आमलकी एकादशी (Amalaki Ekadashi) फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले (आमलकी) के वृक्ष की पूजा की जाती है। “आमलकी” संस्कृत में आंवले को कहते हैं, इसलिए इसे बोलचाल में आंवला एकादशी भी कहा जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन आंवले के पेड़ में भगवान विष्णु का वास माना जाता है।
यह एकादशी महाशिवरात्रि के बाद और होली से कुछ ही दिन पहले आती है। काशी (वाराणसी) में इसी दिन को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जब बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कराकर उन्हें काशी लाते हैं और वहीं से होली के रंगों की शुरुआत मानी जाती है। इस तरह यह एक ऐसा दिन है जिसमें श्रीहरि की भक्ति और भगवान शिव का उत्सव, दोनों एक साथ दिखते हैं।
परंपरा में इस व्रत को सब पापों का नाश करने वाला और एक हजार गौदान के समान पुण्य देने वाला बताया गया है। नीचे आपको तारीख और पारण समय, पूरी व्रत कथा, आंवला वृक्ष पूजा विधि, मंत्र, रंगभरी एकादशी की परंपरा और व्रत के नियम सरल भाषा में मिलेंगे।
आमलकी एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: आमलकी एकादशी 2026 (27 फरवरी) बीत चुकी है। अगली आमलकी एकादशी गुरुवार, 18 मार्च 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 18 मार्च को सुबह 04:21 बजे शुरू होकर 19 मार्च को रात 01:51 बजे समाप्त होगी, और पारण 19 मार्च को सुबह 07:12 से 08:52 बजे के बीच किया जा सकेगा।
अगली आमलकी एकादशी · देहरादून
आमलकी एकादशी 2027
18 मार्च 2027, गुरुवार 137 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- फाल्गुन शुक्ल
- एकादशी तिथि
- 18 मार्च 04:23 – 19 मार्च 01:52
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 19 मार्च, 07:14 – 08:48
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 27 फ़रवरी 2026, शुक्रवार | 27 फ़र 00:35 – 27 फ़र 22:35 | 28 फ़र, 06:45 – 09:03 |
| 2027 | 18 मार्च 2027, गुरुवार | 18 मार्च 04:23 – 19 मार्च 01:52 | 19 मार्च, 07:14 – 08:48 |
| 2028 | 7 मार्च 2028, मंगलवार | 6 मार्च 23:02 – 7 मार्च 20:31 | 8 मार्च, 06:35 – 08:57 |
| 2029 | 25 फ़रवरी 2029, रविवार | 24 फ़र 10:05 – 25 फ़र 09:12 | 26 फ़र, 06:47 – 07:31 |
तारीखें देहरादून के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें। आने वाले वर्षों की तारीख के लिए भी यही तालिका देखें।
स्मार्त और वैष्णव: कभी-कभी एकादशी तिथि दो दिन के सूर्योदय को छूती है, तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। इस बार नई दिल्ली के लिए दोनों परंपराओं की तारीख एक ही दिख रही है, हालाँकि कुछ पंचांग वैष्णवों के लिए अगला दिन बताते हैं। अपने संप्रदाय और स्थानीय पंचांग के अनुसार ही दिन चुनें।
आमलकी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
आमलकी शब्द का अर्थ
“आमलकी” या “आमलक” संस्कृत में आंवले के फल और पेड़ का नाम है। आयुर्वेद और लोक परंपरा में आंवले को “धात्री” भी कहा गया है, यानी माँ की तरह पोषण करने वाली। इसी कारण इस एकादशी की व्रत कथा में आंवले के वृक्ष को “धात्री” कहकर संबोधित किया गया है।
आमलकी एकादशी के अन्य नाम
- आंवला एकादशी (Amla Ekadashi): आमलकी का सरल हिंदी रूप।
- आमलक्य एकादशी / आमलका एकादशी (Amalaka Ekadashi): कुछ पंचांगों और ग्रंथों में यही नाम मिलता है।
- रंगभरी एकादशी (Rangbhari Ekadashi): काशी में यह नाम सबसे प्रचलित है। ब्रज में इसे रंगभरनी एकादशी भी कहते हैं।
- कुंज एकादशी: श्रीनाथद्वारा (राजस्थान) की परंपरा में यह नाम मिलता है।
- खाटू एकादशी: खाटू श्याम जी के फाल्गुन मेले में इस एकादशी का विशेष महत्व होने के कारण यह नाम भी सुनने को मिलता है।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
आमलकी एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है, इसलिए उत्तर भारत के पूर्णिमांत और दक्षिण-पश्चिम भारत के अमांत, दोनों कैलेंडर में इसका महीना एक ही रहता है — फाल्गुन शुक्ल एकादशी। महीने के नाम का अंतर केवल कृष्ण पक्ष की एकादशियों में आता है।
अंग्रेजी कैलेंडर में यह आमतौर पर फरवरी के अंत या मार्च में पड़ती है। इसके चार दिन बाद फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन होता है।
आमलकी एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
परंपरा के अनुसार आमलकी एकादशी का व्रत सभी पापों को दूर करने वाला माना गया है। व्रत कथा में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस व्रत का पुण्य एक हजार गौदान के बराबर है। जो भक्त पूरे विधि-विधान से यह व्रत रखते हैं, उनके लिए विष्णुलोक की प्राप्ति की मान्यता बताई गई है।
इस एकादशी की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भगवान की पूजा प्रकृति के माध्यम से की जाती है। आंवले का पेड़ भगवान विष्णु का प्रिय माना जाता है, इसलिए इसकी पूजा को स्वयं श्रीहरि की पूजा जैसा फल देने वाला कहा गया है। कुछ परंपराओं में इस दिन भगवान विष्णु के अवतार परशुराम जी का भी पूजन आंवले के वृक्ष के नीचे किया जाता है।
आध्यात्मिक संदेश
आमलकी एकादशी की कथा बताती है कि सच्चे मन से सुनी गई भगवान की कथा और एक रात का जागरण भी व्यर्थ नहीं जाता। एक बहेलिया, जो जीवन भर हिंसा से अपना पेट पालता था, अनजाने में की गई भक्ति के कारण अगले जन्म में धर्मात्मा राजा बना। यह संदेश हर किसी के लिए आशा का है — भगवान की ओर लौटने का रास्ता कभी बंद नहीं होता।
आंवले की पूजा यह भी सिखाती है कि फल, छाया और स्वास्थ्य देने वाले वृक्षों के प्रति कृतज्ञ रहना भी धर्म का हिस्सा है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार आमलकी एकादशी की कथा ब्रह्माण्ड पुराण से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें महर्षि वशिष्ठ राजा मान्धाता को इस व्रत की महिमा सुनाते हैं। कई स्रोत आंवले के वृक्ष की महिमा के लिए पद्म पुराण का भी उल्लेख करते हैं, जिसके अनुसार आंवला भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है।
आमलकी एकादशी व्रत कथा: वैदिश नगर, राजा चैतरथ और बहेलिये की कथा
कथा की भूमिका
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा, “हे प्रभु, आपने फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी की महिमा बताई। अब कृपा करके फाल्गुन शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम, उसकी विधि और उसका फल बताइए।” श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन, इस एकादशी का नाम आमलकी है। इसका व्रत सब पापों का नाश करता है और एक हजार गौदान के बराबर फल देता है। मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ जो महर्षि वशिष्ठ ने राजा मान्धाता को सुनाई थी।”
राजा मान्धाता ने वशिष्ठ जी से कल्याणकारी व्रत पूछा था, तब वशिष्ठ जी ने आमलकी एकादशी को सब व्रतों में उत्तम बताकर यह कथा सुनाई।
वैदिश नगर और धर्मात्मा राजा चैतरथ
बहुत पहले वैदिश नाम का एक सुंदर नगर था। वहाँ चारों वर्णों के लोग सुख और प्रेम से रहते थे। नगर में हर समय वेद-मंत्रों की ध्वनि गूँजती रहती थी। वहाँ कोई पापी, दुराचारी या नास्तिक नहीं था।
उस नगर पर चंद्रवंशी राजा चैतरथ (कुछ ग्रंथों में चैत्ररथ या चित्ररथ) राज करते थे। वे विद्वान और धर्मपरायण थे। राजा और प्रजा, सभी भगवान विष्णु के भक्त थे और बाल-वृद्ध सब हर एकादशी का व्रत करते थे।
एक बार फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई। राजा और पूरी प्रजा ने व्रत रखा। सब लोग नदी में स्नान करके मंदिर पहुँचे, जहाँ आंवले का एक पवित्र वृक्ष था। वहाँ उन्होंने जल से भरा पूर्ण कुंभ (कलश) स्थापित किया और धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न तथा छत्र अर्पित करके धात्री (आंवले) का पूजन किया।
पूजा करते हुए सबने प्रार्थना की, “हे धात्री, आप ब्रह्म स्वरूप हैं, ब्रह्मा जी से उत्पन्न हुई हैं और सब पापों का नाश करने वाली हैं। आपको नमस्कार है, हमारा अर्घ्य स्वीकार करें।” कुछ परंपराओं में यह भी बताया गया है कि उन्होंने आंवले के नीचे भगवान परशुराम का आवाहन करके उनकी स्तुति की। इसके बाद पूरी रात मंदिर में भगवान की कथा, भजन और जागरण होता रहा।
बहेलिये का अनजाने में किया गया जागरण
उसी रात एक बहेलिया (शिकारी) वहाँ आ पहुँचा। वह बहुत पापी था और जीव-हत्या करके अपने परिवार का पेट पालता था। उस दिन उसे कुछ खाने को नहीं मिला था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह मंदिर के एक कोने में बैठ गया।
मंदिर में दीपक जल रहे थे और भक्त भगवान विष्णु की कथा तथा एकादशी का माहात्म्य सुना रहे थे। बहेलिया भी चुपचाप कथा सुनता रहा और सबके साथ पूरी रात जागता रहा। इस तरह उसने अनजाने में उपवास और जागरण दोनों कर लिए।
सुबह वह घर जाकर भोजन करके अपने काम में लग गया। कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हो गई।
राजा वसुरथ के रूप में नया जन्म
अपने जीवन भर के जीव-हिंसा के कर्मों के कारण वह घोर नरक का अधिकारी था। लेकिन आमलकी एकादशी की रात के उपवास, जागरण और कथा-श्रवण के पुण्य से उसका अगला जन्म राजा विदूरथ के घर हुआ। उसका नाम वसुरथ रखा गया। कुछ ग्रंथों के अनुसार राजा विदूरथ जयंती नगरी के राजा थे।
बड़ा होकर वसुरथ दस हजार गाँवों का राजा बना। वह सूर्य जैसा तेजस्वी, चंद्रमा जैसा शीतल और पृथ्वी जैसा क्षमाशील था। वह सत्यवादी, दानी और भगवान विष्णु का सच्चा भक्त था।
वन में संकट और दिव्य शक्ति की रक्षा
एक दिन राजा वसुरथ शिकार खेलने वन में गए और रास्ता भटक गए। थककर वे एक पेड़ के नीचे सो गए। तभी वहाँ पहाड़ों में रहने वाले कुछ म्लेच्छ (जंगली लुटेरे) आ पहुँचे। वे राजा को अपने परिजनों की मृत्यु का दोषी मानते थे और “मारो, मारो” चिल्लाते हुए उन पर टूट पड़े।
लेकिन जैसे ही कोई शस्त्र राजा के शरीर को छूता, वह फूल बन जाता। उलटे उनके शस्त्र उन्हीं पर लौटकर गिरने लगे और वे बेहोश होने लगे। उसी समय राजा के शरीर से एक अत्यंत सुंदर लेकिन भयंकर रूप वाली दिव्य स्त्री प्रकट हुई। उसने देखते ही देखते सभी लुटेरों का अंत कर दिया।
जब राजा की नींद खुली तो उन्होंने चारों ओर लुटेरों को मरा पड़ा देखा। तभी आकाशवाणी हुई, “हे राजन, इस संसार में भगवान विष्णु के सिवा तुम्हारी रक्षा और कौन कर सकता है?” यह सुनकर राजा ने भगवान विष्णु को प्रणाम किया, अपने राज्य लौटे और सुख से धर्मपूर्वक राज करने लगे।
वशिष्ठ जी ने मान्धाता से कहा, “हे राजन, यह सब आमलकी एकादशी के व्रत का प्रभाव था। जो मनुष्य यह व्रत करता है, उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं और अंत में वह विष्णुलोक को जाता है।”
कथा के अन्य रूप
कई हिंदी स्रोतों में यह कथा संक्षिप्त रूप में राजा चित्रसेन के नाम से मिलती है। इसमें बहेलिये का पुनर्जन्म नहीं आता; आमलकी व्रत के भक्त राजा चित्रसेन को ही जंगल में लुटेरे घेरते हैं और उनके शरीर से प्रकट वैष्णवी शक्ति उनकी रक्षा करती है।
इस्कॉन परंपरा में राजा का नाम चित्ररथ (पाशबिन्दुक) मिलता है। यहाँ हमने सबसे प्रचलित रूप (वैदिश नगर, राजा चैतरथ, बहेलिया और राजा वसुरथ) दिया है; दोनों रूपों का मूल संदेश एक ही है।
आंवला वृक्ष पूजा विधि और आंवले का महत्व
आमलकी एकादशी पर आंवले के पेड़ की पूजा क्यों होती है?
परंपरा के अनुसार आंवले का वृक्ष भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। कुछ स्रोतों में बताया गया है कि आंवले की उत्पत्ति भगवान विष्णु के श्रीमुख से हुई मानी जाती है। व्रत कथा में आंवले को “ब्रह्म स्वरूप” और “ब्रह्मा जी से उत्पन्न” कहकर प्रणाम किया गया है। अलग-अलग ग्रंथों में उत्पत्ति की बात अलग ढंग से कही गई है, पर सब इसे पवित्र और विष्णु-प्रिय मानते हैं।
लोक मान्यता यह भी है कि आंवले के पेड़ के अलग-अलग भागों में देवताओं का वास है — जड़ में विष्णु, तने में ब्रह्मा, शाखाओं में शिव और फलों में सभी देवता। इसलिए इस दिन आंवले की पूजा को सब देवताओं की पूजा के समान माना जाता है। आंवला स्वास्थ्य के लिए भी उपयोगी फल है, इसलिए यह पूजा भक्ति के साथ प्रकृति के प्रति सम्मान भी सिखाती है।
आंवले के पेड़ की पूजा कैसे करें (स्टेप बाय स्टेप)
- सुबह स्नान करें; कई घरों में नहाने के पानी में थोड़ा आंवले का रस मिलाने की परंपरा है। फिर पूजा सामग्री लेकर आंवले के पेड़ के पास जाएँ और पेड़ के नीचे भगवान विष्णु का चित्र रखें।
- पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें। जल में थोड़ा गंगाजल या दूध मिला सकते हैं।
- पेड़ के नीचे जल से भरा कलश स्थापित करें। कलश पर आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखें। कुछ परंपराओं में कलश में पंचरत्न या नवरत्न डाले जाते हैं; सामर्थ्य न हो तो एक सिक्का और अक्षत पर्याप्त हैं।
- पेड़ के तने पर रोली, चंदन, हल्दी और अक्षत लगाएँ। फूल और फूलमाला अर्पित करें।
- तने पर कच्चा सूत या मौली (कलावा) लपेटें। आमतौर पर सात बार लपेटते हुए परिक्रमा की जाती है; कुछ परिवारों में यह संख्या अलग होती है।
- घी का दीपक और धूप जलाएँ। आंवला, फल और मिठाई का नैवेद्य अर्पित करें।
- हाथ जोड़कर आंवले (धात्री) से प्रार्थना करें कि वे आपके पापों को दूर करें और घर में सुख-शांति दें। फिर पेड़ की परिक्रमा करें — कम से कम 7 या अपनी श्रद्धा के अनुसार 11, 21 या 108।
- पेड़ के नीचे बैठकर आमलकी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
- अंत में आरती करें और संभव हो तो पेड़ के नीचे किसी जरूरतमंद या ब्राह्मण को भोजन या फल का दान करें।
आंवले के नीचे परशुराम पूजन
इस्कॉन और कई अन्य परंपराओं में बताया गया है कि आमलकी एकादशी पर आंवले के पेड़ के नीचे भगवान विष्णु के अवतार परशुराम जी का पूजन किया जाता है। कुछ परिवार कलश के ऊपर परशुराम जी की छोटी प्रतिमा या चित्र रखते हैं और “हे रेणुका-नंदन परशुराम, इस आंवले के वृक्ष के नीचे पधारकर हमारा प्रणाम स्वीकार करें” जैसी भावना से उनका आवाहन करते हैं।
यदि आपके घर की परंपरा में परशुराम पूजन नहीं होता, तो केवल भगवान विष्णु और आंवले की पूजा भी पूरी मानी जाती है। पूजा का भाव अधिक महत्वपूर्ण है, सामग्री या प्रतिमा का आकार नहीं।
घर के पास आंवले का पेड़ न हो तो क्या करें?
- पूजा स्थान पर कुछ ताजे आंवले रखकर उन्हें ही धात्री का प्रतीक मानकर पूजें।
- आंवले के पेड़ का चित्र रखकर भी पूजा की जा सकती है।
- भगवान विष्णु को आंवला, आंवले का मुरब्बा या आंवले से बनी सात्विक मिठाई का भोग लगाएँ।
- इस्कॉन परंपरा में बताया गया है कि आंवले का पेड़ न मिले तो तुलसी माता की पूजा की जा सकती है।
- पास के किसी मंदिर या पार्क में आंवले का पेड़ हो तो वहाँ जाकर जल अर्पित करें।
आमलकी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी को सूर्यास्त से पहले सात्विक भोजन कर लें। प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा से बचें।
- घर, पूजा स्थान और आंवले के पेड़ के आसपास सफाई करें। पूजा सामग्री, ताजे आंवले और फूल पहले से जुटा लें।
- रात को भगवान विष्णु का स्मरण करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें। स्नान करें; संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें, नहीं तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ।
- साफ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें। सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं (अपना नाम, गोत्र) भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए आज आमलकी एकादशी का व्रत रखूँगा/रखूँगी। हे प्रभु, इस व्रत को निर्विघ्न पूरा करने की शक्ति दें।” फिर जल भूमि पर छोड़ दें।
- संकल्प में यह भी तय करें कि आप निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखेंगे।
भगवान विष्णु और आंवले की पूजा
- चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें और गंगाजल के छींटे दें।
- पीला चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़ा हुआ) अर्पित करें। घी का दीपक जलाकर आंवला, फल और पंचामृत का भोग लगाएँ।
- इसके बाद ऊपर बताई गई विधि से आंवले के पेड़ (या फल) की पूजा और परिक्रमा करें।
- व्रत कथा पढ़ें, विष्णु सहस्रनाम या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और अंत में “ओम जय जगदीश हरे” आरती करें।
शाम की पूजा और रात्रि जागरण
- शाम को फिर से दीपक जलाकर भगवान विष्णु की आरती करें। आंवले के पेड़ के पास भी एक दीपक रखें।
- इस एकादशी की कथा में रात्रि जागरण का बहुत महत्व बताया गया है। सामर्थ्य हो तो रात में भजन-कीर्तन, कथा और नाम-जप करते हुए जागरण करें।
- पूरी रात जागना संभव न हो तो कुछ घंटे भगवान के नाम में बिताकर विश्राम करें।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु और आंवले की पूजा करें।
- किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, आंवला, वस्त्र या कलश का दान करें।
- पारण के समय में (ऊपर की तालिका देखें) तुलसी दल डालकर जल ग्रहण करें और आंवला खाकर व्रत खोलें। इसके बाद सात्विक भोजन करें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र
- आंवले का पेड़, या पूजा के लिए ताजे आंवले / आंवले के पेड़ का चित्र
- चौकी और पीला कपड़ा
- तांबे, पीतल या मिट्टी का कलश, आम या अशोक के पत्ते, नारियल
- गंगाजल और शुद्ध जल
- रोली, पीला चंदन, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल, केवल पूजा के लिए)
- कच्चा सूत या मौली (कलावा)
- पीले फूल, फूलमाला और तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़ा हुआ)
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती, कपूर
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- मौसमी फल, आंवला, आंवले का मुरब्बा या सात्विक मिठाई
- पान, सुपारी, सिक्का या दक्षिणा
- परशुराम जी का चित्र (यदि आपकी परंपरा में पूजन होता है)
- व्रत कथा और आरती की पुस्तक
- दान के लिए आंवला, फल, वस्त्र या अनाज
आमलकी एकादशी के मंत्र
पूजा के समय नीचे दिए गए किसी भी मंत्र का शांत मन से जप करें। तुलसी की माला से 108 बार जप शुभ माना जाता है, पर श्रद्धा संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण / श्रीविष्णु) को नमस्कार करता हूँ, जो सब प्राणियों के भीतर निवास करते हैं। यह एकादशी का सबसे प्रचलित मंत्र है और आंवले की परिक्रमा करते समय भी इसका जप किया जा सकता है।
2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र
ॐ नमो नारायणाय॥
अर्थ: मैं भगवान नारायण को नमस्कार करता हूँ, जो पूरी सृष्टि का पालन करते हैं। यह छोटा और सरल मंत्र है, जिसे दिन भर चलते-फिरते भी मन में जपा जा सकता है।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम भगवान नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें।
4. परशुराम गायत्री मंत्र
ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि। तन्नो परशुराम प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम जमदग्नि के पुत्र का चिंतन करते हैं और महावीर का ध्यान करते हैं। भगवान परशुराम हमारी बुद्धि को प्रेरित करें। जिन परिवारों में आंवले के नीचे परशुराम पूजन होता है, वे इस मंत्र का जप करते हैं।
5. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्। विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्। वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: शांत रूप वाले, शेषनाग पर शयन करने वाले, संसार के आधार, लक्ष्मीपति और कमल-नयन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ, जो संसार के भय को दूर करते हैं और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं।
रंगभरी एकादशी: काशी विश्वनाथ और होली की शुरुआत
रंगभरी एकादशी क्या है?
फाल्गुन शुक्ल एकादशी को काशी (वाराणसी) में रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ, और इसके बाद इसी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ माता गौरा का गौना कराकर उन्हें पहली बार काशी लाए। इस खुशी में देवताओं और भक्तों ने उन पर फूल और रंग बरसाए।
इसी कारण यह दिन भगवान शिव के भक्तों के लिए भी बहुत खास है। काशी में कहा जाता है कि होली के रंगों की असली शुरुआत इसी दिन से होती है, और यहाँ से फाल्गुन पूर्णिमा तक होली का उत्सव चलता है। मान्यता के अनुसार यही एक ऐसी एकादशी है जिसका विशेष उत्सव भगवान शिव से जुड़ा है।
काशी विश्वनाथ मंदिर में रंगभरी एकादशी का उत्सव
गौने की रस्में एकादशी से कुछ दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। परंपरा के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत के टेढ़ीनीम स्थित आवास से बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती और भगवान गणेश (प्रथमेश) की चल प्रतिमा पालकी में सजाकर निकाली जाती है। पालकी विश्वनाथ गली से होते हुए मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचती है।
शोभायात्रा में भक्त “हर हर महादेव” के जयकारों के साथ बाबा पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं और मान्यता है कि इस दिन बाबा अपने भक्तों के साथ होली खेलते हैं। श्रद्धालु गंगा स्नान करके बाबा को गुलाल, दूध और मिठाई अर्पित करते हैं।
मसान की होली
रंगभरी एकादशी के अगले दिन काशी में प्रसिद्ध “मसान की होली” खेली जाती है। मान्यता है कि भगवान शिव अपने गणों, भूत-प्रेत और अघोरियों के साथ महाश्मशान (मणिकर्णिका घाट) पर चिता की भस्म से होली खेलते हैं। यह परंपरा जीवन और मृत्यु, दोनों को शिव के रूप में स्वीकार करने का प्रतीक मानी जाती है।
आमलकी और रंगभरी एकादशी एक ही दिन क्यों?
आमलकी और रंगभरी एकादशी अलग-अलग पर्व नहीं, बल्कि एक ही तिथि (फाल्गुन शुक्ल एकादशी) के दो रूप हैं। पूरे भारत में वैष्णव परंपरा में इस दिन भगवान विष्णु और आंवले की पूजा होती है, जबकि काशी में यह दिन बाबा विश्वनाथ के गौने और होली के आरंभ के रूप में प्रसिद्ध है।
बहुत से भक्त दोनों परंपराएँ साथ निभाते हैं — व्रत रखकर विष्णु और आंवले की पूजा करते हैं और शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और गुलाल भी अर्पित करते हैं। कई जगह इस दिन रुद्राभिषेक होता है। ब्रज में इसे रंगभरनी, श्रीनाथद्वारा में कुंज और खाटू श्याम मेले में खाटू एकादशी के नाम से जाना जाता है।
आमलकी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
क्या खा सकते हैं
- ताजे फल — केला, सेब, पपीता, अनार, अंगूर और विशेष रूप से आंवला
- दूध, दही, छाछ, पनीर और मखाना
- साबूदाना, कुट्टू (बकव्हीट) का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा
- उबला आलू, शकरकंद, अरबी और कद्दू
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
- मूंगफली, बादाम, काजू, अखरोट जैसे मेवे
- नारियल पानी, नींबू पानी, फलों का रस
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी चीजें — एकादशी पर चावल वर्जित माने जाते हैं
- गेहूँ, जौ, मक्का, दालें और सभी अनाज
- प्याज, लहसुन, मांस, अंडा, मछली और मदिरा
- साधारण नमक (केवल सेंधा नमक लें)
- पैकेट वाला खाना, जिसमें अनाज या साधारण नमक मिला हो
आमलकी एकादशी पर आंवला खाना
बहुत से लोग पूछते हैं कि क्या इस दिन आंवला खा सकते हैं। आंवला फल है, इसलिए फलाहार व्रत में इसे खाया जा सकता है। कई परिवारों में इस दिन आंवले का भोग लगाकर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है और द्वादशी पर आंवला खाकर पारण किया जाता है। पेड़ की पूजा के समय उस पर लगे फल न तोड़ें; पूजा के लिए आंवले पहले से ले आएँ।
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल, दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है और केवल स्वस्थ व्यक्तियों को ही रखना चाहिए। मार्च की बढ़ती गर्मी में निर्जला व्रत रखते समय कमजोरी या चक्कर आए तो जल ग्रहण करने में संकोच न करें।
फलाहार व्रत
फलाहार व्रत सबसे प्रचलित है। इसमें दिन में फल, दूध, मेवे और व्रत में खाई जाने वाली चीजें ली जाती हैं, पर अनाज और चावल नहीं। आमलकी एकादशी पर फलाहार में आंवले को शामिल करना इस दिन की परंपरा से मेल खाता है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो पूरा उपवास नहीं रख पाते, वे दिन में एक बार सात्विक फलाहारी भोजन (जैसे कुट्टू की पूरी या साबूदाना खिचड़ी) करके व्रत रख सकते हैं। बुजुर्गों और कमजोर लोगों के लिए यह अच्छा विकल्प है।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: मधुमेह, हृदय रोग, रक्तचाप, गर्भावस्था, स्तनपान या नियमित दवा लेने वाले लोग कोई भी कठोर व्रत (विशेषकर निर्जला) रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें। ऐसे में फलाहार या केवल नियम-संयम वाला व्रत भी भक्ति से रखा जा सकता है।
आमलकी एकादशी पारण कब और कैसे करें
पारण का अर्थ है व्रत खोलना। एकादशी का पारण अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद किया जाता है। पारण द्वादशी समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए।
हरि वासर: द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग को हरि वासर कहते हैं। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलें। सबसे अच्छा समय प्रातःकाल माना जाता है।
स्मार्त और वैष्णव: जब दो दिन एकादशी हो, तो स्मार्त पहले दिन और वैष्णव दूसरे दिन व्रत रखते हैं, और उसी अनुसार उनका पारण भी अलग दिन होता है। इस्कॉन जैसी वैष्णव परंपराओं में पारण की समय-सीमा थोड़ी लंबी हो सकती है। अपने शहर का सही पारण समय ऊपर दी गई तालिका में देखें या हमारा दैनिक पंचांग देखें।
पारण कैसे करें
- स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और आंवले के पेड़ को जल दें।
- किसी जरूरतमंद को भोजन, आंवला या फल दान करें।
- तुलसी दल डालकर थोड़ा जल पिएँ, फिर आंवला या प्रसाद खाकर व्रत खोलें और सात्विक भोजन करें।
आमलकी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु के साथ आंवले के पेड़ (या आंवले के फल) की पूजा और परिक्रमा करें।
- आमलकी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- सामर्थ्य हो तो रात्रि जागरण करें, जैसा कथा में बताया गया है।
- आंवला, फल, वस्त्र और भोजन का दान करें।
- संभव हो तो आंवले का एक पौधा लगाएँ।
- काशी में हों या शिवभक्त हों तो रंगभरी एकादशी पर शिवलिंग पर जल और गुलाल अर्पित करें।
क्या न करें
- चावल, अनाज, प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का सेवन न करें।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए एक दिन पहले तोड़कर रखें।
- आंवले के पेड़ की डाल या पत्ते न तोड़ें और पेड़ को नुकसान न पहुँचाएँ।
- क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और किसी का अपमान न करें।
- हरि वासर में या द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न करें।
- होली की मस्ती के नाम पर किसी को जबरदस्ती रंग न लगाएँ या नशा न करें।
आमलकी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: आंवले का पेड़ न हो तो आमलकी एकादशी का व्रत अधूरा रहता है।
सच्चाई: व्रत का मूल भगवान विष्णु की भक्ति, उपवास और संयम है। पेड़ उपलब्ध न हो तो आंवले के फल, चित्र या तुलसी की पूजा करके भी व्रत पूरा माना जाता है, जैसा कई परंपराएँ स्वयं बताती हैं।
मिथक: आमलकी एकादशी पर आंवला खाना मना है, क्योंकि उसी की पूजा होती है।
सच्चाई: आंवला फल है और फलाहार में खाया जा सकता है। कई परिवारों में आंवले का भोग लगाकर उसे प्रसाद रूप में लिया जाता है और आंवले से ही पारण किया जाता है। मनाही केवल पूजा किए जा रहे पेड़ को नुकसान पहुँचाने या उसके फल तोड़ने की है।
मिथक: रंगभरी एकादशी और आमलकी एकादशी दो अलग-अलग दिन हैं।
सच्चाई: दोनों एक ही तिथि, फाल्गुन शुक्ल एकादशी, के नाम हैं। काशी में यह दिन बाबा विश्वनाथ के गौने और होली के आरंभ के रूप में मनाया जाता है, और बाकी जगह विष्णु व आंवले की पूजा के रूप में। केवल पंचांग में स्मार्त-वैष्णव भेद से तारीख में कभी अंतर दिख सकता है।
मिथक: व्रत रखने से सब पाप अपने-आप मिट जाते हैं, फिर आचरण का कोई महत्व नहीं।
सच्चाई: शास्त्र व्रत को पापों से मुक्ति का साधन बताते हैं, पर साथ ही सत्य, अहिंसा और संयम पर भी जोर देते हैं। कथा में भी बहेलिये का अगला जन्म एक धर्मात्मा राजा के रूप में होता है जो सत्य और न्याय से चलता है। व्रत आचरण सुधारने की शुरुआत है, उसका विकल्प नहीं।
मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और अपशकुन होगा।
सच्चाई: अनजाने में हुई भूल के लिए भगवान से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और व्रत के बाकी नियम श्रद्धा से निभाएँ। एकादशी भय का नहीं, भक्ति का व्रत है। भूल को अपशकुन मानकर डरने की आवश्यकता नहीं।
मिथक: व्रत से शरीर पूरी तरह “डिटॉक्स” हो जाता है, इसलिए हर किसी को निर्जला व्रत रखना चाहिए।
सच्चाई: एकादशी का उद्देश्य आध्यात्मिक है, इसे किसी चिकित्सा उपाय की तरह नहीं देखना चाहिए। मधुमेह, गर्भावस्था, बुढ़ापा, कमजोरी या नियमित दवा की स्थिति में डॉक्टर की सलाह लेकर ही व्रत का प्रकार चुनें। फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत भी पूरी तरह मान्य है।
आमलकी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे दिए गए लाभ शास्त्रों और परंपरा में बताई गई मान्यताएँ हैं। इन्हें आस्था के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।
- परंपरा के अनुसार इस व्रत से जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है।
- व्रत कथा के अनुसार आमलकी एकादशी का पुण्य एक हजार गौदान के बराबर माना गया है।
- मान्यता है कि आंवले की पूजा और परिक्रमा से घर में सुख-समृद्धि और अच्छा स्वास्थ्य आता है।
- कथा में बताया गया है कि भगवान विष्णु अपने भक्त की संकट में रक्षा करते हैं, इसलिए भक्त इस दिन रक्षा और शांति की प्रार्थना करते हैं।
- जागरण, कथा-श्रवण, दान और वृक्ष-पूजा से मन शांत होता है और करुणा का भाव बढ़ता है।
- शास्त्रीय मान्यता के अनुसार श्रद्धा से यह व्रत करने वाला अंत में विष्णुलोक को प्राप्त होता है।
संबंधित एकादशी और पाठ
आमलकी एकादशी से ठीक पहले फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी आती है, जिसका व्रत भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पहले रखा था। आमलकी के बाद चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी आती है, जो पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती पढ़ें। आंवले का पेड़ न हो और आप तुलसी पूजन करें, तो तुलसी माता की आरती भी गा सकते हैं। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड करें।
आमलकी एकादशी हमें सिखाती है कि भगवान तक पहुँचने के लिए बड़े आडंबर की नहीं, सच्चे मन की जरूरत है — एक आंवले का पेड़, एक दीपक, एक रात का जागरण और श्रीहरि का नाम ही काफी है। इस दिन आंवले को जल दें, कथा सुनें और होली से पहले मन को प्रेम और क्षमा से भर लें। श्रीहरि और महादेव आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, हर हर महादेव।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
आमलकी एकादशी 2027 कब है?
आमलकी एकादशी 2026 (27 फरवरी) बीत चुकी है। अगली आमलकी एकादशी गुरुवार, 18 मार्च 2027 को है और पारण 19 मार्च की सुबह (नई दिल्ली में 07:12 से 08:52 बजे) होगा। अपने शहर और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तालिका में देखें।
आमलकी एकादशी किस महीने में आती है?
आमलकी एकादशी फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। शुक्ल पक्ष होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत, दोनों कैलेंडर में इसका महीना फाल्गुन ही रहता है। यह आमतौर पर फरवरी के अंत या मार्च में, होली से चार दिन पहले आती है।
इसे आमलकी एकादशी क्यों कहते हैं?
संस्कृत में आंवले को आमलकी कहते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ आंवले के वृक्ष की पूजा होती है, क्योंकि परंपरा के अनुसार आंवले में श्रीहरि का वास माना जाता है।
आमलकी एकादशी और रंगभरी एकादशी में क्या अंतर है?
दोनों एक ही तिथि (फाल्गुन शुक्ल एकादशी) के नाम हैं। सामान्य रूप से इस दिन विष्णु और आंवले की पूजा होती है, जबकि काशी में इसे रंगभरी एकादशी के रूप में बाबा विश्वनाथ के गौने और होली के आरंभ के उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
रंगभरी एकादशी पर काशी में क्या होता है?
मान्यता है कि इस दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती का गौना कराकर उन्हें काशी लाए थे। काशी विश्वनाथ मंदिर में शिव-पार्वती की चल प्रतिमा की पालकी यात्रा निकलती है, भक्त अबीर-गुलाल उड़ाते हैं और यहीं से काशी में होली की शुरुआत मानी जाती है।
आमलकी एकादशी की व्रत कथा क्या है?
प्रचलित कथा में वैदिश नगर के राजा चैतरथ और प्रजा आमलकी एकादशी पर आंवले की पूजा और जागरण करते हैं। वहाँ आया एक भूखा बहेलिया अनजाने में पूरी रात कथा सुनता और जागता है, और इस पुण्य से अगले जन्म में राजा वसुरथ बनता है, जिसकी रक्षा भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति करती है।
क्या आमलकी एकादशी की कथा राजा चित्रसेन से जुड़ी है?
कुछ हिंदी स्रोतों में संक्षिप्त कथा राजा चित्रसेन के नाम से मिलती है, जिसमें जंगल में लुटेरों से घिरे राजा की रक्षा उनके शरीर से प्रकट वैष्णवी शक्ति करती है। अधिकतर ग्रंथ-आधारित स्रोतों में वैदिश नगर, राजा चैतरथ और बहेलिये वाली कथा मिलती है; दोनों का संदेश एक ही है।
आमलकी एकादशी पर आंवले के पेड़ की पूजा कैसे करें?
पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें, तने पर रोली, चंदन और अक्षत लगाएँ, फूल चढ़ाएँ और कच्चा सूत या मौली लपेटते हुए परिक्रमा करें। घी का दीपक जलाकर आंवले का भोग लगाएँ और पेड़ के नीचे बैठकर व्रत कथा पढ़ें।
घर में आंवले का पेड़ न हो तो पूजा कैसे करें?
पूजा स्थान पर ताजे आंवले या आंवले के पेड़ का चित्र रखकर उनकी पूजा करें और भगवान विष्णु को आंवले का भोग लगाएँ। इस्कॉन परंपरा के अनुसार आंवले का पेड़ न मिले तो तुलसी माता की पूजा की जा सकती है।
आमलकी एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
मुख्य रूप से भगवान विष्णु और आंवले (धात्री) के वृक्ष की पूजा होती है। कुछ परंपराओं में आंवले के नीचे भगवान परशुराम का भी पूजन होता है, और काशी में इसी दिन बाबा विश्वनाथ व माता पार्वती का उत्सव मनाया जाता है।
आमलकी एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?
सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। इसके साथ “ॐ नमो नारायणाय”, विष्णु गायत्री मंत्र और परशुराम पूजन करने वाले परिवार परशुराम गायत्री मंत्र का जप भी करते हैं।
क्या आमलकी एकादशी पर आंवला खा सकते हैं?
हाँ, आंवला फल है, इसलिए फलाहार व्रत में खाया जा सकता है। कई परिवार आंवले का भोग लगाकर प्रसाद के रूप में लेते हैं और द्वादशी पर आंवला खाकर पारण करते हैं; बस जिस पेड़ की पूजा कर रहे हैं, उसके फल न तोड़ें।
आमलकी एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
फल (विशेषकर आंवला), दूध, दही, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक लिया जा सकता है। चावल, गेहूँ, दालें, प्याज, लहसुन और साधारण नमक नहीं लेना चाहिए।
क्या एकादशी के व्रत में पानी पी सकते हैं?
निर्जला व्रत में पानी नहीं पिया जाता, लेकिन फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी, नारियल पानी और फलों का रस लिया जा सकता है। स्वास्थ्य ठीक न हो तो निर्जला व्रत न रखें।
आमलकी एकादशी पर चावल क्यों नहीं खाते?
परंपरा में सभी एकादशियों पर चावल और अनाज का सेवन वर्जित माना गया है। इसलिए आमलकी एकादशी पर भी चावल नहीं खाए जाते; चावल केवल पूजा में अक्षत के रूप में प्रयोग होते हैं।
आमलकी एकादशी का पारण कब और कैसे करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले करें। तुलसी दल डालकर जल लें और आंवला या प्रसाद खाकर व्रत खोलें; अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।
स्मार्त और वैष्णव आमलकी एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो दिन के सूर्योदय को छूती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव (जैसे इस्कॉन) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। 2027 में नई दिल्ली के लिए दोनों की तारीख 18 मार्च दिख रही है, फिर भी अपने संप्रदाय के पंचांग से पुष्टि करें।
क्या गर्भवती महिलाएँ और बुजुर्ग आमलकी एकादशी का व्रत रख सकते हैं?
हाँ, लेकिन कठोर या निर्जला व्रत की जगह फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत चुनें और पहले डॉक्टर से सलाह लें। मधुमेह या नियमित दवा लेने वालों के लिए भी यही सावधानी जरूरी है।
अगर गलती से आमलकी एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें?
भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन के नियम श्रद्धा से निभाएँ। एकादशी भय का नहीं, भक्ति का व्रत है।
आमलकी एकादशी से पहले और बाद में कौन सी एकादशी आती है?
इससे पहले फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी आती है और इसके बाद चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी। दोनों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।