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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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Ekadashi

देवशयनी एकादशी कब है? (Devshayani Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण, शयन मंत्र और चातुर्मास आरंभ

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

देवशयनी एकादशी (Devshayani Ekadashi) आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी और आषाढ़ी एकादशी भी कहते हैं। परंपरा के अनुसार इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए इसे “देव” के “शयन” यानी भगवान के विश्राम का दिन कहा जाता है।

देवशयनी एकादशी से ही चातुर्मास शुरू होता है, यानी चार महीने का वह पवित्र समय जिसमें विवाह जैसे मांगलिक कार्य प्रायः रोक दिए जाते हैं और भक्ति, जप, संयम और सेवा पर ज़ोर दिया जाता है। ये चार महीने कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी पर पूरे होते हैं, जब भगवान जागते हैं। महाराष्ट्र में यही दिन आषाढ़ी एकादशी के रूप में पंढरपुर के विट्ठल भगवान की वारी का सबसे बड़ा पर्व है।

देवशयनी एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: देवशयनी एकादशी 2026 (25 जुलाई) बीत चुकी है। अगली देवशयनी एकादशी बुधवार, 14 जुलाई 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 13 जुलाई 2027 दोपहर 12:08 बजे से 14 जुलाई दोपहर 1:10 बजे तक रहेगी, और पारण 15 जुलाई 2027 की सुबह लगभग 5:33 से 8:19 बजे के बीच किया जा सकेगा।

अगली देवशयनी एकादशी

देवशयनी एकादशी 2027

14 जुलाई 2027, बुधवार 255 दिन बाकी

मास और पक्ष
आषाढ़ शुक्ल
एकादशी तिथि
13 जुला 12:10 – 14 जुला 13:12
पारण (व्रत खोलने का समय)
15 जुला, 05:33 – 08:18
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202625 जुलाई 2026, शनिवार24 जुला 09:14 –
25 जुला 11:36
26 जुला, 05:39 – 08:22
202714 जुलाई 2027, बुधवार13 जुला 12:10 –
14 जुला 13:12
15 जुला, 05:33 – 08:18
20282 जुलाई 2028, रविवार2 जुला 01:16 –
3 जुला 00:06
3 जुला, 05:54 – 08:14
202921 जुलाई 2029, शनिवार21 जुला 02:15 –
22 जुला 00:17
22 जुला, 05:50 – 08:21

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का समय देखें। सूर्योदय हर शहर में अलग होता है, इसलिए पारण का समय भी थोड़ा बदल जाता है। आने वाले वर्षों की तारीखें भी इसी तालिका में अपने आप अपडेट होती रहती हैं।

कभी-कभी एकादशी तिथि दो दिन तक फैल जाती है। तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन व्रत रखते हैं और वैष्णव संप्रदाय के भक्त दूसरे दिन। ऐसा होने पर तालिका में दोनों दिन अलग से दिखाए जाते हैं।

देवशयनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“देवशयनी” नाम का अर्थ

“देवशयनी” दो शब्दों से बना है: “देव” यानी भगवान और “शयन” यानी सोना या विश्राम। मान्यता है कि इस एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसी कारण इसे “हरिशयनी” (हरि का शयन) भी कहा जाता है।

यहाँ “निद्रा” का अर्थ साधारण नींद नहीं है। योगनिद्रा का अर्थ है ऐसा गहरा ध्यान, जिसमें भगवान बाहरी संसार से हटकर अपने ही स्वरूप में स्थित रहते हैं। भक्त इसे सृष्टि के विश्राम और नई ऊर्जा के संचय का समय मानते हैं।

देवशयनी एकादशी के अन्य नाम

  • हरिशयनी एकादशी (Harishayani Ekadashi): भगवान हरि के शयन के कारण।
  • पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi): कथा में अंगिरा ऋषि इसी नाम से इस व्रत का उल्लेख करते हैं। ध्यान रखें कि कुछ पंचांगों में भाद्रपद शुक्ल की परिवर्तिनी एकादशी को भी “पद्मा एकादशी” कहा जाता है।
  • आषाढ़ी एकादशी (Ashadhi Ekadashi): आषाढ़ मास में आने के कारण। महाराष्ट्र में यही नाम सबसे प्रचलित है।
  • शयनी एकादशी: पुराने कथा पाठों में भगवान श्रीकृष्ण इसे “शयनी” नाम से ही बताते हैं।
  • तोलि एकादशी (Toli / Tholi Ekadashi): आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में। तेलुगु में “तोलि” का अर्थ है “पहली”, क्योंकि इसे वर्षा ऋतु और चातुर्मास की पहली एकादशी माना जाता है। वहाँ इसे “पेद्द एकादशी” (बड़ी एकादशी) भी कहते हैं।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

देवशयनी एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी है, इसलिए उत्तर भारत के पूर्णिमांत और दक्षिण व पश्चिम भारत के अमांत, दोनों कैलेंडर में यह आषाढ़ शुक्ल एकादशी ही कहलाती है। शुक्ल पक्ष में दोनों पद्धतियों के महीने का नाम एक ही रहता है। यह प्रायः जून के अंत से जुलाई के बीच आती है।

क्रम के अनुसार यह आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी के बाद और श्रावण कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी से पहले आती है।

देवशयनी एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

साल की चौबीस एकादशियों में देवशयनी एकादशी का स्थान बहुत ऊँचा माना जाता है, क्योंकि इसी दिन से चातुर्मास का पवित्र समय शुरू होता है। कथा पाठों में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि यह व्रत पापों को दूर करने वाला और स्वर्ग तथा मोक्ष देने वाला है। मान्यता है कि इस दिन विष्णु की पूजा करने से तीनों लोकों की पूजा का फल मिलता है।

इस दिन भक्त भगवान को विधि से पूजकर शयन कराते हैं और आने वाले चार महीनों के लिए कोई नियम या संकल्प लेते हैं। इसलिए यह केवल एक दिन का व्रत नहीं, बल्कि चार महीने की साधना का आरंभ है।

आध्यात्मिक संदेश

भगवान का विश्राम हमें याद दिलाता है कि जीवन में रुकना, भीतर देखना और अपनी ऊर्जा को सँभालना भी ज़रूरी है। चातुर्मास मन को नए संकल्पों के लिए तैयार करने का समय है।

कथा का दूसरा संदेश करुणा और न्याय का है। राजा मान्धाता ने अपनी प्रजा के कष्ट दूर करने के लिए भी किसी निरपराध की हत्या का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने भगवान की शरण ली, और भक्ति के मार्ग से ही समाधान मिला।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार देवशयनी एकादशी की कथा भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलती है, जिसके भीतर ब्रह्मा जी नारद मुनि को यह कथा सुनाते हैं। अलग-अलग स्रोत इसे अलग पुराणों से जोड़ते हैं। ISKCON और वैष्णव परंपरा भविष्योत्तर पुराण का नाम लेती है, कुछ हिंदी कथा पाठ ब्रह्मवैवर्त पुराण का, और कुछ पंचांग पद्म पुराण का।

इन सभी परंपराओं में कथा का मूल रूप एक जैसा है: राजा मान्धाता, तीन वर्ष का अकाल, अंगिरा ऋषि का उपदेश और व्रत के बाद वर्षा।

भगवान विष्णु की योगनिद्रा: क्षीरसागर और शेषनाग

भगवान विष्णु का प्रसिद्ध रूप “शेषशायी” है, यानी क्षीरसागर (दूध के सागर) में शेषनाग की कुंडली पर लेटे हुए भगवान, जिनकी नाभि से कमल निकलता है और जिनके चरणों के पास माता लक्ष्मी बैठी हैं। देवशयनी एकादशी पर भक्त इसी रूप का ध्यान करते हैं। “शान्ताकारं भुजगशयनं” श्लोक में भी भगवान को “भुजगशयन”, यानी सर्प की शय्या पर सोने वाला कहा गया है।

मान्यता है कि भगवान आषाढ़ शुक्ल एकादशी को सोते हैं, भाद्रपद शुक्ल की परिवर्तिनी एकादशी पर करवट बदलते हैं और कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी पर जागते हैं। इन तीनों एकादशियों को मिलाकर देखें तो चातुर्मास की पूरी कहानी समझ में आती है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर का प्रश्न

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे केशव! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसकी विधि क्या है और उस दिन किस देवता की पूजा की जाती है? कृपा करके विस्तार से बताइए।”

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन! इस एकादशी की कथा वही है जो एक बार ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को सुनाई थी। मैं वही कथा तुम्हें सुनाता हूँ, ध्यान से सुनो।”

एक समय नारद मुनि ने ब्रह्मा जी से इसी एकादशी के बारे में पूछा था। ब्रह्मा जी ने कहा कि इसका व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है, और यह कथा सुनाई।

सतयुग के चक्रवर्ती राजा मान्धाता

सतयुग में सूर्यवंश (इक्ष्वाकु वंश) में मान्धाता नाम के एक चक्रवर्ती सम्राट हुए। वे सत्यवादी, प्रतापी और प्रजा को संतान की तरह पालने वाले राजा थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी और धन-धान्य से भरपूर थी। वहाँ कभी अकाल नहीं पड़ा था और कोई दुखी नहीं था।

तीन वर्ष का अकाल

समय बदला और एक बार उनके राज्य में लगातार तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। खेत सूख गए, अन्न समाप्त होने लगा और भयंकर अकाल पड़ गया। अन्न के अभाव में यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा और व्रत जैसे धार्मिक कार्य भी कम होने लगे।

दुखी प्रजा राजा के पास पहुँची और बोली, “महाराज! सारा संसार वर्षा पर टिका है। वर्षा के बिना अन्न नहीं, और अन्न के बिना प्रजा जीवित नहीं रह सकती। कृपा करके कोई उपाय कीजिए।”

राजा मान्धाता बहुत चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि मुझसे ऐसा कौन-सा पाप हुआ है जिसका दंड मेरी प्रजा भुगत रही है। उन्होंने प्रजा को आश्वासन दिया और इस संकट का कारण और उपाय खोजने के लिए अपनी सेना के कुछ लोगों के साथ वन की ओर चल पड़े।

अंगिरा ऋषि के आश्रम में

वन में भटकते हुए राजा ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुँचे और प्रणाम करके आने का कारण बताया।

राजा ने हाथ जोड़कर कहा, “हे मुनिवर! मैं धर्म से राज्य चलाता हूँ, फिर भी तीन वर्ष से मेरे राज्य में वर्षा नहीं हुई और प्रजा अकाल से पीड़ित है। मैं इसका कारण नहीं जानता। कृपा करके मेरा संशय दूर कीजिए और कोई उपाय बताइए।”

ऋषि का उत्तर और राजा का निर्णय

अंगिरा ऋषि ने उस युग की मान्यताओं के अनुसार बताया कि सतयुग में तपस्या का अधिकार केवल ब्राह्मणों को था, पर आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है। इसी नियम-भंग के कारण वर्षा रुकी है, और जब तक वह जीवित है अकाल समाप्त नहीं होगा। उन्होंने उपाय के रूप में उस तपस्वी को मृत्युदंड देने की बात कही।

राजा मान्धाता ने विनम्रता से पर दृढ़ता से कहा, “हे मुनिवर! मैं एक निरपराध तपस्वी के प्राण नहीं ले सकता। उसने कोई अपराध नहीं किया है। कृपा करके मुझे कोई दूसरा उपाय बताइए।” यही प्रसंग इस कथा का हृदय माना जाता है। आज के पाठक इसमें राजा की करुणा, न्यायप्रियता और अहिंसा को ही मुख्य संदेश के रूप में देखते हैं।

पद्मा एकादशी व्रत का उपदेश

राजा का धर्म-भाव देखकर ऋषि प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “हे राजन! यदि तुम ऐसा नहीं करना चाहते, तो आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पद्मा नाम की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में वर्षा होगी और प्रजा सुखी होगी।”

व्रत का फल

राजा अपनी राजधानी लौट आए। उन्होंने चारों वर्णों की प्रजा के साथ मिलकर आषाढ़ शुक्ल एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियम से किया। व्रत के प्रभाव से राज्य में मूसलधार वर्षा हुई, धरती फिर हरी-भरी हो गई और अकाल दूर हो गया। प्रजा फिर से धन-धान्य से संपन्न और सुखी हो गई।

कथा का माहात्म्य

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि इस एकादशी का व्रत सब पापों का नाश करने वाला है और इसकी कथा पढ़ने या सुनने से भी पुण्य मिलता है। उन्होंने बताया कि इसी दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन करते हैं, इसलिए इन महीनों में मनुष्य को विशेष रूप से धर्म, संयम और भक्ति का पालन करना चाहिए। परंपरा के अनुसार जो भक्त रात्रि जागरण करके भगवान का कीर्तन करते हैं, उनके पुण्य की गिनती करना कठिन बताया गया है।

कथा के पाठ में भिन्नता: अधिकतर हिंदी कथा पाठों में श्रोता युधिष्ठिर हैं, जबकि कुछ स्रोतों में भगवान यह कथा अर्जुन को सुनाते हैं। कथा के बाकी पात्र, यानी ब्रह्मा जी, नारद मुनि, राजा मान्धाता और अंगिरा ऋषि, सभी स्रोतों में एक जैसे हैं।

राजा बलि और वामन अवतार से संबंध (मान्यता)

देवशयनी एकादशी से जुड़ी एक लोकप्रिय मान्यता राजा बलि और भगवान वामन की है। दैत्यराज बलि बहुत शक्तिशाली और दानी थे, पर उन्हें अपनी शक्ति का अभिमान हो गया था। भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) का रूप लेकर बलि से तीन पग भूमि माँगी।

पहले पग में भगवान ने पूरी पृथ्वी और दिशाएँ नाप लीं और दूसरे पग में स्वर्ग। तीसरे पग के लिए कुछ नहीं बचा, तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। उनके इस समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पाताल लोक का राजा बनाया और वरदान माँगने को कहा। बलि ने वर माँगा कि भगवान सदा उनके महल में रहें।

वचन से बँधे भगवान पाताल में रहने लगे, तो माता लक्ष्मी चिंतित हुईं। उन्होंने बलि को भाई बनाकर भगवान को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया। मान्यता है कि इसी के बाद भगवान हर वर्ष चार महीने बलि के यहाँ निवास करते हैं, और यही समय चातुर्मास है। कुछ कथा पाठों में कहा गया है कि भगवान इस समय बलि के लोक में भी रहते हैं और क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में भी।

यह कथा पुराणों के वामन अवतार प्रसंग से जुड़ी लोक-परंपरा है। देवशयनी एकादशी की मुख्य व्रत कथा राजा मान्धाता वाली ही है, और बलि की कथा चातुर्मास के कारण को समझाने वाली मान्यता के रूप में सुनाई जाती है।

देवशयनी एकादशी से चातुर्मास आरंभ

चातुर्मास क्या है?

“चातुर्मास” का अर्थ है चार महीने: श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक। यह आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी या प्रबोधिनी) तक चलता है। जिस वर्ष अधिक मास पड़ता है, उस वर्ष यह अवधि और लंबी हो जाती है।

यह वर्षा ऋतु का समय है। पुराने समय में बरसात में यात्रा कठिन होती थी, इसलिए साधु-संत एक ही स्थान पर रुककर साधना और प्रवचन करते थे।

चातुर्मास में कौन-से मांगलिक कार्य नहीं होते?

मान्यता है कि भगवान के शयन काल में नए शुभ कार्यों का आरंभ नहीं करना चाहिए। इसलिए इन चार महीनों में प्रायः ये कार्य टाल दिए जाते हैं:

  • विवाह (शादी) और सगाई
  • गृह प्रवेश
  • मुंडन संस्कार
  • यज्ञोपवीत (जनेऊ) संस्कार
  • नए घर या बड़े नए कार्य की शुरुआत, जिसके लिए लोग शुभ मुहूर्त देखते हैं

ये कार्य फिर से देवउठनी एकादशी के बाद शुरू होते हैं, और कई जगह तुलसी विवाह के साथ विवाह का मौसम खुलता है। रोज़ की पूजा, त्योहार, व्रत और दान पर कोई रोक नहीं है। किसी विशेष कार्य के मुहूर्त के लिए अपने कुल-पुरोहित या पंचांग की सलाह लें।

चातुर्मास में क्या करें?

  • रोज़ “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • भगवद्गीता, रामायण या भागवत का नियमित पाठ या श्रवण करें।
  • संध्या समय दीपदान करें और तुलसी की सेवा करें।
  • सात्विक भोजन, संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • कुछ भक्त भूमि पर सोने और पलाश के पत्तों पर भोजन करने का नियम लेते हैं। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ और बीमार लोग ऐसे कठोर नियमों से मुक्त माने जाते हैं।

महीने के अनुसार त्याग की परंपरा

कई परिवारों में चातुर्मास के हर महीने किसी एक खाद्य वस्तु का त्याग करने की परंपरा है। प्रचलित नियम इस प्रकार है:

महीनापरंपरा में किसका त्याग
श्रावणहरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ (साग)
भाद्रपददही और छाछ
आश्विनदूध
कार्तिकउड़द की दाल और उससे बनी चीज़ें

यह नियम हर परिवार में एक जैसा नहीं होता, और कई भक्त अपनी पसंद की कोई एक चीज़ चार महीने के लिए छोड़ने का संकल्प लेते हैं। यदि आपको कोई स्वास्थ्य समस्या है या आप दवाइयाँ लेते हैं, तो आहार बदलने से पहले डॉक्टर से बात करें।

चातुर्मास का संकल्प कैसे लें

  1. देवशयनी एकादशी की पूजा के बाद भगवान विष्णु के सामने हाथ में जल और अक्षत लें।
  2. मन में तय करें कि चार महीने आप कौन-सा नियम निभाएँगे, जैसे रोज़ एक माला जप, गीता का एक अध्याय, किसी एक चीज़ का त्याग या हर सप्ताह दान।
  3. भगवान से प्रार्थना करें कि वे इस नियम को निभाने की शक्ति दें, और जल भूमि पर छोड़ दें।

आषाढ़ी एकादशी और पंढरपुर वारी (महाराष्ट्र)

महाराष्ट्र में देवशयनी एकादशी को आषाढ़ी एकादशी कहते हैं, और यह पंढरपुर (सोलापुर ज़िला) के विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर का सबसे बड़ा पर्व है। वारकरी संप्रदाय के भक्त भगवान विट्ठल (विठोबा) को श्रीकृष्ण यानी विष्णु का रूप और रुक्मिणी (रखुमाई) को लक्ष्मी का रूप मानकर पूजते हैं।

वारी क्या है?

“वारी” का अर्थ है नियमित रूप से की जाने वाली तीर्थ यात्रा। आषाढ़ी एकादशी से पहले लाखों वारकरी लगभग तीन सप्ताह तक पैदल चलकर पंढरपुर पहुँचते हैं। यह परंपरा लगभग आठ सौ वर्ष पुरानी मानी जाती है, और इसमें बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण परिवार शामिल होते हैं।

पालखी और दिंडी

वारी की सबसे प्रमुख पालखियाँ पुणे ज़िले के आलंदी से संत ज्ञानेश्वर महाराज की और देहू से संत तुकाराम महाराज की होती हैं। इन पालखियों में संतों की पादुकाएँ रखी जाती हैं। भक्त छोटे-छोटे समूहों में चलते हैं जिन्हें “दिंडी” कहते हैं, और रास्ते भर अभंग गाते हुए “जय हरि विट्ठल” और “राम कृष्ण हरि” का जयघोष करते हैं।

रास्ते में “रिंगण” जैसे आयोजन होते हैं, जिनमें एक घोड़ा भक्तों के घेरे में दौड़ता है और भक्त उसके खुरों से उड़ी धूल को पाने की कोशिश करते हैं। वारकरी गले में तुलसी की माला पहनते हैं। संत ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, चोखामेला और तुकाराम के अभंग इस यात्रा की आत्मा हैं।

पंढरपुर में आषाढ़ी एकादशी

एकादशी के दिन भक्त चंद्रभागा नदी में स्नान करते हैं, नगर की प्रदक्षिणा करते हैं और विट्ठल के दर्शन करते हैं। इन दिनों मंदिर लगभग चौबीसों घंटे खुला रहता है। परंपरा है कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री सपत्नीक आषाढ़ी एकादशी पर विट्ठल भगवान की शासकीय महापूजा करते हैं।

जो भक्त पंढरपुर नहीं जा पाते, वे अपने नगर के विट्ठल मंदिर में दर्शन करते हैं, घर पर विट्ठल-रुक्मिणी की पूजा करते हैं और अभंग या भजन गाते हैं। कार्तिक शुक्ल एकादशी (कार्तिकी एकादशी) पर भी पंढरपुर में बड़ी यात्रा होती है।

देवशयनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले सात्विक और हल्का भोजन करें। प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  2. घर और पूजा स्थान की सफ़ाई करें। पूजा की सामग्री एक दिन पहले ही जुटा लें।
  3. रात को भगवान का नाम लेकर सोएँ और मन में अगले दिन व्रत रखने का निश्चय करें।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में या सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और स्वच्छ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थान पर एक चौकी रखकर उस पर पीला वस्त्र बिछाएँ और भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। शेषशायी विष्णु का चित्र हो तो और भी अच्छा है।
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपना नाम, गोत्र और व्रत का प्रकार (निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन) बोलकर संकल्प लें। चाहें तो नीचे दिया गया संकल्प मंत्र पढ़ें।

भगवान विष्णु की पूजा

  1. भगवान को जल या पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर स्वच्छ जल से स्नान कराकर वस्त्र पहनाएँ।
  2. पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। तुलसी दल एक दिन पहले तोड़कर रखें, क्योंकि एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
  3. धूप और घी का दीपक जलाएँ।
  4. फल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  5. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार जप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  6. देवशयनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  7. ओम जय जगदीश हरे और एकादशी माता की आरती करें।

भगवान को शयन कराना

  1. कई घरों और मंदिरों में इस दिन भगवान के लिए एक छोटी शय्या (बिस्तर) सजाई जाती है, जिस पर स्वच्छ वस्त्र, तकिया और फूल रखे जाते हैं।
  2. संध्या या रात्रि की पूजा के बाद भगवान की मूर्ति को आदर से शय्या पर लिटाएँ या चित्र के सामने शयन का भाव करें।
  3. “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ…” शयन मंत्र पढ़कर भगवान से प्रार्थना करें कि उनके विश्राम के समय भी उनकी कृपा संसार पर बनी रहे।
  4. इसके बाद चातुर्मास का अपना संकल्प लें।

दिन भर, शाम और रात्रि जागरण

  1. दिन भर भगवान का स्मरण करें, कम बोलें, क्रोध और निंदा से बचें।
  2. शाम को फिर से दीपक जलाकर आरती करें और तुलसी के पास दीपक रखें।
  3. रात को सामर्थ्य हो तो भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें। न हो सके तो कुछ समय जप करके भूमि या साधारण बिस्तर पर सोएँ।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें।
  2. किसी ब्राह्मण, साधु या ज़रूरतमंद को भोजन, अन्न या दक्षिणा दें।
  3. ऊपर की तालिका में दिए पारण समय के भीतर भगवान को अर्पित तुलसी दल और जल लेकर व्रत खोलें, फिर हल्का सात्विक भोजन करें। बहुत भारी या तला भोजन एकदम से न लें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु की मूर्ति या चित्र (शेषशायी रूप हो तो उत्तम)
  • चौकी और पीला वस्त्र
  • गंगाजल या स्वच्छ जल, कलश
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • पीला चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल पूजा के लिए)
  • पीले फूल और फूलों की माला
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
  • धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक, रुई की बत्ती, कपूर
  • फल, मिठाई, सूखे मेवे, भोग के लिए पंचामृत
  • भगवान की शय्या के लिए छोटा बिस्तर, स्वच्छ वस्त्र और तकिया (यदि शयन कराना हो)
  • व्रत कथा की पुस्तक, विष्णु सहस्रनाम, तुलसी की माला
  • दान के लिए अन्न, वस्त्र, छाता या दक्षिणा

देवशयनी एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप अपनी सुविधा से कर सकते हैं। तुलसी की माला से जप करना शुभ माना जाता है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: सब प्राणियों के भीतर बसने वाले भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमस्कार है। यह बारह अक्षरों का मंत्र एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है। इसका 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

2. हरि शयन मंत्र (देवशयनी एकादशी का विशेष मंत्र)

सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥

अर्थ: हे जगन्नाथ! आपके सो जाने पर यह सारा संसार सो जाता है, और आपके जागने पर सारा चर-अचर जगत जाग उठता है। भगवान को शयन कराते समय यह मंत्र पढ़ा जाता है और प्रार्थना की जाती है कि उनकी कृपा सदा बनी रहे।

3. व्रत संकल्प मंत्र

सत्यस्थः सत्यसंकल्पः सत्यवित् सत्यदस्तथा। धर्मो धर्मी च कर्मी च सर्वकर्मविवर्जितः॥ कर्मकर्ता च कर्मैव क्रिया कार्यं तथैव च। श्रीपतिर्नृपतिः श्रीमान् सर्वस्यपतिरूर्जितः॥

अर्थ: भगवान विष्णु सत्य में स्थित हैं, उनका संकल्प सत्य है, वे सत्य को जानने वाले और सत्य देने वाले हैं। वे स्वयं धर्म हैं, धर्म के धारक हैं, कर्म करने वाले होकर भी सब कर्मों से परे हैं। वे ही कर्ता, कर्म और क्रिया हैं, वे लक्ष्मीपति, सबके स्वामी और परम तेजस्वी हैं। व्रत का संकल्प लेते समय यह स्तुति पढ़ी जाती है।

4. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी और पूरे संसार का आधार हैं, आकाश के समान व्यापक और मेघ के समान श्याम वर्ण वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति, कमल-नयन और योगियों के ध्यान में आने वाले हैं, संसार के भय को हरने वाले उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। “भुजगशयनं” शब्द देवशयनी एकादशी के शेषशायी रूप से सीधे जुड़ता है।

5. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम भगवान नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर प्रेरित करें। सुबह की पूजा के बाद इसका 11 या 108 बार जप किया जा सकता है।

देवशयनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल जैसे केला, सेब, पपीता, अमरूद
  • दूध, दही, छाछ, पनीर (यदि आपकी परंपरा में चल सकता है)
  • साबूदाना, कुट्टू (बकव्हीट) का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा
  • आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू
  • मूँगफली, मखाना, सूखे मेवे
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
  • नारियल पानी, नींबू पानी, सादा जल

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी चीज़ें (एकादशी पर चावल सबसे अधिक वर्जित माना जाता है)
  • गेहूँ, जौ, मक्का जैसे सभी अनाज
  • दालें और फलियाँ
  • साधारण नमक (सेंधा नमक ले सकते हैं)
  • प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा, मदिरा, तंबाकू
  • बहुत तला-भुना या भारी भोजन

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों नहीं लिए जाते। यह सबसे कठिन रूप है और केवल वही लोग रखें जो पूरी तरह स्वस्थ हैं। जुलाई की उमस और गर्मी में शरीर में पानी की कमी जल्दी हो सकती है, इसलिए चक्कर, कमज़ोरी या घबराहट हो तो तुरंत पानी पी लें। भगवान भाव देखते हैं, शरीर को कष्ट देना व्रत का उद्देश्य नहीं है।

फलाहार व्रत

ज़्यादातर भक्त फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें दिन में एक या दो बार फल, दूध और व्रत की चीज़ें खाई जाती हैं और जल लिया जा सकता है। यह व्रत संतुलित है और कामकाजी लोगों, विद्यार्थियों और बुज़ुर्गों के लिए अधिक व्यावहारिक है।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

कुछ लोग दिन में केवल एक बार व्रत का सात्विक भोजन करते हैं, जिसमें अनाज नहीं होता। जो लोग स्वास्थ्य कारणों से पूरा उपवास नहीं रख सकते, वे भी इस तरह श्रद्धा से व्रत निभा सकते हैं।

स्वास्थ्य सावधानी: मधुमेह (डायबिटीज़), ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग, गर्भावस्था, स्तनपान, अधिक उम्र या नियमित दवाइयों की स्थिति में कठोर या निर्जला व्रत न रखें। ऐसी स्थिति में व्रत का कोई भी रूप अपनाने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें, और दवाइयाँ बिना डॉक्टर के कहे बंद न करें।

देवशयनी एकादशी पारण कब और कैसे करें

एकादशी व्रत को अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में खोलने को “पारण” कहते हैं। पारण का सही समय इस पेज की ऊपर दी गई तालिका में आपके शहर के अनुसार दिया गया है।

  • द्वादशी के भीतर पारण: पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना ठीक नहीं माना जाता।
  • हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग को “हरि वासर” कहते हैं। इस समय पारण नहीं किया जाता, इसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करें।
  • सुबह का समय सबसे उत्तम: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे अच्छा माना जाता है। मध्याह्न (दोपहर) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है।
  • स्मार्त और वैष्णव: जब व्रत दो दिन का होता है, तो दोनों परंपराओं का पारण समय भी अलग होता है। अपनी परंपरा के अनुसार तालिका में सही पंक्ति देखें।

देवशयनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • भगवान विष्णु की पीले फूलों और तुलसी से पूजा करें।
  • राजा मान्धाता की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ सुनें।
  • भगवान को शयन कराएँ और शयन मंत्र पढ़ें।
  • चातुर्मास के लिए कोई छोटा और व्यावहारिक नियम लें।
  • विष्णु सहस्रनाम और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
  • वर्षा ऋतु को देखते हुए छाता, अन्न, वस्त्र या भोजन का दान करें।
  • महाराष्ट्र या विट्ठल भक्ति परंपरा से हैं तो विट्ठल-रुक्मिणी के दर्शन करें और अभंग गाएँ।

क्या न करें

  • चावल और अनाज का सेवन न करें।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें।
  • मांस, मदिरा, प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन न लें।
  • इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश जैसे नए मांगलिक कार्यों का मुहूर्त न रखें।

देवशयनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: भगवान चार महीने सो जाते हैं, इसलिए इस समय पूजा का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: परंपरा ठीक इसका उलटा कहती है। कथा में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन चार महीनों में धर्म, संयम और भक्ति का विशेष पालन करना चाहिए। योगनिद्रा को भक्त भगवान का गहरा ध्यान मानते हैं, उदासीनता नहीं। इसी समय जन्माष्टमी, नवरात्रि और दीपावली जैसे बड़े पर्व आते हैं।

मिथक: चातुर्मास में कोई भी शुभ काम नहीं हो सकता, पूजा-पाठ और त्योहार भी नहीं।

सच्चाई: परंपरा में मुख्य रूप से विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ जैसे संस्कारों को टाला जाता है। रोज़ की पूजा, व्रत, त्योहार, दान, सेवा और पढ़ाई जैसे काम पूरी तरह किए जाते हैं। किसी ज़रूरी काम पर संशय हो तो अपने पुरोहित या पंचांग से सलाह लें, डर के कारण ज़रूरी काम न रोकें।

मिथक: देवशयनी एकादशी का व्रत करने से वर्षा अवश्य होगी।

सच्चाई: राजा मान्धाता की कथा में व्रत के बाद वर्षा होती है, और इसी कारण किसान परिवारों में इस व्रत से अच्छी वर्षा की प्रार्थना की परंपरा है। यह आस्था और प्रार्थना का विषय है। मौसम प्रकृति के नियमों से चलता है, इसलिए व्रत को प्रार्थना के रूप में रखें, मौसम की भविष्यवाणी के रूप में नहीं।

मिथक: कथा का संदेश यह है कि कुछ लोगों को भक्ति या तपस्या का अधिकार नहीं।

सच्चाई: कथा में ऋषि उस युग की मान्यता बताते हैं, पर कथा का निर्णायक क्षण राजा का इनकार है। राजा निरपराध तपस्वी को दंड देने से मना करते हैं, और भगवान का व्रत चारों वर्णों की प्रजा मिलकर करती है, जिसके बाद ही वर्षा होती है। इसी कथा पाठ में भगवान यह भी कहते हैं कि किसी भी वर्ण का व्यक्ति यह व्रत करे तो वह उन्हें प्रिय है। भक्ति का द्वार सबके लिए खुला है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो देवशयनी एकादशी का कोई फल नहीं।

सच्चाई: शास्त्रीय परंपरा में व्रत अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखने की बात कही गई है। फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत भी पूरी श्रद्धा से रखा जाए तो उतना ही सार्थक माना जाता है। बीमार, गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग और दवाइयाँ लेने वाले लोग डॉक्टर की सलाह से ही व्रत का रूप तय करें।

मिथक: चातुर्मास में जो नियम लिया, वह टूट गया तो बड़ा अपशकुन होगा।

सच्चाई: परंपरा में भूल होने पर भगवान से क्षमा माँगकर नियम फिर से शुरू करने की बात कही जाती है। चातुर्मास का उद्देश्य संयम सीखना है, डर पैदा करना नहीं। इसलिए नियम इतना ही लें जितना सहजता से निभा सकें।

देवशयनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ धार्मिक मान्यता और कथा पर आधारित हैं। इन्हें आस्था के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।

  • पापों से मुक्ति: कथा के अनुसार यह व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों को दूर करने वाला माना जाता है।
  • मनोकामना पूर्ति: कुछ कथा पाठों में इसे सब मनोकामनाएँ पूरी करने वाला व्रत कहा गया है।
  • चातुर्मास का शुभ आरंभ: चार महीने की साधना की शुरुआत भगवान की पूजा और संकल्प से होती है, जिससे मन में अनुशासन आता है।
  • समृद्धि और सुख की प्रार्थना: राजा मान्धाता की कथा के कारण भक्त इस दिन अच्छी वर्षा, अन्न और घर में सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं।
  • मोक्ष की कामना: परंपरा में इस एकादशी को स्वर्ग और मोक्ष देने वाला बताया गया है।

संबंधित एकादशी और पाठ

देवशयनी एकादशी से ठीक पहले आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी आती है, जिसे चातुर्मास से पहले की अंतिम एकादशी माना जाता है। इसके बाद श्रावण कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी आती है, जो चातुर्मास की पहली कृष्ण पक्ष की एकादशी है। चार महीने बाद कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी पर भगवान जागते हैं और चातुर्मास पूरा होता है, जिसके साथ तुलसी विवाह का पर्व भी जुड़ा है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

देवशयनी एकादशी हमें सिखाती है कि भक्ति केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि लंबे समय तक निभाया जाने वाला संयम और प्रेम है। राजा मान्धाता की तरह कठिन समय में भी करुणा और धर्म का साथ न छोड़ें, और इन चार महीनों में कोई एक छोटा अच्छा नियम सच्चे मन से निभाएँ। भगवान श्रीहरि अपनी योगनिद्रा में भी आप पर और आपके परिवार पर कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

देवशयनी एकादशी कब है 2027 में?

देवशयनी एकादशी 2027 की तारीख, एकादशी तिथि और पारण का समय इस पेज के “कब है” भाग में दिया गया है। अपने शहर के अनुसार सटीक तारीख और आने वाले वर्षों की तारीखें इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

देवशयनी एकादशी किस महीने और पक्ष में आती है?

यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। शुक्ल पक्ष होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत, दोनों कैलेंडर में इसका नाम आषाढ़ शुक्ल एकादशी ही रहता है। यह प्रायः जून के अंत से जुलाई के बीच आती है।

इसे देवशयनी एकादशी क्यों कहते हैं?

मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर चार महीने की योगनिद्रा में चले जाते हैं। “देव” यानी भगवान और “शयन” यानी विश्राम, इसलिए इसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं।

देवशयनी एकादशी के अन्य नाम क्या हैं?

इसे हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी, आषाढ़ी एकादशी और शयनी एकादशी कहते हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे तोलि (Tholi) एकादशी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “पहली” एकादशी।

देवशयनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

सतयुग में राजा मान्धाता के राज्य में तीन वर्ष तक वर्षा नहीं हुई। अंगिरा ऋषि के कहने पर राजा ने प्रजा के साथ आषाढ़ शुक्ल (पद्मा) एकादशी का व्रत किया, जिसके बाद भरपूर वर्षा हुई और अकाल दूर हो गया। कथा भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी, जिसे पहले ब्रह्मा जी ने नारद मुनि को सुनाया था।

देवशयनी एकादशी से चातुर्मास कब तक चलता है?

चातुर्मास देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी पर समाप्त होता है। इसमें श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक के चार महीने आते हैं। अधिक मास वाले वर्ष में यह अवधि लंबी हो जाती है।

चातुर्मास में कौन-से काम नहीं करने चाहिए?

परंपरा में इन चार महीनों में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ जैसे मांगलिक संस्कार प्रायः टाल दिए जाते हैं। रोज़ की पूजा, व्रत, त्योहार और दान पर कोई रोक नहीं है।

देवशयनी एकादशी पर कौन-सा मंत्र पढ़ें?

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का 108 बार जप सबसे प्रचलित है। भगवान को शयन कराते समय “सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तं भवेदिदम्…” शयन मंत्र पढ़ा जाता है। ये मंत्र इस पेज के मंत्र भाग में अर्थ सहित दिए गए हैं।

क्या देवशयनी एकादशी के व्रत में पानी पी सकते हैं?

हाँ, फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। केवल निर्जला व्रत में जल नहीं लिया जाता, और वह भी केवल पूरी तरह स्वस्थ लोगों को रखना चाहिए। चक्कर या कमज़ोरी लगे तो तुरंत पानी पी लें।

क्या देवशयनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल और चावल से बनी चीज़ें खाना वर्जित माना जाता है। व्रत में गेहूँ, दालें और अन्य अनाज भी नहीं खाए जाते।

देवशयनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ?

फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद, मखाना, मूँगफली और सेंधा नमक से बनी चीज़ें खा सकते हैं। प्याज़, लहसुन और साधारण नमक से परहेज़ करें।

देवशयनी एकादशी का पारण कब करें?

पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर करें। द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण कर लेना चाहिए। अपने शहर का सही समय इस पेज की तालिका में देखें।

स्मार्त और वैष्णव देवशयनी एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो दिन पड़ती है, तो गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय के भक्त दूसरे दिन व्रत रखते हैं। जब दोनों एक ही दिन हों, तो सब उसी दिन व्रत रखते हैं। ऐसा होने पर पेज की तालिका दोनों दिन दिखाती है।

आषाढ़ी एकादशी और पंढरपुर वारी क्या है?

महाराष्ट्र में देवशयनी एकादशी को आषाढ़ी एकादशी कहते हैं। इस दिन से पहले लाखों वारकरी आलंदी से संत ज्ञानेश्वर और देहू से संत तुकाराम की पालखी के साथ लगभग तीन सप्ताह पैदल चलकर पंढरपुर के विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर पहुँचते हैं।

देवशयनी एकादशी का राजा बलि से क्या संबंध है?

लोक-मान्यता के अनुसार वामन अवतार में बलि से वचनबद्ध होकर भगवान विष्णु पाताल में रहने लगे थे। माता लक्ष्मी के अनुरोध के बाद यह माना जाता है कि भगवान हर वर्ष चार महीने बलि के यहाँ रहते हैं, और यही चातुर्मास है। मुख्य व्रत कथा राजा मान्धाता की ही है।

क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग देवशयनी एकादशी का व्रत रख सकते हैं?

गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, मधुमेह या अन्य रोग वाले और दवाइयाँ लेने वाले लोग निर्जला या कठोर व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से वे फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा, जप और कथा श्रवण कर सकते हैं।

अगर देवशयनी एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान से सच्चे मन से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन संयम से बिताएँ। भगवान भाव देखते हैं, भूल के लिए डरने की ज़रूरत नहीं।

देवशयनी एकादशी के बाद अगली एकादशी कौन-सी है?

देवशयनी के बाद श्रावण कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी आती है। देवशयनी से ठीक पहले आषाढ़ कृष्ण की योगिनी एकादशी होती है, और चातुर्मास कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी पर पूरा होता है।

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