वरुथिनी एकादशी (Varuthini Ekadashi) वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे भक्त भगवान विष्णु के वराह अवतार की विशेष पूजा के साथ रखते हैं। “वरुथिनी” शब्द का भाव है रक्षा करने वाली, यानी कवच के समान। परंपरा के अनुसार जो श्रद्धा से यह व्रत रखता है, भगवान उसकी कष्टों और बुराइयों से रक्षा करते हैं।
इस एकादशी की सबसे प्रसिद्ध कथा राजा मान्धाता की है। नर्मदा के तट पर तपस्या करते समय एक भालू ने उन पर हमला किया था। भगवान विष्णु ने उन्हें बचाया और मथुरा जाकर वराह भगवान की पूजा के साथ यह व्रत करने को कहा, जिससे राजा का शरीर फिर से स्वस्थ हो गया।
वरुथिनी एकादशी का एक और महत्व है। इसी तिथि को पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्री वल्लभाचार्य जी की जयंती मनाई जाती है। इस लेख में आप वरुथिनी एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, दान का महत्व, दशमी से द्वादशी तक के नियम और व्रत से जुड़ी आम भ्रांतियों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
वरुथिनी एकादशी 2027 कब है? तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: वरुथिनी एकादशी 2026 (13 अप्रैल) बीत चुकी है। अगली वरुथिनी एकादशी रविवार, 2 मई 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 1 मई 2027 शाम 6:53 बजे से 2 मई शाम 7:51 बजे तक रहेगी, और पारण 3 मई 2027 की सुबह लगभग 5:39 से 8:19 बजे के बीच किया जा सकेगा।
अगली वरूथिनी एकादशी · देहरादून
वरूथिनी एकादशी 2027
2 मई 2027, रविवार 182 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- वैशाख कृष्ण
- एकादशी तिथि
- 1 मई 18:55 – 2 मई 19:53
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 3 मई, 05:33 – 08:14
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 13 अप्रैल 2026, सोमवार | 13 अप्रै 01:19 – 14 अप्रै 01:11 | 14 अप्रै, 06:57 – 08:26 |
| 2027 | 2 मई 2027, रविवार | 1 मई 18:55 – 2 मई 19:53 | 3 मई, 05:33 – 08:14 |
| 2028 | 20 अप्रैल 2028, गुरुवार | 19 अप्रै 16:16 – 20 अप्रै 18:49 | 21 अप्रै, 05:44 – 08:21 |
| 2029 | 9 मई 2029, बुधवार | 8 मई 07:42 – 9 मई 10:04 | 10 मई, 05:27 – 08:10 |
तारीखें देहरादून के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदलता है। 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में व्रत एक ही दिन है। जिन वर्षों में दोनों की तारीख अलग होती है, तालिका में वह अंतर भी दिखाई देता है।
वरुथिनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
संस्कृत में “वरूथ” का अर्थ होता है कवच, ढाल या रक्षा का आवरण। इसी से “वरुथिनी” बना, यानी वह जो कवच की तरह रक्षा करे। मान्यता है कि यह व्रत भक्त के चारों ओर पुण्य का एक कवच बना देता है, जो उसे पाप, भय, रोग और दुर्भाग्य से बचाता है।
यह नाम इस एकादशी की कथा से भी मेल खाता है। राजा मान्धाता पर संकट आया, पर भगवान विष्णु ने उनकी रक्षा की और इसी व्रत से उनका खोया अंग लौट आया। इसलिए बहुत से भक्त इसे “रक्षा करने वाली एकादशी” कहते हैं।
वरुथिनी एकादशी के अन्य नाम
- वरूथिनी एकादशी: यही नाम लंबी “ऊ” की मात्रा के साथ भी लिखा जाता है। दोनों वर्तनी सही मानी जाती हैं।
- बरूथिनी या बरुथानी एकादशी (Baruthini Ekadashi): उत्तर भारत की बोलियों में “व” को “ब” बोलने के कारण यह नाम प्रचलित है।
- वैशाख कृष्ण एकादशी: पंचांग में तिथि के आधार पर दिया जाने वाला नाम।
- वल्लभाचार्य जयंती की एकादशी: पुष्टिमार्गीय वैष्णव इस दिन को अपने आचार्य के प्राकट्य दिवस के रूप में भी जानते हैं।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ यह वैशाख कृष्ण एकादशी कहलाती है। गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में प्रचलित अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ यही तिथि चैत्र कृष्ण एकादशी कहलाती है।
ध्यान रखें कि तारीख दोनों में एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह एकादशी प्रायः अप्रैल या मई में आती है। यह हिंदू नववर्ष (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा) के बाद आने वाली दूसरी एकादशी है। इससे पहले कामदा एकादशी आती है और इसके बाद मोहिनी एकादशी।
वरुथिनी एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस एकादशी का माहात्म्य सुनाया था। उन्होंने बताया कि यह व्रत सौभाग्य देने वाला, सब पापों का नाश करने वाला और अंत में मोक्ष की ओर ले जाने वाला है। मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी का पुण्य दस हज़ार वर्षों की तपस्या के बराबर है।
माहात्म्य में यह भी कहा गया है कि इस व्रत का फल सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्वर्ण दान करने जैसा माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धा से इसकी कथा पढ़ता या सुनता है, उसे हज़ार गौदान के समान पुण्य मिलने की मान्यता है।
इस एकादशी पर भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा का विशेष विधान है। राजा मान्धाता को भी भगवान ने वराह रूप की प्रतिमा की पूजा करने को कहा था। वराह भगवान वह रूप हैं जिन्होंने हिरण्याक्ष का वध करके डूबी हुई पृथ्वी को अपने दाँतों पर उठाकर फिर से स्थापित किया था। इसीलिए उन्हें रक्षक और उद्धारक के रूप में पूजा जाता है।
आध्यात्मिक संदेश
वरुथिनी एकादशी की कथा का सबसे गहरा संदेश है धैर्य और अहिंसा। जब भालू राजा मान्धाता का पैर चबा रहा था, तब भी राजा ने क्रोध नहीं किया और न ही हथियार उठाया। उन्होंने केवल भगवान को पुकारा। यह हमें सिखाता है कि संकट की घड़ी में घबराने के बजाय मन को ईश्वर में स्थिर रखना चाहिए।
दूसरा संदेश कर्म से जुड़ा है। भगवान ने राजा को बताया कि यह कष्ट उनके पूर्व जन्म के किसी अपराध का फल था। यानी जीवन में आने वाले दुखों को कोसने के बजाय उन्हें सुधार के अवसर की तरह देखना चाहिए। व्रत, सेवा और दान से मन शुद्ध होता है और जीवन की दिशा बदलती है।
तीसरा संदेश दान के बारे में है। इस एकादशी के माहात्म्य में दानों की तुलना की गई है, और विद्या दान को सबसे ऊँचा बताया गया है। इसका भाव यह है कि किसी को ज्ञान देना, पढ़ाना या सही राह दिखाना सबसे बड़ी सेवा है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार वरुथिनी एकादशी का माहात्म्य भविष्योत्तर पुराण में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है। कई वैष्णव संस्थाएँ, जैसे इस्कॉन, इसे पद्म पुराण से जुड़ा बताती हैं। दोनों परंपराओं में कथा का सार एक ही है।
माहात्म्य में दो राजाओं का नाम आता है जिन्हें इस व्रत से लाभ मिला। पहले हैं राजा मान्धाता, जिनकी कथा हम आगे पढ़ेंगे। दूसरे हैं इक्ष्वाकु वंश के राजा धुंधुमार, जिन्हें भगवान शिव के शाप के कारण कष्ट भोगना पड़ा था। परंपरा के अनुसार वरुथिनी एकादशी के व्रत से वे शाप से मुक्त हुए।
वरुथिनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे वासुदेव! वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है? उसकी विधि क्या है और उसका क्या फल मिलता है? कृपया विस्तार से बताइए।”
श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर कहा, “हे राजन! इस एकादशी का नाम वरुथिनी है। यह सौभाग्य देने वाली, सब पापों को नष्ट करने वाली और अंत में मोक्ष देने वाली है। इसका व्रत करने से मनुष्य को इस लोक और परलोक दोनों में सुख मिलता है। मैं तुम्हें इसकी एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ।”
नर्मदा तट के दानी राजा मान्धाता
प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर राजा मान्धाता राज्य करते थे। वे बहुत दानशील, धर्मात्मा और तपस्वी स्वभाव के थे। प्रजा उनसे बहुत प्रेम करती थी। राजकाज के साथ-साथ वे भगवान की भक्ति और तपस्या में भी लगे रहते थे।
एक दिन राजा मान्धाता वन में जाकर तपस्या करने लगे। वे ध्यान में ऐसे लीन हो गए कि उन्हें आसपास की कोई खबर नहीं रही। तभी वहाँ एक जंगली भालू आया।
भालू का हमला और राजा का धैर्य
भालू ने ध्यानमग्न राजा का पैर पकड़ लिया और उसे चबाने लगा। फिर वह राजा को घसीटते हुए घने जंगल की ओर ले जाने लगा। इतनी पीड़ा में भी राजा मान्धाता ने क्रोध नहीं किया। वे तपस्वी थे और तपस्या के समय हिंसा करना उचित नहीं समझते थे, इसलिए उन्होंने भालू पर हाथ नहीं उठाया।
राजा ने करुण स्वर में भगवान विष्णु को पुकारा, “हे नारायण! हे दीनबंधु! मेरी रक्षा कीजिए।” भक्त की पुकार सुनकर भगवान विष्णु तुरंत प्रकट हुए। उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से भालू का वध कर दिया और राजा के प्राण बचा लिए।
भगवान विष्णु का उपदेश
भालू मारा गया, पर तब तक वह राजा का पैर खा चुका था। अपना पैर खोकर राजा मान्धाता बहुत दुखी हुए। उन्हें दुखी देखकर भगवान विष्णु ने प्रेम से कहा, “वत्स! शोक मत करो। तुम्हें जो कष्ट मिला है, वह तुम्हारे पूर्व जन्म के किसी अपराध का फल है।”
भगवान ने आगे कहा, “तुम मथुरा जाओ। वहाँ वैशाख कृष्ण पक्ष की वरुथिनी एकादशी का व्रत करो और मेरे वराह अवतार की प्रतिमा की श्रद्धा से पूजा करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारा शरीर फिर से पूर्ण और सुंदर हो जाएगा।” इतना कहकर भगवान अंतर्धान हो गए।
मथुरा में व्रत और राजा का उद्धार
राजा मान्धाता भगवान की आज्ञा मानकर मथुरा पहुँचे। उन्होंने पूरी श्रद्धा और नियम के साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा। दिन भर उपवास किया, वराह भगवान की प्रतिमा की पूजा की और रात को जागकर भगवान का स्मरण किया।
व्रत के प्रभाव से राजा का खोया हुआ पैर फिर से लौट आया और उनका शरीर पहले की तरह स्वस्थ और सुंदर हो गया। राजा ने बाकी जीवन धर्म और भक्ति में बिताया। परंपरा के अनुसार इसी व्रत के पुण्य से अंत में उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई।
कथा का फल
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “हे राजन! जो कोई भय या कष्ट से पीड़ित हो, उसे वरुथिनी एकादशी का व्रत करके भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। जो इस कथा को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उसे हज़ार गौदान के समान पुण्य मिलता है।”
कथा के रूपों में अंतर: अधिकांश हिंदी परंपराओं में कथा इसी रूप में मिलती है। कुछ कथाओं में चक्र का नाम सुदर्शन नहीं लिखा, केवल “चक्र” कहा गया है। कुछ में भालू द्वारा पैर “खा लेने” के बजाय “घायल कर देने” की बात है। अंत में किसी कथा में राजा को स्वर्ग और किसी में वैकुंठ मिलने का उल्लेख है। इस्कॉन के अंग्रेज़ी माहात्म्य में भालू वाली घटना नहीं है, वहाँ केवल इतना कहा गया है कि राजा मान्धाता इस व्रत से मुक्त हुए।
वरुथिनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
नीचे दी गई विधि घर पर सरलता से की जा सकती है। अपने परिवार की परंपरा या गुरु के निर्देश अलग हों, तो उन्हें प्राथमिकता दें।
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक ही बार सात्विक भोजन करें। परंपरा में इसे “हविष्यान्न” कहा गया है, यानी बिना तेल-मसाले का सादा भोजन।
- वरुथिनी एकादशी के माहात्म्य में दशमी के लिए कुछ विशेष नियम बताए गए हैं: कांसे के बर्तन में भोजन न करें, मांस, मसूर, चना, कोदो, शाक (साग) और शहद न खाएँ, दूसरे के घर का अन्न न खाएँ और दो बार भोजन न करें।
- दशमी की रात ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में अगले दिन के व्रत का संकल्प रखें।
- पूजा का स्थान साफ कर लें और पूजा सामग्री एक दिन पहले ही जुटा लें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- सूर्योदय से पहले, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। संभव हो तो पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ।
- साफ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें। पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है।
- सूर्य देव को जल अर्पित करें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं (अपना नाम, गोत्र) आज वरुथिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए, अपनी सामर्थ्य के अनुसार (निर्जला / फलाहार / एक समय) रखूँगा/रखूँगी।” फिर जल भूमि पर छोड़ दें।
भगवान विष्णु और वराह भगवान की पूजा
- एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएँ और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र रखें। वराह अवतार का चित्र या प्रतिमा हो, तो उसे भी स्थापित करें। न हो तो भगवान विष्णु की पूजा में ही वराह रूप का ध्यान करें।
- पास में जल से भरा कलश रखें और घी का दीपक जलाएँ।
- भगवान को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर साफ जल से।
- चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी पर तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
- धूप-दीप दिखाएँ और मौसमी फल, मिश्री या पंचामृत का भोग लगाएँ।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का कम से कम 108 बार जप करें।
- वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।
दिन भर और शाम की पूजा
- दिन में सोने से बचें। माहात्म्य में एकादशी के दिन जुआ, खेलकूद, दिन में सोना, पान खाना, निंदा, क्रोध और झूठ बोलने को वर्जित बताया गया है।
- समय मिलने पर विष्णु सहस्रनाम, गीता या भगवान की कथाओं का पाठ करें।
- शाम को तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाएँ (तुलसी को छुएँ या तोड़ें नहीं)।
- संध्या के समय फिर से दीपक जलाकर आरती करें।
रात्रि जागरण
- परंपरा में एकादशी की रात जागरण का बड़ा महत्व है। राजा मान्धाता और राजा धुंधुमार दोनों ने रात जागकर भगवान का स्मरण किया था।
- परिवार के साथ भजन-कीर्तन करें, नाम जप करें या कथा सुनें।
- पूरी रात जागना कठिन हो, तो कम से कम आधी रात तक भगवान का स्मरण करें। स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही जागरण करें।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
- संभव हो तो किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद व्यक्ति या गौ को भोजन कराएँ और यथाशक्ति दान दें।
- ऊपर की तालिका में दिए पारण समय के भीतर तुलसी दल डालकर जल या भोग का प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
- माहात्म्य के अनुसार द्वादशी को भी दशमी के नियमों का पालन करें। साथ ही भारी परिश्रम, तेल मालिश और बाल-दाढ़ी कटवाने से बचें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र (हो सके तो वराह अवतार का चित्र भी)
- चौकी और पीला कपड़ा
- जल से भरा कलश, आम के पत्ते
- गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, माचिस
- धूप या अगरबत्ती
- चंदन, रोली, कुमकुम, हल्दी
- अक्षत (साबुत चावल, केवल पूजा के लिए)
- पीले फूल और फूलों की माला
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
- मौसमी फल, मिश्री, सूखे मेवे
- पान का पत्ता, सुपारी, लौंग, इलायची (पूजा में अर्पण के लिए)
- पीले वस्त्र या जनेऊ (अर्पण के लिए, यदि परंपरा हो)
- व्रत कथा की पुस्तक और आरती की पुस्तक
- दान के लिए अन्न, वस्त्र, पुस्तकें या दक्षिणा
वरुथिनी एकादशी के मंत्र
मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप अपनी सुविधा से इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से जप करना शुभ माना जाता है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमन करता हूँ। यह बारह अक्षरों का मंत्र एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है। इसका 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।
2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र
ॐ नमो नारायणाय॥
अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। यह आठ अक्षरों का सरल मंत्र है, जिसे दिन भर चलते-फिरते भी मन में जपा जा सकता है।
3. वराह मंत्र
॥ ॐ वराहाय नमः ॥
अर्थ: भगवान वराह को नमस्कार है। वरुथिनी एकादशी पर वराह अवतार की पूजा का विशेष महत्व है, इसलिए पूजा के समय यह छोटा मंत्र बोलकर वराह भगवान को फूल और तुलसी अर्पित करें।
4. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी और पूरे संसार के आधार हैं, जो आकाश के समान विशाल और बादल जैसे श्याम रंग के हैं, जो लक्ष्मी के पति और कमल जैसे नेत्रों वाले हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, जो संसार के भय को हरने वाले और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
पूजा आरंभ करते समय इस श्लोक से भगवान का ध्यान करें। यह श्लोक “भवभयहरं” यानी भय दूर करने वाले विष्णु का स्मरण कराता है, जो वरुथिनी एकादशी के रक्षा वाले भाव से मेल खाता है।
वरुथिनी एकादशी पर दान का महत्व
वरुथिनी एकादशी के माहात्म्य में दान पर विशेष बल दिया गया है। इसमें अलग-अलग दानों की तुलना की गई है। परंपरा के अनुसार घोड़े के दान से हाथी का दान श्रेष्ठ है, उससे भूमि दान, फिर तिल दान, फिर स्वर्ण दान और उससे भी श्रेष्ठ अन्न दान माना गया है।
अन्न दान: सबसे बड़ा भौतिक दान
माहात्म्य के अनुसार अन्न दान को इसलिए इतना ऊँचा स्थान दिया गया है क्योंकि अन्न से देवता, पितर और मनुष्य तीनों तृप्त होते हैं। भूखे को भोजन कराना सीधे जीवन देने जैसा है। कुछ ग्रंथ-रूपों में कन्यादान और गौदान को अन्न दान के बराबर बताया गया है।
इस दिन आप किसी मंदिर के भंडारे में सहयोग कर सकते हैं, ज़रूरतमंद परिवार को राशन दे सकते हैं या किसी भूखे को भोजन करा सकते हैं। ध्यान रखें कि व्रत रखने वाले स्वयं अन्न नहीं खाते, पर दूसरों को अन्न दान कर सकते हैं। बहुत से लोग यह दान द्वादशी की सुबह पारण से पहले करते हैं।
विद्या दान: सबसे श्रेष्ठ दान
माहात्म्य में सबसे ऊँचा स्थान विद्या दान को दिया गया है। किसी अनजान को ज्ञान देना, बच्चों को पढ़ाना या किसी को सही मार्ग दिखाना, सभी भौतिक दानों से बढ़कर माना गया है। परंपरा कहती है कि वरुथिनी एकादशी का व्रत करने वाले को इन सभी दानों का फल मिलता है।
आज के समय में विद्या दान के कई सरल रूप हैं: किसी गरीब बच्चे की फीस या किताबें देना, किसी को मुफ्त में पढ़ाना, धार्मिक पुस्तकें बाँटना, या किसी को कोई उपयोगी हुनर सिखाना। ये सब सेवा के सुंदर रूप हैं।
दान करते समय ध्यान रखें
- दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें। कर्ज़ लेकर या दिखावे के लिए दान करने की ज़रूरत नहीं है।
- दान सम्मान के साथ दें, लेने वाले को छोटा महसूस न कराएँ।
- माहात्म्य में कन्या के धन पर जीवन चलाने को निंदनीय बताया गया है। इसका सार यह है कि बेटी को सम्मान और यथाशक्ति उपहार दें, उसके धन पर निर्भर न रहें।
- दान का फल धार्मिक मान्यता है। असली बात है ज़रूरतमंद की मदद और मन में करुणा।
वल्लभाचार्य जयंती और वरुथिनी एकादशी
वरुथिनी एकादशी के दिन ही श्री वल्लभाचार्य जयंती मनाई जाती है। श्री वल्लभाचार्य जी पुष्टिमार्ग के संस्थापक और शुद्धाद्वैत दर्शन के आचार्य थे। उनका प्राकट्य सन् 1479 ईस्वी में वैशाख कृष्ण एकादशी (अमांत में चैत्र कृष्ण एकादशी) को माना जाता है।
उनके पिता का नाम श्री लक्ष्मण भट्ट और माता का नाम इल्लम्मा गारु था। परंपरा के अनुसार उनका जन्म चंपारण्य (आज के छत्तीसगढ़ में रायपुर के पास) में हुआ, जब उनका परिवार यात्रा पर था। कुछ स्रोत उनके जन्म को काशी से जोड़ते हैं, क्योंकि उनका परिवार काशी में रहता था।
वल्लभाचार्य जी ने भगवान श्रीकृष्ण की प्रेम-भक्ति को “पुष्टि”, यानी भगवान की कृपा पर आधारित मार्ग बताया। महाकवि सूरदास जी उनके प्रसिद्ध शिष्य माने जाते हैं। पुष्टिमार्ग के मंदिरों और हवेलियों में, विशेष रूप से श्रीनाथजी की सेवा से जुड़े स्थानों पर, यह दिन बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
पुष्टिमार्गीय भक्त इस दिन एकादशी व्रत के साथ अपने आचार्य का स्मरण करते हैं, उनकी रचनाओं का पाठ करते हैं और ठाकुर जी की सेवा करते हैं। आप चाहें तो इस दिन उनकी शिक्षाओं के बारे में पढ़ सकते हैं।
वरुथिनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
एकादशी पर अन्न, यानी चावल, गेहूँ, दालें और ज़्यादातर अनाज नहीं खाए जाते। खाने के नियम परिवार और क्षेत्र के अनुसार थोड़े अलग हो सकते हैं, इसलिए अपनी परंपरा का पालन करें।
क्या खा सकते हैं
- मौसमी फल: केला, सेब, पपीता, खरबूजा, तरबूज, अंगूर (अप्रैल-मई की गर्मी में रसीले फल अच्छे रहते हैं)
- दूध, दही, छाछ, पनीर, मखाना
- सूखे मेवे और मूँगफली
- कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा का आटा
- साबूदाना, समा के चावल (व्रत वाले चावल)
- आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू, लौकी
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
- नारियल पानी, नींबू पानी, फलों का रस
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी चीज़ें (एकादशी पर सबसे प्रमुख निषेध)
- गेहूँ, जौ, मक्का और सामान्य आटा
- सभी दालें, विशेष रूप से मसूर और चना (वरुथिनी के माहात्म्य में इनका स्पष्ट निषेध है)
- प्याज़, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और शराब
- साधारण (आयोडीन वाला) नमक
- शहद (वरुथिनी के माहात्म्य में दशमी और द्वादशी पर वर्जित बताया गया है; कई लोग एकादशी पर भी नहीं लेते)
- पान और सुपारी (माहात्म्य में एकादशी पर वर्जित)
- बैंगन, कुछ पत्तेदार साग (कई परिवारों में वर्जित)
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों नहीं लिए जाते। यह सबसे कठोर व्रत है। अप्रैल-मई में गर्मी अधिक होती है, इसलिए निर्जला व्रत में शरीर में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) का खतरा रहता है। यह केवल स्वस्थ लोग और अपनी क्षमता समझकर ही रखें।
फलाहार व्रत
ज़्यादातर गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें दिन में फल, दूध और व्रत वाली चीज़ें ली जाती हैं, पर अन्न नहीं। गर्मी के मौसम में यह सबसे संतुलित विकल्प है। पानी, नारियल पानी और छाछ पीते रहें।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरे दिन फलाहार भी नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार सात्विक, बिना अन्न का भोजन ले सकते हैं, जैसे साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू की रोटी और आलू की सब्ज़ी। कुछ परंपराओं में वरुथिनी एकादशी पर “एक समय भोजन” का उल्लेख भी मिलता है।
स्वास्थ्य सावधानी: यदि आपको मधुमेह (डायबिटीज़), रक्तचाप, किडनी या हृदय की समस्या है, आप गर्भवती हैं, बच्चे को दूध पिलाती हैं, बुज़ुर्ग हैं या नियमित दवा लेते हैं, तो कठोर व्रत रखने से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। ऐसे लोग फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रख सकते हैं, और दवाएँ बंद न करें। भगवान भाव देखते हैं, शरीर को कष्ट देना ज़रूरी नहीं।
वरुथिनी एकादशी पारण कब और कैसे करें
पारण का अर्थ है व्रत खोलना। एकादशी का व्रत अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद खोला जाता है। सही समय पर पारण करना व्रत का ज़रूरी हिस्सा माना जाता है।
- द्वादशी के भीतर पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना दोष माना जाता है।
- हरि वासर का ध्यान: द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग को “हरि वासर” कहते हैं। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलें।
- सुबह का समय श्रेष्ठ: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे अच्छा माना जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है, जब तक कोई मजबूरी न हो।
- स्मार्त और वैष्णव: कुछ वर्षों में स्मार्त और वैष्णव (इस्कॉन) परंपरा की तारीख और पारण समय अलग होते हैं। वैष्णव पारण का समय कभी-कभी थोड़ा लंबा होता है। अपनी परंपरा के अनुसार समय चुनें।
आपके शहर के अनुसार सही पारण समय ऊपर दी गई तालिका में दिया गया है। पारण का समय हर शहर में सूर्योदय के अनुसार अलग होता है, इसलिए अपने शहर का समय तालिका में ज़रूर देखें।
पारण कैसे करें
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु को प्रणाम करें और दीपक जलाएँ।
- भगवान को भोग लगाएँ और उसमें तुलसी दल रखें।
- सबसे पहले तुलसी दल के साथ थोड़ा जल या चरणामृत लें।
- फिर हल्का सात्विक भोजन करें। परंपरा में चावल से पारण करना शुभ माना जाता है, क्योंकि एकादशी पर चावल वर्जित होता है और द्वादशी पर उसी से व्रत पूर्ण होता है।
- पारण से पहले या बाद में ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और दान दें।
- लंबे उपवास के बाद एकदम भारी, तला-भुना भोजन न करें। धीरे-धीरे खाएँ।
वरुथिनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और संकल्प लें।
- भगवान विष्णु और वराह अवतार की श्रद्धा से पूजा करें।
- व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
- विष्णु सहस्रनाम या भगवद गीता का पाठ करें।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न दान और विद्या दान करें।
- गर्मी के मौसम में राहगीरों के लिए पानी या शरबत की व्यवस्था करना भी सेवा का अच्छा रूप है।
- शांत, मधुर और सच्ची वाणी बोलें।
- संभव हो तो रात को भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
- ब्रह्मचर्य का पालन करें।
क्या न करें
- चावल, अन्न, दालें, मांस, प्याज़-लहसुन और शराब का सेवन न करें।
- दशमी और द्वादशी पर कांसे के बर्तन में भोजन न करें (वरुथिनी के माहात्म्य का विशेष नियम)।
- दूसरे के घर का अन्न न खाएँ और दशमी पर दो बार भोजन न करें।
- जुआ न खेलें और दिन में न सोएँ।
- क्रोध, झूठ, निंदा, चुगली और किसी का अपमान न करें।
- पान-सुपारी न खाएँ।
- तुलसी के पत्ते एकादशी के दिन न तोड़ें।
- किसी जीव को कष्ट न दें। राजा मान्धाता की तरह अहिंसा का भाव रखें।
- बाल, नाखून या दाढ़ी न काटें (द्वादशी पर भी माहात्म्य में क्षौर कर्म वर्जित बताया गया है)।
दातुन पर एक टिप्पणी: माहात्म्य में एकादशी पर दातुन (दाँत रगड़ने) का निषेध बताया गया है। कई परिवार इस दिन केवल पानी से कुल्ला कर लेते हैं। यह परंपरा का विषय है; स्वच्छता बनाए रखने के लिए अपने परिवार या गुरु की सलाह से निर्णय लें।
वरुथिनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने से हर बीमारी या चोट अपने आप ठीक हो जाती है।
सच्चाई: राजा मान्धाता की कथा आस्था और भगवान की कृपा की कथा है। परंपरा मानती है कि व्रत से मन को बल और शांति मिलती है। पर बीमारी या चोट होने पर डॉक्टर से इलाज कराना ज़रूरी है। व्रत और प्रार्थना इलाज के साथ चल सकते हैं, उसकी जगह नहीं ले सकते।
मिथक: वराह भगवान की प्रतिमा न हो तो वरुथिनी एकादशी की पूजा अधूरी रहती है।
सच्चाई: कथा में राजा को वराह प्रतिमा की पूजा करने को कहा गया था, इसलिए वराह रूप का विशेष महत्व है। पर घर में वराह प्रतिमा न हो, तो भगवान विष्णु के किसी भी स्वरूप की पूजा करके वराह भगवान का ध्यान और “ॐ वराहाय नमः” का जप करना पर्याप्त माना जाता है। भगवान भाव के भूखे हैं।
मिथक: व्रत केवल मथुरा जाकर करने से ही फल देता है।
सच्चाई: कथा में राजा मान्धाता को मथुरा भेजा गया था, पर यह उनकी विशेष स्थिति थी। आज भक्त अपने घर या पास के मंदिर में यह व्रत रखते हैं। परंपरा में व्रत का फल श्रद्धा और नियम पर निर्भर बताया गया है, किसी एक स्थान पर नहीं।
मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो वरुथिनी एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।
सच्चाई: शास्त्रों में अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखने की छूट दी गई है। फलाहार और एक समय भोजन वाला व्रत भी पूरी श्रद्धा से रखा जाए, तो उसे मान्य माना जाता है। गर्मी के मौसम में बिना पानी के व्रत से स्वास्थ्य बिगड़ सकता है, इसलिए समझदारी से चुनें।
मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और अपशकुन होगा।
सच्चाई: भूल से हुई गलती को पाप नहीं माना जाता। भगवान से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। एकादशी व्रत डर का नहीं, भक्ति का व्रत है।
मिथक: एकादशी पर किसी को भी अन्न देना या खाना बनाना मना है।
सच्चाई: व्रत रखने वाला स्वयं अन्न नहीं खाता, पर वरुथिनी के माहात्म्य में तो अन्न दान को सबसे बड़ा भौतिक दान कहा गया है। घर के जो सदस्य व्रत नहीं रख रहे, उनके लिए भोजन बनाना और भूखे को भोजन कराना पुण्य का काम माना जाता है।
मिथक: व्रत रखने से शरीर का “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।
सच्चाई: एकादशी का व्रत एक धार्मिक साधना है, कोई चिकित्सा उपचार नहीं। इसके स्वास्थ्य लाभ के बड़े दावों के पीछे पक्का प्रमाण नहीं है। मधुमेह, गर्भावस्था, बुढ़ापे या दवाओं के साथ कठोर उपवास जोखिम भरा हो सकता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह लें।
वरुथिनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
नीचे दिए गए लाभ परंपरा और माहात्म्य पर आधारित धार्मिक मान्यताएँ हैं। इन्हें आस्था के भाव से पढ़ें, किसी गारंटी की तरह नहीं।
- रक्षा का कवच: नाम के अनुसार माना जाता है कि यह व्रत भक्त को पाप, भय और दुर्भाग्य से बचाने वाले कवच की तरह काम करता है।
- पापों का नाश: मान्यता है कि श्रद्धा से व्रत करने पर पुराने पापों का प्रभाव कम होता है।
- सौभाग्य की प्राप्ति: श्रीकृष्ण ने इसे सौभाग्य देने वाली एकादशी कहा है।
- तपस्या और दान का पुण्य: माहात्म्य के अनुसार इसका फल दस हज़ार वर्ष की तपस्या और विभिन्न दानों के बराबर बताया गया है।
- कष्ट और भय से राहत: राजा मान्धाता और राजा धुंधुमार की कथाओं के आधार पर इसे कष्ट और शाप से राहत देने वाला व्रत माना जाता है।
- मन की शांति और संयम: उपवास, जप और जागरण से मन एकाग्र होता है और संयम की आदत बनती है।
- सेवा का भाव: अन्न दान और विद्या दान से समाज में करुणा और सहयोग बढ़ता है।
- मोक्ष की ओर कदम: परंपरा में इसे भगवान विष्णु के धाम की ओर ले जाने वाला व्रत कहा गया है।
संबंधित एकादशी और पाठ
वरुथिनी एकादशी से ठीक पहले चैत्र शुक्ल पक्ष की कामदा एकादशी आती है, जो हिंदू नववर्ष की पहली एकादशी है और मनोकामना पूरी करने वाली मानी जाती है। वरुथिनी के बाद वैशाख शुक्ल पक्ष की मोहिनी एकादशी आती है, जो भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार से जुड़ी है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।
वरुथिनी एकादशी हमें याद दिलाती है कि संकट कितना भी बड़ा हो, जो धैर्य रखकर भगवान को पुकारता है, भगवान उसकी रक्षा का कवच बन जाते हैं। इस दिन वराह भगवान का स्मरण करें, किसी भूखे को भोजन दें, किसी को ज्ञान का एक दीपक दें और अपने मन को क्रोध से मुक्त रखें। भगवान श्रीहरि आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
वरुथिनी एकादशी 2027 कब है?
वरुथिनी एकादशी 2026 (13 अप्रैल) बीत चुकी है। अगला व्रत रविवार, 2 मई 2027 को है और पारण 3 मई की सुबह होगा (नई दिल्ली)। अपने शहर का पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तारीख तालिका में देखें।
वरुथिनी एकादशी किस महीने में आती है?
यह उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में वैशाख कृष्ण पक्ष की और दक्षिण-पश्चिम भारत के अमांत पंचांग में चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी है। तारीख एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। यह प्रायः अप्रैल या मई में आती है।
वरुथिनी एकादशी का अर्थ क्या है?
संस्कृत में “वरूथ” का अर्थ कवच या रक्षा का आवरण है। वरुथिनी का भाव है कवच की तरह रक्षा करने वाली। मान्यता है कि यह व्रत भक्त को पाप, भय और दुर्भाग्य से बचाता है।
वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?
नर्मदा तट के राजा मान्धाता तपस्या कर रहे थे, तभी एक भालू ने उनका पैर चबा लिया। राजा ने क्रोध न करके भगवान विष्णु को पुकारा, भगवान ने चक्र से भालू को मारा और उन्हें मथुरा जाकर वराह अवतार की पूजा के साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत करने को कहा। व्रत के प्रभाव से राजा का शरीर फिर से पूर्ण हो गया।
वरुथिनी एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु की, विशेष रूप से उनके वराह अवतार की पूजा की जाती है। कथा में भगवान ने राजा मान्धाता को वराह प्रतिमा की पूजा करने को कहा था। वराह प्रतिमा न हो तो विष्णु पूजा में ही वराह रूप का ध्यान करें।
वरुथिनी एकादशी पर वल्लभाचार्य जयंती क्यों मनाई जाती है?
पुष्टिमार्ग के संस्थापक श्री वल्लभाचार्य जी का प्राकट्य सन् 1479 में वैशाख कृष्ण एकादशी को माना जाता है। इसलिए हर वर्ष वरुथिनी एकादशी पर उनकी जयंती मनाई जाती है।
वरुथिनी एकादशी पर कौन सा दान श्रेष्ठ माना गया है?
माहात्म्य में अन्न दान को भौतिक दानों में सबसे बड़ा बताया गया है, क्योंकि इससे देवता, पितर और मनुष्य सभी तृप्त होते हैं। सबसे श्रेष्ठ दान विद्या दान माना गया है, यानी किसी को ज्ञान देना।
वरुथिनी एकादशी पर क्या खाएँ?
फल, दूध, दही, मखाना, सूखे मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक लिया जा सकता है। गर्मी के मौसम में पानी, नारियल पानी और छाछ लेते रहें।
वरुथिनी एकादशी पर क्या नहीं खाना चाहिए?
चावल, गेहूँ, सभी दालें (विशेषकर मसूर और चना), प्याज़, लहसुन, मांस और साधारण नमक नहीं खाया जाता। माहात्म्य में शहद और पान-सुपारी से भी बचने को कहा गया है।
क्या वरुथिनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी पर चावल खाना वर्जित माना जाता है। परंपरा में चावल अगले दिन द्वादशी पर पारण के समय खाया जाता है।
क्या वरुथिनी एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?
हाँ, निर्जला व्रत को छोड़कर फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। अप्रैल-मई की गर्मी को देखते हुए पानी पीते रहना स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है।
दशमी के दिन वरुथिनी एकादशी के लिए क्या नियम हैं?
माहात्म्य के अनुसार दशमी पर एक ही बार सात्विक भोजन करें, कांसे के बर्तन में न खाएँ, मांस, मसूर, चना, कोदो, शाक और शहद से बचें, दूसरे के घर का अन्न न खाएँ और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
वरुथिनी एकादशी का पारण कब और कैसे करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर, द्वादशी खत्म होने से पहले करें। तुलसी दल के साथ जल या प्रसाद लेकर व्रत खोलें। अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।
स्मार्त और वैष्णव वरुथिनी एकादशी में क्या अंतर है?
स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) परंपराएँ तिथि गणना के नियम थोड़े अलग मानती हैं, इसलिए कुछ वर्षों में व्रत की तारीख एक दिन आगे-पीछे हो सकती है। 2027 में दोनों का व्रत एक ही दिन है।
वरुथिनी एकादशी पर कौन से मंत्र जपें?
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार जप सबसे प्रचलित है। इसके साथ “ॐ नमो नारायणाय”, वराह भगवान के लिए “ॐ वराहाय नमः” और विष्णु ध्यान श्लोक “शान्ताकारं भुजगशयनं” का पाठ कर सकते हैं।
वरुथिनी एकादशी की कथा सुनने का क्या फल है?
परंपरा के अनुसार जो इस कथा को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उसे हज़ार गौदान के समान पुण्य मिलता है। यह धार्मिक मान्यता है।
क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग वरुथिनी एकादशी का व्रत रख सकते हैं?
रख सकते हैं, पर कठोर या निर्जला व्रत से बचें और पहले डॉक्टर से सलाह लें। मधुमेह या नियमित दवा लेने वाले भी फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें और दवा बंद न करें।
अगर वरुथिनी एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। भूल से हुई गलती को पाप नहीं माना जाता।