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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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Ekadashi

पापमोचनी एकादशी 2027 (Papmochani Ekadashi): कब है, व्रत कथा, पूजा विधि, पारण और मेधावी-मंजुघोषा की कथा

अंतिम अपडेट: 26 मिनट पढ़ें लेखक: admin

पापमोचनी एकादशी (Papmochani Ekadashi) चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे पापों से मुक्ति की कामना और प्रायश्चित का व्रत माना जाता है। “पापमोचनी” का अर्थ है पापों को छुड़ाने वाली। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, कथा-श्रवण और नाम-जप करके मन से अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगी जाती है और आगे सही राह पर चलने का संकल्प लिया जाता है।

यह एकादशी होली और चैत्र नवरात्रि के बीच आती है और हिंदू नववर्ष (विक्रम संवत) से पहले की अंतिम एकादशी मानी जाती है। इसलिए बहुत से भक्त इसे पुराने वर्ष की भूलों को पीछे छोड़कर, शुद्ध मन से नए वर्ष में प्रवेश करने का अवसर मानते हैं। इसके बाद नए संवत की पहली एकादशी, कामदा एकादशी आती है।

पापमोचनी एकादशी की कथा मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा से जुड़ी है, जिसमें च्यवन ऋषि अपने पुत्र को इसी व्रत से प्रायश्चित का मार्ग बताते हैं। नीचे आपको पापमोचनी एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि, सामग्री, मंत्र, व्रत के नियम और इससे जुड़े सवालों के जवाब सरल भाषा में मिलेंगे।

पापमोचनी एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: पापमोचनी एकादशी 2026 (15 मार्च) बीत चुकी है। अगली पापमोचनी एकादशी शुक्रवार, 2 अप्रैल 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 2 अप्रैल की रात 12:45 बजे शुरू होकर 3 अप्रैल की रात 2:51 बजे समाप्त होगी। पारण 3 अप्रैल को होगा; उस दिन हरि वासर सुबह 9:15 बजे तक है, इसलिए स्मार्त पंचांग दोपहर 1:40 से 4:10 बजे के बीच पारण बताता है, जबकि इस्कॉन (वैष्णव) पंचांग सुबह 9:15 से 10:20 बजे का समय देता है।

अगली पापमोचनी एकादशी

पापमोचनी एकादशी 2027

2 अप्रैल 2027, शुक्रवार 152 दिन बाकी

मास और पक्ष
चैत्र कृष्ण
एकादशी तिथि
2 अप्रै 00:47 – 3 अप्रै 02:53
पारण (व्रत खोलने का समय)
3 अप्रै, 13:39 – 16:09
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202615 मार्च 2026, रविवार14 मार्च 08:13 –
15 मार्च 09:19
16 मार्च, 06:30 – 08:54
20272 अप्रैल 2027, शुक्रवार2 अप्रै 00:47 –
3 अप्रै 02:53
3 अप्रै, 13:39 – 16:09
202821 मार्च 2028, मंगलवार20 मार्च 21:38 –
22 मार्च 00:15
22 मार्च, 06:56 – 08:48
202910 मार्च 2029, शनिवार10 मार्च 01:18 –
11 मार्च 02:18
11 मार्च, 08:39 – 08:57

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें।

जब एकादशी तिथि दो दिनों के सूर्योदय को छूती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव परंपरा की तारीख अलग हो सकती है। ऐसे में गृहस्थ सामान्यतः स्मार्त तिथि मानते हैं और वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी अपने संप्रदाय या इस्कॉन कैलेंडर की तिथि।

पापमोचनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“पापमोचनी” शब्द दो भागों से बना है — “पाप” और “मोचनी”, यानी पाप से छुड़ाने वाली। परंपरा में माना जाता है कि यह एकादशी जाने-अनजाने में हुई भूलों के बोझ से मन को हल्का करती है। इसीलिए इसे प्रायश्चित और आत्मशुद्धि की एकादशी भी कहा जाता है।

पापमोचनी एकादशी के अन्य नाम

  • पापमोचिनी एकादशी — कई पंचांगों और कथा-ग्रंथों में यही वर्तनी मिलती है।
  • पापमोचनी / पापामोचनी एकादशी (Papamochani Ekadashi) — अंग्रेज़ी में दोनों वर्तनी प्रचलित हैं।
  • चैत्र कृष्ण एकादशी — उत्तर भारत के पूर्णिमांत कैलेंडर के अनुसार।
  • फाल्गुन कृष्ण एकादशी — दक्षिण और पश्चिम भारत के अमांत कैलेंडर के अनुसार।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इसमें होली (फाल्गुन पूर्णिमा) के अगले दिन से चैत्र मास शुरू हो जाता है, इसलिए यह एकादशी चैत्र कृष्ण पक्ष में गिनी जाती है।

महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में प्रचलित अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। वहाँ यही दिन फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी कहलाता है। दोनों में दिन एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है। यह सामान्यतः मार्च या अप्रैल में आती है।

पापमोचनी एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार पापमोचनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि श्रद्धा से यह व्रत रखने, कथा सुनने और भगवान का स्मरण करने से मनुष्य के जाने-अनजाने किए गए पापों का प्रभाव कम होता है। कथा के अंत में कहा गया है कि इसे पढ़ने या सुनने से हज़ार गौदान के समान पुण्य मिलता है।

साल की 24 एकादशियों में हर एक का अपना भाव है। किसी को मोक्ष से, किसी को संतान से और किसी को विजय से जोड़ा जाता है। पापमोचनी का भाव है प्रायश्चित और आत्मशुद्धि। यह याद दिलाती है कि गलती हो जाना मानव स्वभाव है, पर उसे स्वीकार करके सुधारना ही धर्म का मार्ग है।

आध्यात्मिक संदेश

इस एकादशी की कथा में एक तपस्वी ऋषि भी अपने मार्ग से भटक जाते हैं। यह संदेश देता है कि मोह, आकर्षण और क्रोध किसी को भी घेर सकते हैं — चाहे वह कितना भी ज्ञानी क्यों न हो। कथा में मेधावी पहले मोह में फँसते हैं, फिर क्रोध में श्राप दे देते हैं, और अंत में पछताकर अपने पिता के सामने अपनी गलती मान लेते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से “पाप से मुक्ति” का अर्थ केवल किसी अनुष्ठान से नहीं, बल्कि पश्चाताप, स्वीकार और सुधार से है। व्रत मन को संयम सिखाता है, कथा आत्म-चिंतन कराती है और नाम-जप मन को शांत करता है। इसी तीनों के मेल को परंपरा प्रायश्चित मानती है।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार पापमोचनी एकादशी की कथा भविष्योत्तर पुराण (भविष्य पुराण का उत्तर भाग) में आती है, जहाँ भगवान श्रीकृष्ण एकादशियों का माहात्म्य बताते हैं। कथा के भीतर एक और कथा है — श्रीकृष्ण वह प्रसंग सुनाते हैं, जो लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को सुनाया था।

हिंदी की अधिकतर कथा-पुस्तिकाओं में यह संवाद श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच बताया गया है, जबकि इस्कॉन और कई वैष्णव ग्रंथों में प्रश्न राजा युधिष्ठिर पूछते हैं। दोनों रूपों में मूल कथा, पात्र और संदेश एक ही हैं।

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा: मेधावी ऋषि और अप्सरा मंजुघोषा

कथा का आरंभ

एक बार प्रश्न किया गया — “हे भगवन्! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, उसकी विधि क्या है और उसका क्या फल है?” तब भगवान श्रीकृष्ण बोले कि इस एकादशी का नाम पापमोचनी है। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से पूछा था कि मनुष्य अपने पापों से सरल उपाय से कैसे मुक्त हो सकता है। उसके उत्तर में लोमश ऋषि ने यह कथा सुनाई।

चैत्ररथ वन और तपस्वी मेधावी

प्राचीन समय में चैत्ररथ नाम का एक अत्यंत सुंदर वन था, जहाँ सदा वसंत ऋतु जैसा वातावरण रहता था। वहाँ तरह-तरह के फूल खिले रहते थे, अप्सराएँ और किन्नर विहार करते थे, गंधर्व कन्याएँ घूमती थीं और कभी-कभी देवराज इंद्र भी देवताओं के साथ वहाँ आते थे। कुछ परंपराओं में इसे धन के देवता कुबेर का उद्यान बताया गया है।

उसी वन में मेधावी नाम के एक युवा ऋषि कठोर तपस्या करते थे। वे महर्षि च्यवन के पुत्र थे और भगवान शिव के परम भक्त थे। उनके तप का तेज दूर-दूर तक प्रसिद्ध था।

मंजुघोषा और कामदेव

मेधावी के तप को भंग करने के लिए मंजुघोषा नाम की एक अप्सरा वहाँ आई। वह ऋषि के आश्रम से कुछ दूरी पर ठहर गई और वीणा बजाकर मधुर स्वर में गाने लगी। उसका गायन और सौंदर्य ऐसा था कि वातावरण ही बदल गया।

कथा के अनुसार इसी समय कामदेव भी वहाँ आ पहुँचे। भगवान शिव ने कभी उन्हें भस्म किया था, इसलिए वे शिव-भक्त ऋषि का तप तोड़ना चाहते थे। उन्होंने मंजुघोषा की भौंहों को धनुष, कटाक्ष को प्रत्यंचा और नेत्रों को बाण बनाकर ऋषि पर प्रभाव डाला। कुछ कथाओं में बताया गया है कि मंजुघोषा को कामदेव ने भेजा था, तो कुछ में कहा गया है कि इंद्र ने ऋषि के तप से चिंतित होकर उसे भेजा।

युवा मेधावी अपने तप और शिव-भक्ति को भूलकर मंजुघोषा के प्रति आकर्षित हो गए। वे अपना संयम छोड़कर उसके साथ रहने लगे। मोह में डूबे ऋषि को दिन और रात का भी भान नहीं रहा।

57 वर्ष और ऋषि का क्रोध

बहुत समय बाद एक दिन मंजुघोषा ने स्वर्ग लौटने की अनुमति माँगी। मेधावी ने कहा, “अभी तो संध्या ही हुई है, सुबह चली जाना।” ऐसा कई बार हुआ। अंत में मंजुघोषा ने उन्हें याद दिलाया कि उन्हें साथ रहते सत्तावन (57) वर्ष बीत चुके हैं। इस्कॉन की कथा में यह अवधि 57 वर्ष, 9 महीने और 3 दिन बताई गई है, पर ऋषि को यह सब एक क्षण जैसा लगा था।

यह सुनकर मेधावी को अपनी स्थिति का बोध हुआ। उन्हें लगा कि उनका सारा तप नष्ट हो गया। इस पछतावे के साथ उन्हें भयंकर क्रोध आया और उन्होंने मंजुघोषा को श्राप दे दिया — “तुमने मेरा तप नष्ट किया है, इसलिए तुम पिशाचिनी हो जाओ।”

मंजुघोषा की विनती और मुक्ति का उपाय

श्राप सुनकर मंजुघोषा काँप उठी। उसने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और कहा, “हे मुनिवर! मैंने इतने वर्ष आपके साथ बिताए हैं। मुझ पर कृपा कीजिए और इस श्राप से मुक्ति का उपाय बताइए।”

उसकी विनती सुनकर मेधावी का क्रोध शांत हुआ और उन्हें अपने कठोर वचन पर पछतावा हुआ। उन्होंने कहा, “चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका नाम पापमोचनी है। उसका विधिपूर्वक व्रत करने से तुम्हें पिशाच योनि से मुक्ति मिल जाएगी।” फिर उन्होंने उसे व्रत की पूरी विधि बताई।

च्यवन ऋषि की सलाह

इसके बाद मेधावी अपने पिता च्यवन ऋषि के आश्रम पहुँचे। पुत्र का मलिन चेहरा देखकर च्यवन ऋषि ने पूछा, “पुत्र, तुम्हारा तपोबल और तेज कहाँ चला गया?” मेधावी ने बिना कुछ छिपाए पूरी घटना सच-सच बता दी और प्रायश्चित का उपाय पूछा।

च्यवन ऋषि ने कहा कि मोह में पड़कर तुमने अपना तप गँवाया है, और क्रोध में एक प्राणी को श्राप भी दिया है। इसलिए तुम भी उसी चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और विधि से करो। इससे तुम्हारे पाप नष्ट होंगे और तप का तेज फिर से लौटेगा।

व्रत का फल

पिता की आज्ञा मानकर मेधावी ने पापमोचनी एकादशी का व्रत किया। कथा के अनुसार इससे उनके पाप नष्ट हो गए और वे फिर से तेजस्वी हो गए। उधर मंजुघोषा ने भी यह व्रत किया, जिससे वह पिशाचिनी रूप से मुक्त होकर अपने सुंदर दिव्य रूप में स्वर्ग लौट गई।

कथा के अंत में लोमश ऋषि कहते हैं कि जो व्यक्ति पापमोचनी एकादशी का व्रत करता है, उसके बड़े-बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। इस कथा को पढ़ने या सुनने से हज़ार गौदान का पुण्य मिलता है — यह परंपरा की मान्यता है, जिसे श्रद्धा के भाव से समझना चाहिए।

कथा की सीख

  • मोह क्षणिक है: ऋषि को 57 वर्ष एक क्षण जैसे लगे। आकर्षण और सुख में समय का पता नहीं चलता, इसलिए संयम जरूरी है।
  • क्रोध दूसरी गलती बनता है: अपनी भूल का दोष दूसरे पर डालकर श्राप देना भी गलत था, और मेधावी को इसका पछतावा हुआ।
  • स्वीकार ही पहला कदम है: मेधावी ने पिता से कुछ नहीं छिपाया। सच बोलकर ही उन्हें सुधार का मार्ग मिला।
  • दोनों को समान अवसर: ऋषि और अप्सरा दोनों ने व्रत किया और दोनों को मुक्ति मिली। कथा किसी एक को दोषी ठहराने के बजाय दोनों को सुधार का अवसर देती है।

पापमोचनी एकादशी और “पापों से मुक्ति” का अर्थ

लोग अक्सर पूछते हैं कि क्या एक दिन का व्रत सच में सारे पाप मिटा सकता है। परंपरा इसे आस्था के रूप में देखती है। शास्त्रों में प्रायश्चित के साथ हमेशा पश्चाताप, फिर से गलती न करने का संकल्प और जहाँ संभव हो वहाँ सुधार की बात कही गई है।

इसलिए पापमोचनी एकादशी को “गलती करो और व्रत से माफ़ी पा लो” का साधन समझना उचित नहीं है। कथा में भी मेधावी पहले अपनी भूल स्वीकार करते हैं, फिर व्रत करते हैं। आस्था के अनुसार व्रत उस भीतरी बदलाव को बल देता है।

इस दिन आत्म-चिंतन कैसे करें

  • शाम को कुछ देर शांत बैठकर पिछले वर्ष की उन बातों पर विचार करें, जिनसे किसी को दुख पहुँचा हो।
  • जिससे आपने कठोर बात कही हो, उससे संभव हो तो क्षमा माँगें।
  • कोई एक बुरी आदत छोड़ने का छोटा, व्यावहारिक संकल्प लें।
  • भगवान के सामने मन ही मन अपनी भूलें स्वीकार करें और सद्बुद्धि की प्रार्थना करें।

पापमोचनी एकादशी और हिंदू नववर्ष: होली और चैत्र नवरात्रि के बीच

पापमोचनी एकादशी का समय इसे खास बनाता है। यह होली के लगभग एक सप्ताह बाद आती है और इसके कुछ ही दिनों बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से हिंदू नववर्ष (विक्रम संवत), चैत्र नवरात्रि, गुड़ी पड़वा और उगादि शुरू होते हैं।

हिंदू संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से बदलता है, इसलिए पापमोचनी एकादशी को संवत वर्ष की अंतिम एकादशी माना जाता है। इसके बाद चैत्र शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी नए संवत की पहली एकादशी होती है। अधिक मास वाले वर्षों में एकादशियों की संख्या बढ़ जाती है, पर पापमोचनी का क्रम यही रहता है।

बहुत से परिवार इस दिन को एक तरह का “आध्यात्मिक नववर्ष संकल्प” मानते हैं। होली के उत्सव के बाद यह संयम का दिन है और नवरात्रि की साधना से पहले मन को शुद्ध करने का अवसर। अगर आप नवरात्रि में व्रत रखने वाले हैं, तो पापमोचनी एकादशी से ही सात्विक दिनचर्या शुरू कर सकते हैं।

पापमोचनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सात्विक भोजन करें और सूर्यास्त से पहले एक ही बार भोजन करना अच्छा माना जाता है।
  2. दशमी की रात चावल, प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  3. घर और पूजा स्थान की सफाई कर लें और पूजा सामग्री एक जगह रख लें।
  4. रात को जल्दी सोएँ और मन में अगले दिन के व्रत का विचार रखें।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। संभव हो तो जल में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  2. स्वच्छ, हल्के पीले या सफेद वस्त्र पहनें।
  3. सूर्यदेव को जल अर्पित करें।
  4. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — “मैं (अपना नाम) आज पापमोचनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता और अपनी जाने-अनजाने हुई भूलों के प्रायश्चित के लिए रख रहा/रही हूँ।” साथ में बताएँ कि आप निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखेंगे।

भगवान विष्णु की पूजा

  1. पूजा स्थान पर एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु (या श्रीकृष्ण) और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  2. भगवान को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएँ (प्रतिमा हो तो), फिर स्वच्छ जल से।
  3. पीला चंदन, रोली और अक्षत से तिलक करें।
  4. पीले फूल, फूलमाला और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रखें कि एकादशी के दिन तुलसी न तोड़ें; पत्ते एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
  5. धूप और घी का दीपक जलाएँ।
  6. फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी पत्र अवश्य रखें।
  7. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें।
  8. पापमोचनी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
  9. ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।
  10. अंत में भगवान से अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगें और सबके कल्याण की प्रार्थना करें।

दिन भर और शाम की पूजा

  1. दिन में विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या भगवान के भजन का पाठ करें।
  2. क्रोध, निंदा, झूठ और बहस से बचें, क्योंकि इस व्रत का भाव ही आत्म-सुधार है।
  3. शाम को फिर से दीपक जलाएँ, तुलसी के पास दीया रखें और आरती करें।
  4. संभव हो तो रात में भजन-कीर्तन करके जागरण करें। पूरी रात जागना संभव न हो तो कुछ समय नाम-जप करके सोएँ।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
  2. किसी ब्राह्मण, जरूरतमंद व्यक्ति या गौ को भोजन, अन्न या दक्षिणा दें।
  3. अपने शहर के पारण समय (ऊपर की तालिका देखें) के भीतर तुलसी पत्र और जल लेकर व्रत खोलें।
  4. पारण सात्विक भोजन से करें और उस दिन भी तामसिक भोजन से बचें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की प्रतिमा अथवा चित्र
  • चौकी और पीला वस्त्र
  • गंगाजल और स्वच्छ जल का कलश
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • पीला चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत
  • पीले फूल और फूलमाला
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
  • धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, रुई की बाती और कपूर
  • फल (केला, सेब, अंगूर आदि), मेवा और मिठाई
  • पान, सुपारी, लौंग, इलायची
  • नारियल
  • व्रत कथा की पुस्तक या यह पेज
  • दान के लिए अन्न, फल, वस्त्र या दक्षिणा

पापमोचनी एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में शुद्ध उच्चारण से ज्यादा जरूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। अपनी सुविधा से इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमन करता हूँ। यह एकादशी का सबसे प्रचलित मंत्र है और पूरे दिन इसका जप किया जा सकता है।

2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र

ॐ नमो नारायणाय॥

अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। यह छोटा और सरल मंत्र है, जिसे बच्चे और बुज़ुर्ग भी आसानी से जप सकते हैं।

3. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम भगवान नारायण को जानें, वासुदेव का ध्यान करें; वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करें। आत्म-सुधार के इस व्रत में सद्बुद्धि की प्रार्थना के लिए यह मंत्र उपयुक्त माना जाता है।

4. क्लेशनाशक श्रीकृष्ण मंत्र

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥

अर्थ: श्रीकृष्ण, वासुदेव, हरि, परमात्मा और गोविंद को बार-बार नमस्कार है, जो शरण में आए हुए भक्तों के कष्ट दूर करते हैं। यह श्लोक श्रीमद्भागवत से लिया गया माना जाता है। पापमोचनी की कथा श्रीकृष्ण ही सुनाते हैं, इसलिए यह मंत्र इस दिन विशेष भाव से जपा जाता है।

5. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी, सारे संसार के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघ के रंग वाले और सुंदर अंगों वाले हैं; जो लक्ष्मी के पति, कमल-नयन और योगियों के ध्यान से प्राप्त होने वाले हैं — संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

पापमोचनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का मूल नियम है अन्न, विशेषकर चावल का त्याग। व्रत कितना कठोर हो, यह आपकी सेहत, उम्र और परिवार की परंपरा पर निर्भर करता है। जो व्रत आप श्रद्धा और सहजता से निभा सकें, वही सबसे अच्छा है।

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल — केला, सेब, पपीता, अंगूर, संतरा, तरबूज
  • दूध, दही, छाछ, पनीर और मखाने
  • साबूदाना की खिचड़ी या खीर
  • कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा के आटे की रोटी या पूरी (जिनकी परंपरा में यह मान्य हो)
  • आलू, शकरकंद, अरबी और कद्दू जैसी सब्ज़ियाँ
  • सेंधा नमक, काली मिर्च और जीरा
  • मूंगफली, बादाम, अखरोट और अन्य मेवे
  • नारियल पानी, नींबू पानी और सादा जल

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी चीज़ें — एकादशी पर यह सबसे प्रमुख वर्जना है
  • गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा जैसे अनाज और दालें
  • प्याज, लहसुन, मांस, अंडा, मछली और मदिरा
  • साधारण (आयोडीन वाला) नमक, जिसकी जगह सेंधा नमक लें
  • बहुत तला-भुना, बासी या पैकेट वाला भारी भोजन
  • तंबाकू, पान-मसाला और अन्य नशे

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में सूर्योदय से अगले दिन पारण तक अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठोर रूप है और केवल स्वस्थ वयस्कों को ही रखना चाहिए। मार्च-अप्रैल में गर्मी बढ़ने लगती है, इसलिए निर्जला व्रत में शरीर में पानी की कमी का ध्यान रखें।

फलाहार व्रत

फलाहार व्रत सबसे प्रचलित है। इसमें अन्न नहीं खाया जाता, पर फल, दूध, मेवे और व्रत की चीज़ें ली जा सकती हैं। जल पीने की पूरी छूट रहती है। अधिकतर गृहस्थ यही व्रत रखते हैं।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा दिन बिना भोजन नहीं रह सकते, वे दिन में एक बार व्रत का सात्विक भोजन (जैसे साबूदाना या कुट्टू की चीज़ें) ले सकते हैं। बुज़ुर्गों, कामकाजी लोगों और कमज़ोरी महसूस करने वालों के लिए यह व्यावहारिक विकल्प है।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: मधुमेह (डायबिटीज़), ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग हो, आप गर्भवती हों या स्तनपान कराती हों, बुज़ुर्ग हों, या नियमित दवाइयाँ लेते हों, तो कठोर या निर्जला व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह लें। दवाइयाँ बिना डॉक्टर की सलाह के बंद न करें। परंपरा में ऐसे लोगों के लिए फलाहार या केवल पूजा-जप का विकल्प भी स्वीकार्य माना गया है।

पापमोचनी एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण यानी व्रत खोलना। एकादशी व्रत का फल पारण सही समय पर करने से पूरा माना जाता है। पारण के मुख्य नियम इस प्रकार हैं:

  • द्वादशी में पारण: पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद किया जाता है। द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण करना जरूरी माना गया है।
  • हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता।
  • प्रातःकाल सबसे अच्छा: पारण के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है।
  • मध्याह्न से बचें: अगर हरि वासर सुबह देर तक चलता हो और प्रातःकाल निकल जाए, तो कई पंचांग दोपहर (मध्याह्न) बीतने के बाद पारण का समय देते हैं। इसी कारण कुछ वर्षों में पारण दोपहर बाद आता है।
  • स्मार्त और वैष्णव: स्मार्त और वैष्णव (इस्कॉन) पंचांग में पारण का समय अलग हो सकता है, क्योंकि उनके नियम थोड़े अलग हैं। अपनी परंपरा के अनुसार समय चुनें।

आपके शहर का सही पारण समय ऊपर दी गई तालिका में दिया गया है। उस दिन के सूर्योदय और तिथि की जानकारी के लिए हमारा दैनिक पंचांग भी देख सकते हैं।

पारण कैसे करें

  1. स्नान के बाद भगवान विष्णु को भोग लगाएँ और आरती करें।
  2. पहले तुलसी पत्र और थोड़ा जल लें, फिर भोग का प्रसाद ग्रहण करें।
  3. हल्का सात्विक भोजन लें। लंबे व्रत के बाद एकदम भारी या तला-भुना भोजन न करें।
  4. पारण से पहले या साथ में किसी जरूरतमंद को भोजन या दान दें।

पापमोचनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सुबह जल्दी स्नान करके व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु की पूजा करें और पापमोचनी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • मन ही मन अपनी भूलें स्वीकार करें और सुधार का संकल्प लें।
  • किसी से नाराज़गी हो, तो संवाद करें और क्षमा माँगें या क्षमा करें।
  • अन्न, फल, वस्त्र या जल का दान करें। गर्मी की शुरुआत होने से जल और मटके का दान भी अच्छा माना जाता है।
  • तुलसी के पास शाम को दीपक जलाएँ।
  • पारण सही समय पर करें।

क्या न करें

  • चावल और अन्न का सेवन न करें।
  • प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा और नशे से दूर रहें।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और किसी का अपमान न करें — कथा का मुख्य सबक ही क्रोध से बचना है।
  • दिन में सोने से बचें, अगर स्वास्थ्य अनुमति दे।
  • किसी को व्रत रखने के लिए मजबूर न करें, विशेषकर बीमार, बुज़ुर्ग या गर्भवती महिलाओं को।
  • हरि वासर में या द्वादशी बीत जाने के बाद पारण न करें।

पापमोचनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: पापमोचनी एकादशी का व्रत रख लो, फिर कोई भी गलत काम करो, सब माफ़ हो जाएगा।

सच्चाई: परंपरा में प्रायश्चित का अर्थ है पश्चाताप और फिर से वही गलती न करना। कथा में भी मेधावी पहले अपनी भूल अपने पिता के सामने स्वीकार करते हैं, तभी उन्हें व्रत का मार्ग मिलता है। जानबूझकर गलती करते रहना और व्रत को “माफ़ीनामा” समझना इस व्रत के भाव के विपरीत है।

मिथक: यह व्रत केवल बड़े पाप करने वालों के लिए है।

सच्चाई: पापमोचनी एकादशी हर उस व्यक्ति के लिए है, जो आत्म-शुद्धि और भगवान की भक्ति चाहता है। रोज़मर्रा की छोटी भूलें, कठोर वचन या किसी का दिल दुखाना भी आत्म-चिंतन के विषय हैं। यह व्रत किसी को “पापी” ठहराने के लिए नहीं, बल्कि सबको सुधार का अवसर देने के लिए है।

मिथक: कथा में सारा दोष अप्सरा मंजुघोषा का है।

सच्चाई: कथा में मेधावी अपना संयम छोड़ते हैं और बाद में क्रोध में श्राप भी देते हैं, जिसका उन्हें स्वयं पछतावा होता है। च्यवन ऋषि भी अपने पुत्र को ही प्रायश्चित करने को कहते हैं। अंत में दोनों व्रत करते हैं और दोनों को मुक्ति मिलती है। कथा का संदेश दोष थोपना नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करना है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो पापमोचनी एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: शास्त्रों और परंपरा में फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत को भी मान्यता है। व्रत का भाव श्रद्धा, संयम और भक्ति है, शरीर को कष्ट देना नहीं। जिनके लिए निर्जला व्रत संभव नहीं, वे फलाहार करके भी पूरे मन से पूजा कर सकते हैं।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और इससे अपशकुन होगा।

सच्चाई: अनजाने में हुई भूल के लिए परंपरा भगवान से क्षमा माँगने और व्रत को श्रद्धा से आगे जारी रखने की सलाह देती है। इसे डर या अपशकुन से जोड़ना उचित नहीं है। मन में शांति रखें, क्षमा प्रार्थना करें और अगली एकादशी पर अधिक सावधानी रखें।

मिथक: पारण सूर्योदय होते ही किसी भी समय कर लेना चाहिए।

सच्चाई: पारण द्वादशी में होता है, पर हरि वासर (द्वादशी का पहला चौथाई भाग) में पारण नहीं किया जाता। कुछ वर्षों में हरि वासर सुबह देर तक चलता है, तब पंचांग दोपहर बाद का समय बताते हैं। इसलिए अपने शहर का पारण समय ऊपर की तालिका में जरूर देखें।

मिथक: व्रत से शरीर “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी व्रत एक धार्मिक साधना है, इसे किसी चिकित्सा उपचार की तरह नहीं देखना चाहिए। हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग है। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुज़ुर्गावस्था या नियमित दवाइयों की स्थिति में कठोर व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह लें और अपनी क्षमता के अनुसार ही व्रत चुनें।

पापमोचनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ परंपरा और श्रद्धा पर आधारित मान्यताएँ हैं। इनका अनुभव हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकता है।

  • पापों के प्रभाव से मुक्ति: मान्यता है कि श्रद्धा से व्रत करने पर जाने-अनजाने हुई भूलों का बोझ हल्का होता है।
  • मन की शांति: स्वीकार, क्षमा और प्रार्थना से मन का अपराध-बोध कम होता है और शांति मिलती है।
  • संयम और आत्म-नियंत्रण: व्रत, जप और सात्विक दिनचर्या से इच्छाओं पर नियंत्रण का अभ्यास होता है।
  • कथा-श्रवण का पुण्य: परंपरा के अनुसार इस कथा को पढ़ने-सुनने से हज़ार गौदान के समान पुण्य मिलता है।
  • नए वर्ष की शुद्ध शुरुआत: संवत की अंतिम एकादशी होने से इसे नए वर्ष से पहले मन को साफ़ करने का अवसर माना जाता है।
  • भगवान विष्णु की कृपा: भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की भक्ति से श्रीहरि की कृपा और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  • रिश्तों में सुधार: क्षमा माँगने और क्षमा करने के भाव से टूटे या तनाव भरे रिश्तों में मिठास लौट सकती है।

संबंधित एकादशी और पाठ

पापमोचनी एकादशी से ठीक पहले फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आती है, जिस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है। पापमोचनी के बाद नए संवत की पहली एकादशी, चैत्र शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी आती है, जिसे मनोकामना पूरी करने वाली एकादशी कहा जाता है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

पापमोचनी एकादशी हमें सिखाती है कि भटकना मनुष्य का स्वभाव है, पर लौट आना भक्ति का मार्ग है। इस दिन अपनी भूलों को ईमानदारी से स्वीकार करें, किसी से क्षमा माँगें, किसी को क्षमा करें और भगवान विष्णु के चरणों में नए वर्ष के लिए सद्बुद्धि की प्रार्थना करें। श्रीहरि आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

पापमोचनी एकादशी 2027 में कब है?

पापमोचनी एकादशी 2026 (15 मार्च) बीत चुकी है। अगला व्रत शुक्रवार, 2 अप्रैल 2027 को है और पारण 3 अप्रैल को होगा (नई दिल्ली)। अपने शहर और आने वाले वर्षों की तारीख के लिए इस पेज की तारीख तालिका देखें।

पापमोचनी एकादशी किस महीने और पक्ष में आती है?

यह उत्तर भारत के पूर्णिमांत कैलेंडर में चैत्र कृष्ण पक्ष की और दक्षिण-पश्चिम भारत के अमांत कैलेंडर में फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी है। दोनों में दिन एक ही होता है, सामान्यतः मार्च या अप्रैल में।

इसे पापमोचनी एकादशी क्यों कहते हैं?

पापमोचनी का अर्थ है पापों से छुड़ाने वाली। मान्यता है कि श्रद्धा से इसका व्रत करने पर जाने-अनजाने हुई भूलों का प्रभाव कम होता है, इसलिए इसे प्रायश्चित की एकादशी कहा जाता है।

पापमोचनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

कथा में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी चैत्ररथ वन में तप करते हैं, जहाँ अप्सरा मंजुघोषा और कामदेव उनका तप भंग कर देते हैं। 57 वर्ष बाद होश आने पर वे उसे पिशाचिनी होने का श्राप देते हैं। फिर दोनों पापमोचनी एकादशी का व्रत करके मुक्त होते हैं।

पापमोचनी एकादशी की कथा किसने किसे सुनाई?

परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण यह कथा सुनाते हैं, जो लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को सुनाई थी। हिंदी कथा-पुस्तकों में प्रश्नकर्ता अर्जुन हैं, जबकि इस्कॉन ग्रंथों में राजा युधिष्ठिर।

पापमोचनी एकादशी का उल्लेख किस पुराण में है?

परंपरा के अनुसार इसकी कथा भविष्योत्तर पुराण में आती है, जहाँ श्रीकृष्ण एकादशियों का माहात्म्य बताते हैं।

क्या पापमोचनी एकादशी साल की आखिरी एकादशी है?

हाँ, हिंदू संवत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से बदलता है, इसलिए पापमोचनी को संवत वर्ष की अंतिम एकादशी माना जाता है। इसके बाद आने वाली कामदा एकादशी नए संवत की पहली एकादशी होती है।

पापमोचनी एकादशी पर किसकी पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु (या श्रीकृष्ण) और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पीले फूल, तुलसी दल, फल और पंचामृत का भोग लगाकर व्रत कथा पढ़ी जाती है।

पापमोचनी एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है, जिसका 108 बार जप शुभ माना जाता है। इसके साथ “ॐ नमो नारायणाय”, विष्णु गायत्री मंत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं।

पापमोचनी एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फलाहार व्रत में फल, दूध, दही, मखाने, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, मेवे और सेंधा नमक लिया जा सकता है। अन्न और दालें नहीं खाई जातीं।

क्या पापमोचनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल खाना परंपरा में वर्जित माना गया है। चावल और उससे बनी चीज़ें द्वादशी को पारण के बाद ही ली जाती हैं।

क्या पापमोचनी एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। केवल निर्जला व्रत में जल का भी त्याग होता है, जो स्वस्थ वयस्कों को ही रखना चाहिए।

पापमोचनी एकादशी का पारण कब और कैसे करें?

पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर किया जाता है। तुलसी पत्र और जल लेकर सात्विक भोजन से व्रत खोलें; अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।

पारण दोपहर में क्यों बताया जाता है?

जब हरि वासर सुबह देर तक चलता है और प्रातःकाल निकल जाता है, तब कई पंचांग मध्याह्न बीतने के बाद पारण का समय देते हैं। इसलिए कुछ वर्षों में स्मार्त पारण दोपहर बाद आता है।

स्मार्त और वैष्णव पापमोचनी एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो सूर्योदयों को छूती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन) तिथि या पारण समय अलग हो सकते हैं। गृहस्थ सामान्यतः स्मार्त तिथि मानते हैं और वैष्णव अपने संप्रदाय का कैलेंडर।

क्या एक व्रत से सारे पाप मिट जाते हैं?

परंपरा इसे आस्था के रूप में देखती है, और प्रायश्चित के साथ पश्चाताप व फिर गलती न करने का संकल्प भी जरूरी माना गया है। कथा में भी मेधावी पहले अपनी भूल स्वीकार करते हैं, फिर व्रत करते हैं।

क्या गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग या मरीज़ यह व्रत रख सकते हैं?

ऐसे लोग डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन वाला हल्का व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा और जप कर सकते हैं। निर्जला व्रत से बचें और दवाइयाँ बंद न करें।

अगर पापमोचनी एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा प्रार्थना करें, बाकी दिन संयम से व्रत जारी रखें और अगली एकादशी पर अधिक सावधानी रखें।

पापमोचनी एकादशी पर क्या दान करें?

अन्न, फल, वस्त्र, जल या दक्षिणा का दान किया जाता है। गर्मी की शुरुआत होने से जल या मिट्टी के मटके का दान भी अच्छा माना जाता है।

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