हैं (जैसे 2026 में), अन्यथा वैकुंठ एकादशी पौष पुत्रदा एकादशी के दिन आती है।

मोक्षदा एकादशी पर पितरों के लिए क्या करें?

व्रत रखें और द्वादशी को पारण से पहले हाथ में जल, तिल और तुलसी लेकर व्रत का पुण्य पितरों को समर्पित करने का संकल्प लें। साथ में अन्न, गरम कपड़े, गीता या दीप का दान कर सकते हैं।

मोक्षदा एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?

इस दिन श्रीमद्भगवद्गीता की प्रति, गरम कपड़े, कंबल, अन्न, तिल-गुड़ और दीपदान को शुभ माना जाता है। गौ सेवा और जरूरतमंदों को भोजन देना भी अच्छा माना गया है।

मोक्षदा एकादशी व्रत में क्या खाएँ?

फल, दूध, दही, पनीर, मेवे, साबूदाना, आलू, शकरकंद और कुट्टू या सिंघाड़े के आटे से बनी चीजें खा सकते हैं। नमक के लिए सेंधा नमक का उपयोग करें।

क्या एकादशी व्रत में चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल और चावल से बनी चीजें पूरी तरह वर्जित मानी जाती हैं। गेहूँ, दालें और अन्य अनाज भी व्रत में नहीं लिए जाते।

क्या मोक्षदा एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

हाँ, निर्जला व्रत को छोड़कर फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। निर्जला व्रत केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही रखें।

मोक्षदा एकादशी का पारण कब करें?

पारण द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले करें। आपके शहर का सटीक पारण समय इस पेज की तालिका में दिया है।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो दिनों में बँटती है, तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। 2026 में नई दिल्ली पंचांग के अनुसार दोनों का व्रत एक ही दिन है।

मोक्षदा एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

सबसे प्रचलित मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ है, जिसका 108 बार जप शुभ माना जाता है। गीता का श्लोक ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य…’ (18.66) और हरे कृष्ण महामंत्र भी इस दिन पढ़े जाते हैं।

मोक्षदा एकादशी पर गीता का कौन सा अध्याय पढ़ें?

संभव हो तो पूरी गीता पढ़ें। समय कम हो तो अध्याय 12 (भक्ति योग), 15 (पुरुषोत्तम योग) या 18 (मोक्ष संन्यास योग) पढ़ना विशेष माना जाता है।

क्या गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग या मधुमेह के रोगी यह व्रत रख सकते हैं?

ऐसी स्थिति में कठोर या निर्जला व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से हल्का फलाहार व्रत रख सकते हैं, दवाएँ समय पर लें, और जप-पाठ से भी श्रद्धा व्यक्त कर सकते हैं।

अगर गलती से मोक्षदा एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं, भगवान विष्णु से क्षमा माँगें और ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें। बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें और द्वादशी को सामान्य रूप से पारण करें।

क्या एकादशी पर तुलसी तोड़ सकते हैं?

नहीं, परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले दशमी को तोड़कर रख लें।

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