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अहोई अष्टमी 2026 (Ahoi Ashtami Puja Vidhi): तारीख, मुहूर्त, तारों का समय, व्रत कथा और विधि

अंतिम अपडेट: 10 मिनट पढ़ें लेखक: admin
Ahoi Ashtami Puja Vidhi 2026 – अहोई अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि

Ahoi Ashtami Puja Vidhi (अहोई अष्टमी पूजा विधि) के अनुसार माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु, सुख और रक्षा के लिए दिन भर व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा करके तारों को अर्घ्य देती हैं। वर्ष 2026 में अहोई अष्टमी रविवार, 1 नवंबर को है। यह कार्तिक कृष्ण अष्टमी का व्रत है — करवा चौथ के तीन दिन बाद और दीपावली से सात दिन पहले। नीचे Ahoi Ashtami Puja Vidhi, मुहूर्त, तारों का समय, अहोई अष्टमी व्रत कथा और नियम दिए गए हैं।

Ahoi Ashtami Puja Vidhi 2026 – अहोई अष्टमी व्रत कथा और पूजा विधि

इस लेख में

अहोई अष्टमी 2026: तारीख और मुहूर्त

विवरणसमय (2026)
अहोई अष्टमीरविवार, 1 नवंबर 2026
अष्टमी तिथि आरंभ1 नवंबर, दोपहर लगभग 2:51
अष्टमी तिथि समाप्त2 नवंबर, दोपहर लगभग 1:10
पूजा मुहूर्त (दिल्ली)शाम 5:36 से 6:54 तक
तारे दिखने का समय (दिल्ली)शाम लगभग 6:00
चंद्रोदय (दिल्ली)रात लगभग 11:40

दूसरे शहरों में पूजा मुहूर्त और तारों का समय

शहरपूजा मुहूर्ततारे दिखने का समय
दिल्लीशाम 5:36 से 6:54शाम लगभग 6:00
लखनऊशाम 5:23 से 6:41शाम लगभग 5:47
जयपुरशाम 5:44 से 7:02शाम लगभग 6:08
देहरादूनशाम 5:30 से 6:48शाम लगभग 5:54
पटनाशाम 5:08 से 6:26शाम लगभग 5:32
मुंबईशाम 6:05 से 7:23शाम लगभग 6:29

पूजा सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में की जाती है और तारे सूर्यास्त के लगभग 20–25 मिनट बाद दिखने लगते हैं। शहरों का समय सूर्यास्त के आधार पर अनुमानित है; अपने शहर का सूर्यास्त आज के पंचांग में देखें।

अहोई माता कौन हैं?

अहोई माता को माता पार्वती का एक रूप माना जाता है, जो संतान की रक्षा करती हैं। “अहोई” शब्द “अनहोनी” से जुड़ा माना जाता है — यानी जो अनहोनी को टाल दें। पूजा में अहोई माता के साथ स्याहू (साही) और उसके बच्चों का चित्र बनाया जाता है, जो इस व्रत की कथा से जुड़ा है।

Ahoi Ashtami Puja Vidhi: पूजा सामग्री

  • अहोई माता का चित्र — दीवार पर गेरू से बनाया हुआ, कपड़े पर बना या छपा हुआ कैलेंडर
  • जल से भरा कलश या करवा (कई परिवार करवा चौथ वाला करवा ही रखते हैं)
  • रोली, अक्षत, कलावा, फूल, दूब और दीपक
  • चाँदी का अहोई लॉकेट (स्याहू) और मोती — माला बनाने के लिए
  • भोग: आठ पूड़ी, आठ पुए या मीठे गुलगुले, हलवा, और कुछ जगह सिंघाड़े व चने
  • दक्षिणा और बायना — सास या घर की बड़ी महिला के लिए

अहोई अष्टमी पूजा विधि — स्टेप बाय स्टेप

  1. सुबह स्नान करके संतान की लंबी आयु के लिए व्रत का संकल्प लें। अधिकतर माताएँ तारे दिखने तक निर्जला व्रत रखती हैं।
  2. दोपहर बाद दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएँ — आठ कोनों (अष्ट कोष्ठक) वाली आकृति, साथ में स्याहू और उसके बच्चे। चाहें तो छपा हुआ चित्र लगाएँ।
  3. चित्र के सामने चौकी पर जल से भरा कलश या करवा रखें, उस पर स्वस्तिक बनाएँ और दीपक जलाएँ।
  4. शाम को शुभ मुहूर्त में अहोई माता को रोली, अक्षत, फूल और कलावा चढ़ाएँ। चाँदी का स्याहू और मोती भी पूजा में रखें।
  5. पूड़ी, पुए और हलवे का भोग लगाएँ और परिवार के साथ बैठकर अहोई अष्टमी व्रत कथा सुनें।
  6. सास या घर की बड़ी महिला को बायना (भोग, कुछ पैसे या कपड़े) देकर उनका आशीर्वाद लें।
  7. तारे दिखने पर करवे के जल से तारों को अर्घ्य दें और संतान के सुख की प्रार्थना करें। इसके बाद भोजन करके व्रत खोलें।
  8. करवे का जल संभालकर रखा जाता है; कई परिवार दीपावली पर इसी जल से घर में छिड़काव करते हैं।

अहोई अष्टमी व्रत कथा

प्राचीन समय में एक साहूकार के सात बेटे थे। दीपावली से पहले घर लीपने के लिए साहूकार की पत्नी मिट्टी लेने जंगल गई। मिट्टी खोदते समय उसकी कुदाल से अनजाने में एक स्याहू (साही) का बच्चा मर गया। वह बहुत दुखी हुई, पर घर लौट आई।

कुछ समय बाद एक-एक करके उसके सातों बेटों की मृत्यु हो गई। दुखी होकर उसने गाँव की बुज़ुर्ग महिलाओं को सारी बात बताई। उन्होंने कहा कि अनजाने में हुए पाप का प्रायश्चित करो — कार्तिक कृष्ण अष्टमी को व्रत रखकर अहोई माता और स्याहू तथा उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजा करो और क्षमा माँगो।

साहूकार की पत्नी ने पूरी श्रद्धा से यह व्रत किया। अहोई माता प्रसन्न हुईं और उसके सातों बेटे फिर से जीवित हो गए। तभी से माताएँ अपनी संतान की रक्षा और लंबी आयु के लिए हर साल अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं।

अहोई अष्टमी 2026: दिन भर की तैयारी

समय (1 नवंबर)क्या करें
सूर्योदय से पहलेकई परिवारों में सरगी जैसा हल्का भोजन और जल लेकर व्रत आरंभ करने की परंपरा है।
सुबहस्नान, संकल्प और घर की सफ़ाई। पूजा का स्थान तय करें।
दोपहरदीवार पर अहोई माता का चित्र बनाएँ या लगाएँ; भोग की तैयारी शुरू करें।
शाम 5:00 के बादपूजा की चौकी सजाएँ, करवे में जल भरें, दीपक तैयार रखें।
पूजा मुहूर्त (दिल्ली 5:36–6:54)पूजा, कथा, बायना और आरती।
तारे दिखने पर (दिल्ली लगभग 6:00 के बाद)तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलें।

कामकाजी माताओं के लिए सरल पूजा विधि

अगर ऑफिस या यात्रा के कारण दीवार पर चित्र बनाना संभव न हो, तो बाज़ार में मिलने वाला अहोई माता का छपा हुआ चित्र या कैलेंडर लगा लें। शाम को घर पहुँचकर एक चौकी पर चित्र रखें, सामने जल का लोटा या करवा, एक दीपक और थोड़ा-सा भोग (पूड़ी या कोई भी मिठाई) रखें। रोली-अक्षत चढ़ाकर कथा पढ़ें या सुनें, और तारे दिखने पर अर्घ्य दें। श्रद्धा और भाव सबसे ज़रूरी हैं — सामग्री कम हो तो भी व्रत पूरा माना जाता है।

अहोई अष्टमी उद्यापन (उजमन) विधि

कई परिवारों में संतान के जन्म या विवाह के बाद वाले वर्ष में अहोई अष्टमी का उद्यापन (उजमन) किया जाता है। उद्यापन की रीति हर परिवार और क्षेत्र में थोड़ी अलग होती है, इसलिए घर की बुज़ुर्ग महिलाओं से पूछकर ही करें। सामान्य रूप से इसमें ये काम होते हैं:

  1. सामान्य पूजा की तरह अहोई माता की पूजा और कथा की जाती है।
  2. एक थाली में सात जगह चार-चार पूड़ियाँ (या परिवार की रीति के अनुसार पूड़ी-हलवा) रखकर बायना निकाला जाता है।
  3. यह बायना साड़ी, सुहाग की वस्तुएँ और दक्षिणा के साथ सास या घर की बड़ी महिला को दिया जाता है।
  4. सात सुहागिन महिलाओं या बच्चों को भोजन कराने की परंपरा भी कई घरों में है।

स्याहू माला का नियम

पूजा में रखी गई चाँदी की स्याहू माला व्रत के बाद माताएँ गले में पहनती हैं। परंपरा के अनुसार यह माला दीपावली तक पहनी जाती है और फिर किसी शुभ दिन उतारकर संभालकर रख दी जाती है। अगले वर्ष इसी माला की पूजा की जाती है और कई परिवारों में हर संतान के नाम से एक नया मोती जोड़ा जाता है। माला उतारते समय उस पर जल के छींटे देकर गुड़ का भोग लगाने की रीति भी कुछ घरों में है।

बादल हों या तारे न दिखें तो क्या करें?

अगर आसमान में बादल हों और तारे न दिखें, तो अपने शहर के सूर्यास्त के लगभग 20–25 मिनट बाद आकाश की ओर मुख करके तारों का ध्यान करते हुए अर्घ्य दें और व्रत खोल लें। जो परिवार चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, वे 1 नवंबर की रात चंद्रोदय (दिल्ली में लगभग 11:40) के बाद व्रत खोलें। अपने शहर का सूर्यास्त और चंद्रोदय दैनिक पंचांग में देख सकते हैं, और आने वाले व्रतों की पूरी सूची व्रत कैलेंडर में है।

अहोई अष्टमी व्रत के नियम

  • तारे दिखने तक जल और अन्न ग्रहण न करें; स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार या जल लेकर व्रत रखें।
  • इस दिन मिट्टी खोदने, नुकीली चीज़ों से काटने-छाँटने और सिलाई जैसे कामों से बचने की परंपरा है।
  • संतान को दिन भर आशीर्वाद दें और उसके हाथ से जल या मिठाई लेकर व्रत खोलना शुभ माना जाता है।
  • गर्भवती महिलाएँ और बीमार लोग निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह लें।

राधा कुंड स्नान

अहोई अष्टमी की रात मथुरा के पास गोवर्धन में राधा कुंड में स्नान की विशेष परंपरा है। मान्यता है कि संतान की कामना करने वाले दंपती इस रात श्रद्धा से राधा कुंड में स्नान करें तो उनकी मनोकामना पूरी होती है। इसलिए इस रात वहाँ हज़ारों श्रद्धालु पहुँचते हैं।

अहोई अष्टमी का महत्व

अहोई अष्टमी उत्तर भारत — विशेषकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड — में बड़ी श्रद्धा से मनाई जाती है। इसे “अहोई आठे” भी कहते हैं, क्योंकि यह अष्टमी (आठवीं तिथि) को पड़ती है। माताएँ मानती हैं कि अहोई माता की कृपा से संतान पर आने वाली अनहोनी टल जाती है और उसे लंबी आयु, अच्छा स्वास्थ्य और सफलता मिलती है। पहले यह व्रत मुख्य रूप से बेटों के लिए रखा जाता था, पर आज माताएँ बेटे और बेटी दोनों के लिए समान भाव से यह व्रत रखती हैं।

यह व्रत दीपावली के उत्सव की शुरुआत भी माना जाता है। अहोई अष्टमी के बाद ही घरों में दीपावली की सफ़ाई, रंगोली और खरीदारी ज़ोर पकड़ती है, और कुछ ही दिनों में धनतेरस, नरक चतुर्दशी और लक्ष्मी पूजा आते हैं।

करवा चौथ और अहोई अष्टमी में अंतर

बिंदुकरवा चौथअहोई अष्टमी
तिथिकार्तिक कृष्ण चतुर्थीकार्तिक कृष्ण अष्टमी
किसके लिएपति की लंबी आयुसंतान की लंबी आयु और सुख
कौन रखता हैसुहागिन महिलाएँमाताएँ
व्रत खोलनाचंद्रमा को अर्घ्य देकरतारों को अर्घ्य देकर (कुछ परिवार चंद्रमा को)
पूजाकरवा माता, शिव-पार्वती, गणेशअहोई माता, स्याहू और उसके बच्चे

अहोई अष्टमी पर क्या करें, क्या न करें

  • करें: पूजा के बाद अपनी सास या किसी बुज़ुर्ग महिला के पैर छूकर आशीर्वाद लें और ज़रूरतमंद बच्चों को भोजन, मिठाई या कपड़े दान करें।
  • करें: व्रत कथा पूरे ध्यान से सुनें और अंत में माता की आरती करें।
  • न करें: इस दिन किसी को कटु वचन न कहें और घर में कलह से बचें।
  • न करें: तारे दिखने से पहले व्रत न तोड़ें; बादल हों तो तारों के निकलने के अनुमानित समय पर आकाश की ओर अर्घ्य दें।

Ahoi Ashtami 2026 — in English

Ahoi Ashtami falls on Sunday, 1 November 2026 (Kartik Krishna Ashtami). Mothers fast from sunrise for the long life and wellbeing of their children, draw or place an image of Ahoi Mata — a form of Goddess Parvati — with the syahu (porcupine) and her cubs, and worship her in the evening between 5:36 and 6:54 PM (Delhi). The fast is broken after offering water to the stars, at about 6:00 PM in Delhi; some wait for moonrise at about 11:40 PM.

The Ahoi Ashtami Puja Vidhi and katha are given in full above. Read more on Wikipedia, and see the coming festivals — धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा और भाई दूज — in our व्रत-त्योहार कैलेंडर.

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

अहोई अष्टमी 2026 कब है?

रविवार, 1 नवंबर 2026 को। अष्टमी तिथि 1 नवंबर दोपहर लगभग 2:51 से 2 नवंबर दोपहर लगभग 1:10 तक है।

अहोई अष्टमी का व्रत कब खोलें?

शाम को तारे दिखने पर उन्हें अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है — दिल्ली में लगभग 6:00 बजे। कुछ महिलाएँ चंद्रोदय (रात लगभग 11:40) के बाद व्रत खोलती हैं।

अहोई अष्टमी का व्रत कौन रखता है?

माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और सुख के लिए यह व्रत रखती हैं। संतान की कामना करने वाली महिलाएँ भी यह व्रत करती हैं।

अहोई अष्टमी पर स्याहू की माला क्या होती है?

चाँदी का अहोई लॉकेट (स्याहू) और मोती जो माला में पिरोकर पूजा में रखे जाते हैं। कई परिवारों में हर संतान के लिए हर साल एक मोती जोड़ा जाता है और माला दीपावली तक पहनी जाती है।

What is the Ahoi Ashtami Puja Vidhi in short?

Mothers fast from sunrise, draw or place an image of Ahoi Mata with the syahu and her cubs, worship her in the evening with water, roli, rice and a bhog of puri and halwa, hear the katha, and break the fast after offering water to the stars.

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