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जया एकादशी कब है? (Jaya Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण और भीष्म द्वादशी

अंतिम अपडेट: 28 मिनट पढ़ें लेखक: admin
जया एकादशी – भगवान विष्णु की कृपा से मुक्त होकर स्वर्ग की ओर जाते माल्यवान और पुष्पवती (Jaya Ekadashi)

जया एकादशी (Jaya Ekadashi) माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे भगवान विष्णु की उपासना का अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। “जया” का अर्थ है — विजय दिलाने वाली। परंपरा के अनुसार यह व्रत मनुष्य को पापों पर, बुरी आदतों पर और अपने ही मन की कमजोरियों पर विजय दिलाने वाला माना गया है।

जया एकादशी की सबसे प्रसिद्ध पहचान है गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती की कथा, जिन्हें इंद्र के श्राप से पिशाच योनि में जाना पड़ा और अनजाने में इसी एकादशी का व्रत हो जाने से उन्हें मुक्ति मिली। इसीलिए लोक-मान्यता में इसे “पिशाच योनि से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी” भी कहा जाता है।

यह एकादशी भीष्म अष्टमी के तीन दिन बाद आती है और इसके अगले दिन भीष्म द्वादशी मनाई जाती है। दक्षिण भारत में इसे भीष्म एकादशी और कई स्थानों पर भैमी एकादशी भी कहते हैं। नीचे आपको जया एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि, मंत्र, खान-पान के नियम, भीष्म द्वादशी से संबंध और मिथक-सच्चाई — सब कुछ सरल भाषा में मिलेगा।

जया एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: वर्ष 2026 की जया एकादशी (29 जनवरी) बीत चुकी है। अगली जया एकादशी का व्रत बुधवार, 17 फरवरी 2027 को रखा जाएगा। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 16 फरवरी रात 8:19 बजे शुरू होकर 17 फरवरी शाम 5:31 बजे समाप्त होगी, और पारण 18 फरवरी को सुबह 6:57 से 9:12 बजे के बीच किया जा सकता है।

अगली जया एकादशी

जया एकादशी 2027

17 फ़रवरी 2027, बुधवार 108 दिन बाकी

मास और पक्ष
माघ शुक्ल
एकादशी तिथि
16 फ़र 20:21 – 17 फ़र 17:33
पारण (व्रत खोलने का समय)
18 फ़र, 06:57 – 09:12
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202629 जनवरी 2026, गुरुवार28 जन 16:37 –
29 जन 13:57
30 जन, 07:10 – 09:20
202717 फ़रवरी 2027, बुधवार16 फ़र 20:21 –
17 फ़र 17:33
18 फ़र, 06:57 – 09:12
20287 फ़रवरी 2028, सोमवार6 फ़र 11:19 –
7 फ़र 09:26
8 फ़र, 07:05 – 09:17
202926 जनवरी 2029, शुक्रवार25 जन 16:51 –
26 जन 17:14
27 जन, 07:11 – 09:20

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें।

स्मार्त और वैष्णव: जब एकादशी तिथि दो दिनों में बँटती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। भारत में इस बार दोनों परंपराओं का व्रत एक ही दिन है, लेकिन अमेरिका जैसे देशों में तारीख एक दिन अलग हो सकती है — इसलिए अपने शहर की तालिका अवश्य देखें।

जया एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“जया” शब्द “जय” से बना है, जिसका अर्थ है विजय। इस तरह जया एकादशी का अर्थ हुआ “विजय दिलाने वाली एकादशी”। यहाँ विजय का अर्थ किसी युद्ध की जीत से अधिक अपने भीतर के दोषों — काम, क्रोध, लोभ और आलस्य — पर जीत से है। कथा में माल्यवान और पुष्पवती की भूल भी मन के असंयम से ही हुई थी, और व्रत के पुण्य से वे उस दुर्दशा पर विजय पा सके।

जया एकादशी के अन्य नाम

  • माघ शुक्ल एकादशी — तिथि के आधार पर सामान्य नाम।
  • भीष्म एकादशी — आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और दक्षिण भारत के कई हिस्सों में प्रचलित नाम। यह भीष्म पितामह और विष्णु सहस्रनाम से जुड़ा है।
  • भैमी एकादशी / भीम एकादशी — इस्कॉन सहित गौड़ीय वैष्णव कैलेंडर में यही नाम मिलता है। नेपाल और ओडिशा में इसे भीम एकादशी या भौमी एकादशी भी कहते हैं, और लोक-मान्यता इसे पांडुपुत्र भीम से जोड़ती है।

ध्यान दें कि ज्येष्ठ शुक्ल की निर्जला एकादशी को भी “भीमसेनी एकादशी” कहा जाता है। दोनों अलग एकादशियाँ हैं, इसलिए नाम पढ़कर भ्रम में न पड़ें।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत कैलेंडर और दक्षिण-पश्चिम भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र आदि) में प्रचलित अमांत कैलेंडर — दोनों में जया एकादशी माघ शुक्ल पक्ष में ही आती है। शुक्ल पक्ष का महीना दोनों कैलेंडरों में एक जैसा होता है, फर्क केवल कृष्ण पक्ष के महीने के नाम में आता है। अंग्रेजी कैलेंडर में यह एकादशी आमतौर पर जनवरी के अंत से फरवरी के बीच पड़ती है।

जया एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

माघ मास को स्वयं में पवित्र मास माना गया है — इसी महीने में प्रयाग में माघ मेला लगता है, लोग कल्पवास करते हैं और गंगा स्नान का विशेष महत्व होता है। इसी पावन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी होने से जया एकादशी का महत्व और बढ़ जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, जप और दान करने से पापों का क्षय होता है।

कथा में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसे नीच योनियों में भटकना नहीं पड़ता। यही कारण है कि जया एकादशी को विशेष रूप से उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है जो अपने दिवंगत प्रियजनों की सद्गति के लिए प्रार्थना करना चाहते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

जया एकादशी की कथा का मूल संदेश है — कर्तव्य के समय मन का संयम। माल्यवान और पुष्पवती कलाकार थे, पर अपनी सेवा के समय उनका ध्यान भटक गया। कथा बताती है कि कला, ज्ञान और कोई भी सेवा तभी शोभा देती है जब उसमें अनुशासन और सम्मान हो।

दूसरा संदेश है — भगवान की करुणा। दोनों ने न कोई विधि जानी, न संकल्प लिया, फिर भी सच्चे पश्चाताप, अन्न के त्याग और रात भर के जागरण को भगवान ने स्वीकार किया। इसका भाव यह है कि सच्चे मन से किया गया छोटा-सा प्रयत्न भी व्यर्थ नहीं जाता।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार जया एकादशी का माहात्म्य पद्म पुराण और भविष्योत्तर पुराण में मिलता है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को साल भर की एकादशियों की कथाएँ सुनाते हैं। हिंदी में प्रचलित “एकादशी माहात्म्य” की पुस्तकों में यही कथा कुछ शब्द-भेद के साथ दी गई है। भीष्म एकादशी वाला संबंध महाभारत के अनुशासन पर्व से आता है, जहाँ शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम का उपदेश देते हैं।

जया एकादशी व्रत कथा

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा — “हे जनार्दन! आपने माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी का माहात्म्य बताया। अब कृपा करके बताइए कि माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता की पूजा की जाती है?”

श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन्! माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम जया है। यह सब पापों को नष्ट करने वाली है और मनुष्य को भूत-पिशाच जैसी योनियों से भी मुक्त करने वाली मानी गई है। इस दिन श्रद्धा से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। अब मैं तुम्हें इससे जुड़ी एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ।”

इंद्र की सभा और नंदन वन का उत्सव

एक समय देवराज इंद्र स्वर्ग के सुंदर नंदन वन में विहार कर रहे थे। चारों ओर पारिजात के फूल खिले थे, अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और गंधर्व मधुर गान कर रहे थे। उस सभा में गंधर्व पुष्पदंत, उनकी कन्या पुष्पवती, गंधर्व चित्रसेन और उनका परिवार भी उपस्थित था। चित्रसेन के पौत्र (कुछ कथाओं में पुत्र) माल्यवान गायन में अत्यंत निपुण थे।

इंद्र की प्रसन्नता के लिए माल्यवान गा रहे थे और पुष्पवती नृत्य कर रही थीं। तभी पुष्पवती माल्यवान के रूप पर मोहित हो गई और अपने हाव-भाव से उन्हें आकर्षित करने लगी। माल्यवान भी उसके सौंदर्य में खो गए। मन भटका तो उनके गायन का सुर बिगड़ गया और ताल टूट गई। पुष्पवती के नृत्य की लय भी गड़बड़ा गई।

इंद्र का श्राप — पिशाच योनि

देवराज इंद्र ने तुरंत समझ लिया कि दोनों का ध्यान सेवा पर नहीं, एक-दूसरे पर है। देवताओं की सभा में संगीत का ऐसा अपमान देखकर इंद्र क्रोधित हो गए। उन्होंने कहा — “तुम दोनों ने मेरी आज्ञा का उल्लंघन किया है और इस पवित्र संगीत का अनादर किया है। इसलिए तुम पति-पत्नी के रूप में मृत्युलोक में जाओ और पिशाच योनि में रहकर अपने कर्म का फल भोगो।”

श्राप मिलते ही दोनों का दिव्य रूप चला गया। वे पृथ्वी पर हिमालय पर्वत के एक दुर्गम स्थान पर जा गिरे और पिशाच के रूप में भटकने लगे।

हिमालय की ठंड में कष्ट भरा जीवन

हिमालय की कड़ाके की ठंड में दोनों का जीवन अत्यंत कष्टमय हो गया। उन्हें न ठीक से भूख का सुख मिलता, न नींद आती। गंध, स्वाद और स्पर्श जैसी इंद्रियों का सुख भी छिन गया था। बर्फीली हवाओं में उनके दाँत किटकिटाते और शरीर काँपता रहता।

एक दिन पिशाच बने माल्यवान ने दुखी होकर पुष्पवती से कहा — “न जाने हमने पिछले जन्मों में कौन-से पाप किए थे, जिनके कारण हमें यह भयानक योनि मिली। अब हमें निश्चय कर लेना चाहिए कि आगे से कभी कोई पाप नहीं करेंगे।” इस प्रकार दोनों के मन में सच्चा पश्चाताप जाग उठा।

अनजाने में हुआ जया एकादशी का व्रत

संयोग से कुछ समय बाद माघ मास के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का दिन आया। उस दिन दुख के कारण दोनों ने अन्न का एक दाना भी नहीं खाया। कुछ कथाओं के अनुसार उन्होंने केवल जंगल के फल-फूल खाकर दिन बिताया, जबकि कुछ परंपराओं में कहा गया है कि उन्होंने उस दिन जल तक ग्रहण नहीं किया। उन्होंने कोई हिंसा या पाप-कर्म भी नहीं किया।

शाम होते ही वे एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए। सूर्य ढलते ही ठंड इतनी बढ़ गई कि वे सो न सके। पूरी रात दोनों एक-दूसरे से सटकर, ठिठुरते हुए जागते रहे और अपने दुर्भाग्य पर पछताते रहे। उन्हें पता भी नहीं था कि आज जया एकादशी है — पर इस प्रकार उनका उपवास और रात्रि जागरण अनजाने में पूरा हो गया।

पिशाच योनि से मुक्ति और स्वर्ग वापसी

अगले दिन द्वादशी की सुबह होते ही भगवान विष्णु की कृपा से दोनों की पिशाच देह छूट गई। वे फिर से अपने सुंदर गंधर्व और अप्सरा रूप में आ गए। दिव्य वस्त्र और आभूषणों से सजे दोनों के लिए आकाश से विमान आया, देवताओं ने पुष्प वर्षा की और वे स्वर्ग लौट गए।

दोनों ने देवराज इंद्र को प्रणाम किया। इंद्र आश्चर्य में पड़ गए और पूछा — “तुम्हें इस पिशाच योनि से मुक्ति कैसे मिली?” माल्यवान ने विनम्रता से उत्तर दिया — “हे देवराज! यह भगवान विष्णु की कृपा और जया एकादशी के व्रत का प्रभाव है।” यह सुनकर इंद्र बोले — “जो भगवान विष्णु के भक्त हैं और एकादशी का व्रत करते हैं, वे हमारे लिए भी वंदनीय हैं। तुम धन्य हो। अब तुम सुखपूर्वक यहाँ रहो।”

कथा के अंत में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं — “हे राजन्! जो मनुष्य जया एकादशी का व्रत करता है, उसे पिशाच जैसी योनियों का भय नहीं रहता। परंपरा के अनुसार इस व्रत से सभी यज्ञ, तप और दान का पुण्य मिलता है।”

कथा की सीख: मन का भटकाव किसी को भी ऊँचाई से नीचे गिरा सकता है, पर सच्चा पश्चाताप और भगवान की शरण उसे फिर ऊपर उठा सकती है। व्रत कथा पढ़ने के बाद एकादशी माता की आरती करने की परंपरा है।

पिशाच योनि से मुक्ति की मान्यता

जया एकादशी के बारे में सबसे ज्यादा पूछा जाने वाला प्रश्न यही है कि क्या यह व्रत “पिशाच योनि से मुक्ति” देता है। इस विषय को परंपरा और आस्था के दृष्टिकोण से समझना चाहिए।

  • परंपरा क्या कहती है: पुराण-कथा के अनुसार जया एकादशी के पुण्य से माल्यवान और पुष्पवती पिशाच योनि से मुक्त हुए। इसी आधार पर मान्यता है कि यह व्रत व्यक्ति को मृत्यु के बाद भटकने वाली योनियों से बचाता है।
  • दिवंगत परिजनों के लिए प्रार्थना: कई परिवार इस दिन व्रत रखकर संकल्प करते हैं कि इसका पुण्य उनके दिवंगत परिजनों की शांति के लिए हो। यह एक श्रद्धा भरी प्रार्थना है, कोई तांत्रिक उपाय नहीं।
  • प्रतीकात्मक अर्थ: कई संत “पिशाच योनि” को मन की उस अवस्था का प्रतीक भी मानते हैं जहाँ व्यक्ति वासना, भय और बेचैनी में भटकता रहता है। एकादशी का संयम और भगवान का स्मरण मन को इस अवस्था से निकालने में सहायक माना जाता है।
  • भय से नहीं, श्रद्धा से: यह व्रत डर से रखने की चीज नहीं है। किसी के बहकावे में आकर “भूत-प्रेत भगाने” के नाम पर महंगे अनुष्ठान कराने की कोई जरूरत नहीं है। सरल व्रत, विष्णु पूजा, नाम-जप और दान ही इस दिन की परंपरा है।

भीष्म एकादशी और भीष्म द्वादशी का संबंध

माघ शुक्ल पक्ष के ये कुछ दिन भीष्म पितामह की स्मृति से जुड़े हैं। महाभारत युद्ध के बाद भीष्म पितामह शरशय्या पर लेटे उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे, क्योंकि उन्हें इच्छा-मृत्यु का वरदान था। परंपरा के अनुसार उन्होंने माघ शुक्ल अष्टमी (भीष्म अष्टमी) को देह त्याग किया।

भीष्म एकादशी और विष्णु सहस्रनाम

दक्षिण भारत, विशेषकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में, जया एकादशी को भीष्म एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने भगवान श्रीकृष्ण की उपस्थिति में युधिष्ठिर को विष्णु सहस्रनाम — भगवान विष्णु के एक हजार नाम — का उपदेश दिया था। इसलिए इस दिन को कुछ लोग “विष्णु सहस्रनाम जयंती” के रूप में भी मानते हैं और मंदिरों में सामूहिक सहस्रनाम पाठ होता है।

भीष्म द्वादशी (तिल द्वादशी)

जया एकादशी के अगले दिन, माघ शुक्ल द्वादशी को भीष्म द्वादशी मनाई जाती है, जिसे कई स्थानों पर तिल द्वादशी भी कहते हैं। मान्यता है कि भीष्म पितामह ने भले ही अष्टमी को देह त्यागी, पर उनके निमित्त धार्मिक कर्म द्वादशी को किए गए। इसलिए इस दिन:

  • स्नान के बाद भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है।
  • तिल, जल और कुश से भीष्म पितामह को तर्पण दिया जाता है। भीष्म आजीवन ब्रह्मचारी रहे, इसलिए परंपरा में माना जाता है कि उन्हें तर्पण कोई भी श्रद्धालु दे सकता है।
  • कई परिवार अपने पितरों का तर्पण भी इसी दिन करते हैं।
  • तिल का दान, तिल से हवन और जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा है।

चूँकि जया एकादशी का पारण भी इसी द्वादशी की सुबह होता है, इसलिए बहुत से श्रद्धालु पारण के साथ ही तिल-दान और भीष्म तर्पण कर लेते हैं। एकादशी, पारण और भीष्म द्वादशी — तीनों को एक साथ श्रद्धा से मनाना इस समय की सुंदर परंपरा है।

वराह द्वादशी (वैष्णव परंपरा)

गौड़ीय वैष्णव परंपरा में जया (भैमी) एकादशी के अगले दिन को भगवान के वराह अवतार के प्रकट होने के दिन वराह द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। नेपाल की भीम एकादशी में भी “ॐ वराहाय नमः” मंत्र से पूजा का उल्लेख मिलता है। यदि आपके परिवार में यह परंपरा है, तो द्वादशी को वराह भगवान का स्मरण भी कर सकते हैं।

जया एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

नीचे दी गई विधि सामान्य गृहस्थों के लिए है। आपके परिवार या संप्रदाय की कोई विशेष परंपरा हो, तो उसे प्राथमिकता दें। श्रद्धा और नियम का पालन सबसे महत्वपूर्ण है, सामग्री की कमी से घबराएँ नहीं।

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का सात्विक भोजन करें। चावल, मसूर, प्याज-लहसुन और मांसाहार से बचें।
  2. रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में अगले दिन के व्रत का विचार रखें।
  3. पूजा स्थान साफ कर लें। तुलसी दल एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी नहीं तोड़ी जाती।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें। माघ मास होने से पवित्र नदी में स्नान का विशेष महत्व है; संभव न हो तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें।
  2. स्वच्छ (संभव हो तो पीले) वस्त्र पहनें और सूर्य देव को जल अर्पित करें।
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — “मैं आज जया एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता और अपने पापों के क्षय की कामना से कर रहा/रही हूँ।” अपना नाम और गोत्र बोलें।
  4. अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत का प्रकार (निर्जला, फलाहार या एक समय) पहले ही तय कर लें।

भगवान विष्णु की पूजा

  1. चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  2. पहले भगवान गणेश का स्मरण करें, फिर परंपरा हो तो कलश स्थापित करें।
  3. भगवान को गंगाजल या शुद्ध जल से स्नान कराएँ, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें।
  4. पीले वस्त्र, चंदन, पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें।
  5. धूप-दीप जलाएँ और फल, तिल-गुड़ के लड्डू या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  6. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) जप करें।
  7. जया एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
  8. भीष्म एकादशी की परंपरा मानते हों तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  9. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती करें और भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।

शाम की पूजा और रात्रि जागरण

  1. शाम को फिर से दीपक जलाएँ। तुलसी के पास और संभव हो तो पीपल के वृक्ष के पास भी घी या तिल के तेल का दीपक रखें — कथा में पीपल के नीचे की रात का स्मरण इसी भाव से किया जाता है।
  2. विष्णु सहस्रनाम, भजन या हरि-नाम कीर्तन करें।
  3. जया एकादशी की कथा में रात्रि जागरण का विशेष स्थान है, इसलिए संभव हो तो कुछ समय जागकर भजन करें। स्वास्थ्य ठीक न हो तो पूरी रात जागना जरूरी नहीं।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
  2. किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को भोजन, तिल, अन्न या गर्म कपड़े दान करें।
  3. परंपरा हो तो इसी दिन भीष्म पितामह और अपने पितरों को तिल-जल से तर्पण करें।
  4. ऊपर दी गई तालिका में बताए गए पारण समय के भीतर तुलसी दल और जल लेकर व्रत खोलें, फिर सात्विक भोजन करें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा / चित्र
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • गंगाजल और शुद्ध जल से भरा कलश
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • पीला चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल — केवल पूजा में अर्पण के लिए)
  • पीले फूल और फूलमाला
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़ा हुआ)
  • धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, रुई की बत्ती, कपूर
  • काले या सफेद तिल (माघ मास में तिल का विशेष महत्व है)
  • फल, तिल-गुड़ के लड्डू, सूखे मेवे और मिठाई का भोग
  • पान, सुपारी, लौंग, इलायची
  • व्रत कथा की पुस्तक और विष्णु सहस्रनाम
  • तर्पण के लिए कुश, तिल और जल (भीष्म द्वादशी हेतु, यदि परंपरा हो)
  • दान के लिए अन्न, तिल, कंबल या गर्म कपड़े

जया एकादशी के मंत्र

मंत्र जप करते समय उच्चारण से अधिक भाव का महत्व है। कोई भी एक मंत्र चुनकर एकाग्र मन से 108 बार जप करें।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: हे भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु), मैं आपको नमन करता हूँ। यह एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाने वाला मंत्र है।

2. अष्टाक्षर मंत्र

ॐ नमो नारायणाय॥

अर्थ: सर्वव्यापक भगवान नारायण को मेरा नमस्कार है। यह छोटा और सरल मंत्र है, जिसे बच्चे और बुजुर्ग भी आसानी से जप सकते हैं।

3. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग की शय्या पर विराजमान हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं, आकाश के समान व्यापक, मेघ के समान वर्ण वाले, लक्ष्मीपति और कमल-नयन हैं — संसार के भय को हरने वाले उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

4. विष्णु सहस्रनाम का “राम नाम” श्लोक

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥

अर्थ: विष्णु सहस्रनाम के अंत में भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि “राम” नाम का तीन बार उच्चारण पूरे सहस्रनाम के समान है। भीष्म एकादशी पर जो लोग पूरा सहस्रनाम न पढ़ सकें, वे परंपरा के अनुसार यह श्लोक श्रद्धा से पढ़ते हैं।

जया एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का मूल नियम है — अन्न (अनाज) का त्याग। इसके अलावा कितना और क्या खाना है, यह आपकी परंपरा, स्वास्थ्य और व्रत के प्रकार पर निर्भर करता है।

क्या खा सकते हैं

  • सभी प्रकार के ताजे फल — केला, सेब, पपीता, अनार, अमरूद, संतरा आदि
  • दूध, दही, छाछ, पनीर और मावा
  • साबूदाना, सिंघाड़ा आटा, कुट्टू आटा, राजगिरा (रामदाना) और समा के चावल
  • आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू, लौकी
  • मूँगफली, मखाना, बादाम, किशमिश, अखरोट और नारियल
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हरी मिर्च
  • गुड़ और तिल से बनी चीजें — माघ मास में तिल-गुड़ विशेष रूप से प्रचलित है (कुछ वैष्णव परंपराओं में एकादशी पर तिल भी नहीं खाते, अपनी परंपरा देखें)

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज
  • गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा, ज्वार जैसे अनाज
  • दालें, चना, राजमा और सोयाबीन
  • प्याज, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और शराब
  • साधारण (आयोडीन वाला) नमक — इसकी जगह सेंधा नमक लें
  • बैंगन, गोभी जैसी चीजें कुछ परंपराओं में वर्जित मानी जाती हैं
  • तामसिक, बासी और बहुत तला-भुना भोजन

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है। कथा में माल्यवान और पुष्पवती ने भी अनजाने में ऐसा ही कठोर उपवास किया था, पर यह अनिवार्य नहीं है। केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे रखें, और कमजोरी, चक्कर या बेचैनी लगे तो जल या फल ले लें।

फलाहार व्रत

ज्यादातर गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें अनाज छोड़कर फल, दूध, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े से बनी चीजें दिन में एक-दो बार ली जाती हैं। माघ की ठंड में गुनगुना दूध, सूखे मेवे और शकरकंद शरीर को ऊर्जा देने में मदद करते हैं।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरे दिन भूखे नहीं रह सकते, वे दिन में एक बार फलाहारी भोजन करते हैं। बुजुर्ग, कामकाजी लोग और पहली बार व्रत रखने वाले इस तरीके से शुरुआत कर सकते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: डायबिटीज, ब्लड प्रेशर, हृदय रोग या किडनी की समस्या वाले लोग, गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुजुर्ग और नियमित दवा लेने वाले लोग कोई भी कठोर व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें। दवाएँ बंद न करें। शास्त्रों में भी बीमार, बच्चों और वृद्धों को कठोर नियमों से छूट दी गई है।

जया एकादशी पारण कब और कैसे करें

एकादशी का व्रत तभी पूरा माना जाता है जब उसका पारण सही समय पर किया जाए। पारण का अर्थ है — द्वादशी के दिन व्रत खोलना।

  • द्वादशी में पारण: पारण अगले दिन (द्वादशी) सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना उचित नहीं माना जाता।
  • हरिवासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग “हरिवासर” कहलाता है। इस दौरान पारण नहीं किया जाता। यदि हरिवासर सुबह तक चल रहा हो, तो उसके समाप्त होने का इंतजार करें।
  • सबसे अच्छा समय: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे उत्तम माना जाता है। किसी कारण सुबह पारण न हो सके, तो मध्याह्न के बाद करें, पर द्वादशी के भीतर ही।
  • स्मार्त और वैष्णव: जिस वर्ष स्मार्त और वैष्णव व्रत अलग-अलग दिन हों, उनका पारण भी अलग दिन होगा। अपनी परंपरा के अनुसार तालिका में सही पंक्ति देखें।

पारण कैसे करें

  1. स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
  2. किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन या दान दें। भीष्म द्वादशी होने से तिल-दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
  3. सबसे पहले तुलसी दल और थोड़ा जल लें, फिर भगवान का प्रसाद ग्रहण करें।
  4. इसके बाद हल्का सात्विक भोजन करें। परंपरा में पारण के भोजन में चावल लेना भी शुभ माना जाता है, पर भारी, तला हुआ या तामसिक भोजन न करें।

आपके शहर का सटीक पारण समय ऊपर दी गई तालिका में दिया है। रोज की तिथि जानने के लिए आप हमारा दैनिक पंचांग भी देख सकते हैं।

जया एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें; माघ मास में तिल मिले जल से स्नान शुभ माना जाता है।
  • भगवान विष्णु की पूजा करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
  • जया एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें, खासकर यदि आप भीष्म एकादशी की परंपरा मानते हैं।
  • शाम को तुलसी और पीपल के पास दीपक जलाएँ।
  • ठंड के मौसम को देखते हुए जरूरतमंदों को कंबल, गर्म कपड़े, तिल, गुड़ या अन्न दान करें।
  • मन को शांत रखें, कम बोलें और अच्छे विचारों में समय बिताएँ।
  • संगीत या कला से जुड़े लोग इस दिन अपनी कला को भगवान को समर्पित करने का संकल्प ले सकते हैं — कथा के भाव से यह सुंदर परंपरा है।

क्या न करें

  • चावल और अन्न न खाएँ, प्याज-लहसुन और तामसिक भोजन से बचें।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और झगड़े से दूर रहें।
  • दिन में सोने से बचें, क्योंकि यह व्रत के नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
  • किसी का अपमान न करें, विशेषकर गुरुजनों और बड़ों का — कथा में इंद्र की सभा का अनादर ही श्राप का कारण बना था।
  • मद्यपान, जुआ और किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहें।
  • स्वास्थ्य की अनदेखी करके जबरदस्ती कठोर व्रत न रखें।

जया एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: जया एकादशी का व्रत भूत-प्रेत भगाने का तांत्रिक उपाय है।

सच्चाई: कथा में पिशाच योनि से मुक्ति का प्रसंग है, पर जया एकादशी एक सात्विक विष्णु-व्रत है, कोई तांत्रिक अनुष्ठान नहीं। इसकी परंपरा है व्रत, पूजा, नाम-जप, दान और संयम। “भूत-प्रेत” के डर में किसी के बहकावे पर महंगे अनुष्ठान कराने की कोई आवश्यकता नहीं है।

मिथक: यह व्रत करने से निश्चित रूप से सारे पाप मिट जाते हैं, फिर कुछ भी करो।

सच्चाई: पुराणों में व्रत के फल का वर्णन श्रद्धा बढ़ाने के लिए किया गया है। कथा में माल्यवान ने स्वयं संकल्प लिया था कि आगे पाप नहीं करेंगे — यानी सच्चा पश्चाताप और आचरण में सुधार ही व्रत का मूल भाव है। व्रत कोई “छूट का प्रमाणपत्र” नहीं है।

मिथक: बिना विधि-विधान के रखा गया व्रत बेकार है।

सच्चाई: जया एकादशी की कथा स्वयं इस मिथक को तोड़ती है। माल्यवान और पुष्पवती को न विधि पता थी, न तिथि — फिर भी परंपरा के अनुसार उनका उपवास और जागरण स्वीकार हुआ। विधि का पालन अच्छा है, पर सबसे बड़ा तत्व श्रद्धा और सच्चा भाव है।

मिथक: एकादशी पर पानी पीने से व्रत टूट जाता है।

सच्चाई: केवल निर्जला व्रत में ही जल का त्याग होता है। फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी, दूध और फल लिए जाते हैं। व्रत का मूल नियम अन्न का त्याग है, जल का नहीं।

मिथक: भीष्म एकादशी और जया एकादशी अलग-अलग दिन मनाई जाती हैं।

सच्चाई: ये दोनों एक ही माघ शुक्ल एकादशी के अलग-अलग क्षेत्रीय नाम हैं। उत्तर भारत में इसे जया एकादशी, दक्षिण में भीष्म एकादशी और वैष्णव कैलेंडर में भैमी एकादशी कहते हैं। हाँ, अगले दिन की भीष्म द्वादशी एक अलग पर्व है।

मिथक: व्रत से शरीर का “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को निर्जला व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: व्रत मूल रूप से एक आध्यात्मिक साधना है। इसे किसी बीमारी का इलाज या स्वास्थ्य का गारंटीड उपाय नहीं मानना चाहिए। डायबिटीज, गर्भावस्था, बुढ़ापे या दवाओं के साथ कठोर व्रत नुकसान कर सकता है, इसलिए ऐसे लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत रखें।

मिथक: भीष्म पितामह का तर्पण केवल वही कर सकता है जिसके पिता नहीं रहे।

सच्चाई: परंपरा में माना जाता है कि भीष्म पितामह आजीवन ब्रह्मचारी रहे और उनकी कोई संतान नहीं थी, इसलिए उन्हें तर्पण कोई भी श्रद्धालु दे सकता है। अपने पितरों के तर्पण के नियम परिवार की परंपरा के अनुसार अलग हो सकते हैं — उसके लिए अपने कुल-पुरोहित से पूछें।

जया एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ पुराणों और परंपरा में बताई गई मान्यताएँ हैं। इन्हें श्रद्धा के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।

  • पापों का क्षय: परंपरा के अनुसार जया एकादशी का व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों के प्रभाव को कम करता है।
  • नीच योनियों से रक्षा: कथा के आधार पर मान्यता है कि यह व्रत पिशाच जैसी योनियों में भटकने से बचाता है।
  • दिवंगत परिजनों की शांति: बहुत से लोग इस व्रत का पुण्य अपने पितरों को समर्पित करते हैं, इस भाव से कि उन्हें सद्गति मिले।
  • यज्ञ, तप और दान के समान पुण्य: कथा में कहा गया है कि यह व्रत अनेक यज्ञों और दान के समान फल देने वाला माना गया है।
  • मन पर विजय: “जया” नाम के अनुसार यह व्रत संयम, एकाग्रता और आत्म-अनुशासन को मजबूत करने वाला माना जाता है।
  • पारिवारिक सुख-शांति: परिवार के साथ पूजा, कथा और कीर्तन करने से घर में सकारात्मक वातावरण बनता है।
  • कला और विद्या में सफलता की कामना: गंधर्व-अप्सरा की कथा के कारण कई कलाकार इस दिन अपनी कला में शुद्धता और सफलता की प्रार्थना करते हैं।

संबंधित एकादशी और पाठ

जया एकादशी से ठीक पहले माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी आती है, जिसमें तिल के छह प्रकार के उपयोग का विशेष महत्व है। जया के बाद फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी आती है, जिसका संबंध भगवान श्रीराम की लंका-विजय से माना जाता है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

जया एकादशी हमें याद दिलाती है कि भूल किसी से भी हो सकती है — स्वर्ग के गंधर्व से भी। पर सच्चा पश्चाताप, संयम और भगवान की शरण हर गिरावट से उठने का मार्ग खोल देते हैं। इस माघ शुक्ल एकादशी पर श्रद्धा से व्रत रखें, भगवान विष्णु का स्मरण करें, जरूरतमंदों की सहायता करें और अगले दिन भीष्म पितामह को भी श्रद्धा से याद करें। भगवान श्रीहरि आप और आपके परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

जया एकादशी कब है 2027 में?

जया एकादशी 2027 का व्रत बुधवार, 17 फरवरी 2027 को है और पारण 18 फरवरी की सुबह होगा (नई दिल्ली)। अपने शहर का पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

जया एकादशी किस महीने में आती है?

जया एकादशी माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। पूर्णिमांत और अमांत दोनों कैलेंडरों में यह माघ शुक्ल में ही आती है और अंग्रेजी कैलेंडर में आमतौर पर जनवरी के अंत से फरवरी के बीच पड़ती है।

इसे जया एकादशी क्यों कहते हैं?

‘जया’ का अर्थ है विजय दिलाने वाली। परंपरा के अनुसार यह व्रत पापों और मन की कमजोरियों पर विजय दिलाने वाला माना गया है।

जया एकादशी के अन्य नाम क्या हैं?

दक्षिण भारत में इसे भीष्म एकादशी, गौड़ीय वैष्णव (इस्कॉन) कैलेंडर में भैमी एकादशी, और नेपाल-ओडिशा में भीम या भौमी एकादशी कहा जाता है।

जया एकादशी की व्रत कथा क्या है?

इंद्र की सभा में गायन के समय गंधर्व माल्यवान और अप्सरा पुष्पवती का ध्यान भटक गया, तो इंद्र ने उन्हें पिशाच बनने का श्राप दिया। हिमालय की ठंड में अनजाने में जया एकादशी का उपवास और रात्रि जागरण हो जाने से भगवान विष्णु की कृपा से वे मुक्त होकर स्वर्ग लौट गए।

क्या जया एकादशी से पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है?

कथा के आधार पर परंपरा में यह मान्यता है कि यह व्रत पिशाच जैसी योनियों से रक्षा करता है। इसे श्रद्धा और प्रार्थना के रूप में देखें; यह कोई तांत्रिक उपाय नहीं है।

भीष्म एकादशी और जया एकादशी में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं — दोनों एक ही माघ शुक्ल एकादशी के क्षेत्रीय नाम हैं। दक्षिण भारत में इस दिन भीष्म पितामह द्वारा दिए गए विष्णु सहस्रनाम के उपदेश को विशेष रूप से याद किया जाता है।

भीष्म द्वादशी कब होती है और उसका जया एकादशी से क्या संबंध है?

भीष्म द्वादशी जया एकादशी के अगले दिन, माघ शुक्ल द्वादशी को होती है। इसी दिन जया एकादशी का पारण भी होता है, इसलिए कई लोग पारण के साथ तिल-दान और भीष्म तर्पण करते हैं।

जया एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण या नारायण रूप) की पूजा की जाती है। भीष्म एकादशी की परंपरा में विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जाता है।

जया एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़ा, आलू, शकरकंद, मखाना, मेवे और सेंधा नमक लिया जा सकता है। चावल, गेहूँ, दालें, प्याज-लहसुन और मांसाहार वर्जित हैं।

क्या जया एकादशी पर पानी पी सकते हैं?

हाँ, निर्जला व्रत को छोड़कर फलाहार और एक समय वाले व्रत में पानी पिया जा सकता है। व्रत का मूल नियम अन्न का त्याग है।

क्या एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी के दिन चावल और सभी अनाज वर्जित माने जाते हैं। पारण के दिन द्वादशी को चावल खाया जा सकता है।

जया एकादशी का पारण कब करें?

पारण अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरिवासर समाप्त होने के बाद और द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले करें। अपने शहर का सटीक समय इस पेज की तालिका में देखें।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो दिन में बँटती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। भारत में जया एकादशी अधिकतर वर्षों में दोनों के लिए एक ही दिन होती है।

जया एकादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?

सबसे प्रचलित मंत्र ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ है। इसके अलावा ‘ॐ नमो नारायणाय’ और विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जाता है।

क्या गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग या डायबिटीज के मरीज यह व्रत रख सकते हैं?

वे डॉक्टर की सलाह से हल्का फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रख सकते हैं। निर्जला जैसे कठोर व्रत से बचें और दवाएँ बंद न करें।

अगर जया एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं, भगवान विष्णु से क्षमा माँगें और जितना संभव हो उतना व्रत और नाम-जप जारी रखें। परंपरा में श्रद्धा और सच्चे भाव को सबसे बड़ा माना गया है।

जया एकादशी पर क्या दान करें?

माघ की ठंड को देखते हुए कंबल, गर्म कपड़े, तिल, गुड़ और अन्न का दान प्रचलित है। द्वादशी पर तिल-दान का विशेष महत्व माना जाता है।

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