षटतिला एकादशी (Shattila Ekadashi) माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसमें भगवान विष्णु की पूजा के साथ तिल (Sesame) का छह तरह से प्रयोग करने की परंपरा है। “षट” यानी छह और “तिला” यानी तिल — इसीलिए इसका नाम षटतिला पड़ा। उत्तर भारत में इसे बोलचाल में तिल एकादशी या तिलदा एकादशी भी कहते हैं।
यह एकादशी कड़ाके की सर्दी के बीच, माघ स्नान और दान-पुण्य के मौसम में आती है। मकर संक्रांति के आसपास जिस तरह तिल-गुड़ का दान किया जाता है, उसी भाव को षटतिला एकादशी और आगे बढ़ाती है। परंपरा के अनुसार इस दिन व्रत के साथ अन्न और तिल का दान न किया जाए, तो व्रत अधूरा माना जाता है।
नीचे आपको तारीख और पारण समय, ब्राह्मणी की व्रत कथा, तिल के छह प्रयोग, तिल दान, माघ मास का संदर्भ, पूजा विधि, मंत्र और खान-पान के नियम सरल भाषा में मिलेंगे।
षटतिला एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: 2026 की षटतिला एकादशी 14 जनवरी 2026 को बीत चुकी है। अगली षटतिला एकादशी का व्रत मंगलवार, 2 फरवरी 2027 को रखा जाएगा। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 1 फरवरी सुबह 8:41 बजे शुरू होकर 2 फरवरी सुबह 11:10 बजे समाप्त होगी, और पारण 3 फरवरी 2027 को सुबह 7:08 से 9:19 बजे के बीच किया जा सकता है।
अगली षटतिला एकादशी
षटतिला एकादशी 2027
2 फ़रवरी 2027, मंगलवार 93 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- माघ कृष्ण
- एकादशी तिथि
- 1 फ़र 08:43 – 2 फ़र 11:12
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 3 फ़र, 07:08 – 09:19
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 14 जनवरी 2026, बुधवार | 13 जन 15:20 – 14 जन 17:55 | 15 जन, 07:14 – 09:21 |
| 2027 | 2 फ़रवरी 2027, मंगलवार | 1 फ़र 08:43 – 2 फ़र 11:12 | 3 फ़र, 07:08 – 09:19 |
| 2028 | 22 जनवरी 2028, शनिवार | 21 जन 12:18 – 22 जन 13:06 | 23 जन, 07:13 – 09:21 |
| 2029 | 10 जनवरी 2029, बुधवार | 10 जन 02:21 – 11 जन 00:57 | 11 जन, 07:15 – 09:20 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें।
स्मार्त और वैष्णव: जब एकादशी तिथि दो दिनों में बँटती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) प्रायः पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। 2027 में भारत में दोनों परंपराओं का व्रत 2 फरवरी को ही है; केवल वैष्णव पारण की समय-सीमा थोड़ी लंबी बताई गई है। विदेश में रहने वाले भक्त अपने शहर की तालिका अवश्य देखें।
षटतिला एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“षटतिला” शब्द “षट्” (छह) और “तिल” से बना है। इसका अर्थ है वह एकादशी जिसमें तिल का छह प्रकार से उपयोग किया जाए — स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान। व्रत कथा भी यही सिखाती है कि केवल उपवास नहीं, बल्कि तिल और अन्न का दान इस व्रत का प्राण है।
षटतिला एकादशी के अन्य नाम
- षट्तिला एकादशी — संस्कृत वर्तनी, जिसे कई पंचांग इसी रूप में लिखते हैं।
- तिल एकादशी / तिलदा एकादशी — बोलचाल का नाम, तिल के प्रयोग और दान के कारण।
- माघ कृष्ण एकादशी — उत्तर भारत (पूर्णिमांत कैलेंडर) में तिथि के आधार पर नाम।
- पौष कृष्ण एकादशी — दक्षिण और पश्चिम भारत (अमांत कैलेंडर) में यही तिथि पौष मास में गिनी जाती है।
- सत-तिला एकादशी (Sat Tila Ekadashi) — इस्कॉन और वैष्णव कैलेंडरों में प्रचलित अंग्रेज़ी वर्तनी।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर चलता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। वहाँ पौष पूर्णिमा के बाद माघ मास शुरू हो जाता है, इसलिए षटतिला एकादशी माघ कृष्ण एकादशी कहलाती है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत में अमांत कैलेंडर चलता है, जहाँ यही तिथि पौष कृष्ण एकादशी मानी जाती है।
ध्यान दें — केवल महीने का नाम बदलता है, दिन वही रहता है। पूरे देश में षटतिला एकादशी एक ही दिन मनाई जाती है। यह आमतौर पर जनवरी के मध्य से फरवरी की शुरुआत के बीच आती है। इससे पहले पौष शुक्ल पक्ष की पौष पुत्रदा एकादशी आती है, और इसके बाद माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी।
षटतिला एकादशी का महत्व
वर्ष की चौबीस एकादशियों में हर एक का अपना संदेश है। षटतिला एकादशी का संदेश है — तपस्या के साथ उदारता। इसकी कथा उस भक्त की है जिसने कठोर व्रत तो किए, पर किसी भूखे को अन्न नहीं दिया। इसलिए यह एकादशी दान, विशेषकर तिल और अन्न के दान, को व्रत का अनिवार्य अंग बनाती है।
धार्मिक महत्व
परंपरा के अनुसार माघ मास स्वयं पुण्य का महीना है। इस महीने में सूर्योदय से पहले नदी स्नान, विष्णु पूजा और दान का विशेष फल बताया गया है। माघ की पहली एकादशी होने के कारण षटतिला एकादशी इस पूरे महीने की साधना का एक मुख्य पड़ाव मानी जाती है।
तिल को शास्त्रों में पवित्र और पापनाशक माना गया है। पितृ कर्म, हवन और देव पूजा — तीनों में तिल का उपयोग होता है। मान्यता है कि षटतिला एकादशी पर तिल का छह प्रकार से प्रयोग करने से जाने-अनजाने हुए पापों का क्षय होता है और घर में अन्न-धन की कमी नहीं रहती।
आध्यात्मिक संदेश
षटतिला एकादशी की कथा बहुत सीधी बात कहती है — केवल अपने लिए किया गया तप अधूरा है। ब्राह्मणी ने महीने भर उपवास किया, शरीर तक दुर्बल कर लिया, फिर भी भिक्षा माँगने आए अतिथि को मिट्टी का ढेला दे दिया। परलोक में उसे भी वही मिला जो उसने दिया था — एक खाली घर।
इसका आध्यात्मिक अर्थ है कि भक्ति का फल केवल पूजा की विधि से नहीं, बल्कि हृदय की करुणा से तय होता है। तिल का दाना छोटा होता है, पर कथा कहती है कि श्रद्धा से दिया गया एक-एक तिल भी बड़ा पुण्य बनता है। यानी दान की कीमत वस्तु के आकार से नहीं, भाव से होती है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार षटतिला एकादशी का माहात्म्य पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण के एकादशी माहात्म्य प्रसंगों से जोड़ा जाता है। प्रचलित रूप में यह कथा भगवान श्रीकृष्ण सुनाते हैं, जिसके भीतर पुलस्त्य ऋषि दाल्भ्य ऋषि को यह व्रत बताते हैं, और उसी में भगवान विष्णु नारद जी को ब्राह्मणी की कथा सुनाते हैं।
कुछ ग्रंथ-रूपों में श्रीकृष्ण यह कथा युधिष्ठिर को सुनाते हैं, तो कुछ में अर्जुन को। मूल कथा और उसका संदेश सभी रूपों में एक ही है।
षटतिला एकादशी व्रत कथा
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा — “हे केशव! माघ मास के कृष्ण पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है, उसका क्या नाम है और उसका व्रत कैसे किया जाता है?” श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन! इस एकादशी का नाम षटतिला है। इसके विषय में मैं तुम्हें वह प्रसंग सुनाता हूँ जो पुलस्त्य ऋषि ने दाल्भ्य ऋषि को सुनाया था।”
एक समय दाल्भ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा — “हे मुनिवर! मनुष्य क्रोध, लोभ या अज्ञान में ब्रह्महत्या, चोरी और दूसरों की उन्नति से जलन जैसे बड़े पाप कर बैठता है, फिर पछताता है। ऐसे व्यक्ति को नरक से बचाने वाला कौन-सा उपाय है? कौन-सा दान या पुण्य उसे पापों से मुक्त कर सकता है?”
पुलस्त्य ऋषि बोले — “हे दाल्भ्य! तुमने बहुत गूढ़ प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें वह रहस्य बताता हूँ जो बहुत कम लोग जानते हैं। माघ मास में मनुष्य को प्रतिदिन स्नान करके पवित्र रहना चाहिए, इंद्रियों को वश में रखना चाहिए और काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या तथा अहंकार का त्याग करना चाहिए।”
उन्होंने आगे विधि बताई — “पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास और तिल मिलाकर उनके पिंड (कंडे) बनाए जाएँ और उनसे 108 आहुतियाँ दी जाएँ। माघ कृष्ण एकादशी को व्रत का संकल्प लेकर भगवान श्रीहरि की पूजा, कीर्तन और रात्रि जागरण किया जाए। अगले दिन धूप, दीप और नैवेद्य से भगवान की पूजा करके खिचड़ी का भोग लगाया जाए, अर्घ्य दिया जाए और ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा, तिल और यथाशक्ति गौ का दान किया जाए।”
पुलस्त्य ऋषि ने कहा — “जितने तिल दान किए जाते हैं, उतने ही हज़ार वर्षों तक दाता स्वर्ग में निवास करता है, ऐसी मान्यता है। इस दिन तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल मिला जल, तिल का भोजन और तिल का दान — इन छह प्रकार से तिल का प्रयोग करने से बहुत से पाप नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण इसे षटतिला एकादशी कहते हैं।”
ब्राह्मणी और भगवान की कथा
फिर पुलस्त्य ऋषि ने वह कथा सुनाई जो स्वयं भगवान विष्णु ने देवर्षि नारद को सुनाई थी। एक बार नारद जी वैकुंठ पहुँचे और भगवान से षटतिला एकादशी के पुण्य और उसकी उत्पत्ति के बारे में पूछा। भगवान बोले — “हे नारद! मैं तुम्हें वह घटना सुनाता हूँ जो मैंने स्वयं अपनी आँखों से देखी है।”
प्राचीन काल में मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। कई कथाओं में उसे विधवा बताया गया है। वह बहुत बुद्धिमान थी और सदा व्रत-उपवास में लगी रहती थी। मेरी भक्ति में उसकी गहरी निष्ठा थी। एक बार उसने पूरे एक महीने तक लगातार उपवास किया, जिससे उसका शरीर अत्यंत दुर्बल हो गया।
पर उसमें एक कमी थी। उसने कभी किसी देवता, ब्राह्मण या भूखे व्यक्ति को अन्न या धन का दान नहीं किया था। भगवान ने सोचा — “इस ब्राह्मणी ने व्रत करके अपना शरीर तो शुद्ध कर लिया है और इसे मेरे लोक में स्थान भी मिलेगा, पर इसने कभी अन्नदान नहीं किया। बिना अन्नदान के इसकी तृप्ति कैसे होगी?”
यह सोचकर भगवान एक दरिद्र भिक्षुक का वेश बनाकर उसके द्वार पर गए और भिक्षा माँगी। ब्राह्मणी ने भिक्षुक को पहचाना नहीं। उसने पूछा — “तुम किसलिए आए हो?” भिक्षुक ने कहा — “मुझे भिक्षा चाहिए।” ब्राह्मणी ने अन्न देने के बजाय उसके भिक्षापात्र में मिट्टी का एक पिंड (ढेला) डाल दिया। भगवान वह मिट्टी का ढेला लेकर चुपचाप अपने लोक लौट आए।
समय बीता और ब्राह्मणी ने शरीर त्याग दिया। अपने व्रत और तप के पुण्य से वह स्वर्ग लोक पहुँची। वहाँ उसे एक सुंदर घर (कई कथाओं में कुटिया) और एक आम का पेड़ मिला। पर जब उसने घर के भीतर देखा तो वह बिल्कुल खाली था — न अन्न, न वस्त्र, न कोई और सामग्री। मिट्टी के ढेले के कारण उसे घर तो मिला, पर उसमें कुछ भी नहीं था।
दुखी होकर वह भगवान के पास गई और बोली — “हे प्रभु! मैंने इतने व्रत और उपवास किए, सदा आपकी पूजा की, फिर भी मेरा घर खाली क्यों है?” भगवान ने कहा — “तुमने व्रत तो बहुत किए, पर कभी अन्नदान नहीं किया। जब मैं भिक्षुक बनकर तुम्हारे द्वार पर आया था, तब तुमने मुझे मिट्टी का ढेला दिया था। इसीलिए तुम्हें यह खाली घर मिला है।”
ब्राह्मणी ने हाथ जोड़कर उपाय पूछा। भगवान बोले — “अपने घर लौट जाओ। कुछ समय बाद देव-स्त्रियाँ (देवकन्याएँ) तुमसे मिलने आएँगी। जब तक वे तुम्हें षटतिला एकादशी का माहात्म्य और उसकी विधि न बता दें, तब तक द्वार मत खोलना।”
ब्राह्मणी ने वैसा ही किया। देव-स्त्रियाँ आईं और द्वार खोलने को कहा। ब्राह्मणी ने कहा — “यदि आप मुझसे मिलना चाहती हैं, तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुनाइए।” तब उनमें से एक देवी ने उसे इस व्रत की पूरी विधि और महिमा विस्तार से बताई। विधि सुनने के बाद ही ब्राह्मणी ने द्वार खोला।
फिर ब्राह्मणी ने पूरी श्रद्धा से षटतिला एकादशी का व्रत किया, तिल का प्रयोग किया और तिल व अन्न का दान किया। व्रत के प्रभाव से वह रूपवती हो गई और उसका घर अन्न, धन और सभी आवश्यक वस्तुओं से भर गया।
कथा के अंत में भगवान कहते हैं कि मनुष्य को लोभ और अज्ञान छोड़कर षटतिला एकादशी का व्रत करना चाहिए और तिल व अन्न का दान करना चाहिए। परंपरा के अनुसार इससे दरिद्रता, कष्ट और दुर्भाग्य दूर होते हैं और पापों का क्षय होता है।
कथा से मिलने वाली सीख
- तप के साथ दान: केवल उपवास और पूजा पर्याप्त नहीं, जरूरतमंद को अन्न देना भी उतना ही जरूरी है।
- हर अतिथि में भगवान: द्वार पर आया भिक्षुक भी भगवान का रूप हो सकता है, इसलिए किसी का अपमान न करें।
- जैसा देंगे, वैसा पाएँगे: ब्राह्मणी ने मिट्टी दी तो उसे खाली घर मिला — यह कर्म और उसके फल का सीधा संकेत है।
- गलती सुधारने का अवसर: भगवान ने उसे दंड नहीं दिया, बल्कि सुधार का रास्ता बताया। एकादशी व्रत यही अवसर देता है।
षटतिला एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
यह विधि सामान्य गृहस्थ परंपरा पर आधारित है। आपके परिवार की परंपरा अलग हो तो उसी का पालन करें।
- दशमी की तैयारी: दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन करें और रात में अन्न न लें। लहसुन, प्याज, मांस-मदिरा से दूर रहें। अगले दिन के लिए काले या सफेद तिल, तिल का तेल, गुड़ और दान की सामग्री पहले से तैयार रख लें।
- प्रातः तिल स्नान: एकादशी को सूर्योदय से पहले उठें। नहाने के पानी में थोड़े तिल डालें। स्नान से पहले तिल के उबटन (तिल पीसकर, थोड़ा हल्दी या बेसन मिलाकर) से शरीर पर मालिश कर सकते हैं। संभव हो तो किसी पवित्र नदी में माघ स्नान करें।
- संकल्प: स्वच्छ वस्त्र पहनकर पूजा स्थान पर बैठें। हाथ में जल, अक्षत, तिल और फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और तिथि बोलते हुए संकल्प लें — “मैं भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए षटतिला एकादशी का व्रत रखता/रखती हूँ और यथाशक्ति तिल व अन्न का दान करूँगा/करूँगी।”
- पूजा स्थापना: चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। गंगाजल छिड़ककर स्थान शुद्ध करें और घी का दीपक जलाएँ। चाहें तो तिल के तेल का दीपक भी जला सकते हैं।
- षोडशोपचार या पंचोपचार पूजा: भगवान को गंगाजल से स्नान कराएँ, पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें। तिल और गुड़ से बने लड्डू या तिल मिली खीर का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी पत्ता अवश्य रखें।
- मंत्र जप और कथा: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की कम से कम एक माला जपें। फिर षटतिला एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जा सकता है।
- तिल हवन: घर में हवन की सुविधा हो तो गाय के घी में तिल मिलाकर “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा” बोलते हुए 108 या 28 आहुतियाँ दें। हवन संभव न हो तो दीपक के सामने तिल अर्पित कर देना भी परंपरा में स्वीकार्य माना जाता है।
- आरती: पूजा के अंत में ओम जय जगदीश हरे और एकादशी माता की आरती करें। भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।
- दिन में दान: तिल, गुड़, अन्न, कंबल या गर्म कपड़े किसी जरूरतमंद, ब्राह्मण या मंदिर में दान करें। कथा का मूल संदेश यही है, इसलिए दान को व्रत का अनिवार्य हिस्सा मानें।
- संध्या पूजा: शाम को फिर से दीपक जलाएँ, तुलसी के पास दीप रखें (तुलसी को जल न दें और पत्ते न तोड़ें) और भगवान का भजन-कीर्तन करें।
- रात्रि जागरण: कथा में रात्रि जागरण का उल्लेख है। पूरी रात जागना संभव न हो तो देर रात तक भजन, नाम जप या गीता पाठ करके सोएँ।
- द्वादशी और पारण: द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें, किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन और तिल का दान दें, फिर शुभ समय में तिल या तुलसी मिले जल से पारण करें। समय ऊपर की तालिका में देखें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा या चित्र
- चौकी और पीला वस्त्र
- काले और सफेद तिल (पूजा, हवन और दान के लिए अलग-अलग)
- तिल का तेल और गाय का घी
- गंगाजल और ताँबे या पीतल का लोटा
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
- पीला चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत
- पीले फूल और फूलों की माला
- धूप, अगरबत्ती, कपूर और दीपक
- तिल-गुड़ के लड्डू, फल, पंचामृत और मिश्री
- हवन कुंड, आम की लकड़ी या गोबर के कंडे और हवन सामग्री
- जल से भरा मिट्टी का घड़ा (दान के लिए)
- दान की सामग्री — अन्न, तिल, गुड़, कंबल, गर्म कपड़े, जूते-चप्पल आदि यथाशक्ति
षटतिला एकादशी के मंत्र
अपनी सुविधा के अनुसार नीचे दिए किसी एक या अधिक मंत्र का श्रद्धा से जप करें।
1. द्वादशाक्षर वासुदेव मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अर्थ: मैं सर्वव्यापी भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु) को नमन करता हूँ। यह एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाने वाला मंत्र है। इसे 108 बार (एक माला) जपना शुभ माना जाता है।
2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र
ॐ नमो नारायणाय।
अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। यह सरल मंत्र दिन भर चलते-फिरते भी मन में जपा जा सकता है।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम नारायण को जानें, वासुदेव का ध्यान करें; वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें।
4. विष्णु ध्यान श्लोक
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं — उन संसार के भय को हरने वाले लक्ष्मीपति भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। पूजा आरंभ करते समय इसे पढ़ा जाता है।
5. तिल हवन के लिए आहुति मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा।
अर्थ: भगवान वासुदेव को यह आहुति समर्पित है। घी मिले तिल की आहुति देते समय यह मंत्र बोला जाता है। परिवार की परंपरा में कोई और हवन मंत्र हो, तो उसका प्रयोग करें।
तिल के छह प्रयोग: षटतिला एकादशी का मूल नियम
षटतिला एकादशी की पहचान तिल के छह प्रयोग हैं — स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान। ये घर पर आसानी से किए जा सकते हैं।
1. तिल स्नान
सुबह नहाने के पानी में एक चुटकी या एक चम्मच तिल डालें। स्नान करते समय भगवान विष्णु का स्मरण करें। माघ मास में नदी स्नान का विशेष महत्व है, पर घर पर तिल मिले जल से स्नान करना भी परंपरा में मान्य है।
2. तिल उबटन
थोड़े तिल पीसकर उसमें हल्दी, बेसन या दूध मिलाकर उबटन बनाएँ और स्नान से पहले शरीर पर लगाएँ। चाहें तो केवल तिल के तेल से मालिश कर सकते हैं। जिनकी त्वचा संवेदनशील हो, वे पहले थोड़ी जगह पर लगाकर देख लें।
3. तिल हवन
गाय के घी में काले तिल मिलाकर हवन में आहुति दें। कथा में गोबर, कपास और तिल से बने कंडों से 108 आहुतियों का वर्णन है। घर पर छोटा हवन संभव न हो तो मंदिर के हवन में तिल अर्पित करें या दीपक के सामने तिल चढ़ा दें।
4. तिल तर्पण
लोटे के जल में काले तिल मिलाकर पितरों का स्मरण करते हुए जल अर्पित करें। औपचारिक तर्पण की विधि अलग-अलग परिवारों में अलग होती है, इसलिए अपने कुल की परंपरा या पुरोहित की सलाह मानें। कुछ ग्रंथ-रूपों में तर्पण के स्थान पर “तिल मिला जल पीना” (तिलोदक) छठे प्रयोग के रूप में गिना गया है।
5. तिल भोजन
व्रत में फलाहार करते हों तो तिल-गुड़ के लड्डू, तिल की चिक्की या तिल मिली खीर ले सकते हैं। ध्यान रखें कि इनमें अन्न (गेहूँ का आटा, सूजी आदि) न मिला हो। निर्जला व्रत करने वाले पारण के समय तिल का प्रसाद ग्रहण करते हैं।
6. तिल दान
छठा प्रयोग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है — तिल का दान। काले तिल, तिल के लड्डू, तिल से भरा पात्र या तिल के साथ अन्न का दान करें। इसके बारे में विस्तार से नीचे पढ़ें।
षटतिला एकादशी पर तिल दान का महत्व
षटतिला एकादशी की पूरी कथा दान के इर्द-गिर्द घूमती है। ब्राह्मणी के पास तप था, भक्ति थी, पर दान नहीं था — इसलिए उसका स्वर्ग का घर भी खाली रहा। यही कारण है कि इस एकादशी पर तिल और अन्न दान को व्रत का अनिवार्य अंग माना गया है।
परंपरा में तिल को “पवित्र अन्न” माना गया है। पुलस्त्य ऋषि के कथन के अनुसार जितने तिल दान किए जाते हैं, उतने हज़ार वर्षों तक स्वर्ग में निवास का फल मिलता है — यह बात दान की महिमा बताने के लिए कही गई है। इसका सरल अर्थ है कि श्रद्धा से दिया गया छोटा दान भी बड़ा पुण्य बनता है।
षटतिला एकादशी पर क्या दान करें
- काले तिल: किसी पात्र में भरकर, या तिल के लड्डू बनाकर।
- अन्न: गेहूँ, चावल, दाल या आटा — भले ही आप स्वयं व्रत में अन्न न खाएँ, दान अन्न का ही करें। कथा का मूल यही है।
- जल से भरा घड़ा: कथा में ब्राह्मण को जलपूर्ण घड़ा दान करने का उल्लेख है।
- गर्म कपड़े और कंबल: माघ की ठंड में जरूरतमंदों के लिए यह सबसे उपयोगी दान है।
- गुड़ और घी: तिल के साथ गुड़ और घी का दान भी परंपरा में शुभ माना जाता है।
- गौ सेवा: कथा में गौ दान का उल्लेख है। आज के समय में गौशाला में चारा या सेवा का दान इसका व्यावहारिक रूप है।
माघ मास और मकर संक्रांति से षटतिला एकादशी का संबंध
षटतिला एकादशी माघ मास (पूर्णिमांत) की पहली एकादशी है। माघ का महीना स्नान, दान और तप के लिए प्रसिद्ध है। प्रयागराज के संगम पर इसी महीने में माघ मेला लगता है, जहाँ श्रद्धालु महीने भर कल्पवास करते हैं और रोज़ स्नान-ध्यान करते हैं।
मकर संक्रांति और तिल
मकर संक्रांति पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इस पर्व पर पूरे देश में तिल-गुड़ खाने और खिचड़ी व तिल का दान करने की परंपरा है; महाराष्ट्र में “तिळगूळ घ्या, गोड गोड बोला” कहा जाता है।
षटतिला एकादशी प्रायः मकर संक्रांति के आसपास ही आती है — कभी उसी दिन, कभी कुछ दिन पहले या बाद में। उदाहरण के लिए, 2026 में दोनों पर्व 14 जनवरी को एक साथ पड़े थे। इसलिए यह एकादशी संक्रांति के तिल-दान की परंपरा को आगे बढ़ाती है, और कई परिवार दोनों अवसरों पर एक साथ तिल का दान करते हैं।
माघ मास में षटतिला एकादशी का स्थान
- माघ स्नान: सूर्योदय से पहले नदी या घर पर तिल मिले जल से स्नान इस पूरे महीने का नियम है।
- मौनी अमावस्या: षटतिला एकादशी के कुछ ही दिन बाद माघ की अमावस्या (मौनी अमावस्या) आती है, जिस दिन मौन रखकर स्नान-दान किया जाता है।
- तिल द्वादशी: कई परंपराओं में षटतिला एकादशी के अगले दिन की द्वादशी को तिल द्वादशी कहा जाता है, जिस दिन भी तिल का दान किया जाता है।
- जया एकादशी: माघ के शुक्ल पक्ष में आगे जया एकादशी आती है, जो इस महीने की दूसरी एकादशी है।
षटतिला एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
एकादशी के व्रत में अन्न (चावल, गेहूँ, दालें) का त्याग मुख्य नियम है। षटतिला एकादशी में तिल का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है, पर ध्यान रखें कि तिल के व्यंजन में अनाज न मिला हो।
क्या खा सकते हैं
- तिल-गुड़ के लड्डू, तिल की चिक्की (बिना आटे या सूजी के)
- मौसमी फल — केला, सेब, अमरूद, संतरा, पपीता
- दूध, दही, मक्खन, पनीर और छाछ
- साबूदाना की खिचड़ी या खीर
- कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा (जिन परिवारों में मान्य हो)
- उबले आलू, शकरकंद, अरबी
- मूँगफली, मखाना, बादाम, काजू, किशमिश
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी चीज़ें
- गेहूँ, जौ, मक्का और सभी दालें
- सादा (आयोडीन युक्त) नमक — इसकी जगह सेंधा नमक लें
- प्याज, लहसुन, मांस, अंडा और मदिरा
- बैंगन, मसूर और तामसिक भोजन (कई परंपराओं में वर्जित)
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन रूप है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे करें। माघ की ठंड में शरीर को गर्मी और ऊर्जा की जरूरत होती है, इसलिए अपनी क्षमता को समझकर ही यह व्रत चुनें।
फलाहार व्रत
यह सबसे प्रचलित तरीका है। इसमें दिन में फल, दूध, तिल-गुड़ और व्रत के व्यंजन एक या दो बार लिए जाते हैं। षटतिला एकादशी पर फलाहार में तिल के लड्डू शामिल करना “तिल भोजन” के नियम को भी पूरा करता है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरा दिन उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार व्रत का सात्विक भोजन (बिना अन्न) ले सकते हैं। वृद्ध, बीमार या कमज़ोर लोगों के लिए यह व्यावहारिक विकल्प है।
स्वास्थ्य सावधानी: मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप, गर्भावस्था, स्तनपान, किडनी रोग या नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह अवश्य लें। ऐसी स्थिति में फलाहार या एक समय भोजन भी पूरी श्रद्धा से किया गया व्रत ही है। दवा समय पर लें — परंपरा में रोगी, वृद्ध और बच्चों को नियमों में छूट दी गई है।
षटतिला एकादशी पारण कब और कैसे करें
पारण का अर्थ है व्रत खोलना। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन यानी द्वादशी को सूर्योदय के बाद किया जाता है। सही समय पर पारण करना व्रत जितना ही आवश्यक माना गया है।
पारण के नियम
- द्वादशी में पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना दोषपूर्ण माना जाता है।
- हरिवासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग “हरिवासर” कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरिवासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलें।
- प्रातःकाल सबसे अच्छा: पारण के लिए सुबह का समय श्रेष्ठ माना गया है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचना चाहिए; किसी कारण सुबह न हो पाए तो मध्याह्न के बाद करें।
- स्मार्त और वैष्णव: दोनों की पारण समय-सीमा अलग हो सकती है; इस्कॉन पंचांग में यह अवधि प्रायः लंबी होती है।
- शहर के अनुसार समय: सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पारण का सही समय इस पेज पर ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के लिए देखें।
पारण कैसे करें
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
- किसी ब्राह्मण, जरूरतमंद या गाय को भोजन कराएँ और तिल का दान करें।
- सबसे पहले तुलसी दल या तिल मिला जल ग्रहण करें, फिर तिल-गुड़ का प्रसाद लें।
- इसके बाद सात्विक भोजन करें। चाहें तो कथा में बताए अनुसार खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाएँ और उसी से पारण करें।
षटतिला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- सुबह तिल मिले जल से स्नान करें और तिल का उबटन लगाएँ।
- भगवान विष्णु को तिल, तुलसी और पीले फूल अर्पित करें।
- तिल-गुड़ के लड्डू का भोग लगाएँ।
- व्रत कथा पढ़ें या सुनें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
- अपनी क्षमता के अनुसार तिल, अन्न, कंबल और गर्म कपड़े दान करें।
- पितरों का स्मरण करते हुए तिल मिला जल अर्पित करें।
- द्वार पर आए किसी भी अतिथि या भिक्षुक का सम्मान करें।
- अगले दिन सही समय पर पारण करें।
क्या न करें
- चावल, गेहूँ और दालें न खाएँ।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
- किसी भिक्षुक या जरूरतमंद को खाली हाथ या अपमानित करके न लौटाएँ — यही कथा की मुख्य सीख है।
- क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें।
- दिन में सोने से बचें, खासकर यदि रात्रि जागरण का संकल्प लिया हो।
- मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज का सेवन न करें।
- स्वास्थ्य खराब होने पर ज़बरदस्ती कठोर व्रत न रखें।
षटतिला एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: षटतिला एकादशी पर तिल का दान करने से निश्चित रूप से धन मिलता है।
सच्चाई: परंपरा तिल दान को समृद्धि और पुण्य से जोड़ती है, पर कोई भी धार्मिक कर्म किसी परिणाम की गारंटी नहीं है। कथा का असली संदेश “दान करो तो धन मिलेगा” नहीं, बल्कि “उदार बनो, क्योंकि करुणा के बिना भक्ति अधूरी है” है।
मिथक: तिल का प्रयोग केवल पितृ कर्म में होता है, इसलिए एकादशी पर तिल अशुभ है।
सच्चाई: तिल का उपयोग पितृ कर्म में होता है, पर देव पूजा, हवन और त्योहारों (जैसे मकर संक्रांति) में भी तिल पवित्र माना गया है। षटतिला एकादशी का तो नाम ही तिल पर है, इसलिए इस दिन तिल का प्रयोग पूरी तरह परंपरा के अनुसार है।
मिथक: बिना तिल के षटतिला एकादशी का व्रत बेकार है।
सच्चाई: तिल के छह प्रयोग इस एकादशी की विशेषता हैं, पर किसी को तिल से एलर्जी हो या तिल उपलब्ध न हो, तो श्रद्धा से किया गया व्रत, जप और अन्नदान भी पूरा व्रत माना जाता है। एकादशी का मूल भाव भक्ति और संयम है।
मिथक: व्रत जितना कठोर (निर्जला) होगा, पुण्य उतना अधिक होगा।
सच्चाई: शास्त्रों में अपनी शक्ति के अनुसार व्रत करने की बात कही गई है। मधुमेह, गर्भावस्था, वृद्धावस्था या दवाओं की स्थिति में डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन करना भी पूर्ण व्रत है। स्वयं को कष्ट देना भक्ति की शर्त नहीं है।
मिथक: व्रत रखने वाला ही दान करे, तभी पुण्य मिलता है।
सच्चाई: जो लोग स्वास्थ्य या किसी कारण से व्रत नहीं रख पाते, वे भी इस दिन तिल और अन्न का दान, विष्णु पूजा और कथा श्रवण कर सकते हैं। कथा में ब्राह्मणी की कमी व्रत की नहीं, दान की थी — इसलिए दान अपने आप में मूल्यवान है।
मिथक: अगर गलती से व्रत टूट जाए तो भारी पाप लगता है।
सच्चाई: अनजाने में कुछ खा लेना या बीमारी के कारण व्रत तोड़ना पाप नहीं माना जाता। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें, थोड़ा दान करें और अगली एकादशी पर फिर से व्रत रखें। भय नहीं, भाव महत्वपूर्ण है।
षटतिला एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं और परंपरा पर आधारित हैं। इनका अनुभव हर व्यक्ति की श्रद्धा, आचरण और भाव पर निर्भर माना जाता है।
- पापों का क्षय: परंपरा के अनुसार तिल के छह प्रयोग और व्रत से जाने-अनजाने हुए पापों का प्रायश्चित होता है।
- दरिद्रता से मुक्ति की कामना: कथा में ब्राह्मणी का खाली घर अन्न-धन से भर गया, इसलिए इस व्रत को समृद्धि की कामना से जोड़ा जाता है।
- अन्न की कभी कमी न हो: अन्नदान करने वाले भक्त मानते हैं कि उनके घर में भी अन्नपूर्णा का वास बना रहता है।
- पितरों की तृप्ति: तिल तर्पण से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है और उनकी शांति की कामना की जाती है।
- स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना: कथा के फलश्रुति भाग में व्रत करने वाले को रोग से मुक्ति का फल बताया गया है — यह धार्मिक मान्यता है, चिकित्सा का विकल्प नहीं।
- करुणा और उदारता: दान की आदत मन से लोभ कम करती है और दूसरों के प्रति संवेदना बढ़ाती है — यह इस व्रत का सबसे प्रत्यक्ष लाभ है।
- विष्णु कृपा: भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई भक्ति और दान से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
संबंधित एकादशी और पाठ
षटतिला एकादशी से ठीक पहले पौष शुक्ल पक्ष की पौष पुत्रदा एकादशी आती है, जिसका व्रत संतान सुख की कामना से रखा जाता है। षटतिला के बाद माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी आती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए दैनिक पंचांग देखें, और सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड करें।
षटतिला एकादशी हमें याद दिलाती है कि भगवान तक पहुँचने का रास्ता केवल उपवास से नहीं, बल्कि दूसरों की भूख मिटाने से भी होकर जाता है। इस माघ की ठंड में किसी जरूरतमंद को एक मुट्ठी तिल, थोड़ा अन्न या एक कंबल दें, और उस दान को प्रभु के चरणों में अर्पित कर दें। भगवान श्रीहरि आपके घर को अन्न, धन और शांति से भरा रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
षटतिला एकादशी 2027 कब है?
षटतिला एकादशी का अगला व्रत मंगलवार, 2 फरवरी 2027 को है और पारण 3 फरवरी की सुबह होगा (नई दिल्ली में लगभग 7:08 से 9:19 बजे)। आगे के वर्षों की तारीख और अपने शहर का पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।
2026 में षटतिला एकादशी कब थी?
2026 में षटतिला एकादशी 14 जनवरी को थी, उसी दिन मकर संक्रांति भी थी। अब अगला व्रत 2027 में है।
षटतिला एकादशी किस महीने में आती है?
उत्तर भारत के पूर्णिमांत कैलेंडर में यह माघ कृष्ण एकादशी है और दक्षिण-पश्चिम भारत के अमांत कैलेंडर में पौष कृष्ण एकादशी। दोनों जगह दिन एक ही होता है, आमतौर पर जनवरी-फरवरी में।
इसे षटतिला एकादशी क्यों कहते हैं?
‘षट्’ का अर्थ छह और ‘तिल’ का अर्थ तिल है। इस दिन तिल का छह प्रकार से प्रयोग किया जाता है — स्नान, उबटन, हवन, तर्पण, भोजन और दान — इसलिए यह नाम पड़ा।
तिल के छह प्रयोग कौन-से हैं?
तिल मिले जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल मिले जल से तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान। कुछ ग्रंथ-रूपों में तर्पण की जगह तिल मिला जल पीना गिना जाता है।
षटतिला एकादशी की व्रत कथा क्या है?
एक ब्राह्मणी बहुत व्रत करती थी पर कभी अन्नदान नहीं करती थी। भगवान भिक्षुक बनकर आए तो उसने मिट्टी का ढेला दे दिया, इसलिए स्वर्ग में उसे खाली घर मिला। देव-स्त्रियों से षटतिला व्रत की विधि जानकर व्रत और तिल-अन्न दान करने पर उसका घर भर गया।
षटतिला एकादशी पर क्या दान करें?
काले तिल, तिल के लड्डू, अन्न, गुड़, घी, जल से भरा घड़ा, कंबल और गर्म कपड़े दान करना शुभ माना जाता है। दान अपनी क्षमता के अनुसार और सम्मान के साथ करें।
क्या षटतिला एकादशी पर तिल खा सकते हैं?
हाँ, तिल भोजन इस दिन के छह प्रयोगों में से एक है। फलाहार में तिल-गुड़ के लड्डू या चिक्की ले सकते हैं, बस उनमें आटा या सूजी जैसा अनाज न हो।
षटतिला एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, मखाना, मूँगफली और सेंधा नमक लिया जा सकता है। तिल-गुड़ के व्यंजन इस एकादशी में विशेष रूप से लिए जाते हैं।
क्या एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी व्रत में चावल और सभी अनाज व दालें वर्जित हैं। जो व्रत नहीं रख रहे, वे भी परंपरा के अनुसार इस दिन चावल से परहेज़ करते हैं।
क्या षटतिला एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?
हाँ, निर्जला व्रत को छोड़कर फलाहार या एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। निर्जला व्रत केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही रखें।
षटतिला एकादशी का पारण कब और कैसे करें?
पारण द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरिवासर समाप्त होने पर और द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले करें। पहले भगवान की पूजा और दान करें, फिर तुलसी या तिल मिले जल से व्रत खोलें; अपने शहर का समय तालिका में देखें।
स्मार्त और वैष्णव षटतिला एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी दो दिन में बँटती है तो स्मार्त (गृहस्थ) प्रायः पहले दिन और वैष्णव (इस्कॉन आदि) अगले दिन व्रत रखते हैं। 2027 में भारत में दोनों का व्रत एक ही दिन है।
षटतिला एकादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?
‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ सबसे प्रचलित मंत्र है। ‘ॐ नमो नारायणाय’ और विष्णु गायत्री का जप भी किया जाता है, और तिल हवन में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय स्वाहा’ बोला जाता है।
षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति का क्या संबंध है?
दोनों पर्वों में तिल का दान और सेवन प्रमुख है, और षटतिला एकादशी प्रायः मकर संक्रांति के आसपास ही आती है। कई परिवार दोनों अवसरों पर तिल-गुड़ और अन्न का दान करते हैं।
क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग षटतिला एकादशी का व्रत रख सकते हैं?
वे डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन वाला हल्का व्रत रख सकते हैं। परंपरा में गर्भवती, रोगी, वृद्ध और बच्चों को कठोर नियमों से छूट दी गई है; पूजा, जप और दान भी पूरा पुण्य माना जाता है।
अगर षटतिला एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं; भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, नाम जप करें और यथाशक्ति तिल या अन्न का दान करें। अगली एकादशी पर फिर से श्रद्धा से व्रत रखें।
षटतिला एकादशी पर तुलसी के पत्ते तोड़ सकते हैं?
नहीं, परंपरा के अनुसार एकादशी पर तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। पूजा के लिए पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें।