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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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Ekadashi

योगिनी एकादशी कब है? (Yogini Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण, मंत्र और चातुर्मास से संबंध

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

योगिनी एकादशी (Yogini Ekadashi) आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करते हैं। यह निर्जला एकादशी के बाद और देवशयनी एकादशी से ठीक पहले आती है, इसलिए इसे चातुर्मास शुरू होने से पहले की अंतिम एकादशी भी माना जाता है। परंपरा के अनुसार यह व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति दिलाने वाला है।

इस एकादशी की कथा कुबेर के माली हेममाली की है। अपने कर्तव्य में लापरवाही करने पर उसे श्राप मिला, वह स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गिरा और कठिन रोग से पीड़ित हुआ। मार्कण्डेय ऋषि के कहने पर उसने योगिनी एकादशी का व्रत किया और फिर से अपना दिव्य रूप पा लिया। मान्यता है कि इस व्रत का फल 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है।

यहाँ आप इसकी तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, नियम और चातुर्मास से इसका संबंध विस्तार से जानेंगे।

योगिनी एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: योगिनी एकादशी 2026 (10 जुलाई) बीत चुकी है। अगली योगिनी एकादशी बुधवार, 30 जून 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 29 जून 2027 रात 10:03 बजे से 30 जून रात 8:30 बजे तक रहेगी, और पारण 1 जुलाई 2027 की सुबह लगभग 5:27 से 8:13 बजे के बीच किया जा सकेगा।

अगली योगिनी एकादशी

योगिनी एकादशी 2027

30 जून 2027, बुधवार 241 दिन बाकी

मास और पक्ष
आषाढ़ कृष्ण
एकादशी तिथि
29 जून 22:06 – 30 जून 20:32
पारण (व्रत खोलने का समय)
1 जुला, 05:26 – 08:14
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202610 जुलाई 2026, शुक्रवार
वैष्णव: 11 जुला
10 जुला 08:18 –
11 जुला 05:24
11 जुला, 13:49 – 16:35
202730 जून 2027, बुधवार29 जून 22:06 –
30 जून 20:32
1 जुला, 05:26 – 08:14
202818 जून 2028, रविवार18 जून 02:30 –
19 जून 03:17
19 जून, 13:46 – 16:34
20297 जुलाई 2029, शनिवार6 जुला 17:14 –
7 जुला 19:08
8 जुला, 05:29 – 08:16

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदलता है। 2027 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में व्रत एक ही दिन है। जिन वर्षों में दोनों की तारीख अलग होती है, जैसे 2026 में हुआ था, तालिका में वह अंतर भी दिखाई देता है।

योगिनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“योगिनी” शब्द “योग” से जुड़ा है। योग का अर्थ है जुड़ना, यानी आत्मा का परमात्मा से जुड़ना। कथा में श्रीकृष्ण इस एकादशी को इस लोक में सुख और परलोक में मुक्ति देने वाली बताते हैं। इसीलिए बहुत से भक्त मानते हैं कि यह व्रत मन को संयम और साधना की ओर ले जाता है।

इस नाम का एक सुंदर भाव कथा से भी मिलता है। श्राप के कारण हेममाली अपनी पत्नी और अपने लोक से बिछड़ गया था। इस व्रत के प्रभाव से वह फिर से अपने दिव्य रूप, अपनी पत्नी और अपने स्थान से जुड़ गया। इसलिए कई लोग इसे “फिर से जोड़ने वाली” एकादशी भी कहते हैं। यह नाम की एक व्याख्या है, पुराण में शब्द का अर्थ अलग से नहीं बताया गया है।

योगिनी एकादशी के अन्य नाम

  • आषाढ़ कृष्ण एकादशी: उत्तर भारत के पंचांग में इसका सबसे सीधा नाम।
  • ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी: दक्षिण और पश्चिम भारत के अमांत पंचांग में इसी तिथि का नाम।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। इसमें योगिनी एकादशी आषाढ़ कृष्ण पक्ष में आती है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत में प्रचलित अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ यही एकादशी ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की कहलाती है।

ध्यान रखें कि तारीख दोनों पंचांगों में एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में योगिनी एकादशी प्रायः जून के अंत या जुलाई में आती है।

योगिनी एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि योगिनी एकादशी का व्रत बड़े से बड़े पापों को भी नष्ट करने वाला है। इसे संसार रूपी सागर में डूबते लोगों के लिए नाव के समान कहा गया है। जो श्रद्धा से यह व्रत रखता है, उसे इस जीवन में सुख और अंत में मोक्ष मिलने की मान्यता है।

इस एकादशी के साथ सबसे प्रसिद्ध मान्यता यह है कि इसका फल 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है। कई कथा पाठों में यह भी कहा गया है कि इसकी कथा पढ़ने या सुनने मात्र से भी यही पुण्य मिलता है। इस मान्यता का अर्थ आगे एक अलग खंड में समझाया गया है।

योगिनी एकादशी का एक और खास स्थान है। यह देवशयनी एकादशी से पहले की एकादशी है। देवशयनी से भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है। इसलिए भक्त योगिनी एकादशी को चातुर्मास की तैयारी का व्रत भी मानते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

हेममाली की कथा बहुत मानवीय है। उसने कोई बड़ा अपराध नहीं किया था, बल्कि सुख में डूबकर अपना रोज़ का कर्तव्य भूल गया था। यह कथा याद दिलाती है कि भक्ति और सेवा में आलस्य या लापरवाही भी हमें अपने लक्ष्य से दूर कर सकती है।

कथा का दूसरा संदेश है सच्चाई और पश्चाताप। जब मार्कण्डेय ऋषि ने हेममाली से उसकी गलती पूछी, तो उसने कुछ नहीं छिपाया। ऋषि ने उसकी सत्यवादिता देखकर ही उसे उपाय बताया। यानी अपनी भूल को ईमानदारी से मान लेना सुधार की पहली सीढ़ी है।

तीसरा संदेश है कि कठिन समय में भी आस्था न छोड़ें। पृथ्वी पर इतने कष्ट सहने के बाद भी हेममाली ने भगवान का स्मरण नहीं छोड़ा। इसी आस्था ने उसे सही मार्ग तक पहुँचाया।

शिव और विष्णु की एकता

इस कथा की एक सुंदर बात यह है कि कुबेर भगवान शिव की पूजा करते थे और हेममाली शिव पूजा के फूल लाता था। उसकी भूल शिव पूजा में देरी थी, पर उसका उद्धार भगवान विष्णु की एकादशी के व्रत से हुआ। यह कथा बताती है कि सनातन परंपरा में शिव और विष्णु की भक्ति एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पूरा करती है।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार योगिनी एकादशी की कथा भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलती है। इस्कॉन और कई वैष्णव स्रोत इसे ब्रह्मवैवर्त पुराण से जोड़ते हैं। कुछ पंचांग और लेख इसे पद्म पुराण में बताते हैं। हिंदी के अधिकतर कथा पाठ केवल “पुराणों में कही गई कथा” कहते हैं।

युधिष्ठिर ने इससे पहले ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी की कथा सुनी थी, फिर आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा। इसी क्रम में श्रीकृष्ण ने योगिनी एकादशी का माहात्म्य बताया। कुछ कथा पाठों में प्रश्न अर्जुन पूछते हैं, पर अधिकतर परंपराओं में श्रोता युधिष्ठिर ही हैं।

योगिनी एकादशी व्रत कथा

नीचे दी गई कथा पारंपरिक कथा का सरल रूप है, जिसे पूजा के समय पढ़ा या परिवार को सुनाया जा सकता है।

युधिष्ठिर का प्रश्न

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा, “हे वासुदेव! मैंने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी का माहात्म्य सुना। अब कृपा करके बताइए कि आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसका क्या फल है।”

श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम योगिनी है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करती है और इस लोक में सुख तथा परलोक में मुक्ति देती है। मैं तुम्हें पुराणों में कही गई इसकी कथा सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”

अलकापुरी के राजा कुबेर और माली हेममाली

स्वर्ग की अलकापुरी नगरी में यक्षों के राजा और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर राज्य करते थे। कुबेर भगवान शिव के परम भक्त थे और रोज़ नियम से उनकी पूजा करते थे। उनकी सेवा में हेममाली नाम का एक यक्ष माली था।

हेममाली का काम था रोज़ मानसरोवर से सुगंधित फूल लाकर कुबेर को देना, ताकि दोपहर की शिव पूजा समय पर हो सके। हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था, जो बहुत सुंदर थी। हेममाली अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था।

कर्तव्य में लापरवाही

एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल तो ले आया, पर कुबेर के पास जाने के बजाय अपने घर चला गया। वहाँ वह अपनी पत्नी के साथ प्रेम और आमोद में ऐसा डूबा कि उसे समय का ध्यान ही नहीं रहा। फूल घर में ही रखे रह गए।

उधर कुबेर शिव पूजा के लिए फूलों की प्रतीक्षा करते रहे। दोपहर बीत गई, पर हेममाली नहीं आया। तब कुबेर ने अपने सेवकों को उसका पता लगाने भेजा। सेवकों ने लौटकर बताया, “महाराज, हेममाली अपने घर में पत्नी के साथ आनंद में मग्न है।”

कुबेर का क्रोध और श्राप

यह सुनकर कुबेर बहुत क्रोधित हुए और हेममाली को तुरंत बुलवाया। हेममाली डर से काँपता हुआ उनके सामने आया। कुबेर बोले, “हे पापी! तूने भगवान शिव की पूजा का अनादर किया है। मैं तुझे श्राप देता हूँ कि तू अपनी पत्नी के वियोग का दुख सहेगा और मृत्युलोक (पृथ्वी) पर जाकर कोढ़ (कुष्ठ रोग) से पीड़ित रहेगा।”

श्राप मिलते ही हेममाली अलकापुरी से नीचे पृथ्वी पर आ गिरा। उसका दिव्य रूप चला गया, शरीर रोग से ग्रस्त हो गया और पत्नी भी उससे बिछड़ गई। कुछ परंपराओं में इस रोग को “श्वेत कुष्ठ” कहा गया है।

पृथ्वी पर कष्ट और आस्था

पृथ्वी पर हेममाली एक घने, भयानक वन में भटकने लगा। वहाँ न खाने को अन्न था, न पीने को जल। उसने सर्दी, गर्मी और बरसात के कई कष्ट सहे। फिर भी भगवान शिव की कृपा से उसकी बुद्धि भ्रष्ट नहीं हुई और उसे अपने पिछले जीवन की याद बनी रही।

अपनी भूल को याद करते और पछताते हुए वह पर्वतों और मैदानों से होता हुआ हिमालय की ओर चल पड़ा। चलते-चलते वह एक दिन महान तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि के आश्रम में पहुँचा। परंपरा में मार्कण्डेय ऋषि को चिरंजीवी और अत्यंत तेजस्वी माना जाता है।

मार्कण्डेय ऋषि का उपदेश

हेममाली ने ऋषि के चरणों में प्रणाम किया। ऋषि ने करुणा से पूछा, “तुमने ऐसा कौन-सा कर्म किया है, जिसके कारण तुम्हें यह कष्ट मिला है?” हेममाली ने कुछ नहीं छिपाया। उसने अपनी लापरवाही, कुबेर का क्रोध और श्राप की पूरी बात सच-सच बता दी और उद्धार का उपाय माँगा।

मार्कण्डेय ऋषि उसकी सच्चाई से प्रसन्न हुए। वे बोले, “तुमने मुझसे सत्य कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक कल्याणकारी उपाय बताता हूँ। आषाढ़ मास के कृष्ण पक्ष में योगिनी नाम की एकादशी आती है। तुम विधिपूर्वक उसका व्रत करो। उस व्रत के पुण्य से तुम्हारे सारे पाप नष्ट होंगे और तुम श्राप से मुक्त हो जाओगे।”

व्रत और हेममाली का उद्धार

हेममाली ने ऋषि को बार-बार प्रणाम किया और उनके बताए अनुसार पूरी श्रद्धा से योगिनी एकादशी का व्रत रखा। उसने भगवान विष्णु की पूजा की और नियम से व्रत पूरा किया।

व्रत के प्रभाव से हेममाली का रोग दूर हो गया और उसे अपना पहले जैसा सुंदर, दिव्य यक्ष रूप मिल गया। वह अलकापुरी लौट गया और अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ फिर से सुखपूर्वक रहने लगा। कुछ कथा पाठों में कहा गया है कि उसका शरीर सोने के समान चमकने लगा।

कथा का फल

कथा पूरी करके श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! योगिनी एकादशी का व्रत करने का फल 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है। इसके व्रत से सारे पाप नष्ट होते हैं और अंत में प्राणी मोक्ष पाकर उत्तम लोक का अधिकारी बनता है।”

कुछ परंपराओं में पत्नी का नाम “स्वरूपवती” बताया गया है और कुछ हिंदी पाठों में ब्राह्मणों की संख्या 80 हज़ार लिखी मिलती है। कथा का मूल भाव सभी में एक ही है: सच्चे पश्चाताप और श्रद्धा से किया गया व्रत भगवान की कृपा का द्वार खोलता है।

योगिनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

नीचे दी गई विधि घर पर सरलता से की जा सकती है। अपने परिवार की परंपरा या गुरु के निर्देश अलग हों, तो उन्हें प्राथमिकता दें।

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक ही बार हल्का, सात्विक भोजन करें। प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा से दूर रहें।
  2. दशमी की रात ब्रह्मचर्य का पालन करें। कुछ परंपराओं में इस रात भूमि पर सोने की सलाह दी जाती है।
  3. पूजा का स्थान साफ कर लें और पूजा सामग्री एक दिन पहले ही जुटा लें।
  4. तुलसी दल दशमी को ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी पर तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. सूर्योदय से पहले, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। कुछ परंपराओं में नहाने के पानी में थोड़े तिल या कुश डालने की बात कही गई है। गंगाजल हो तो वह भी मिला सकते हैं।
  2. साफ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें। पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है।
  3. सूर्य देव को जल अर्पित करें।
  4. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं (अपना नाम, गोत्र) आज योगिनी एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता और अपने जाने-अनजाने पापों की शांति के लिए, अपनी सामर्थ्य के अनुसार (निर्जला / फलाहार / एक समय) रखूँगा/रखूँगी।” फिर जल भूमि पर छोड़ दें।

भगवान विष्णु की पूजा

  1. एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएँ और उस पर भगवान विष्णु (नारायण) की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  2. पास में जल से भरा कलश रखें, उस पर आम के पत्ते और नारियल रखें। घी का दीपक जलाएँ।
  3. भगवान को गंगाजल या पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर साफ जल से।
  4. चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
  5. धूप-दीप दिखाएँ और मौसमी फल, मिश्री, गुड़ या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल ज़रूर रखें।
  6. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का कम से कम 108 बार जप करें।
  7. योगिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
  8. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।

भगवान शिव का स्मरण (वैकल्पिक)

कथा में शिव पूजा का प्रसंग है, इसलिए कुछ भक्त इस दिन शिवलिंग पर जल और बेलपत्र भी चढ़ाते हैं और “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हैं। यह परंपरा के अनुसार वैकल्पिक है। मुख्य पूजा भगवान विष्णु की ही होती है।

दिन भर और शाम की पूजा

  1. दिन में सोने से बचें और मन को भगवान के स्मरण में लगाएँ।
  2. समय मिलने पर विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या भगवान की कथाओं का पाठ करें।
  3. क्रोध, निंदा, झूठ और कटु वचन से दूर रहें।
  4. शाम को तुलसी के पौधे के पास दीपक जलाएँ (तुलसी को छुएँ या तोड़ें नहीं)।
  5. संध्या के समय फिर से दीपक जलाकर भगवान की आरती करें।

रात्रि जागरण

  1. परंपरा में एकादशी की रात जागरण का महत्व बताया गया है। परिवार के साथ भजन-कीर्तन करें, नाम जप करें या कथा सुनें।
  2. पूरी रात जागना कठिन हो, तो कम से कम कुछ घंटे भगवान का स्मरण करें। स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर ही जागरण करें।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
  2. संभव हो तो किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएँ और यथाशक्ति अन्न, वस्त्र या जल से भरा पात्र दान दें।
  3. ऊपर की तालिका में दिए पारण समय के भीतर तुलसी दल डालकर जल या भोग का प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
  4. द्वादशी के दिन भी सात्विक भोजन करें और संयम बनाए रखें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु (नारायण) की प्रतिमा या चित्र
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • जल से भरा कलश, आम के पत्ते और नारियल
  • गंगाजल
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़े हुए)
  • पीले फूल और फूलों की माला
  • चंदन, रोली, हल्दी और अक्षत (साबुत चावल, केवल पूजा के लिए)
  • घी का दीपक, रुई की बत्ती और धूप/अगरबत्ती
  • मौसमी फल, मिश्री, गुड़ और मेवे का भोग
  • पीला वस्त्र (भगवान को अर्पित करने के लिए)
  • तुलसी की माला (जप के लिए)
  • व्रत कथा की पुस्तक या यह पेज
  • बेलपत्र और जल (यदि शिव स्मरण भी करना हो)
  • दान के लिए अन्न, वस्त्र, फल या जल से भरा पात्र

योगिनी एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप अपनी सुविधा से इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से जप करना शुभ माना जाता है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: सब प्राणियों के भीतर बसने वाले भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमस्कार है। यह बारह अक्षरों का मंत्र एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है। इसका 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

2. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम भगवान नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर प्रेरित करें। सुबह की पूजा के बाद इसका 11 या 108 बार जप किया जा सकता है।

3. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी हैं, जो पूरे संसार का आधार हैं, आकाश के समान व्यापक हैं, मेघ के समान श्याम वर्ण और सुंदर अंगों वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी जिन्हें ध्यान से पाते हैं, संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

“योगिभिर्ध्यानगम्यं” यानी “जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं”, यह भाव योगिनी एकादशी के नाम से भी मेल खाता है। पूजा शुरू करते समय इस श्लोक से भगवान का ध्यान करें।

4. पंचाक्षर शिव मंत्र

ॐ नमः शिवाय॥

अर्थ: भगवान शिव को नमस्कार है। योगिनी एकादशी की कथा में कुबेर की शिव पूजा का प्रसंग है, इसलिए कुछ भक्त विष्णु पूजा के साथ इस मंत्र से भगवान शिव का भी स्मरण करते हैं।

योगिनी एकादशी और चातुर्मास

योगिनी एकादशी के लगभग दो सप्ताह बाद आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी आती है। परंपरा के अनुसार उस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और चार महीने का चातुर्मास शुरू होता है। चातुर्मास कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर समाप्त होता है।

इस तरह योगिनी एकादशी चातुर्मास शुरू होने से पहले की अंतिम एकादशी है। बहुत से भक्त इसे शरीर और मन को चातुर्मास के नियमों के लिए तैयार करने का अवसर मानते हैं। चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य प्रायः नहीं किए जाते और भक्ति, जप, सत्संग और संयम पर ज़ोर दिया जाता है।

चातुर्मास की तैयारी कैसे करें

  • योगिनी एकादशी पर तय करें कि चातुर्मास में आप कौन-सा नियम निभाएँगे, जैसे रोज़ थोड़ा जप, गीता पाठ या किसी एक चीज़ का त्याग।
  • जो मांगलिक कार्य आप करना चाहते हैं, उनकी तारीख के बारे में अपने पंडित जी से पहले ही सलाह ले लें।
  • अपनी सेहत के अनुसार ही उपवास और नियम चुनें, ताकि चार महीने तक उन्हें निभा सकें।

88 हज़ार ब्राह्मण भोजन के बराबर फल: इसका अर्थ

योगिनी एकादशी के बारे में सबसे ज़्यादा पूछी जाने वाली बात यह है कि इसका फल 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर क्यों कहा गया है। यह बात इस एकादशी के माहात्म्य (महिमा) में कही गई है और परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है।

प्राचीन समाज में ब्राह्मण भोजन और अन्न दान को बहुत बड़ा पुण्य माना जाता था। माहात्म्य यह बताना चाहता है कि सच्ची श्रद्धा से किया गया एक दिन का व्रत भी उतना ही बड़ा पुण्य दे सकता है।

इसे किसी हिसाब-किताब या सौदे की तरह न देखें। यह व्रत की महिमा बताने का पारंपरिक तरीका है। इसका भाव यह है कि संयम, भक्ति और पश्चाताप से मन जितना शुद्ध होता है, वह बड़े-बड़े दानों के बराबर है। कुछ हिंदी कथा पाठों में यह संख्या 80 हज़ार भी लिखी मिलती है, पर अधिकतर स्रोत 88 हज़ार ही बताते हैं।

इस दिन दान क्या करें

  • अन्न, आटा, दाल या पका हुआ भोजन (एकादशी पर स्वयं अन्न न खाएँ, पर दूसरों को दिया जा सकता है)
  • मौसमी फल और मिठाई
  • जल से भरा घड़ा या पात्र, क्योंकि यह व्रत भीषण गर्मी या बरसात के मौसम में आता है
  • छाता, चप्पल या वस्त्र
  • ज़रूरतमंद, बुज़ुर्ग या बीमार व्यक्ति की सेवा और सहायता

त्वचा रोग और योगिनी एकादशी: आस्था और समझदारी

कथा में हेममाली को कोढ़ (कुष्ठ रोग) होने का प्रसंग है, इसलिए बहुत से लोग मानते हैं कि योगिनी एकादशी का व्रत त्वचा के रोगों में राहत देता है। यह एक धार्मिक मान्यता है, जिसे श्रद्धा के रूप में समझना चाहिए।

कथा में रोग श्राप के प्रतीक के रूप में आया है। उसका संदेश यह है कि गलती का एहसास, पश्चाताप और ईश्वर की शरण से जीवन में फिर से सुख लौट सकता है। यह कथा किसी रोगी को दोषी ठहराने के लिए नहीं है। किसी की बीमारी को उसके पाप से जोड़ना उचित नहीं है।

अगर आप या परिवार में कोई त्वचा के रोग से परेशान है, तो व्रत और प्रार्थना के साथ-साथ डॉक्टर से इलाज ज़रूर कराएँ। आज कुष्ठ रोग (Leprosy) का भी इलाज संभव है और भारत में सरकारी अस्पतालों में इसका इलाज उपलब्ध है। आस्था मन को शक्ति देती है और इलाज शरीर को, दोनों साथ चल सकते हैं।

योगिनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत में अन्न (अनाज) का त्याग मुख्य नियम है। व्रत किस प्रकार का रखना है, यह अपनी सेहत, उम्र और परंपरा के अनुसार तय करें।

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल, जैसे केला, सेब, पपीता, आम, खरबूजा और अनार
  • दूध, दही, छाछ और पनीर
  • साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा और राजगिरा (परिवार की परंपरा के अनुसार)
  • आलू, शकरकंद, अरबी और कद्दू जैसी सब्ज़ियाँ
  • मूंगफली, मखाना, बादाम, किशमिश और अन्य मेवे
  • सेंधा नमक, काली मिर्च और जीरा
  • नारियल पानी, नींबू पानी और जल

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी चीज़ें (एकादशी पर चावल सबसे ज़्यादा वर्जित माना जाता है)
  • गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा और सभी अनाज
  • दालें, चना, मसूर और बेसन
  • प्याज़ और लहसुन
  • मांस, मछली, अंडा और मदिरा
  • साधारण (आयोडीन वाला) नमक, जिसकी जगह सेंधा नमक लें
  • तंबाकू, गुटखा और किसी भी तरह का नशा

गर्मी और उमस के मौसम में यह व्रत आता है, इसलिए अगर आप जल ले रहे हैं, तो दिन भर में पर्याप्त पानी पिएँ।

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठोर तरीका है। आषाढ़ की गर्मी में निर्जला व्रत कठिन हो सकता है, इसलिए इसे केवल वही रखें जो पूरी तरह स्वस्थ हों और पहले ऐसा व्रत रख चुके हों।

फलाहार व्रत

फलाहार व्रत में अनाज छोड़कर फल, दूध, मेवे और व्रत में खाई जाने वाली चीज़ें ली जाती हैं। ज़्यादातर गृहस्थ यही व्रत रखते हैं। यह शरीर पर कम भार डालता है और व्रत का भाव भी बना रहता है।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा उपवास नहीं रख सकते, वे दिन में एक बार सात्विक फलाहार कर सकते हैं। बुज़ुर्ग, कमज़ोर या दवा लेने वाले लोगों के लिए यह अच्छा विकल्प है। इसमें भी अनाज और चावल न लें।

योगिनी एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण का अर्थ है व्रत खोलना। एकादशी का व्रत अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद खोला जाता है। सही समय पर पारण करना व्रत का ज़रूरी हिस्सा माना जाता है।

  • द्वादशी के भीतर पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना दोष माना जाता है।
  • हरि वासर का ध्यान: द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग को “हरि वासर” कहते हैं। इस समय पारण नहीं किया जाता। हरि वासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलें।
  • सुबह का समय श्रेष्ठ: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे अच्छा माना जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है, जब तक कोई मजबूरी न हो।
  • स्मार्त और वैष्णव: कुछ वर्षों में स्मार्त और वैष्णव (इस्कॉन) परंपरा की तारीख और पारण समय अलग होते हैं। वैष्णव पारण का समय कभी-कभी थोड़ा लंबा होता है। अपनी परंपरा के अनुसार समय चुनें।

आपके शहर के अनुसार सही पारण समय ऊपर दी गई तालिका में दिया गया है। पारण का समय हर शहर में सूर्योदय के अनुसार अलग होता है, इसलिए अपने शहर का समय तालिका में ज़रूर देखें।

पारण कैसे करें

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु को प्रणाम करें और दीपक जलाएँ।
  2. भगवान को भोग लगाएँ और उसमें तुलसी दल रखें।
  3. सबसे पहले तुलसी दल के साथ थोड़ा जल या चरणामृत लें।
  4. फिर हल्का सात्विक भोजन करें। परंपरा में चावल से पारण करना शुभ माना जाता है, क्योंकि एकादशी पर चावल वर्जित होता है और द्वादशी पर उसी से व्रत पूर्ण होता है।
  5. पारण से पहले या बाद में ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और दान दें।
  6. लंबे उपवास के बाद एकदम भारी, तला-भुना भोजन न करें। धीरे-धीरे खाएँ।

योगिनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें।
  • भगवान विष्णु की पूजा करें और तुलसी दल अर्पित करें।
  • योगिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • अपनी किसी भूल को मन में स्वीकार करें और उसे सुधारने का संकल्प लें, जैसा हेममाली ने किया।
  • अपने रोज़ के कर्तव्य (घर, नौकरी, सेवा) समय पर और मन लगाकर पूरे करें।
  • ज़रूरतमंदों को भोजन, जल या वस्त्र का दान दें।
  • शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएँ।

क्या न करें

  • चावल और कोई भी अनाज न खाएँ।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • प्याज़, लहसुन, मांस और मदिरा का सेवन न करें।
  • किसी की निंदा, चुगली या अपमान न करें।
  • क्रोध और झूठ से बचें।
  • दिन में सोने से बचें।
  • पूजा या सेवा के काम को टालें नहीं। कथा का मुख्य संदेश ही है कि कर्तव्य में लापरवाही न करें।
  • किसी बीमार व्यक्ति, खासकर त्वचा रोगी को उसकी बीमारी के लिए ताना न दें या उसे दोषी न ठहराएँ।
  • सेहत ठीक न हो तो ज़बरदस्ती कठोर व्रत न रखें।

योगिनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: योगिनी एकादशी का व्रत रखने से त्वचा का हर रोग अपने आप ठीक हो जाता है, इलाज की ज़रूरत नहीं।

सच्चाई: कथा में हेममाली के रोग का दूर होना श्राप से मुक्ति का प्रतीक है। परंपरा इस व्रत को पापों के नाश और मन की शुद्धि से जोड़ती है। व्रत और प्रार्थना से मन को बल मिलता है, पर किसी भी रोग में डॉक्टर का इलाज बंद न करें। श्रद्धा और इलाज साथ-साथ रखें।

मिथक: त्वचा रोग या कुष्ठ रोग पिछले जन्म के पापों का दंड है।

सच्चाई: कथा एक विशेष पौराणिक प्रसंग है, जिसमें कुबेर ने श्राप दिया था। इसे किसी असली रोगी पर लागू करना ठीक नहीं है। रोग के अपने कारण होते हैं और उनका इलाज होता है। किसी बीमार व्यक्ति को दोषी ठहराना या उससे दूरी बनाना एकादशी के करुणा भरे संदेश के विपरीत है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो योगिनी एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: परंपरा में व्रत के कई प्रकार बताए गए हैं: निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन। भाव और नियम का पालन सबसे ज़रूरी है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखा गया व्रत भी पूरी श्रद्धा से रखा जाए, तो वह सार्थक माना जाता है।

मिथक: 88 हज़ार ब्राह्मण भोजन का फल मिलेगा, इसलिए अब किसी को दान देने की ज़रूरत नहीं।

सच्चाई: यह मान्यता व्रत की महिमा बताने के लिए है, दान से बचने के लिए नहीं। परंपरा में द्वादशी पर ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और दान देना व्रत का हिस्सा माना गया है। अपनी शक्ति के अनुसार दान करते रहें।

मिथक: योगिनी एकादशी का व्रत केवल वही रख सकते हैं जिनसे कोई बड़ा पाप हुआ हो।

सच्चाई: कथा में हेममाली की भूल के कारण यह व्रत बताया गया, पर व्रत कोई भी श्रद्धालु रख सकता है। परंपरा इसे सुख, शांति और भक्ति बढ़ाने वाला व्रत भी मानती है। इसे डर से नहीं, प्रेम और संयम से रखें।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और अपशकुन होगा।

सच्चाई: अनजाने में हुई भूल पर डरने की ज़रूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। हेममाली की कथा भी यही बताती है कि सच्चे मन से भूल मान लेने पर भगवान की कृपा मिलती है।

मिथक: व्रत से शरीर का “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी मूल रूप से एक आध्यात्मिक व्रत है, कोई इलाज नहीं। डायबिटीज़ (मधुमेह), ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग वाले, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे और नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर या निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। आषाढ़ की गर्मी में पानी की कमी (डिहाइड्रेशन) का भी ध्यान रखें। ऐसे लोग फलाहार या एक समय भोजन का व्रत रख सकते हैं।

योगिनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ परंपरा और श्रद्धालुओं की मान्यता पर आधारित हैं। इन्हें आस्था के रूप में समझें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।

  • पापों से मुक्ति: माना जाता है कि यह व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों के प्रभाव को कम करता है।
  • बड़ा पुण्य: माहात्म्य के अनुसार इसका फल 88 हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर बताया गया है।
  • श्राप और कष्टों से राहत: हेममाली की कथा के आधार पर भक्त मानते हैं कि यह व्रत जीवन के कठिन दौर से उबरने में आत्मबल देता है।
  • मन की शुद्धि: उपवास, जप और संयम से मन शांत होता है और भक्ति में स्थिरता आती है।
  • पारिवारिक सुख: कथा में हेममाली अपनी पत्नी से फिर मिलता है, इसलिए कई दंपति इस व्रत को दांपत्य सुख से भी जोड़ते हैं।
  • चातुर्मास की तैयारी: चातुर्मास से पहले की अंतिम एकादशी होने के कारण यह आगे के चार महीनों के संयम के लिए मन तैयार करती है।
  • मोक्ष की कामना: परंपरा के अनुसार यह व्रत इस लोक में सुख और परलोक में उत्तम गति देने वाला माना जाता है।

संबंधित एकादशी और पाठ

योगिनी एकादशी से ठीक पहले ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी आती है, जिसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं और जिसका माहात्म्य सुनने के बाद ही युधिष्ठिर ने योगिनी एकादशी के बारे में पूछा था। योगिनी के बाद आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी आती है, जिससे चातुर्मास शुरू होता है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

योगिनी एकादशी हमें सिखाती है कि भूल किसी से भी हो सकती है, पर सच्चे मन से उसे स्वीकार करना और सुधार का रास्ता अपनाना ही असली भक्ति है। इस दिन अपने कर्तव्यों को प्रेम से निभाने का संकल्प लें, किसी प्यासे को जल और भूखे को भोजन दें, और मन को भगवान के चरणों में लगाएँ। भगवान श्रीहरि आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

योगिनी एकादशी कब है 2027 में?

योगिनी एकादशी 2026 (10 जुलाई) बीत चुकी है। अगला व्रत बुधवार, 30 जून 2027 को है और पारण 1 जुलाई की सुबह लगभग 5:27 से 8:13 बजे के बीच होगा (नई दिल्ली)। अपने शहर का पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

योगिनी एकादशी किस महीने में आती है?

यह उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण पक्ष की और अमांत पंचांग में ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की एकादशी है। तारीख एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। यह प्रायः जून के अंत या जुलाई में आती है।

योगिनी एकादशी का नाम योगिनी क्यों है?

“योगिनी” शब्द योग यानी जुड़ने से जुड़ा माना जाता है। भक्त इसे आत्मा को भगवान से जोड़ने वाला व्रत मानते हैं, और कथा में हेममाली भी इसी व्रत से अपने दिव्य रूप और पत्नी से फिर जुड़ता है। पुराण में शब्द का अर्थ अलग से नहीं बताया गया है, यह परंपरागत व्याख्या है।

योगिनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

कुबेर के माली हेममाली ने पत्नी विशालाक्षी के मोह में शिव पूजा के फूल समय पर नहीं पहुँचाए। कुबेर के श्राप से वह पृथ्वी पर गिरा और कोढ़ से पीड़ित हुआ। मार्कण्डेय ऋषि के कहने पर उसने योगिनी एकादशी का व्रत किया और फिर से अपना दिव्य रूप पा लिया।

योगिनी एकादशी की कथा किस पुराण में है?

परंपरा के अनुसार यह कथा श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में है। इस्कॉन और कई वैष्णव स्रोत इसे ब्रह्मवैवर्त पुराण से जोड़ते हैं, जबकि कुछ पंचांग इसे पद्म पुराण में बताते हैं।

योगिनी एकादशी का फल 88 हज़ार ब्राह्मण भोजन के बराबर क्यों कहा जाता है?

यह बात इस एकादशी के माहात्म्य में कही गई है और परंपरा में बहुत प्रसिद्ध है। इसका भाव यह है कि श्रद्धा से रखा गया एक दिन का व्रत भी बहुत बड़े दान जितना पुण्य दे सकता है। कुछ हिंदी पाठों में यह संख्या 80 हज़ार भी मिलती है।

योगिनी एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु (नारायण) की पूजा होती है। कथा में कुबेर की शिव पूजा का प्रसंग है, इसलिए कुछ भक्त भगवान शिव का भी स्मरण करते हैं, पर यह वैकल्पिक है।

क्या योगिनी एकादशी चातुर्मास से पहले की अंतिम एकादशी है?

हाँ। इसके लगभग दो सप्ताह बाद देवशयनी एकादशी आती है, जिससे चातुर्मास शुरू होता है। इसलिए भक्त योगिनी एकादशी को चातुर्मास की तैयारी का व्रत भी मानते हैं।

योगिनी एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, सिंघाड़ा या कुट्टू का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक ले सकते हैं। चावल, गेहूँ, दालें, प्याज़, लहसुन और मांसाहार से पूरी तरह बचें।

क्या योगिनी एकादशी पर पानी पी सकते हैं?

हाँ, अगर आप निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं तो जल पी सकते हैं। फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में जल लिया जाता है। गर्मी के मौसम में पर्याप्त पानी पीना ज़रूरी है।

क्या योगिनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल खाना सबसे ज़्यादा वर्जित माना जाता है, चाहे आप व्रत रखें या न रखें। द्वादशी के दिन पारण के समय चावल खाना शुभ माना जाता है।

योगिनी एकादशी का पारण कब करें?

पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले करें। सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है। अपने शहर का सही समय इस पेज की तालिका में देखें।

स्मार्त और वैष्णव योगिनी एकादशी में क्या अंतर है?

स्मार्त परंपरा गृहस्थों की है और वैष्णव (जैसे इस्कॉन) परंपरा तिथि गणना के थोड़े अलग नियम मानती है। कुछ वर्षों में दोनों की तारीख अलग होती है, जैसे 2026 में थी। 2027 में दोनों का व्रत एक ही दिन है।

योगिनी एकादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?

सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है, जिसका 108 बार जप शुभ माना जाता है। आप विष्णु गायत्री मंत्र, “शान्ताकारं भुजगशयनं” ध्यान श्लोक या विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं।

क्या योगिनी एकादशी व्रत से त्वचा रोग ठीक होते हैं?

कथा के आधार पर कई भक्त ऐसा मानते हैं, पर यह धार्मिक आस्था है, कोई चिकित्सा दावा नहीं। किसी भी त्वचा रोग में व्रत और प्रार्थना के साथ डॉक्टर से इलाज ज़रूर कराएँ।

क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग योगिनी एकादशी का व्रत रख सकते हैं?

गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, डायबिटीज़ के रोगी और दवा लेने वाले लोग कठोर या निर्जला व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन का व्रत रख सकते हैं।

अगर योगिनी एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। परंपरा में सच्चे मन का पश्चाताप ही सबसे बड़ा उपाय माना गया है।

योगिनी एकादशी पर क्या दान करें?

अन्न, फल, मिठाई, वस्त्र, छाता, चप्पल या जल से भरा घड़ा दान करना शुभ माना जाता है। द्वादशी पर ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराना भी व्रत का हिस्सा माना जाता है।

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