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शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotram) — जटाटवीगलज्जल, संस्कृत लिरिक्स, English और हिंदी अर्थ

अंतिम अपडेट: 7 मिनट पढ़ें लेखक: admin
Shiv Tandav Stotram – शिव तांडव स्तोत्रम्

Shiv Tandav Stotram (शिव तांडव स्तोत्रम्) लंकापति रावण द्वारा रचित भगवान शिव की अत्यंत शक्तिशाली संस्कृत स्तुति है, जिसमें शिव जी के प्रचंड तांडव नृत्य का वर्णन है। “जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले” से शुरू होने वाले इस स्तोत्र की लय डमरू की ताल जैसी है, इसलिए इसे पढ़ते या सुनते ही मन में ऊर्जा भर जाती है। नीचे संपूर्ण संस्कृत पाठ, English transliteration, हर श्लोक का सरल हिंदी अर्थ, रचना की कथा और पाठ विधि दी गई है।

Shiv Tandav Stotram – शिव तांडव स्तोत्रम्

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Sanskrit — शिव तांडव स्तोत्रम्

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी-
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥२॥

धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुबन्धुर-
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा-
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर-
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा-
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥

नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरन्धरः॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥

अखर्वसर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी-
रसप्रवाहमाधुरीविजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समप्रवृत्तिकः कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥१२॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥

॥ फलश्रुति ॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसन्ततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिन्तनम्॥१४॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः॥१५॥

॥ इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Shiv Tandav Stotram Lyrics in English

Jatatavigalajjalapravahapavitasthale
Gale’valambya lambitam bhujangatungamalikam।
Damaddamaddamaddamanninadavaddamarvayam
Chakara chandatandavam tanotu nah shivah shivam॥1॥

Jatakatahasambhramabhramannilimpanirjhari-
Vilolavichivallarivirajamanamurdhani।
Dhagaddhagaddhagajjvalallalatapattapavake
Kishorachandrashekhare ratih pratikshanam mama॥2॥

Dharadharendranandinivilasabandhubandhura-
Sphuraddigantasantatipramodamanamanase।
Kripakatakshadhoraniniruddhadurdharapadi
Kvachiddigambare mano vinodametu vastuni॥3॥

Jatabhujangapingalasphuratphanamaniprabha-
Kadambakunkumadravapraliptadigvadhumukhe।
Madandhasindhurasphurattvaguttariyamedure
Mano vinodamadbhutam bibhartu bhutabhartari॥4॥

Sahasralochanaprabhrityasheshalekhashekhara-
Prasunadhulidhorani vidhusaranghripithabhuh।
Bhujangarajamalaya nibaddhajatajutakah
Shriyai chiraya jayatam chakorabandhushekharah॥5॥

Lalatachatvarajvaladdhananjayasphulingabha-
Nipitapanchasayakam namannilimpanayakam।
Sudhamayukhalekhaya virajamanashekharam
Mahakapalisampadeshirojatalamastu nah॥6॥

Karalabhalapattikadhagaddhagaddhagajjvala-
Ddhananjayahutikritaprachandapanchasayake।
Dharadharendranandinikuchagrachitrapatraka-
Prakalpanaikashilpini trilochane ratirmama॥7॥

Navinameghamandaliniruddhadurdharasphurat-
Kuhunishithinitamah prabandhabaddhakandharah।
Nilimpanirjharidharastanotu krittisindhurah
Kalanidhanabandhurah shriyam jagaddhurandharah॥8॥

Praphullanilapankajaprapanchakalimaprabha-
Valambikanthakandaliruchiprabaddhakandharam।
Smarachchhidam purachchhidam bhavachchhidam makhachchhidam
Gajachchhidandhakachchhidam tamantakachchhidam bhaje॥9॥

Akharvasarvamangalakalakadambamanjari-
Rasapravahamadhurivijrimbhanamadhuvratam।
Smarantakam purantakam bhavantakam makhantakam
Gajantakandhakantakam tamantakantakam bhaje॥10॥

Jayatvadabhravibhramabhramadbhujangamashvasa-
Dvinirgamatkramasphuratkaralabhalahavyavat।
Dhimiddhimiddhimidhvananmridangatungamangala-
Dhvanikramapravartitaprachandatandavah shivah॥11॥

Drishadvichitratalpayorbhujangamauktikasrajor-
Garishtharatnaloshthayoh suhridvipakshapakshayoh।
Trinaravindachakshushoh prajamahimahendrayoh
Samapravrittikah kada sadashivam bhajamyaham॥12॥

Kada nilimpanirjharinikunjakotare vasan
Vimuktadurmatih sada shirahsthamanjalim vahan।
Vimuktalolalochano lalamabhalalagnakah
Shiveti mantramuchcharan kada sukhi bhavamyaham॥13॥

Phalashruti

Imam hi nityamevamuktamuttamottamam stavam
Pathansmaranbruvannaro vishuddhimetisantatam।
Hare gurau subhaktimashu yati nanyatha gatim
Vimohanam hi dehinam sushankarasya chintanam॥14॥

Pujavasanasamaye dashavaktragitam
Yah shambhupujanaparam pathati pradoshe।
Tasya sthiram rathagajendraturangayuktam
Lakshmim sadaiva sumukhim pradadati shambhuh॥15॥

Iti Shri Ravana Kritam Shiva Tandava Stotram Sampurnam

Shiv Tandav Stotram का हिंदी अर्थ

  1. जटाओं से बहती गंगा की धारा से पवित्र गले में सर्पों की माला लटकाए, डमरू की डम-डम ध्वनि के साथ प्रचंड तांडव करने वाले शिव हमारा कल्याण करें।
  2. जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें लहराती हैं, जिनके माथे पर अग्नि धधकती है और सिर पर बाल चंद्रमा है — उन शिव में मेरा प्रेम हर क्षण बढ़ता रहे।
  3. पार्वती जी के विलास से जिनका मन आनंदित रहता है, जिनकी कृपा दृष्टि बड़े से बड़े संकट को रोक देती है — उन दिगंबर शिव में मेरा मन रमे।
  4. जिनकी जटाओं के सर्पों की मणियों की प्रभा दिशाओं को रंग देती है और जो मदमस्त हाथी की खाल ओढ़ते हैं — उन भूतनाथ में मेरा मन अद्भुत आनंद पाए।
  5. इंद्र आदि देवताओं के मुकुटों के फूलों की धूल से जिनके चरण धूसर हैं, जिनकी जटा सर्पराज से बँधी है — वे चंद्रशेखर हमें चिरकाल तक समृद्धि दें।
  6. जिनके ललाट की अग्नि ने कामदेव को भस्म किया, जिन्हें देवराज प्रणाम करते हैं, जिनके सिर पर चंद्रकला है — उन जटाधारी शिव से हमें सिद्धि मिले।
  7. जिनके भयंकर ललाट की अग्नि में कामदेव की आहुति हुई, जो पार्वती जी के श्रृंगार के एकमात्र कलाकार हैं — उन त्रिनेत्र शिव में मेरा प्रेम हो।
  8. नए बादलों जैसे काले कंठ वाले, गंगा को धारण करने वाले, गजचर्म ओढ़ने वाले, चंद्रमा से सुशोभित और जगत का भार उठाने वाले शिव हमें समृद्धि दें।
  9. खिले नीले कमल जैसे श्याम कंठ वाले, कामदेव, त्रिपुर, संसार, दक्ष यज्ञ, गजासुर, अंधकासुर और यमराज का भी अंत करने वाले शिव को मैं भजता हूँ।
  10. मंगलमयी पार्वती की कलाओं के रस का आनंद लेने वाले भ्रमर जैसे, कामदेव, त्रिपुर, संसार, यज्ञ, गज, अंधक और यम का अंत करने वाले शिव को मैं भजता हूँ।
  11. जिनके माथे पर सर्पों की फुफकार से अग्नि भड़कती है और मृदंग की धिम-धिम ध्वनि पर जो प्रचंड तांडव करते हैं — उन शिव की जय हो।
  12. पत्थर और सुंदर शय्या, सर्प और मोतियों की माला, रत्न और मिट्टी, मित्र और शत्रु, तिनका और कमल-नयनी, प्रजा और राजा — इन सबको समान दृष्टि से देखते हुए मैं कब सदाशिव को भजूँगा?
  13. कब मैं गंगा तट के कुंज में रहते हुए, दुर्बुद्धि से मुक्त होकर, सिर पर अंजलि बाँधे, चंचल नेत्रों को स्थिर करके, “शिव” मंत्र का उच्चारण करते हुए सुखी होऊँगा?

फलश्रुति: जो इस उत्तम स्तोत्र को रोज़ पढ़ता, याद करता और बोलता है, वह शुद्ध हो जाता है और उसे शिव भक्ति मिलती है। जो पूजा के अंत में, प्रदोष काल में रावण द्वारा गाए इस स्तोत्र को पढ़ता है, उसे भगवान शिव रथ, हाथी, घोड़ों से युक्त स्थिर लक्ष्मी प्रदान करते हैं।

शिव तांडव स्तोत्र की कथा

रावण भगवान शिव का परम भक्त था। एक बार वह अपने बल के घमंड में कैलाश पर्वत को उठाकर लंका ले जाना चाहता था। जैसे ही उसने पर्वत हिलाया, भगवान शिव ने अपने पैर के अँगूठे से कैलाश को दबा दिया और रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया। पीड़ा में रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए यह स्तोत्र गाया।

इस स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने रावण को मुक्त किया। मान्यता है कि उसकी पीड़ा भरी पुकार (रव) के कारण ही उसका नाम “रावण” पड़ा, और शिव जी ने उसे चंद्रहास तलवार भी दी। इसीलिए यह स्तोत्र अहंकार छोड़कर शिव की शरण में जाने का प्रतीक है।

Shiv Tandav Stotram पाठ की विधि

  1. शाम को प्रदोष काल में या सुबह स्नान के बाद शिवलिंग या शिव जी के चित्र के सामने बैठें।
  2. जल, बेलपत्र, धतूरा और सफ़ेद फूल अर्पित करें, घी का दीपक जलाएँ।
  3. “ॐ नमः शिवाय” का 11 बार जाप करके स्तोत्र पढ़ना शुरू करें।
  4. संस्कृत का उच्चारण साफ़ और लयबद्ध रखें; शुरुआत में धीरे पढ़ें, फिर ताल के साथ।
  5. पाठ के बाद ॐ जय शिव ओंकारा आरती करें।

Shiv Tandav Stotram के 7 नियम

  • पाठ शुद्ध और शांत मन से करें।
  • उच्चारण गलत होने के डर से पाठ न छोड़ें — श्रद्धा सबसे बड़ी है, धीरे-धीरे अभ्यास करें।
  • प्रदोष काल का पाठ विशेष फलदायी है।
  • पाठ के बीच में उठें नहीं।
  • सोमवार और शिवरात्रि पर सात्विक भोजन करें।
  • पाठ के बाद आरती ज़रूर करें।
  • स्तोत्र की तेज़ लय के कारण इसे ध्यान से पढ़ें, जल्दबाज़ी में शब्द न छोड़ें।

शिव तांडव स्तोत्र के लाभ

  • मन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और साहस भरता है।
  • फलश्रुति के अनुसार स्थिर लक्ष्मी और समृद्धि मिलती है।
  • मान्यता है कि भय, नकारात्मकता और ग्रह बाधा दूर होती है।
  • एकाग्रता बढ़ती है और मन शांत होता है।

शिव पूजा में शिव चालीसा और ॐ जय शिव ओंकारा भी पढ़ें। शिव तांडव स्तोत्र के बारे में और पढ़ें Wikipedia पर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

शिव तांडव स्तोत्र किसने लिखा?

शिव तांडव स्तोत्र लंकापति रावण की रचना है। अंतिम श्लोक में स्वयं “दशवक्त्रगीतं” (दस मुख वाले रावण द्वारा गाया गया) कहा गया है।

शिव तांडव स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

प्रदोष काल (शाम), सोमवार, सावन, महाशिवरात्रि और मासिक शिवरात्रि पर इसका पाठ सबसे शुभ है। फलश्रुति में स्वयं प्रदोष में पाठ का फल बताया गया है।

शिव तांडव स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

मूल स्तोत्र में 13 श्लोक हैं, जिसके बाद 2 श्लोकों की फलश्रुति है। कुछ संस्करणों में 2 श्लोक और जोड़े जाते हैं, इसलिए 15 से 17 श्लोक तक मिलते हैं।

क्या महिलाएँ शिव तांडव स्तोत्र पढ़ सकती हैं?

हाँ, कोई भी भक्त श्रद्धा से शिव तांडव स्तोत्र का पाठ या श्रवण कर सकता है। संस्कृत कठिन लगे तो पहले धीरे-धीरे पढ़ें या ऑडियो के साथ पढ़ें।

What is Shiv Tandav Stotram?

Shiv Tandav Stotram is a Sanskrit hymn composed by Ravana in praise of Lord Shiva’s cosmic dance, the Tandava. It has 13 verses and a 2-verse phalashruti, and is best recited in Pradosh Kaal, on Mondays and on Mahashivratri.

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