सीधे सामग्री पर जाएँ
रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
पसंदीदा
Ekadashi

मोहिनी एकादशी कब है? (Mohini Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण और मोहिनी अवतार की कथा

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi) वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे भगवान विष्णु के मोहिनी रूप की स्मृति में श्रद्धा से रखा जाता है। समुद्र मंथन के समय भगवान ने मोहिनी का मनमोहक रूप धरकर अमृत देवताओं तक पहुँचाया था। इसी कारण इस एकादशी को मोह, यानी आसक्ति और भ्रम से मुक्ति दिलाने वाला व्रत माना जाता है।

परंपरा के अनुसार यह कथा भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी, और उससे भी पहले महर्षि वशिष्ठ ने इसे भगवान श्रीराम को बताया था। सीता जी के वियोग से दुखी श्रीराम ने गुरु से ऐसा व्रत पूछा जो सब पाप और दुख मिटा दे। तब वशिष्ठ जी ने उन्हें मोहिनी एकादशी की महिमा और भद्रावती नगरी के वैश्य पुत्र धृष्टबुद्धि की कथा सुनाई।

इस लेख में आप मोहिनी एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, मोहिनी अवतार की कथा, पूजा विधि, मंत्र और व्रत के नियम सरल भाषा में जानेंगे।

मोहिनी एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: मोहिनी एकादशी 2026 (27 अप्रैल) बीत चुकी है। अगली मोहिनी एकादशी रविवार, 16 मई 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 15 मई 2027 शाम 6:17 बजे से 16 मई शाम 5:13 बजे तक रहेगी, और पारण 17 मई 2027 की सुबह लगभग 5:29 से 8:13 बजे के बीच किया जा सकेगा।

अगली मोहिनी एकादशी

मोहिनी एकादशी 2027

16 मई 2027, रविवार 196 दिन बाकी

मास और पक्ष
वैशाख शुक्ल
एकादशी तिथि
15 मई 18:19 – 16 मई 17:15
पारण (व्रत खोलने का समय)
17 मई, 05:29 – 08:12
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202627 अप्रैल 2026, सोमवार26 अप्रै 18:09 –
27 अप्रै 18:18
28 अप्रै, 05:43 – 08:21
202716 मई 2027, रविवार15 मई 18:19 –
16 मई 17:15
17 मई, 05:29 – 08:12
20285 मई 2028, शुक्रवार4 मई 14:14 –
5 मई 11:35
6 मई, 05:36 – 08:16
202924 मई 2029, गुरुवार23 मई 16:11 –
24 मई 13:12
25 मई, 05:25 – 08:10

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदलता है। 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में व्रत एक ही दिन है। जिन वर्षों में दोनों की तारीख अलग होती है, तालिका में वह अंतर भी दिखाई देता है।

मोहिनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“मोहिनी” शब्द “मोह” से बना है। इसका एक अर्थ है मन को मोह लेने वाली, यानी अत्यंत सुंदर और आकर्षक। भगवान विष्णु ने समुद्र मंथन के समय यही रूप लिया था, जिसके सौंदर्य से असुर मोहित हो गए और अमृत देवताओं को मिल गया।

इस नाम का दूसरा और गहरा अर्थ है मोह के बंधन को काटने वाली। धृष्टबुद्धि की कथा में वशिष्ठ जी कहते हैं कि यह व्रत मनुष्य को मोह के जाल से छुड़ाता है। यानी जिस माया से असुर भटक गए, उसी माया से भक्त को बाहर निकालने वाला व्रत है मोहिनी एकादशी।

मोहिनी एकादशी के अन्य नाम

  • वैशाख शुक्ल एकादशी: पंचांग में तिथि के आधार पर दिया जाने वाला नाम।
  • मोहिनी ग्यारस: हिंदी पट्टी के कई हिस्सों में बोलचाल में एकादशी को “ग्यारस” कहा जाता है।
  • Mohini Ekadasi: इस्कॉन और कई वैष्णव कैलेंडरों में अंग्रेज़ी वर्तनी “Ekadasi” लिखी जाती है।
  • मोहिनी अवतार की एकादशी: बहुत से भक्त इसे भगवान के मोहिनी रूप के स्मरण का दिन मानकर इसी नाम से पुकारते हैं।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर चलता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर खत्म होता है। दक्षिण और पश्चिम भारत में अमांत कैलेंडर चलता है, जिसमें महीना अमावस्या पर खत्म होता है। कृष्ण पक्ष की एकादशियों का महीना इन दोनों में अलग-अलग लिखा जाता है, पर शुक्ल पक्ष की एकादशी का महीना दोनों में एक ही रहता है।

इसलिए मोहिनी एकादशी पूर्णिमांत और अमांत, दोनों कैलेंडरों में वैशाख शुक्ल एकादशी ही है। तमिल सौर कैलेंडर में यह प्रायः चित्तिरै मास में पड़ती है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह आमतौर पर अप्रैल के अंत या मई में आती है।

हिंदू नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के बाद यह तीसरी एकादशी है। पहले चैत्र शुक्ल की कामदा एकादशी आती है, फिर वैशाख कृष्ण की वरुथिनी एकादशी, और उसके बाद मोहिनी एकादशी। इसके कुछ दिन पहले वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया आती है और कुछ दिन बाद वैशाख पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा) आती है।

मोहिनी एकादशी का महत्व

परंपरा के अनुसार वशिष्ठ जी ने कहा कि तीनों लोकों में मोहिनी एकादशी के समान कोई व्रत नहीं है।

धार्मिक महत्व

माहात्म्य में बताया गया है कि मोहिनी एकादशी का व्रत अनेक जन्मों के पापों को नष्ट करता है। कथा में कौण्डिन्य ऋषि कहते हैं कि इस व्रत से मेरु पर्वत जैसे बड़े पाप भी मिट जाते हैं। यह बात धृष्टबुद्धि जैसे व्यक्ति के उद्धार से समझाई गई है, जिसने जीवन भर गलत काम किए थे।

परंपरा में यह भी कहा गया है कि तीर्थ, यज्ञ और दान से मिलने वाला पुण्य मोहिनी एकादशी के पुण्य के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है। साथ ही इसकी कथा पढ़ने या सुनने से एक हज़ार गौदान के समान फल मिलने की मान्यता है। इन बातों को श्रद्धा के भाव से देखें, हिसाब के रूप में नहीं।

आध्यात्मिक संदेश

मोहिनी एकादशी का सबसे बड़ा संदेश है मोह से मुक्ति। असुरों ने अमृत छीन लिया था, पर एक सुंदर रूप के मोह में उन्होंने उसे खो दिया। इसी तरह मनुष्य भी धन, सुख, भोग और अहंकार के मोह में अपना असली अमृत, यानी भक्ति और विवेक, खो बैठता है।

धृष्टबुद्धि की कथा दूसरा संदेश देती है: कोई भी व्यक्ति इतना गिरा हुआ नहीं होता कि लौट न सके। एक ऋषि के वस्त्रों से गिरी गंगाजल की कुछ बूँदों ने उसके मन में अच्छा विचार जगा दिया। यह सत्संग की शक्ति है। अच्छी संगति का एक पल भी जीवन की दिशा बदल सकता है।

श्रीराम ने भी अपने दुख में गुरु से मार्ग पूछा। यह सिखाता है कि कठिन समय में सही मार्गदर्शन लेना कमजोरी नहीं, बुद्धिमानी है।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार मोहिनी एकादशी की महिमा पद्म पुराण (उत्तर खंड) के एकादशी माहात्म्य में मिलती है। कुछ वैष्णव स्रोत इस कथा को कूर्म पुराण से भी जोड़ते हैं, और कुछ लेखों में सूर्य पुराण का नाम भी लिया जाता है। सभी परंपराओं में कथा का मूल रूप एक ही है।

मोहिनी अवतार की कथा अलग से महाभारत, विष्णु पुराण और श्रीमद्भागवत पुराण में आती है। भागवत के आठवें स्कंध में समुद्र मंथन और मोहिनी रूप का विस्तार से वर्णन है। एकादशी व्रत की कथा (धृष्टबुद्धि) और अवतार की कथा (समुद्र मंथन) दो अलग कथाएँ हैं, पर दोनों का भाव एक है: मोह पर विजय।

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर का प्रश्न और श्रीराम की जिज्ञासा

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है, उसकी विधि क्या है और उसका फल क्या है?” भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन, इस एकादशी का नाम मोहिनी है। मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ जो महर्षि वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम को सुनाई थी।”

त्रेता युग में सीता जी के वियोग से श्रीराम बहुत दुखी थे। उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ जी से विनती की, “हे गुरुदेव, मुझे ऐसा कोई श्रेष्ठ व्रत बताइए जिससे सब पाप और सब दुख नष्ट हो जाएँ।” वशिष्ठ जी बोले, “हे राम, आपने लोक कल्याण के लिए उत्तम प्रश्न पूछा है। वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी मनुष्य को सब पापों, दुखों और मोह के जाल से छुड़ाती है।”

भद्रावती नगरी का दानी वैश्य धनपाल

प्राचीन समय में सरस्वती नदी के सुंदर तट पर भद्रावती नाम की एक नगरी थी। वहाँ चंद्रवंश में जन्मे सत्यनिष्ठ राजा द्युतिमान राज्य करते थे। उसी नगरी में धनपाल नाम का एक धनी वैश्य रहता था, जो धन-धान्य से भरपूर होने के साथ बहुत धर्मात्मा और भगवान विष्णु का भक्त था।

धनपाल ने लोगों की भलाई के लिए नगर में अन्नक्षेत्र, प्याऊ, कुएँ, तालाब और धर्मशालाएँ बनवाई थीं। सड़कों के किनारे उसने आम, जामुन और नीम के पेड़ लगवाए थे। उसके पाँच पुत्र थे: सुमना, सद्बुद्धि, मेधावी, सुकृति और धृष्टबुद्धि।

धृष्टबुद्धि का पतन

पाँचवाँ पुत्र धृष्टबुद्धि अपने नाम के अनुसार ही दुष्ट बुद्धि वाला था। वह बुरी संगति में पड़ गया। जुआ खेलना, शराब पीना, मांस खाना और वेश्याओं के पास जाना उसकी आदत बन गई थी। वह न देवताओं का आदर करता था, न पितरों का, न ब्राह्मणों और अतिथियों का, और न ही अपने माता-पिता का। वह पिता के कमाए धन को इन्हीं बुरे कामों में उड़ाता रहता था।

एक दिन धनपाल ने उसे एक वेश्या के गले में हाथ डाले सड़क पर घूमते देख लिया। लज्जा और दुख से भरे पिता ने उसे घर से निकाल दिया। उसके भाई-बंधुओं ने भी उससे नाता तोड़ लिया। कुछ समय तक वह अपने गहने और कपड़े बेचकर गुज़ारा करता रहा, पर जब सब कुछ खत्म हो गया तो वेश्या और उसके साथी भी उसे छोड़कर चले गए।

चोरी, कारावास और वन का जीवन

भूख और प्यास से व्याकुल होकर धृष्टबुद्धि चोरी करने लगा। सिपाहियों ने पहले उसे धनपाल का पुत्र जानकर छोड़ दिया। जब वह फिर-फिर पकड़ा गया, तो राजा की आज्ञा से उसे बेड़ियों में डालकर कारागार में रखा गया और कठोर दंड दिया गया। अंत में उसे नगर से निकाल दिया गया।

नगर से निकाला गया धृष्टबुद्धि घने वन में भटकने लगा। वहाँ पेट भरने के लिए वह पशु-पक्षियों को मारकर खाने लगा। धीरे-धीरे वह धनुष-बाण लेकर पूरा बहेलिया (शिकारी) बन गया। इस तरह उसके पापों का बोझ और बढ़ता गया।

कौण्डिन्य ऋषि का आश्रम और गंगाजल की बूँदें

एक दिन वैशाख मास में, भूख-प्यास और शोक से व्याकुल धृष्टबुद्धि भटकता हुआ महर्षि कौण्डिन्य के आश्रम में जा पहुँचा। उसी समय ऋषि गंगा में स्नान करके लौट रहे थे। उनके भीगे वस्त्रों से गंगाजल की कुछ बूँदें धृष्टबुद्धि पर गिरीं।

उन पवित्र बूँदों के स्पर्श से उसके पिछले पुण्य जाग उठे और उसके मन में सद्बुद्धि आई। उसने हाथ जोड़कर ऋषि से कहा, “हे मुनिवर, मेरे पास न धन है, न कोई सहारा। कृपा करके मुझे कोई ऐसा सरल उपाय बताइए जिससे मेरे पापों का प्रायश्चित हो सके और मुझे इस दुख से मुक्ति मिले।”

ऋषि का उपदेश और व्रत का फल

उसकी सच्ची पुकार सुनकर कौण्डिन्य ऋषि का हृदय करुणा से भर गया। वे बोले, “वत्स, वैशाख शुक्ल पक्ष में मोहिनी नाम की एकादशी आती है। तुम श्रद्धा से उसका व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से अनेक जन्मों के मेरु पर्वत जैसे बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं।”

धृष्टबुद्धि ने ऋषि के बताए नियमों के अनुसार पूरी श्रद्धा से मोहिनी एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उसके सब पाप नष्ट हो गए। उसे दिव्य शरीर प्राप्त हुआ और वह गरुड़ पर बैठकर सब दुखों से मुक्त होकर भगवान विष्णु के धाम को चला गया।

कथा के अंत में वशिष्ठ जी ने श्रीराम से कहा, “हे राम, इस व्रत से मोह आदि सब बंधन नष्ट हो जाते हैं। संसार में इससे श्रेष्ठ कोई व्रत नहीं है।” भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो इस कथा को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उसे एक हज़ार गौदान के समान पुण्य मिलता है।

कथा के अलग-अलग रूप

कुछ परंपराओं में छोटे विवरण अलग मिलते हैं। कहीं राजा का नाम धृतिमान है, कहीं धनपाल के पुत्रों के नाम कुछ बदले हुए हैं, और एक संक्षिप्त कथा में धृष्टबुद्धि को सबसे बड़ा पुत्र कहा गया है। कुछ कथाओं में चोरी और कारावास का प्रसंग नहीं है। पर भद्रावती, धनपाल, धृष्टबुद्धि, कौण्डिन्य ऋषि और मोहिनी एकादशी से उद्धार का मूल प्रसंग सभी में एक जैसा है।

भगवान विष्णु का मोहिनी अवतार और समुद्र मंथन

मोहिनी एकादशी के नाम के पीछे भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की प्रसिद्ध कथा है। लोक मान्यता है कि भगवान ने यह रूप वैशाख शुक्ल एकादशी के दिन ही धारण किया था, इसलिए इस दिन मोहिनी रूप का स्मरण विशेष रूप से किया जाता है। पुराणों में अवतार की तिथि स्पष्ट रूप से नहीं दी गई है, पर यह भाव भक्तों में बहुत प्रचलित है।

समुद्र मंथन क्यों हुआ

पुराणों के अनुसार दुर्वासा ऋषि के श्राप से इंद्र और देवताओं का बल, तेज और ऐश्वर्य क्षीण हो गया था। असुरों के राजा बलि के सामने देवता युद्ध में हारने लगे। तब भगवान विष्णु की सलाह पर देवताओं ने असुरों से संधि की और दोनों ने मिलकर क्षीर सागर का मंथन करने का निश्चय किया, ताकि अमृत निकले।

मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकि नाग को रस्सी। जब पर्वत समुद्र में धँसने लगा, तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर उसे अपनी पीठ पर थाम लिया। मंथन से सबसे पहले हलाहल विष निकला, जिसे भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए पी लिया और नीलकंठ कहलाए।

अमृत कलश और असुरों का छल

मंथन से एक-एक करके कई रत्न निकले, जैसे कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, पारिजात वृक्ष और माता लक्ष्मी। अंत में भगवान धन्वंतरि अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए। असुरों ने कलश छीन लिया और आपस में लड़ने लगे कि पहले कौन पिएगा। चिंतित देवता भगवान विष्णु की शरण में गए।

मोहिनी रूप और अमृत का वितरण

तभी असुरों के बीच एक अत्यंत सुंदर स्त्री प्रकट हुई। उसके रूप को देखकर असुर अपनी लड़ाई भूल गए और उस पर मोहित हो गए। उन्होंने उसी से कहा कि वह अमृत बाँटकर उनका झगड़ा खत्म करे। मोहिनी ने शर्त रखी कि वह जैसे भी बाँटे, सबको मानना होगा। मोह में डूबे असुरों ने बिना सोचे यह शर्त मान ली।

मोहिनी ने देवताओं और असुरों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया। फिर अपनी मधुर बातों और मुस्कान से असुरों को उलझाए रखते हुए उन्होंने सारा अमृत देवताओं को पिला दिया। असुर उसके रूप में इतने खोए रहे कि उन्हें पता भी नहीं चला कि अमृत किसे मिल रहा है।

स्वर्भानु और राहु-केतु

एक असुर स्वर्भानु इस चाल को समझ गया। वह देवता का वेश बनाकर सूर्य और चंद्रमा के बीच बैठ गया और उसने अमृत पी लिया। सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचानकर मोहिनी को बता दिया। भगवान ने तुरंत सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट दिया।

पर अमृत गले से नीचे उतर चुका था, इसलिए वह मरा नहीं। उसका सिर राहु और धड़ केतु कहलाया। मान्यता है कि इसी बैर के कारण राहु सूर्य और चंद्रमा को ग्रसने आता है, जिसे ग्रहण से जोड़ा जाता है। अमृत वितरण के बाद भगवान ने अपना मूल विष्णु रूप फिर से धारण कर लिया।

मोहिनी अवतार से क्या सीखें

इस कथा का भाव यह है कि बल से जो काम नहीं हो सकता, वह विवेक से हो जाता है। असुरों के पास अमृत था, पर मोह ने उनकी बुद्धि हर ली। मोहिनी एकादशी पर इस कथा को याद करने का अर्थ है अपने भीतर के मोह को पहचानना और उससे ऊपर उठने का प्रयास करना।

भगवान श्रीराम और मोहिनी एकादशी

मोहिनी एकादशी की कथा सीधे भगवान श्रीराम से जुड़ी है, क्योंकि वशिष्ठ जी ने यह कथा सीता जी के वियोग में दुखी श्रीराम को सुनाई थी। कई लोक परंपराओं में कहा जाता है कि श्रीराम ने भी यह व्रत किया था। इसलिए इस दिन बहुत से भक्त भगवान विष्णु के साथ श्रीराम का भी पूजन और राम नाम का जप करते हैं।

वैशाख मास, गर्मी और जल सेवा

वैशाख का महीना स्नान, दान और सेवा के लिए बहुत पवित्र माना जाता है। मोहिनी एकादशी इसी महीने के बीच में आती है, जब उत्तर भारत में तेज़ गर्मी होती है। कथा में धनपाल का प्याऊ, कुएँ, तालाब और छायादार पेड़ लगवाना इसी सेवा भाव को दिखाता है।

इस दिन आप भी किसी प्यासे को पानी पिलाएँ, घर के बाहर पक्षियों के लिए पानी का बर्तन रखें, मटका, पंखा, छाता या मौसमी फल दान करें। गरीबों को अन्न और ज़रूरतमंदों को वस्त्र देना भी शुभ माना जाता है। ध्यान रखें कि एकादशी पर स्वयं अन्न नहीं खाया जाता, पर दूसरों को अन्न दान किया जा सकता है।

मोहिनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

नीचे दी गई विधि सामान्य घरेलू परंपरा पर आधारित है। अपने परिवार या गुरु की परंपरा में कोई अलग नियम हो तो उसका पालन करें।

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। भोजन में प्याज़, लहसुन, मांस, मसूर दाल और तामसिक चीज़ें न लें।
  2. रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में अगले दिन के व्रत का विचार रखें।
  3. पूजा स्थान साफ कर लें और ज़रूरी सामग्री पहले से इकट्ठा कर लें, ताकि सुबह जल्दबाज़ी न हो।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय से पहले उठें। स्नान के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  2. साफ, हो सके तो पीले रंग के वस्त्र पहनें।
  3. हाथ में जल, अक्षत (साबुत चावल) और फूल लेकर संकल्प करें: “मैं आज मोहिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता और अपने मन के मोह व पापों की निवृत्ति के लिए रख रहा/रही हूँ। हे प्रभु, मेरा व्रत निर्विघ्न पूरा करें।”

भगवान विष्णु की पूजा

  1. चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र रखें। चाहें तो साथ में श्रीराम या लक्ष्मी-नारायण का चित्र भी रख सकते हैं।
  2. घी का दीपक और धूप जलाएँ। सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
  3. प्रतिमा हो तो गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएँ।
  4. पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल, फूलों की माला और वस्त्र अर्पित करें।
  5. तुलसी दल ज़रूर चढ़ाएँ। तुलसी एकादशी के दिन नहीं तोड़ी जाती, इसलिए पत्ते दशमी को ही तोड़कर रख लें।
  6. मौसमी फल, पंचामृत और पीली मिठाई या मिश्री का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल रखें।
  7. मंत्र जप करें (नीचे दिए गए मंत्र देखें) और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  8. मोहिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  9. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।

दिन भर और शाम की पूजा

  1. दिन भर भगवान का नाम स्मरण करें। दिन में सोने से बचें, क्योंकि एकादशी पर दिन में सोना वर्जित माना गया है।
  2. शाम को फिर से दीपक जलाएँ, तुलसी जी के पास भी घी का दीपक रखें और आरती करें।

रात्रि जागरण

  1. हो सके तो रात में भजन, कीर्तन, राम नाम या विष्णु नाम का जप करते हुए जागरण करें।
  2. पूरी रात जागना संभव न हो तो कुछ घंटे भजन-कीर्तन करके सोएँ। श्रद्धा से किया थोड़ा जागरण भी शुभ माना जाता है।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
  2. किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद या गाय को भोजन कराएँ या दान दें।
  3. ऊपर दी गई तालिका में बताए पारण समय के भीतर तुलसी दल और जल लेकर व्रत खोलें, फिर सात्विक भोजन करें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र (चाहें तो श्रीराम का चित्र भी)
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • घी का दीपक, रुई की बत्ती, माचिस
  • धूप, अगरबत्ती और कपूर
  • गंगाजल और साफ जल से भरा कलश
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, मिश्री)
  • पीला चंदन, रोली और अक्षत
  • पीले फूल और फूलों की माला
  • तुलसी दल (दशमी को तोड़कर रखे हुए)
  • मौसमी फल (आम, केला, खरबूजा आदि)
  • पीली मिठाई, मिश्री या गुड़
  • भगवान के लिए पीला वस्त्र या जनेऊ
  • तुलसी की माला (जप के लिए)
  • व्रत कथा की पुस्तक और आरती संग्रह
  • दान के लिए जल से भरा मटका, पंखा, छाता, फल या अन्न

मोहिनी एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप अपनी सुविधा से इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमन करता हूँ। यह बारह अक्षरों का मंत्र एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है।

2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र

ॐ नमो नारायणाय॥

अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। यह छोटा और सरल मंत्र है, जिसे दिन भर चलते-फिरते मन में जपा जा सकता है।

3. श्रीराम मंत्र

श्री राम जय राम जय जय राम॥

अर्थ: माता सीता सहित भगवान श्रीराम की जय हो। मोहिनी एकादशी की कथा श्रीराम और वशिष्ठ जी से जुड़ी है, इसलिए इस दिन यह राम मंत्र जपना बहुत सुंदर माना जाता है।

4. हरे राम महामंत्र

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥

अर्थ: हे हरि, हे राम, हे कृष्ण, मुझे अपनी भक्ति में लगाइए। इन सोलह नामों का कीर्तन कलियुग में सबसे सरल साधना माना जाता है।

5. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं, जो आकाश के समान विशाल और मेघ जैसे श्याम वर्ण वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति और कमल नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, जो संसार के भय को हरने वाले और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

पूजा आरंभ करते समय इस श्लोक से भगवान का ध्यान करें।

मोहिनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत में अन्न का त्याग मुख्य नियम है। मोहिनी एकादशी गर्मी के मौसम में आती है, इसलिए शरीर में पानी की कमी न होने दें, खासकर अगर आप निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं।

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल: आम, केला, खरबूजा, तरबूज़, पपीता, अंगूर
  • दूध, दही, छाछ, लस्सी, पनीर और मखाना
  • सूखे मेवे: बादाम, काजू, किशमिश, अखरोट
  • साबूदाना की खिचड़ी या खीर
  • कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा के आटे की पूरी या रोटी
  • आलू, शकरकंद, अरबी और कद्दू की सब्ज़ी
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा और हरी मिर्च
  • नारियल पानी, नींबू पानी (सेंधा नमक के साथ) और सादा पानी

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़
  • गेहूँ, जौ, मक्का और सभी अनाज
  • सभी दालें (विशेष रूप से मसूर और चना)
  • प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन
  • मांस, मछली, अंडा और शराब
  • साधारण (आयोडीन) नमक
  • बैंगन, गोभी जैसी कुछ सब्ज़ियाँ, जिन्हें कई परिवार एकादशी पर नहीं खाते
  • दूसरे के घर का या बाहर का बना भोजन

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है। मई की गर्मी में बिना पानी के रहना शरीर पर भारी पड़ सकता है, इसलिए यह व्रत केवल वही रखें जो पूरी तरह स्वस्थ हों और पहले भी ऐसा व्रत रख चुके हों। चक्कर, कमज़ोरी या घबराहट हो तो पानी पी लें।

फलाहार व्रत

फलाहार व्रत सबसे अधिक रखा जाता है। इसमें अन्न नहीं खाया जाता, पर फल, दूध, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा और व्रत की सब्ज़ियाँ खाई जा सकती हैं। पानी, नारियल पानी और छाछ पीते रहें।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा दिन फलाहार पर नहीं रह सकते, वे दिन में एक बार व्रत का सात्विक भोजन कर सकते हैं। इसमें भी अन्न, दाल और साधारण नमक नहीं लिया जाता।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग वाले लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग और नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। ऐसे लोग फलाहार या एक समय के व्रत से भी पूरी श्रद्धा के साथ एकादशी कर सकते हैं। दवा कभी न छोड़ें।

मोहिनी एकादशी पारण कब और कैसे करें

एकादशी व्रत का पारण, यानी व्रत खोलना, अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। सही समय पर पारण करना व्रत का ज़रूरी हिस्सा माना गया है। इसके कुछ मुख्य नियम इस प्रकार हैं:

  • द्वादशी में पारण: पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करें। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना ठीक नहीं माना जाता।
  • हरिवासर से बचें: द्वादशी का पहला चौथाई भाग हरिवासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरिवासर खत्म होने के बाद ही व्रत खोलें।
  • सुबह का समय सबसे अच्छा: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे उत्तम माना गया है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है। सुबह संभव न हो तो मध्याह्न के बाद करें।
  • स्मार्त और वैष्णव: कुछ वर्षों में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव परंपरा के व्रत का दिन अलग होता है। वैष्णव परंपरा में पारण की समय सीमा कभी-कभी थोड़ी लंबी होती है। अपनी परंपरा के अनुसार ऊपर की तालिका में दिया गया समय देखें।

पारण कैसे करें

  1. द्वादशी को स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
  2. किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद या गाय को भोजन या दान दें।
  3. पहले तुलसी दल और थोड़ा जल लेकर व्रत खोलें। कई परिवार दूध या फल से भी पारण करते हैं।
  4. उसके बाद सात्विक भोजन करें। चाहें तो इसमें चावल भी शामिल कर सकते हैं, क्योंकि द्वादशी पर चावल खाना वर्जित नहीं है।

पारण का सही समय आपके शहर के सूर्योदय पर निर्भर करता है। इसलिए हमेशा ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर का समय देखें।

मोहिनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
  • भगवान विष्णु और श्रीराम का पूजन करें, तुलसी दल अर्पित करें।
  • मोहिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
  • प्यासे लोगों और पक्षियों के लिए पानी की व्यवस्था करें।
  • मटका, छाता, पंखा, फल या अन्न का दान करें।
  • विष्णु सहस्रनाम या राम नाम का जप करें।
  • मन में किसी पुरानी गलती के लिए सच्चा पश्चाताप करें और आगे न दोहराने का संकल्प लें।
  • अच्छी संगति में समय बिताएँ, सत्संग या भजन में भाग लें।

क्या न करें

  • चावल, अनाज, दाल, प्याज़, लहसुन और मांस-मदिरा का सेवन न करें।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और झगड़े से बचें।
  • जुआ, नशा या किसी भी बुरी आदत से दूर रहें, जैसा कथा में धृष्टबुद्धि के पतन से सीख मिलती है।
  • किसी का अपमान न करें, विशेष रूप से माता-पिता, बुज़ुर्गों और अतिथियों का।
  • अपने व्रत का दिखावा न करें और दूसरों को व्रत न रखने के लिए बुरा न कहें।

मोहिनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

नीचे सम्मान के साथ समझाया गया है कि परंपरा वास्तव में क्या कहती है।

मिथक: मोहिनी एकादशी का संबंध किसी तरह के “वशीकरण” या दूसरों को मोहित करने से है।

सच्चाई: यह एक आम भ्रम है। मोहिनी नाम भगवान के उस रूप से आया है जिसने असुरों के मोह को उन्हीं के विरुद्ध इस्तेमाल किया। व्रत का भाव दूसरों को मोहित करना नहीं, बल्कि अपने मन के मोह से मुक्त होना है। शास्त्रों में इस व्रत को किसी को वश में करने का उपाय नहीं बताया गया।

मिथक: बहुत बड़े पाप करने वाले व्यक्ति के लिए यह व्रत किसी काम का नहीं।

सच्चाई: कथा ठीक इसका उल्टा कहती है। धृष्टबुद्धि ने जुआ, चोरी, शराब और हिंसा जैसे अनेक गलत काम किए थे, फिर भी सच्चे पश्चाताप और व्रत से उसका उद्धार हुआ। परंपरा में व्रत के साथ सच्चा पछतावा और जीवन में सुधार का संकल्प सबसे ज़रूरी माना गया है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो मोहिनी एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: परंपरा में निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन, तीनों प्रकार के व्रत मान्य हैं। कथा में धृष्टबुद्धि को कोई कठोर तप नहीं, बल्कि श्रद्धा से व्रत करने को कहा गया था। मई की गर्मी में अपने स्वास्थ्य के अनुसार व्रत का प्रकार चुनें।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और अपशकुन होगा।

सच्चाई: अनजाने में हुई भूल पर डरने की ज़रूरत नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें और व्रत जारी रखें। परंपरा में भाव को सबसे ऊपर रखा गया है। एकादशी का व्रत भय से नहीं, प्रेम और श्रद्धा से रखा जाता है।

मिथक: एकादशी पर किसी को अन्न देना या घर में खाना बनाना मना है।

सच्चाई: व्रत रखने वाला स्वयं अन्न नहीं खाता, पर परिवार के जो सदस्य व्रत नहीं रख रहे, उनके लिए खाना बनाया जा सकता है। बच्चों, बीमारों और बुज़ुर्गों को भोजन देना सेवा है। अन्न दान भी किया जा सकता है।

मिथक: व्रत शरीर का “डिटॉक्स” करता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी व्रत एक धार्मिक साधना है, इसे किसी इलाज के रूप में नहीं देखना चाहिए। डायबिटीज़, गर्भावस्था, बुढ़ापे या दवा लेने की स्थिति में कठोर उपवास नुकसान कर सकता है। ऐसे में डॉक्टर से सलाह लें और हल्का व्रत रखें।

मोहिनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ परंपरा और श्रद्धा पर आधारित मान्यताएँ हैं, इन्हें किसी गारंटी के रूप में न देखें।

  • मोह से मुक्ति: मान्यता है कि यह व्रत मन को आसक्ति, भ्रम और माया के बंधन से छुड़ाने में सहायता करता है।
  • पापों का क्षय: माहात्म्य के अनुसार इससे अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।
  • दुख और शोक में सहारा: श्रीराम के प्रश्न से जुड़ी होने के कारण यह एकादशी वियोग और मन के दुख में धैर्य देने वाली मानी जाती है।
  • सद्बुद्धि: धृष्टबुद्धि की तरह व्यक्ति के मन में अच्छे विचार और सही निर्णय लेने की शक्ति जागने की मान्यता है।
  • महान पुण्य: परंपरा में इसका पुण्य तीर्थ, यज्ञ और दान से भी बढ़कर बताया गया है, और कथा सुनने का फल एक हज़ार गौदान के समान कहा गया है।
  • मन की शांति: उपवास, जप और जागरण से मन एकाग्र होता है और संयम की आदत बनती है।
  • मोक्ष की ओर कदम: कथा में धृष्टबुद्धि को विष्णु धाम की प्राप्ति बताई गई है, इसलिए इसे मोक्ष की ओर ले जाने वाला व्रत माना जाता है।

संबंधित एकादशी और पाठ

मोहिनी एकादशी से ठीक पहले वैशाख कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी आती है, जिसे कवच की तरह रक्षा करने वाली एकादशी माना जाता है। मोहिनी के बाद ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी आती है, जिसे अपार पुण्य देने वाली कहा जाता है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

मोहिनी एकादशी हमें याद दिलाती है कि मोह चाहे कितना भी गहरा हो, भगवान की कृपा और अच्छी संगति का एक पल उससे बाहर निकाल सकता है। जैसे भगवान ने मोहिनी रूप धरकर अमृत सही हाथों तक पहुँचाया, वैसे ही वे हमारे जीवन का अमृत, यानी भक्ति और विवेक, हमें लौटा सकते हैं। इस दिन किसी प्यासे को पानी दें, किसी दुखी को सहारा दें और अपने मन की एक बुरी आदत छोड़ने का संकल्प लें। भगवान श्रीहरि आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

मोहिनी एकादशी कब है 2027 में?

मोहिनी एकादशी 2026 (27 अप्रैल) बीत चुकी है। अगला व्रत रविवार, 16 मई 2027 को है और पारण 17 मई की सुबह (नई दिल्ली) होगा। अपने शहर और आने वाले वर्षों की तारीख के लिए इस पेज पर दी गई तारीख तालिका देखें।

मोहिनी एकादशी किस महीने में आती है?

मोहिनी एकादशी वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। शुक्ल पक्ष होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत, दोनों कैलेंडरों में इसका महीना वैशाख ही रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह आमतौर पर अप्रैल के अंत या मई में आती है।

इस एकादशी का नाम मोहिनी क्यों पड़ा?

यह नाम भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ा है, जिसे उन्होंने समुद्र मंथन के समय अमृत देवताओं तक पहुँचाने के लिए धारण किया था। साथ ही माना जाता है कि यह व्रत मनुष्य को मोह के बंधन से मुक्त करता है।

क्या भगवान विष्णु ने इसी दिन मोहिनी रूप लिया था?

लोक मान्यता है कि भगवान ने वैशाख शुक्ल एकादशी को ही मोहिनी रूप धारण किया था, इसलिए इस दिन उस रूप का स्मरण किया जाता है। पुराणों में अवतार की तिथि स्पष्ट रूप से नहीं मिलती, पर यह भाव भक्तों में बहुत प्रचलित है।

मोहिनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

भद्रावती नगरी के धर्मात्मा वैश्य धनपाल का पुत्र धृष्टबुद्धि बुरी संगति में पड़कर घर और नगर से निकाला गया। वन में भटकते हुए वह कौण्डिन्य ऋषि के आश्रम पहुँचा, जिनकी सलाह पर उसने मोहिनी एकादशी का व्रत किया और पापों से मुक्त होकर विष्णु धाम गया।

मोहिनी एकादशी की कथा किसने किसको सुनाई थी?

परंपरा के अनुसार महर्षि वशिष्ठ ने यह कथा सीता वियोग से दुखी भगवान श्रीराम को सुनाई थी। बाद में भगवान श्रीकृष्ण ने यही कथा युधिष्ठिर को सुनाई।

मोहिनी एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है और उनके मोहिनी रूप का स्मरण किया जाता है। कथा श्रीराम से जुड़ी होने के कारण बहुत से भक्त श्रीराम का भी पूजन करते हैं।

मोहिनी एकादशी पर क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, छाछ, मखाना, सूखे मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक लिया जा सकता है। गर्मी के कारण पानी, नारियल पानी और छाछ पीते रहें।

मोहिनी एकादशी पर क्या नहीं खाना चाहिए?

चावल, गेहूँ और सभी अनाज, सभी दालें, प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा, शराब और साधारण नमक नहीं लेना चाहिए।

क्या मोहिनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं। परंपरा में हर एकादशी पर चावल वर्जित माना गया है। चावल अगले दिन द्वादशी को पारण के बाद खाया जा सकता है।

क्या मोहिनी एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

हाँ, निर्जला व्रत को छोड़कर फलाहार और एक समय के व्रत में पानी पिया जा सकता है। मई की गर्मी में शरीर में पानी की कमी न होने देना ज़रूरी है।

मोहिनी एकादशी का पारण कब और कैसे करें?

पारण अगले दिन द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरिवासर समाप्त होने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले करें। तुलसी दल और जल लेकर व्रत खोलें। अपने शहर का सही समय इस पेज की तालिका में देखें।

हरिवासर क्या होता है?

द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग हरिवासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता, इसके खत्म होने के बाद ही व्रत खोलना चाहिए।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

स्मार्त परंपरा (अधिकतर गृहस्थ) और वैष्णव परंपरा (जैसे इस्कॉन) तिथि की गणना के अलग नियम मानती हैं, इसलिए कुछ वर्षों में व्रत का दिन अलग हो जाता है। 2027 में मोहिनी एकादशी दोनों परंपराओं में एक ही दिन है।

मोहिनी एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” और “ॐ नमो नारायणाय” का जप किया जा सकता है। कथा श्रीराम से जुड़ी होने के कारण “श्री राम जय राम जय जय राम” का जप भी सुंदर माना जाता है।

क्या गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग या बीमार लोग यह व्रत रख सकते हैं?

ऐसे लोग डॉक्टर से सलाह लेकर फलाहार या एक समय भोजन वाला हल्का व्रत रख सकते हैं। निर्जला व्रत और दवा छोड़ने से बचें, श्रद्धा भाव ही सबसे महत्वपूर्ण है।

अगर गलती से व्रत टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को सबसे ऊपर माना गया है।

मोहिनी एकादशी पर क्या दान करना चाहिए?

वैशाख की गर्मी को देखते हुए जल से भरा मटका, छाता, पंखा, मौसमी फल, अन्न और वस्त्र का दान शुभ माना जाता है। प्यासे लोगों और पक्षियों के लिए पानी रखना भी सेवा है।

अपनी टिप्पणी लिखें

आपका ईमेल प्रकाशित नहीं किया जाएगा। टिप्पणी समीक्षा के बाद दिखाई देगी।