निर्जला एकादशी (Nirjala Ekadashi) ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे साल की सबसे कठिन और सबसे पुण्यदायी एकादशी माना जाता है। “निर्जला” का अर्थ है बिना जल के, यानी इस दिन भक्त अन्न के साथ-साथ पानी का भी त्याग करते हैं। परंपरा के अनुसार यह एक व्रत साल भर की सभी एकादशियों का फल देता है।
इस एकादशी को भीमसेनी एकादशी और पांडव एकादशी भी कहते हैं। कथा है कि भूख सहन न कर पाने वाले पांडुपुत्र भीमसेन ने महर्षि वेदव्यास से ऐसा एक व्रत पूछा था, जिससे सभी एकादशियों का पुण्य मिल जाए। व्यासजी ने उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जल व्रत बताया था।
यह व्रत भीषण गर्मी के समय आता है, इसलिए इस दिन जल दान, पानी से भरा घड़ा, शरबत, पंखा और छाता दान करने की विशेष परंपरा है। इस लेख में आप निर्जला एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि, मंत्र, जल और आचमन के नियम, दान का महत्व और स्वास्थ्य से जुड़ी ज़रूरी सावधानियाँ विस्तार से जानेंगे।
निर्जला एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: निर्जला एकादशी 2026 (25 जून) बीत चुकी है। अगली निर्जला एकादशी सोमवार, 14 जून 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 14 जून 2027 को रात लगभग 2:11 बजे से 15 जून को रात लगभग 2:07 बजे तक रहेगी। 15 जून को हरिवासर सुबह लगभग 8:15 बजे तक है, इसलिए पारण का समय दोपहर लगभग 1:45 से 4:32 बजे के बीच बताया गया है।
अगली निर्जला एकादशी
निर्जला एकादशी 2027
14 जून 2027, सोमवार 225 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- ज्येष्ठ शुक्ल
- एकादशी तिथि
- 14 जून 02:13 – 15 जून 02:09
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 15 जून, 13:45 – 16:32
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 25 जून 2026, गुरुवार | 24 जून 18:14 – 25 जून 20:11 | 26 जून, 05:25 – 08:12 |
| 2027 | 14 जून 2027, सोमवार | 14 जून 02:13 – 15 जून 02:09 | 15 जून, 13:45 – 16:32 |
| 2028 | 3 जून 2028, शनिवार | 2 जून 19:34 – 3 जून 17:27 | 4 जून, 05:23 – 08:09 |
| 2029 | 22 जून 2029, शुक्रवार | 21 जून 21:18 – 22 जून 18:36 | 23 जून, 05:24 – 08:12 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदलता है। 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) परंपरा में व्रत 14 जून को है, जबकि इस्कॉन जैसी वैष्णव परंपरा में अगले दिन 15 जून को “पक्षवर्धिनी महाद्वादशी” के रूप में व्रत रखा जाएगा। अपने कुल या संप्रदाय की परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
निर्जला एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“निर्जला” शब्द दो भागों से बना है: “निर्” यानी बिना और “जल” यानी पानी। इसलिए निर्जला एकादशी का सीधा अर्थ है वह एकादशी जिसमें जल भी ग्रहण न किया जाए। बाकी एकादशियों में फल, दूध और पानी लेने की छूट होती है, पर इस एकादशी का मूल नियम जल का त्याग ही है।
निर्जला एकादशी के अन्य नाम
- भीमसेनी एकादशी (Bhimseni Ekadashi): भीमसेन ने यह व्रत किया था, इसलिए यह नाम सबसे अधिक प्रचलित है। इसे भीम एकादशी या भीमसेन एकादशी भी कहते हैं।
- पांडव एकादशी (Pandava Ekadashi): पांचों पांडवों और भीम से जुड़ी होने के कारण यह नाम मिला। इस्कॉन कैलेंडर में इसे “पांडव निर्जला एकादशी” लिखा जाता है।
- पांडव द्वादशी: कुछ कथा-ग्रंथों में लिखा है कि भीम के व्रत के बाद यह तिथि लोक में पांडव द्वादशी नाम से भी जानी गई।
- ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी: पंचांग में तिथि के आधार पर दिया जाने वाला नाम।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
निर्जला एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी है, इसलिए उत्तर भारत के पूर्णिमांत और दक्षिण-पश्चिम भारत के अमांत, दोनों पंचांगों में यह ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी ही कहलाती है। शुक्ल पक्ष में महीने का नाम दोनों कैलेंडर में एक जैसा रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः मई के अंत से जून के बीच आती है।
कथा में व्यासजी बताते हैं कि यह वह ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी है, जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हों। इससे ठीक एक दिन पहले, ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को, कई स्थानों पर गंगा दशहरा मनाया जाता है, इसलिए बहुत से श्रद्धालु दशमी को गंगा स्नान करके अगले दिन निर्जला व्रत रखते हैं।
निर्जला एकादशी का महत्व
साल में सामान्य रूप से 24 एकादशियाँ आती हैं और अधिक मास वाले वर्ष में 26। इन सब में निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ कहा गया है। इसका कारण केवल इसकी कठिनाई नहीं है, बल्कि वह करुणा भी है जो इसकी कथा में दिखती है: जो व्यक्ति हर एकादशी का व्रत नहीं कर पाता, उसके लिए भी भगवान की कृपा का एक रास्ता खुला है।
धार्मिक महत्व
परंपरा के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है। कथा में कहा गया है कि इस दिन किया गया स्नान, दान, जप और होम “अक्षय” होता है, यानी उसका पुण्य कभी कम नहीं होता।
कथा यह भी बताती है कि इस व्रत को श्रद्धा से करने वाले के पास अंत समय में यमदूत नहीं आते, बल्कि पीतांबर धारण किए विष्णुदूत उसे भगवान के धाम ले जाते हैं। ये बातें आस्था और माहात्म्य का हिस्सा हैं, जिन्हें भक्त श्रद्धा से सुनते और मानते हैं।
आध्यात्मिक संदेश
निर्जला एकादशी का सबसे सुंदर संदेश है ईमानदारी और विनम्रता। भीमसेन जैसे महाबली ने भी अपने गुरु के सामने अपनी कमज़ोरी छिपाई नहीं, बल्कि साफ़ कहा कि “मुझसे भूख सहन नहीं होती”। गुरु ने उन्हें डाँटा नहीं, बल्कि उनकी क्षमता के अनुसार एक रास्ता दिखाया।
दूसरा संदेश है प्यास का अर्थ समझना। एक दिन पानी के बिना रहकर व्यक्ति समझ पाता है कि गर्मी में प्यासे जीव को कैसा लगता है। इसीलिए यह व्रत दूसरों को जल पिलाने की सेवा से भी जुड़ा है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार निर्जला एकादशी की कथा और माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण से जोड़ा जाता है। प्रचलित हिंदी कथाओं में यह संवाद भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के प्रसंग में आता है, जहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि इसका वर्णन सत्यवतीनंदन व्यासजी करेंगे। कुछ परंपराओं में यही कथा सूतजी शौनक आदि ऋषियों को सुनाते हैं।
निर्जला एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी के व्रत और उसके फल के बारे में पूछा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि इस व्रत का वर्णन धर्म और शास्त्रों के महान ज्ञाता, सत्यवती के पुत्र महर्षि वेदव्यास करेंगे। तब व्यासजी ने यह कथा सुनाई।
व्यासजी का उपदेश: दोनों पक्षों की एकादशी
व्यासजी ने पांडवों को एकादशी का सामान्य नियम बताया। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों, यानी कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी को अन्न नहीं खाना चाहिए। द्वादशी को स्नान करके भगवान केशव की पूजा करें, पहले ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ और उसके बाद स्वयं भोजन करें।
पांडव परिवार में युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, सभी नियम से एकादशी का व्रत करते थे। वे भीम से भी कहते थे कि एकादशी के दिन भोजन मत करो। पर भीमसेन के लिए यह सबसे कठिन काम था।
भीमसेन की कठिनाई: “वृक” नाम की अग्नि
भीमसेन ने हाथ जोड़कर व्यासजी से कहा, “पितामह, मैं भगवान की पूजा कर सकता हूँ, दान दे सकता हूँ, पर भूखा नहीं रह सकता। मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की अग्नि हमेशा जलती रहती है। जब तक मैं बहुत सारा भोजन नहीं कर लेता, वह शांत नहीं होती। मैं तो दिन में एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं निभा पाता।”
भीम ने आगे कहा, “मैं साल में मुश्किल से एक ही उपवास कर सकता हूँ। आप मुझे ऐसा कोई एक व्रत बताइए, जिससे मुझे स्वर्ग और कल्याण की प्राप्ति हो जाए और सभी एकादशियों का फल मिल जाए।” व्यासजी ने पहले उन्हें समझाया कि स्वर्ग चाहिए तो दोनों पक्षों की एकादशी का पालन करो। पर भीम ने अपनी असमर्थता फिर से सच्चे मन से बताई।
व्यासजी का समाधान: एक निर्जल व्रत
भीम की सच्चाई देखकर व्यासजी ने कहा, “ज्येष्ठ मास में, जब सूर्य वृष या मिथुन राशि में हों, उस समय शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका तुम निर्जल व्रत करो। उस दिन अन्न तो दूर, जल भी ग्रहण मत करना।”
व्यासजी ने जल का नियम भी स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि केवल कुल्ला करने या आचमन के लिए मुख में थोड़ा जल डाला जा सकता है। इसके अलावा जो जल पिया जाए, उससे व्रत भंग हो जाता है। एकादशी के सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन, यानी द्वादशी के सूर्योदय तक जल का त्याग करने से यह व्रत पूरा होता है।
फिर व्यासजी ने द्वादशी का नियम बताया: “द्वादशी को सुबह स्नान करके ब्राह्मणों को विधि से जल और स्वर्ण का दान करो। उसके बाद संयमी ब्राह्मणों के साथ स्वयं भोजन करो।” उन्होंने कहा कि ऐसा करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल मिल जाता है।
व्रत का फल, जैसा कथा में बताया गया
व्यासजी ने बताया कि यह बात स्वयं भगवान केशव ने उनसे कही थी। जो व्यक्ति सब कुछ छोड़कर केवल भगवान की शरण लेता है और एकादशी का निर्जल व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। कथा के अनुसार इस व्रत से मेरु पर्वत जितने बड़े पाप भी भस्म हो जाते हैं।
कथा में यह भी कहा गया है कि इस व्रत को करने वाले के पास अंत समय में हाथ में दंड और पाश लिए भयानक यमदूत नहीं आते। उसकी जगह पीले वस्त्र पहने, सौम्य रूप वाले, सुदर्शन धारण किए विष्णुदूत आते हैं और उसे भगवान विष्णु के धाम ले जाते हैं। जो व्रत, पूजा और रात्रि जागरण करता है, उसकी आगे और पीछे की पीढ़ियों के कल्याण की बात भी माहात्म्य में कही गई है।
भीमसेन का व्रत और नाम
व्यासजी की बात सुनकर भीमसेन ने पूरे साहस से ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का निर्जल व्रत किया। उन्होंने पूरा दिन बिना अन्न और बिना जल के भगवान विष्णु का स्मरण करते हुए बिताया और द्वादशी को विधि से पारण किया। तभी से यह एकादशी “भीमसेनी” या “पांडव” एकादशी के नाम से प्रसिद्ध हो गई।
कथा का फल और सीख
परंपरा के अनुसार जो व्यक्ति इस कथा को श्रद्धा से सुनता या सुनाता है, उसे भी पुण्य मिलता है। इसलिए व्रत के दिन, पूजा के बाद, परिवार के साथ बैठकर यह कथा पढ़ने की परंपरा है।
इस कथा की सीख यह है कि अपनी कमज़ोरी को बड़ों और गुरु से छिपाना नहीं चाहिए। सच्चे मन से अपनी स्थिति बताने पर ही सही मार्ग मिलता है। और यह भी कि भगवान को कठोरता से अधिक श्रद्धा प्रिय है: भीम ने वही किया जो उनकी सामर्थ्य में था, पर पूरे मन से किया।
निर्जला एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार हल्का, सात्विक भोजन करें। परंपरा में दशमी की शाम चावल न खाने की बात कही गई है।
- दशमी की शाम संध्या-वंदन या भगवान का स्मरण करें और मन में अगले दिन के व्रत का निश्चय करें।
- दशमी को दिन भर भरपूर पानी पिएँ, ताकि शरीर में पानी की कमी लेकर व्रत शुरू न हो। तला-भुना, बहुत नमकीन और मसालेदार भोजन न करें, क्योंकि इससे प्यास बढ़ती है।
- पूजा के लिए तुलसी दल दशमी को ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
- दान के लिए मिट्टी का घड़ा या कलश, पंखा, छाता, फल आदि पहले से तैयार कर लें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें, दाँत साफ़ करें और स्नान करें। संभव हो तो पानी में गंगाजल मिलाएँ।
- साफ़ कपड़े पहनें। पीले वस्त्र भगवान विष्णु को प्रिय माने जाते हैं।
- पूजा स्थान पर बैठकर हाथ में थोड़ा जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: “मैं (अपना नाम) आज निर्जला एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए रख रहा/रही हूँ। आचमन के सिवा मैं जल और अन्न का त्याग करूँगा/करूँगी।” जो लोग स्वास्थ्य के कारण जल या फल लेंगे, वे संकल्प में यही बात कहें।
- संकल्प का जल भगवान के चरणों में या किसी पात्र में छोड़ दें, उसे पिएँ नहीं।
भगवान विष्णु की पूजा
- चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या शालिग्राम जी को स्थापित करें। साथ में लक्ष्मी जी का चित्र भी रख सकते हैं।
- भगवान को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से स्नान कराकर साफ़ वस्त्र पहनाएँ।
- चंदन, पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। घी का दीपक और धूप जलाएँ।
- गर्मी के इस व्रत में भगवान को पंखा अर्पित करने और उनके सामने पंखा झलने की भी परंपरा है।
- फल और मिठाई का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल ज़रूर रखें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें। समय हो तो विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
- निर्जला एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें और फिर ओम जय जगदीश हरे आरती तथा एकादशी माता की आरती करें।
दिन भर और शाम की पूजा
- दिन में धूप में बाहर निकलने और भारी काम से बचें। ठंडी, छायादार जगह पर रहें और भजन, जप या धार्मिक पुस्तक पढ़ने में समय बिताएँ।
- पूजा के बाद जल से भरा घड़ा, शरबत, पंखा, छाता या फल का दान करें (नीचे दान वाला भाग देखें)।
- शाम को फिर दीपक जलाएँ, भगवान को दूर्वा और फूल अर्पित करें और आरती करें। तुलसी जी के पास भी दीपक जलाएँ।
- क्रोध, निंदा और झूठ से बचें। व्रत का अर्थ केवल भूख-प्यास सहना नहीं, मन को शांत रखना भी है।
रात्रि जागरण
- परंपरा में निर्जला एकादशी की रात जागरण करके भजन-कीर्तन करने का बड़ा महत्व बताया गया है।
- पूरी रात जागना संभव न हो तो देर रात तक भजन करके कुछ समय आराम कर लें। निर्जल व्रत में शरीर पहले से थका होता है, इसलिए अपनी क्षमता का ध्यान रखें।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और भगवान विष्णु की पूजा करें।
- संभव हो तो किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और जल, वस्त्र, दक्षिणा आदि का दान करें।
- पंचांग में दिए पारण समय में तुलसी दल डालकर भगवान का चरणामृत या जल लेकर व्रत खोलें, फिर हल्का सात्विक भोजन करें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या शालिग्राम जी की प्रतिमा या चित्र
- चौकी और पीला कपड़ा
- पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
- गंगाजल और शुद्ध जल से भरा कलश
- तुलसी दल (दशमी को तोड़कर रखा हुआ)
- पीले फूल, फूलमाला और दूर्वा
- चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती और कपूर
- भोग के लिए मौसमी फल (आम, खरबूजा, तरबूज आदि) और मिठाई
- भगवान को अर्पित करने के लिए हाथ का पंखा
- दान के लिए मिट्टी का घड़ा या कलश, ढकने के लिए कपड़ा, शक्कर, फल, पंखा, छाता और दक्षिणा
- निर्जला एकादशी व्रत कथा की पुस्तक या यह पेज
निर्जला एकादशी के मंत्र
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण/विष्णु) को प्रणाम करता हूँ। यह बारह अक्षरों का मंत्र एकादशी का सबसे प्रमुख मंत्र है। निर्जला एकादशी पर दिन भर इसका जप करने की परंपरा है।
2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र
ॐ नमो नारायणाय॥
अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। यह आठ अक्षरों का सरल मंत्र है, जिसे बुज़ुर्ग, बच्चे और काम करते हुए लोग भी मन ही मन जप सकते हैं।
3. जल कुम्भ दान का मंत्र
देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥
अर्थ: हे देवों के देव, हे हृषीकेश, हे संसार रूपी सागर से पार लगाने वाले भगवान, इस जल से भरे कलश के दान से मुझे परम गति प्रदान कीजिए। यह मंत्र निर्जला एकादशी की कथा में जल से भरा घड़ा दान करते समय बोलने के लिए बताया गया है।
4. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं, आकाश के समान व्यापक और बादल जैसे श्याम वर्ण वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति और कमल नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, जो संसार का भय हरते हैं और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
पूजा आरंभ करते समय इस श्लोक से भगवान का ध्यान करें, फिर द्वादशाक्षर मंत्र का जप शुरू करें।
निर्जला एकादशी पर जल दान: घड़ा, कलश, शरबत, पंखा और छाता
निर्जला एकादशी का दान बाकी एकादशियों से अलग है, क्योंकि यह गर्मी के मौसम और प्यास से सीधे जुड़ा है। व्रत रखने वाला स्वयं जल नहीं पीता, पर दूसरों को जल पिलाता है। यही इस व्रत का सबसे सुंदर रूप है।
जल से भरा घड़ा या कलश दान
कथा में शक्कर के साथ जल से भरे घड़े के दान का उल्लेख मिलता है। परंपरा में मिट्टी के घड़े या कलश में ठंडा जल भरकर, उसे कपड़े से ढककर, ऊपर थोड़ी शक्कर या फल रखकर दान किया जाता है। कुछ परंपराओं में घड़े के साथ थोड़ा स्वर्ण या दक्षिणा भी दी जाती है। दान करते समय ऊपर दिया गया “उदकुम्भ” मंत्र बोल सकते हैं।
शरबत और जल सेवा (प्याऊ)
बहुत से शहरों और गाँवों में निर्जला एकादशी पर लोग सड़कों के किनारे शरबत और ठंडे पानी की छबील या प्याऊ लगाते हैं। राहगीरों, मज़दूरों, रिक्शा चालकों और प्यासे लोगों को शरबत पिलाना इस दिन बहुत बड़ी सेवा मानी जाती है। पक्षियों के लिए छत पर पानी का बर्तन और पशुओं के लिए पानी की व्यवस्था करना भी इसी भाव का हिस्सा है।
पंखा, छाता और जूते-चप्पल का दान
गर्मी से बचाने वाली चीज़ें इस दिन के दान में विशेष हैं। हाथ का पंखा, छाता और जूते या चप्पल दान करने की परंपरा पुरानी है। कथा में सुपात्र को जूता दान करने का भी विशेष फल बताया गया है। धूप में काम करने वाले लोगों को छाता या चप्पल देना आज के समय में भी बहुत काम की सेवा है।
अन्न, वस्त्र, फल और गौ दान
कथा में अन्न, वस्त्र, शय्या, आसन, कमंडलु, छाता और गौ दान का भी उल्लेख है। आम, खरबूजा, तरबूज जैसे मौसमी फल दान करना भी शुभ माना जाता है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो भी दें, सम्मान के साथ दें।
दान करते समय ध्यान रखें
- दान अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार करें। दिखावे या कर्ज़ लेकर दान की ज़रूरत नहीं है।
- घड़ा या कलश साफ़ हो और जल शुद्ध हो। शरबत साफ़ बर्तनों में और ताज़ा बनाएँ।
- कुछ लोकप्रचलित मान्यताओं में एकादशी पर नमक, तेल और नुकीली चीज़ें दान न करने की बात कही जाती है।
निर्जला व्रत का 24 घंटे का नियम और आचमन
सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक
कथा के अनुसार निर्जला व्रत एकादशी के सूर्योदय से शुरू होकर द्वादशी के सूर्योदय तक, यानी लगभग 24 घंटे का होता है। इस पूरे समय में अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। कुछ परंपराओं में लोग सूर्योदय से सूर्यास्त तक निर्जल रहते हैं और फिर व्रत के नियमों के अनुसार जल लेते हैं।
ध्यान दें कि जल-त्याग का नियम द्वादशी के सूर्योदय तक है, जबकि अन्न से पारण पंचांग में दिए पारण समय में होता है। 2027 जैसे वर्षों में जब हरिवासर के कारण पारण दोपहर में हो, तो सूर्योदय और पारण के बीच जल लेने के बारे में अपनी परंपरा या पुरोहित से मार्गदर्शन लें। स्वास्थ्य को खतरे में डालकर इंतज़ार न करें।
आचमन का अपवाद
व्यासजी ने कथा में साफ़ कहा है कि केवल कुल्ला करने या आचमन के लिए मुख में जल डाला जा सकता है। आचमन में हथेली पर बहुत थोड़ा जल लेकर पूजा से पहले शुद्धि की जाती है। कुछ ग्रंथ-अनुवादों में आचमन के जल की मात्रा भी बहुत छोटी (कुछ बूँदों जितनी) बताई गई है। इससे ज़्यादा जल पीने को व्रत भंग माना जाता है।
कुछ परंपरागत व्याख्याओं में यह भी कहा गया है कि स्नान या आचमन करते समय अनजाने में थोड़ा जल गले में चला जाए तो उसे दोष नहीं माना जाता। इसलिए स्नान करते समय डरने की ज़रूरत नहीं है।
निर्जला व्रत और स्वास्थ्य: किसे सावधान रहना चाहिए
निर्जला एकादशी जून की तेज़ गर्मी में आती है, जब बिना पानी के 24 घंटे रहना शरीर के लिए सचमुच कठिन होता है। श्रद्धा के साथ समझदारी भी ज़रूरी है। नीचे दी गई बातें चिकित्सा सलाह नहीं, बल्कि सावधानी हैं। अपनी स्थिति के बारे में अपने डॉक्टर से बात ज़रूर करें।
किन लोगों को निर्जल व्रत से पहले डॉक्टर से पूछना चाहिए
- डायबिटीज़ (शुगर) के मरीज़: बिना खाए-पिए शुगर बहुत कम (हाइपोग्लाइसीमिया) या बहुत ज़्यादा हो सकती है। इंसुलिन या शुगर की कई दवाओं की खुराक व्रत के दिन बदलनी पड़ सकती है, जो केवल डॉक्टर तय कर सकते हैं।
- गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएँ: इस समय शरीर को पानी और पोषण की लगातार ज़रूरत होती है। इनके लिए निर्जल व्रत उचित नहीं माना जाता।
- बुज़ुर्ग: उम्र के साथ प्यास का एहसास कम हो जाता है और पानी की कमी जल्दी होती है।
- बच्चे और किशोर: इन्हें निर्जल व्रत न रखवाएँ।
- किडनी, पथरी, हृदय रोग या ब्लड प्रेशर के मरीज़: पानी की कमी इन स्थितियों को बिगाड़ सकती है।
- नियमित दवा लेने वाले: विशेषकर पेशाब बढ़ाने वाली (डाइयुरेटिक), बीपी, शुगर, मिर्गी या मानसिक स्वास्थ्य की दवाएँ। डॉक्टर से पूछे बिना कोई दवा न छोड़ें।
- हाल में बीमार रहे लोग: जिन्हें हाल में बुखार, दस्त या उल्टी हुई हो, या कोई ऑपरेशन हुआ हो।
- धूप में काम करने वाले: खेत, निर्माण या बाहर के काम में लगे लोगों के लिए निर्जल व्रत खतरनाक हो सकता है।
इन लोगों के लिए विकल्प
जो लोग निर्जल व्रत नहीं रख सकते, वे जल लेकर व्रत रखें, या फल, दूध, नारियल पानी और फलाहार के साथ व्रत करें। कई परंपराएँ स्पष्ट कहती हैं कि बीमार, बुज़ुर्ग और गर्भवती महिलाएँ फल या दूध लेकर व्रत कर सकती हैं। भीमसेन की कथा भी यही बताती है कि भगवान सामर्थ्य के अनुसार की गई सच्ची भक्ति स्वीकार करते हैं।
व्रत के दौरान खतरे के संकेत
अगर व्रत के दौरान बहुत चक्कर आए, बेहोशी जैसा लगे, दिल की धड़कन बहुत तेज़ हो, भ्रम या उलझन हो, पेशाब बहुत कम या बहुत गहरे रंग का हो, शरीर बहुत गर्म हो और पसीना आना बंद हो जाए, तो तुरंत पानी लें और डॉक्टर से संपर्क करें। ऐसी स्थिति में जल लेना धर्म के विरुद्ध नहीं है। जीवन की रक्षा सबसे पहला कर्तव्य है।
निर्जला एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
क्या ले सकते हैं (जल या फलाहार व्रत में)
- पानी, नारियल पानी, नींबू पानी (सेंधा नमक के साथ) और छाछ
- दूध, दही और पनीर
- मौसमी फल जैसे तरबूज, खरबूजा, आम, केला, पपीता
- कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा, साबूदाना, समा के चावल
- आलू, शकरकंद, अरबी जैसी सब्ज़ियाँ
- मूँगफली, मखाना और सूखे मेवे
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़
- गेहूँ, जौ, दालें और सभी सामान्य अनाज
- प्याज़, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और शराब
- साधारण नमक (व्रत में सेंधा नमक लें)
- बहुत तला-भुना, मसालेदार भोजन, जिससे गर्मी में प्यास और बढ़ती है
निर्जला व्रत
यह इस एकादशी का मूल और सबसे कठोर रूप है। इसमें सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक न अन्न लिया जाता है, न जल। केवल आचमन की छूट है। यह व्रत केवल वही रखें जो पूरी तरह स्वस्थ हों और जिन्होंने पहले उपवास किया हो।
फलाहार व्रत
जो लोग निर्जल नहीं रह सकते, वे जल और फल लेकर व्रत करें। दिन में थोड़ा-थोड़ा पानी, फल और दूध लें। अन्न का त्याग करें। यह भी एकादशी का मान्य रूप है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग फलाहार पर भी पूरा दिन नहीं रह सकते, जैसे बहुत बुज़ुर्ग या कमज़ोर व्यक्ति, वे दिन में एक बार सात्विक फलाहारी भोजन ले सकते हैं। भीमसेन ने भी कथा में स्वीकार किया था कि उनसे एक समय भोजन वाला व्रत तक नहीं निभता, इसलिए यह रूप भी परंपरा में जाना-पहचाना है।
निर्जला एकादशी पारण कब और कैसे करें
एकादशी व्रत को अगले दिन, द्वादशी तिथि में खोलना “पारण” कहलाता है। सही समय पर पारण करना व्रत का ज़रूरी हिस्सा माना जाता है।
- द्वादशी में पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले, सूर्योदय के बाद करना चाहिए।
- हरिवासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग “हरिवासर” कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। 2027 में हरिवासर 15 जून की सुबह तक है, इसलिए पारण दोपहर में बताया गया है।
- मध्याह्न से बचें: पंचांग प्रायः सुबह (प्रातःकाल) पारण को श्रेष्ठ मानते हैं। अगर हरिवासर के कारण सुबह संभव न हो, तो मध्याह्न के बाद पारण का समय दिया जाता है।
- स्मार्त और वैष्णव: जिन वर्षों में दोनों परंपराओं के व्रत के दिन अलग हों, उनके पारण के दिन भी अलग होते हैं। वैष्णव (इस्कॉन) परंपरा के पारण समय उनके अपने कैलेंडर से देखें।
- सही समय: अपने शहर का सटीक पारण समय इस पेज की ऊपर दी गई तालिका में देखें।
पारण कैसे करें
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
- पारण समय में सबसे पहले तुलसी दल डालकर भगवान का चरणामृत या थोड़ा जल लें।
- पानी एक साथ बहुत ज़्यादा न पिएँ। धीरे-धीरे, छोटे घूँट में पिएँ। नींबू पानी, नारियल पानी या छाछ अच्छे विकल्प हैं।
- फिर हल्का सात्विक भोजन करें। पारण के भोजन में प्याज़-लहसुन न डालें।
- बहुत भारी, तला हुआ या बहुत मीठा भोजन एक साथ न करें, क्योंकि 24 घंटे बाद पेट को धीरे-धीरे सामान्य होने का समय चाहिए।
निर्जला एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- भगवान विष्णु की पूजा करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
- जल से भरा घड़ा, शरबत, पंखा, छाता या फल दान करें।
- पक्षियों और पशुओं के लिए पानी रखें।
- दिन में ठंडी, छायादार जगह पर रहें और आराम करें।
- द्वादशी को सही समय पर पारण करें।
- अपने शरीर के संकेतों पर ध्यान दें और ज़रूरत हो तो जल लें।
क्या न करें
- चावल, अनाज, प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन न करें।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
- धूप में लंबे समय तक न रहें और भारी शारीरिक काम या कसरत न करें।
- क्रोध, झगड़ा, निंदा और झूठ से बचें।
- डॉक्टर से पूछे बिना अपनी नियमित दवा न छोड़ें।
- किसी बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती महिला या बच्चे पर निर्जल व्रत रखने का दबाव न डालें।
निर्जला एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: निर्जला एकादशी कर ली तो बाकी एकादशियों का व्रत रखने की कोई ज़रूरत नहीं।
सच्चाई: कथा में व्यासजी ने पहले यही कहा था कि दोनों पक्षों की एकादशी का पालन करना चाहिए। निर्जला एकादशी का विधान भीमसेन की असमर्थता को देखकर दिया गया था। इसलिए जो लोग नियमित एकादशी रख सकते हैं, परंपरा उन्हें वह जारी रखने को कहती है। जो नहीं रख सकते, उनके लिए यह एक व्रत बड़ा सहारा माना गया है।
मिथक: नहाते समय या आचमन में पानी की एक बूँद भी गले में गई तो व्रत टूट गया।
सच्चाई: कथा में स्वयं आचमन और कुल्ले की छूट दी गई है। कुछ परंपरागत व्याख्याओं में यह भी कहा गया है कि स्नान या आचमन के दौरान अनजाने में थोड़ा जल चला जाए तो वह दोष नहीं है। व्रत का संबंध जानबूझकर पानी पीने से है, अनजानी बूँदों से नहीं।
मिथक: तबीयत बिगड़ने पर भी पानी पी लिया तो बहुत बड़ा पाप लगेगा।
सच्चाई: धर्म का उद्देश्य जीवन की रक्षा है, उसे खतरे में डालना नहीं। चक्कर, बेहोशी या पानी की गंभीर कमी के लक्षण हों तो जल लेना ही सही है। बाद में भगवान से क्षमा माँगकर, जप और दान करके व्रत का भाव पूरा किया जा सकता है। भय के कारण अपने स्वास्थ्य को खतरे में न डालें।
मिथक: निर्जल न रख पाए तो इस एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।
सच्चाई: निर्जल व्रत इस एकादशी का आदर्श रूप है, पर बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती और कमज़ोर लोगों के लिए जल, फल या दूध के साथ व्रत रखना परंपरा में स्वीकार किया गया है। भीमसेन की पूरी कथा ही यह दिखाती है कि भगवान सामर्थ्य के अनुसार की गई सच्ची भक्ति को देखते हैं।
मिथक: निर्जला व्रत शरीर का “डिटॉक्स” करता है और वज़न घटाने का अच्छा तरीका है।
सच्चाई: निर्जला व्रत एक धार्मिक तप है, कोई डाइट प्लान नहीं। बिना पानी के रहने से शरीर में पानी की कमी होती है, खासकर गर्मी में। इसे स्वास्थ्य या वज़न के लाभ के लिए नहीं, श्रद्धा और संयम के लिए रखें, और अपनी सेहत का ध्यान रखें।
मिथक: दान केवल ब्राह्मण को ही दिया जा सकता है, किसी और को देने से फल नहीं मिलता।
सच्चाई: कथा में ब्राह्मणों और सुपात्र को दान देने की बात कही गई है, और यह परंपरा आज भी निभाई जाती है। साथ ही, इस दिन का मूल भाव प्यासे को जल पिलाना है। राहगीरों, मज़दूरों, पशु-पक्षियों को जल पिलाने को भी लोक-परंपरा में बड़ी सेवा माना जाता है।
मिथक: भीमसेनी एकादशी और भैमी एकादशी एक ही हैं।
सच्चाई: भीमसेनी या पांडव एकादशी ज्येष्ठ शुक्ल की निर्जला एकादशी है। भैमी एकादशी नाम कुछ वैष्णव कैलेंडरों में माघ शुक्ल की जया एकादशी के लिए आता है। नाम मिलते-जुलते हैं, पर दोनों अलग महीनों की अलग एकादशियाँ हैं।
निर्जला एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे दिए गए लाभ परंपरा और कथा में बताई गई मान्यताएँ हैं। इन्हें श्रद्धा के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।
- सभी एकादशियों का फल: मान्यता है कि यह एक व्रत साल भर की सभी एकादशियों का पुण्य देता है।
- पापों से मुक्ति: कथा में कहा गया है कि इस व्रत से बड़े से बड़े पाप भी नष्ट होते हैं।
- अक्षय पुण्य: इस दिन किया गया स्नान, दान, जप और होम अक्षय फल देने वाला माना जाता है।
- विष्णु धाम की प्राप्ति: परंपरा में इसे भगवान विष्णु के धाम की ओर ले जाने वाला व्रत कहा गया है।
- पितरों और परिवार का कल्याण: माहात्म्य में व्रत और जागरण से पूर्वजों और आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की बात कही गई है।
- संयम और आत्मबल: प्यास और भूख पर नियंत्रण से मन में धैर्य और संकल्प की शक्ति बढ़ती है।
संबंधित एकादशी और पाठ
निर्जला एकादशी से ठीक पहले ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी आती है, जिसे अपार पुण्य देने वाली एकादशी माना जाता है। निर्जला के बाद आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी आती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।
निर्जला एकादशी हमें सिखाती है कि भक्ति का अर्थ केवल कठोर तप नहीं, बल्कि सच्चा मन, अपनी सामर्थ्य की ईमानदार पहचान और दूसरों की प्यास बुझाने की करुणा है। इस दिन भगवान का स्मरण करें, किसी प्यासे को पानी पिलाएँ और अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखें। भगवान श्रीहरि आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
निर्जला एकादशी कब है 2027 में?
निर्जला एकादशी 2026 (25 जून) बीत चुकी है। अगला व्रत सोमवार, 14 जून 2027 को है और नई दिल्ली में पारण 15 जून को दोपहर लगभग 1:45 से 4:32 बजे के बीच बताया गया है। अपने शहर का समय और आने वाले वर्षों की तारीखें इस पेज की तारीख तालिका में देखें।
निर्जला एकादशी किस महीने में आती है?
यह ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। शुक्ल पक्ष होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में इसका नाम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी ही है। यह प्रायः मई के अंत से जून के बीच आती है।
निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी क्यों कहते हैं?
कथा के अनुसार भूख सहन न कर पाने वाले भीमसेन ने महर्षि व्यास के कहने पर यह निर्जल व्रत किया था। इसी कारण इसे भीमसेनी, भीम या पांडव एकादशी भी कहा जाता है।
क्या निर्जला एकादशी पर पानी पी सकते हैं?
परंपरा में इस व्रत का मूल नियम सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक जल का त्याग है, केवल आचमन और कुल्ले की छूट है। पर बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या दवा लेने वाले लोग जल या फल लेकर व्रत रख सकते हैं, और तबीयत बिगड़ने पर जल लेना ही सही है।
निर्जला व्रत कितने घंटे का होता है?
कथा के अनुसार यह एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक, लगभग 24 घंटे का निर्जल व्रत है। अन्न से पारण पंचांग के पारण समय में होता है, जो कभी-कभी सूर्योदय के कई घंटे बाद होता है।
आचमन में कितना जल ले सकते हैं?
आचमन में केवल हथेली पर कुछ बूँदें जितना बहुत थोड़ा जल लिया जाता है। इससे अधिक जल पीना व्रत भंग माना जाता है। स्नान या आचमन में अनजाने में थोड़ा जल चला जाए तो परंपरा में उसे दोष नहीं माना गया है।
क्या एक निर्जला एकादशी से सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है?
परंपरा और कथा के अनुसार हाँ, व्यासजी ने भीम से कहा था कि इस एक व्रत से वर्ष की सभी एकादशियों का फल मिलता है। साथ ही व्यासजी ने पहले यह भी कहा था कि जो कर सकें, वे दोनों पक्षों की एकादशी रखें।
निर्जला एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?
इस दिन जल से भरा मिट्टी का घड़ा या कलश, शरबत, हाथ का पंखा, छाता, जूते-चप्पल, मौसमी फल, अन्न और वस्त्र दान करने की परंपरा है। राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना और पशु-पक्षियों के लिए पानी रखना भी बड़ी सेवा मानी जाती है।
निर्जला एकादशी पर घड़ा दान कैसे करें?
मिट्टी के साफ़ घड़े में ठंडा जल भरें, उसे कपड़े से ढकें और ऊपर थोड़ी शक्कर या फल रखें। पूजा के बाद “देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥” बोलकर किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को सम्मान से दें।
निर्जला एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?
मुख्य मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। साथ में “ॐ नमो नारायणाय” का जप और पूजा की शुरुआत में “शान्ताकारं भुजगशयनं” ध्यान श्लोक पढ़ सकते हैं।
निर्जला एकादशी का पारण कैसे करें?
द्वादशी को स्नान-पूजा और दान के बाद, पारण समय में तुलसी दल के साथ चरणामृत या थोड़ा जल लेकर व्रत खोलें। फिर धीरे-धीरे पानी पिएँ और हल्का सात्विक भोजन करें। हरिवासर में पारण न करें।
स्मार्त और वैष्णव निर्जला एकादशी में क्या अंतर है?
स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (जैसे इस्कॉन) परंपराएँ तिथि का निर्णय अलग नियमों से करती हैं, इसलिए कभी-कभी व्रत अलग दिन होता है। 2027 में स्मार्त व्रत 14 जून को और इस्कॉन का व्रत 15 जून (महाद्वादशी) को है। अपनी परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
क्या निर्जला एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, किसी भी एकादशी पर चावल और अनाज नहीं खाए जाते। निर्जला एकादशी पर तो जल भी त्यागा जाता है, और फलाहार रखने वाले भी चावल से परहेज़ करते हैं। परंपरा में दशमी की शाम भी चावल न खाने की बात कही गई है।
क्या डायबिटीज़ के मरीज़ निर्जला व्रत रख सकते हैं?
डायबिटीज़ में बिना खाए-पिए शुगर बहुत कम या बहुत ज़्यादा हो सकती है, और दवाओं की खुराक बदलनी पड़ सकती है। इसलिए व्रत से पहले डॉक्टर से ज़रूर पूछें और ज़्यादातर मामलों में जल व फल के साथ ही व्रत रखें।
क्या गर्भवती महिलाएँ निर्जला एकादशी का व्रत रख सकती हैं?
गर्भावस्था और स्तनपान में शरीर को लगातार पानी और पोषण चाहिए, इसलिए निर्जल व्रत उचित नहीं माना जाता। परंपरा भी कहती है कि गर्भवती महिलाएँ फल या दूध लेकर व्रत कर सकती हैं। डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
अगर निर्जला व्रत बीच में टूट जाए तो क्या करें?
चिंता या डर की ज़रूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, बचे हुए दिन जप, कथा और दान करें और अगली एकादशी पूरे मन से रखें। तबीयत के कारण जल लेना पड़े तो वह धर्म के विरुद्ध नहीं है।
निर्जला एकादशी व्रत कथा क्या है?
कथा में भीमसेन व्यासजी से कहते हैं कि उनके पेट में “वृक” नाम की अग्नि रहती है, इसलिए वे भूखे नहीं रह सकते। तब व्यासजी उन्हें ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी का एक निर्जल व्रत बताते हैं, जिससे सभी एकादशियों का फल मिलता है। पूरी कथा इसी पेज पर पढ़ें।
निर्जला एकादशी से पहले कौन सा पर्व आता है?
इससे एक दिन पहले ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को कई स्थानों पर गंगा दशहरा मनाया जाता है। निर्जला से पहले की एकादशी अपरा एकादशी (ज्येष्ठ कृष्ण) और बाद की योगिनी एकादशी (आषाढ़ कृष्ण) है।