पद्मिनी एकादशी (Padmini Ekadashi) अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भक्त भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम रूप की पूजा और व्रत करते हैं। यह हर साल नहीं आती। अधिक मास लगभग हर 32 से 33 महीने में एक बार जुड़ता है, इसलिए पद्मिनी एकादशी का अवसर भी लगभग तीन साल में एक बार ही मिलता है।
परंपरा के अनुसार इस एकादशी का व्रत रानी पद्मिनी ने माता अनसूया के बताने पर किया था, और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रार्जुन) जैसा पराक्रमी पुत्र मिला। इसी कारण इसे संतान की कामना, पापों से मुक्ति और भगवान की भक्ति बढ़ाने वाला व्रत माना जाता है। कई जगह इसे कमला एकादशी या पुरुषोत्तमी एकादशी भी कहते हैं।
इस पेज पर आप अगली पद्मिनी एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, चार प्रहर का जागरण, मंत्र, व्रत के नियम और अधिक मास का पूरा अर्थ सरल भाषा में जानेंगे।
पद्मिनी एकादशी कब है? 2029 की तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: पद्मिनी एकादशी 2026 (मई के अंत में, अधिक ज्येष्ठ) बीत चुकी है। अगला अधिक मास 2029 में अधिक चैत्र के रूप में आएगा (16 मार्च से 13 अप्रैल 2029), और अगली पद्मिनी एकादशी सोमवार, 26 मार्च 2029 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 25 मार्च 2029 रात लगभग 11:36 बजे से 26 मार्च रात लगभग 9:36 बजे तक रहेगी। पारण 27 मार्च 2029 की सुबह होगा।
अगली पद्मिनी एकादशी
पद्मिनी एकादशी 2029
26 मार्च 2029, सोमवार 876 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- अधिक चैत्र शुक्ल
- एकादशी तिथि
- 25 मार्च 23:38 – 26 मार्च 21:38
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 27 मार्च, 06:16 – 08:44
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 अधिक ज्येष्ठ शुक्ल | 26 मई 2026, मंगलवार वैष्णव: 27 मई | 26 मई 05:13 – 27 मई 06:24 | 27 मई, 13:41 – 16:26 |
| 2029 अधिक चैत्र शुक्ल | 26 मार्च 2029, सोमवार | 25 मार्च 23:38 – 26 मार्च 21:38 | 27 मार्च, 06:16 – 08:44 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय ऊपर दी गई तालिका में देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदलता है। ध्यान दें कि जिन वर्षों में अधिक मास नहीं होता, उनमें पद्मिनी एकादशी आती ही नहीं। 2029 में स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दोनों परंपराओं में यह व्रत एक ही दिन बताया गया है, फिर भी अपने परिवार या गुरु परंपरा का पंचांग अवश्य देख लें।
पद्मिनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“पद्मिनी” नाम का अर्थ
इस एकादशी का नाम कथा की नायिका रानी पद्मिनी से जुड़ा है, जिन्होंने सबसे पहले यह व्रत किया था। “पद्म” का अर्थ कमल है, इसलिए “पद्मिनी” का भाव कमल जैसी पवित्र और सुंदर स्त्री से भी लिया जाता है। कमल भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी दोनों को प्रिय है, और भक्त इस नाम में यही पवित्रता देखते हैं।
पद्मिनी एकादशी के अन्य नाम
- कमला एकादशी: उत्तर भारत के कई पंचांगों में अधिक मास शुक्ल एकादशी को कमला एकादशी भी कहा जाता है। कुछ पंचांग यह नाम अधिक मास की दोनों एकादशियों के लिए इस्तेमाल करते हैं।
- पुरुषोत्तमी एकादशी: पुरुषोत्तम मास में आने के कारण।
- अधिक मास शुक्ल एकादशी: पंचांग की भाषा में इसका सीधा नाम।
- महीने के साथ नाम: जिस महीने का अधिक मास हो, उसके साथ भी इसे पुकारा जाता है, जैसे 2026 में “अधिक ज्येष्ठ पद्मिनी एकादशी” और 2029 में “अधिक चैत्र पद्मिनी एकादशी”।
पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना
पद्मिनी एकादशी किसी तय महीने में नहीं आती। जिस साल जो महीना अधिक (दोहरा) होता है, उसी के शुक्ल पक्ष में यह आती है। 2026 में यह अधिक ज्येष्ठ में थी और 2029 में अधिक चैत्र में होगी।
अधिक मास अमावस्या से अमावस्या तक गिना जाता है, इसलिए उत्तर भारत (पूर्णिमांत) और दक्षिण-पश्चिम भारत (अमांत) दोनों में इसका नाम एक ही रहता है, जैसे अधिक चैत्र। पूर्णिमांत पंचांग में क्रम कुछ इस तरह बनता है: पहले सामान्य चैत्र का कृष्ण पक्ष, फिर पूरा अधिक चैत्र, और उसके बाद निज (शुद्ध) चैत्र का शुक्ल पक्ष।
पद्मिनी एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
साल भर में सामान्यतः 24 एकादशियाँ आती हैं, पर अधिक मास वाले वर्ष में दो एकादशियाँ और जुड़ जाती हैं, पद्मिनी और परमा। परंपरा के अनुसार अधिक मास स्वयं भगवान विष्णु को समर्पित है, इसलिए इस महीने की एकादशी को विशेष फलदायी माना जाता है। कथा में भगवान स्वयं कहते हैं कि अधिक मास और उसकी एकादशी उन्हें बहुत प्रिय है।
मान्यता है कि इस व्रत से पाप नष्ट होते हैं, मन शुद्ध होता है और भक्त को भगवान के धाम की प्राप्ति होती है। संतान की कामना रखने वाले दंपती भी श्रद्धा से यह व्रत रखते हैं, क्योंकि इसकी कथा एक संतानहीन राजा-रानी को पुत्र मिलने की कथा है।
आध्यात्मिक संदेश
पद्मिनी एकादशी की कथा का सबसे सुंदर संदेश यह है कि केवल कठोर तप ही सब कुछ नहीं है। राजा ने दस हज़ार वर्ष तप किया, पर फल तब मिला जब रानी ने सही मार्ग जानकर प्रेम और नियम से भगवान की भक्ति की। यानी साधना में सही समझ, विनम्रता और किसी अनुभवी से मार्गदर्शन लेना भी उतना ही ज़रूरी है।
दूसरा संदेश स्त्री की आस्था और समर्पण का है। रानी पद्मिनी ने राजमहल का सुख छोड़कर पति के साथ वन का कठिन जीवन चुना, और जब कुछ हल नहीं निकला तो उन्होंने स्वयं उपाय खोजा। माता अनसूया से उनका संवाद बताता है कि एक स्त्री का अनुभव दूसरी स्त्री के लिए कितना बड़ा सहारा बन सकता है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार पद्मिनी एकादशी की कथा स्कंद पुराण से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण धर्मराज युधिष्ठिर को इसका माहात्म्य सुनाते हैं। कुछ कथा पाठ इसे भविष्योत्तर पुराण से जोड़ते हैं, और कुछ में प्रश्न पूछने वाले अर्जुन बताए गए हैं। कथा के भीतर यह प्रसंग पुलस्त्य मुनि ने देवर्षि नारद को सुनाया था।
कथा का एक हिस्सा, यानी कार्तवीर्य अर्जुन का रावण को बंदी बनाना और पुलस्त्य मुनि का उसे छुड़ाना, रामायण के उत्तरकांड जैसे ग्रंथों में भी मिलता है। एकादशी माहात्म्य इसी प्रसिद्ध प्रसंग से अपनी कथा शुरू करता है।
पद्मिनी एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन, अधिक मास के शुक्ल पक्ष में कौन-सी एकादशी आती है? उसका नाम क्या है, उसकी विधि क्या है और उसका फल क्या है?” श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन, इस पवित्र एकादशी का नाम पद्मिनी है। इसकी कथा पहले पुलस्त्य मुनि ने देवर्षि नारद को सुनाई थी। अब वही कथा तुम ध्यान से सुनो।”
रावण की हार और नारद जी की जिज्ञासा
त्रेता युग में लंकापति रावण ने इंद्र सहित सभी देवताओं को जीत लिया था। फिर भी एक राजा ने उसे युद्ध में हराकर अपने नगर में बंदी बना लिया। वे थे माहिष्मती के राजा कार्तवीर्य अर्जुन। जब रावण के दादा पुलस्त्य मुनि वहाँ गए और उन्होंने विनती की, तब जाकर रावण को छोड़ा गया।
यह सुनकर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने पुलस्त्य मुनि से पूछा, “जिस रावण से देवता भी हार गए, उसे एक मनुष्य राजा ने कैसे जीत लिया?” तब पुलस्त्य मुनि ने कार्तवीर्य अर्जुन के जन्म की कथा सुनाई।
राजा कृतवीर्य की चिंता
त्रेता युग में हैहय वंश के राजा कृतवीर्य माहिष्मती नगरी पर राज करते थे। (कई कथा पाठों में उनका नाम भी कार्तवीर्य लिखा मिलता है।) उनकी एक हज़ार रानियाँ थीं, पर किसी से भी ऐसा पुत्र नहीं हुआ जो राज्य का भार संभाल सके। राजा ने ब्राह्मणों से यज्ञ और अनेक उपाय करवाए, पर कोई फल नहीं मिला।
अंत में राजा ने राज्य मंत्रियों को सौंपा और तपस्या के लिए वन जाने का निश्चय किया। उनकी प्रिय रानी पद्मिनी, जो इक्ष्वाकु वंश के सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पुत्री थीं, ने भी अपने गहने और राजसी वस्त्र उतार दिए और पति के साथ वन चल पड़ीं।
गंधमादन पर्वत पर कठोर तप
राजा और रानी गंधमादन पर्वत पर पहुँचे। वहाँ राजा ने भगवान गदाधर (विष्णु) का ध्यान करते हुए दस हज़ार वर्ष तक कठोर तप किया। तप से उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा भर रह गया, फिर भी पुत्र का वरदान नहीं मिला।
पति की यह दशा देखकर रानी पद्मिनी बहुत दुखी हुईं। उन्होंने सोचा कि शायद तप की विधि में कोई कमी है। तब वे महर्षि अत्रि की पत्नी, महान पतिव्रता माता अनसूया के पास गईं और विनम्रता से पूछा, “हे माता, मेरे पति इतने वर्षों से तप कर रहे हैं, फिर भी भगवान प्रसन्न क्यों नहीं हुए? मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जिससे हमें संतान का सुख मिले।”
माता अनसूया का उपदेश
माता अनसूया ने प्रेम से कहा, “बेटी, बारह महीनों के अलावा लगभग बत्तीस महीनों में एक बार अधिक मास आता है। यह महीना भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है। इसमें दो एकादशियाँ होती हैं, शुक्ल पक्ष की पद्मिनी और कृष्ण पक्ष की परमा। इनका व्रत विधि-विधान से करो और पूरी रात जागरण करो। भगवान प्रसन्न होंगे।” फिर उन्होंने रानी को व्रत की पूरी विधि बताई।
व्रत, जागरण और भगवान का दर्शन
जब अधिक मास आया, तब रानी पद्मिनी ने शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत पूरे नियम से किया। उन्होंने अन्न और जल दोनों का त्याग किया, भगवान की पूजा की और पूरी रात भजन-कीर्तन करते हुए जागरण किया।
उनकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान केशव गरुड़ पर सवार होकर प्रकट हुए और रानी से वर माँगने को कहा। रानी ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने हाथ जोड़कर कहा, “प्रभु, यह वरदान मेरे पति को दीजिए।”
वरदान और कार्तवीर्य अर्जुन का जन्म
भगवान ने राजा से कहा, “हे राजन, अधिक मास और उसकी एकादशी मुझे अत्यंत प्रिय है। तुम्हारी रानी ने यह व्रत किया है, इसलिए मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो।” राजा ने विनती की, “प्रभु, मुझे ऐसा पुत्र दीजिए जो सबका प्रिय हो, और जिसे देवता, दानव और मनुष्य कोई न हरा सके, केवल आपको छोड़कर।” भगवान ने “तथास्तु” कहा और अंतर्धान हो गए।
समय आने पर रानी पद्मिनी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया, जो कार्तवीर्य अर्जुन कहलाया। आगे चलकर वही सहस्रार्जुन (सहस्रबाहु) के नाम से प्रसिद्ध हुए और तीनों लोकों में उनके जैसा पराक्रमी कोई नहीं था। उन्होंने रावण को भी हरा दिया।
पुलस्त्य मुनि ने नारद जी से कहा, “देवर्षि, रावण की हार में कोई आश्चर्य नहीं। यह सब पद्मिनी एकादशी के व्रत का प्रभाव था।” श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि जो भक्त श्रद्धा से यह व्रत करता है और इसकी कथा सुनता या पढ़ता है, परंपरा के अनुसार वह भी भगवान की कृपा का भागी बनता है।
कथा के अलग-अलग रूप
- प्रश्न पूछने वाले: इस्कॉन और कई पाठों में युधिष्ठिर, जबकि कुछ हिंदी पाठों में अर्जुन।
- राजा का नाम: वंशावली में पिता का नाम कृतवीर्य और पुत्र का कार्तवीर्य अर्जुन है। कई एकादशी कथाओं में पिता को भी “कार्तवीर्य” लिखा गया है।
- रानियों की संख्या: अधिकतर पाठों में एक हज़ार, कुछ में सौ।
- रानी का नाम: अधिकतर पाठों में पद्मिनी। एक प्रसिद्ध हिंदी पाठ में उनका नाम प्रमदा मिलता है। दोनों में उन्हें राजा हरिश्चंद्र की पुत्री कहा गया है।
- अधिक मास का अंतराल: कुछ पाठों में अनसूया “बत्तीस महीने” कहती हैं, कुछ में “छत्तीस महीने”।
- व्रत किसने किया: अधिकतर पाठों में रानी ने, जबकि कुछ सरल पाठों में राजा-रानी दोनों ने तीन दिन (दशमी से द्वादशी) का नियम रखा।
पद्मिनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
नीचे दी गई विधि कथा में माता अनसूया द्वारा बताए नियमों और आज प्रचलित पूजा विधि पर आधारित है। अपनी शक्ति और परिस्थिति के अनुसार इसे अपनाएँ। भाव सबसे ज़रूरी है।
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार सादा, सात्विक भोजन करें। परंपरा में इस दिन उड़द, चना, मसूर, शहद, पालक जैसे साग, दूसरे के घर का भोजन और काँसे के बर्तन से परहेज़ बताया गया है।
- प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन बिल्कुल न लें।
- रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और संभव हो तो भूमि पर या सादे बिस्तर पर सोएँ।
- पूजा की सामग्री और पूजा स्थान पहले से तैयार कर लें।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में उठें और भगवान विष्णु का स्मरण करें।
- स्नान करें। संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें, नहीं तो घर में पानी में थोड़ा गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें। कथा पाठों में स्नान से पहले मिट्टी, तिल, कुश और आँवले के चूर्ण का प्रयोग भी बताया गया है।
- साफ़, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: “मैं (अपना नाम) अधिक मास शुक्ल पक्ष की पद्मिनी एकादशी का व्रत भगवान पुरुषोत्तम की प्रसन्नता के लिए अपनी शक्ति के अनुसार रखूँगा/रखूँगी।”
भगवान विष्णु (पुरुषोत्तम) की पूजा
- चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र रखें। कथा पाठों में राधा-कृष्ण और शिव-पार्वती दोनों की पूजा का भी उल्लेख है।
- पास में अनाज के ऊपर जल से भरा मिट्टी या ताँबे का कलश रखें, उस पर वस्त्र लपेटें और ऊपर पात्र रखें।
- भगवान को गंगाजल से स्नान कराएँ (या छींटे दें), फिर चंदन, रोली, अक्षत, पीले फूल और कमल (उपलब्ध हो तो) अर्पित करें।
- घी का दीपक और धूप जलाएँ। तुलसी दल के साथ फल, पंचामृत और मिठाई का भोग लगाएँ। तुलसी दल एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें और ऊपर दी गई व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और अंत में ओम जय जगदीश हरे की आरती करें।
शाम की पूजा और रात्रि जागरण
- शाम को फिर से दीपक जलाकर भगवान की आरती करें।
- पद्मिनी एकादशी में रात्रि जागरण का विशेष महत्व है, क्योंकि कथा में माता अनसूया ने व्रत के साथ जागरण भी बताया था। रात भर भजन, कीर्तन, नाम जप और कथा श्रवण करें।
- कथा पाठों में रात के चारों प्रहरों में भगवान को अलग-अलग फल चढ़ाने का नियम मिलता है। इसका विवरण नीचे “चार प्रहर का जागरण” वाले भाग में दिया गया है।
- पूरी रात जागना संभव न हो तो कम से कम आधी रात तक भजन करें। स्वास्थ्य से बढ़कर कोई नियम नहीं है।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें।
- किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और अपनी क्षमता से दान दें। कथा पाठों में पूजा में रखे कलश और प्रतिमा के दान का भी उल्लेख है।
- ऊपर दी गई तालिका में बताए पारण समय में तुलसी दल लेकर व्रत खोलें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की मूर्ति या चित्र
- चौकी और पीला कपड़ा
- मिट्टी या ताँबे का कलश, थोड़ा अनाज (कलश के नीचे के लिए)
- गंगाजल और शुद्ध जल
- तुलसी दल (दशमी को तोड़कर रखें)
- पीले फूल, कमल का फूल (उपलब्ध हो तो), फूलों की माला
- चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत (साबुत चावल)
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती, कपूर
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- मौसमी फल, जागरण के लिए नारियल, बेल फल, सीताफल या संतरा, सुपारी
- मिठाई या घर का बना सात्विक भोग
- पान का पत्ता, लौंग, इलायची
- विष्णु सहस्रनाम या व्रत कथा की पुस्तक
- दान के लिए अन्न, वस्त्र या दक्षिणा
पद्मिनी एकादशी के मंत्र
पद्मिनी एकादशी के लिए अलग से कोई प्राचीन विशेष मंत्र नहीं मिलता। इस दिन भगवान विष्णु के प्रसिद्ध मंत्रों का जप किया जाता है। अधिक मास के लिए एक प्रसिद्ध श्रीकृष्ण मंत्र भी है, जो नीचे दिया गया है। जो मंत्र कठिन लगे, उसकी जगह भगवान का नाम श्रद्धा से लेना भी पूरा भाव रखता है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: सभी प्राणियों में निवास करने वाले भगवान वासुदेव को नमस्कार है। यह बारह अक्षरों का मंत्र है और एकादशी तथा पूरे अधिक मास में सबसे अधिक जपा जाता है। संभव हो तो 108 बार माला से जप करें।
2. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम भगवान नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें। कथा में रानी ने सही मार्ग जानकर ही सफलता पाई, इसलिए सद्बुद्धि की यह प्रार्थना इस दिन बहुत सार्थक है।
3. विष्णु ध्यान मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं, जो आकाश की तरह व्यापक और मेघ जैसे श्याम वर्ण के हैं, जो लक्ष्मी के पति और कमल नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, जो संसार के भय को हरते हैं और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।
4. पुरुषोत्तम मास का श्रीकृष्ण मंत्र
गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्। गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्॥
अर्थ: गोवर्धन पर्वत को उठाने वाले, गायों के रक्षक, ग्वाले का रूप धरने वाले, गोकुल के आनंद, सबके स्वामी, गोविन्द और गोपियों के प्रिय श्रीकृष्ण को मैं प्रणाम करता हूँ। वैष्णव परंपरा में माना जाता है कि कौण्डिन्य मुनि अधिक मास में रोज़ इस मंत्र का जप करते थे, और कई भक्त पूरे पुरुषोत्तम मास में इसे प्रतिदिन जपते हैं।
पद्मिनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
कथा में रानी पद्मिनी ने बिना अन्न और जल के व्रत किया था, और माहात्म्य में भी निर्जला व्रत को श्रेष्ठ बताया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि जो ऐसा न कर सके, वह जल, दूध या हल्का फलाहार ले सकता है। इसलिए व्रत अपनी उम्र, स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार चुनें।
क्या खा सकते हैं
- मौसमी फल, जैसे केला, सेब, पपीता, अनार, संतरा, खरबूजा (मार्च-अप्रैल में आसानी से मिलते हैं)
- दूध, दही, छाछ, मखाना
- साबूदाना, कुट्टू (बकव्हीट) या सिंघाड़े के आटे से बनी चीज़ें
- उबला आलू, शकरकंद, अरबी
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
- नारियल पानी, नींबू पानी, सूखे मेवे
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़
- गेहूँ, जौ, मक्का जैसे अनाज और सभी दालें
- प्याज़, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और मदिरा
- सामान्य (आयोडीन वाला) नमक, यदि आप फलाहारी व्रत रख रहे हैं
- बहुत तला-भुना और भारी भोजन, ताकि जागरण में आलस न आए
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक न अन्न लिया जाता है, न जल। यह सबसे कठोर व्रत है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे रखें। मार्च-अप्रैल में गर्मी शुरू हो जाती है, इसलिए शरीर में पानी की कमी का ध्यान रखें। चक्कर या कमज़ोरी लगे तो पानी पी लें।
फलाहार व्रत
अधिकतर गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं। इसमें अन्न नहीं लिया जाता, पर फल, दूध, जल और व्रत के अनुकूल चीज़ें ली जाती हैं। रात्रि जागरण करना हो तो दिन में थोड़ा-थोड़ा फलाहार लेते रहना शरीर के लिए अच्छा रहता है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरे दिन उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार सात्विक व्रत भोजन कर सकते हैं, जैसे साबूदाना खिचड़ी या कुट्टू की रोटी और आलू की सब्ज़ी। इसमें भी चावल, अनाज और दालें नहीं ली जातीं।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, दिल या किडनी की बीमारी वाले लोग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे और नियमित दवा लेने वाले लोग कोई भी कठोर व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह लें। दवा न छोड़ें। ऐसे लोग फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखकर भी पूरी श्रद्धा से पूजा कर सकते हैं।
पद्मिनी एकादशी पारण कब और कैसे करें
एकादशी व्रत का समापन, यानी पारण, उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है जितना व्रत। पारण के मुख्य नियम ये हैं:
- पारण द्वादशी तिथि के भीतर ही करें। द्वादशी समाप्त होने के बाद पारण करना ठीक नहीं माना जाता।
- हरि वासर (द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग) में पारण नहीं किया जाता। हरि वासर समाप्त होने का इंतज़ार करें।
- पारण के लिए सुबह का समय (प्रातःकाल) सबसे अच्छा माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है।
- स्मार्त और वैष्णव पारण समय कभी-कभी अलग हो सकते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार चलें।
सही पारण समय अपने शहर के सूर्योदय पर निर्भर करता है। इसलिए अनुमान न लगाएँ, ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर का पारण समय देखें।
पारण कैसे करें
- सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
- किसी ब्राह्मण, गरीब या गाय को भोजन दें।
- सबसे पहले तुलसी दल या भगवान का प्रसाद लेकर व्रत खोलें।
- फिर हल्का, सात्विक भोजन करें। निर्जला व्रत के बाद पहले थोड़ा पानी या नींबू पानी लें और फिर धीरे-धीरे भोजन करें।
पद्मिनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- भगवान विष्णु के पुरुषोत्तम रूप की पूजा करें और व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का पाठ करें।
- रात में जागरण करें या कम से कम कुछ घंटे भजन-कीर्तन करें।
- तुलसी दल से पूजा करें और शाम को तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
- अन्न, वस्त्र, फल, घी या जल का दान करें। गर्मी का मौसम हो तो प्याऊ या ठंडे पानी का दान अच्छा विकल्प है।
- मन, वचन और कर्म से सत्य, शांति और संयम बनाए रखें।
- संतान की कामना हो तो पति-पत्नी साथ मिलकर पूजा करें।
क्या न करें
- चावल, अनाज, दालें और तामसिक भोजन न लें।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें। ज़रूरत हो तो दशमी को ही तोड़कर रख लें।
- क्रोध, झूठ, निंदा, कटु वचन और झगड़े से बचें।
- दिन में सोने से बचें, खासकर यदि आप जागरण कर रहे हैं।
- किसी का अपमान न करें और किसी के दिए अन्न पर निर्भर न रहें।
- बीमारी में ज़बरदस्ती निर्जला व्रत न रखें।
- अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे नए मांगलिक कार्यों की शुरुआत न करें।
पद्मिनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से संतान निश्चित रूप से हो जाती है।
सच्चाई: कथा में रानी पद्मिनी को व्रत के बाद पुत्र मिला, इसलिए भक्त संतान की कामना से यह व्रत रखते हैं। पर परंपरा इसे भगवान की कृपा की प्रार्थना मानती है, कोई गारंटी नहीं। संतान से जुड़ी किसी भी स्वास्थ्य समस्या में डॉक्टर की सलाह लें। आस्था और इलाज साथ-साथ चल सकते हैं।
मिथक: अधिक मास अशुभ है, इसलिए इसमें पूजा-पाठ भी नहीं करना चाहिए।
सच्चाई: परंपरा में अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश जैसे नए मांगलिक कार्य टाले जाते हैं। पर पूजा, जप, व्रत, दान और कथा श्रवण के लिए इसे सबसे श्रेष्ठ महीना माना गया है, क्योंकि भगवान विष्णु ने स्वयं इसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” दिया।
मिथक: केवल निर्जला व्रत से ही पद्मिनी एकादशी का फल मिलता है।
सच्चाई: माहात्म्य में निर्जला व्रत को श्रेष्ठ कहा गया है, पर साथ ही यह भी कहा गया है कि जो ऐसा न कर सके, वह जल या हल्का आहार ले सकता है। परंपरा भाव और नियम को महत्व देती है, शरीर को कष्ट देने को नहीं।
मिथक: पूरी रात जागरण न कर पाए तो व्रत बेकार हो जाता है।
सच्चाई: कथा में जागरण का विशेष महत्व बताया गया है और हर प्रहर के जागरण का अलग फल कहा गया है। इसका अर्थ यही है कि जितना हो सके, उतना जागरण भी पुण्य देता है। बुज़ुर्ग, बीमार या अगले दिन काम पर जाने वाले लोग अपनी क्षमता के अनुसार भजन करें।
मिथक: पद्मिनी एकादशी हर साल आती है, बस नाम बदल जाता है।
सच्चाई: पद्मिनी एकादशी केवल उसी वर्ष आती है जिसमें अधिक मास हो। बाकी वर्षों में यह नहीं आती। इसी तरह परमा एकादशी भी केवल अधिक मास में आती है।
मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और कुछ बुरा होगा।
सच्चाई: भूल से कुछ खा लेने पर डरने की ज़रूरत नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें और बाकी व्रत श्रद्धा से पूरा करें। परंपरा में भगवान को भाव का भूखा कहा गया है, सज़ा देने वाला नहीं।
मिथक: व्रत से शरीर पूरी तरह “डिटॉक्स” हो जाता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।
सच्चाई: एकादशी व्रत मूल रूप से एक आध्यात्मिक साधना है, कोई इलाज नहीं। इसके स्वास्थ्य लाभ के बारे में कोई पक्का दावा न करें। जिन्हें कोई बीमारी है या जो दवा लेते हैं, वे डॉक्टर की सलाह से ही कठोर व्रत रखें।
अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) क्या है?
पद्मिनी एकादशी को समझने के लिए अधिक मास को समझना ज़रूरी है, क्योंकि यह एकादशी इसी महीने में आती है।
अधिक मास क्यों आता है
हिंदू पंचांग चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति पर चलता है। बारह चंद्र महीनों का एक वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिन का। यानी हर साल करीब 11 दिन का अंतर बनता है। यह अंतर लगभग तीन साल में एक महीने के बराबर हो जाता है।
इस अंतर को संतुलित करने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त चंद्र महीना जोड़ा जाता है। इसी से हमारे त्योहार ऋतुओं के साथ बने रहते हैं, जैसे होली वसंत में और दीपावली शरद ऋतु के बाद। औसतन यह लगभग हर साढ़े बत्तीस महीने में एक बार होता है।
अधिक मास का नाम कैसे तय होता है
सामान्य रूप से हर चंद्र महीने में सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में जाता है, जिसे संक्रांति कहते हैं। जिस चंद्र महीने (अमावस्या से अमावस्या) में कोई संक्रांति नहीं होती, वही अधिक मास कहलाता है।
अधिक मास का नाम उसके बाद आने वाले सामान्य महीने के नाम पर रखा जाता है। पहले अधिक महीना आता है और फिर उसी नाम का “निज” या “शुद्ध” महीना। जैसे 2026 में पहले अधिक ज्येष्ठ आया और फिर निज ज्येष्ठ। 2029 में पहले अधिक चैत्र होगा और फिर निज चैत्र।
मलमास से पुरुषोत्तम मास बनने की कथा
परंपरा के अनुसार हर महीने का एक स्वामी देवता है, पर यह अतिरिक्त महीना बिना स्वामी के था। इसे “मलमास” कहकर शुभ कार्यों के योग्य नहीं माना गया और कोई देवता इसका स्वामी बनने को तैयार नहीं हुआ। दुखी होकर यह महीना भगवान विष्णु की शरण में गया।
भगवान विष्णु ने इसे स्वीकार किया और अपना नाम “पुरुषोत्तम” दे दिया। उन्होंने कहा कि इस महीने में किए गए जप, तप, दान और भक्ति का फल कई गुना होगा। तभी से इसे पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। “पुरुषोत्तम” का अर्थ है सभी पुरुषों (जीवों) में उत्तम, यानी परमात्मा। भगवद्गीता का पंद्रहवाँ अध्याय भी “पुरुषोत्तम योग” कहलाता है, और कई भक्त इस महीने में इसका रोज़ पाठ करते हैं।
कुछ क्षेत्रों में इसे “लौंद” या “लोंद मास” भी कहा जाता है।
अधिक मास में क्या करें, क्या न करें
- करें: भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की पूजा, जप, भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और विष्णु सहस्रनाम का पाठ, दीपदान, तीर्थ स्नान, दान, सात्विक भोजन और सेवा।
- न करें: विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ जैसे नए मांगलिक संस्कार, नया घर बनवाना या नए बड़े काम की शुरुआत। बीमारी का इलाज, कर्ज़ चुकाना जैसे ज़रूरी काम परंपरा में भी रोके नहीं जाते।
पिछले और अगले अधिक मास
पिछले कुछ वर्षों में 2020 में अधिक आश्विन, 2023 में अधिक श्रावण और 2026 में अधिक ज्येष्ठ (17 मई से 15 जून) आया था। अगला अधिक मास 2029 में अधिक चैत्र होगा। इसलिए अगली पद्मिनी एकादशी 2029 में आएगी।
पद्मिनी एकादशी पर चार प्रहर का जागरण
पद्मिनी एकादशी की एक खास बात इसका रात्रि जागरण है। कथा पाठों के अनुसार रात को चार प्रहरों (लगभग तीन-तीन घंटे के भाग) में बाँटकर हर प्रहर में भगवान को एक फल अर्पित किया जाता है, और हर प्रहर के जागरण का अलग पुण्य बताया गया है।
| प्रहर | अर्पण (कथा पाठों के अनुसार) | मान्य फल |
|---|---|---|
| पहला प्रहर | नारियल | अग्निष्टोम (अग्निहोत्र) यज्ञ के समान |
| दूसरा प्रहर | बेल फल | वाजपेय यज्ञ के समान |
| तीसरा प्रहर | सीताफल या संतरा | अश्वमेध यज्ञ के समान |
| चौथा प्रहर | सुपारी (कुछ पाठों में संतरा भी) | राजसूय यज्ञ के समान |
अलग-अलग पाठों में फलों के क्रम में थोड़ा अंतर है, इसलिए जो फल उपलब्ध हो, उसे श्रद्धा से अर्पित करें। हर प्रहर की शुरुआत में दीपक की आरती करें और बीच-बीच में नाम जप, भजन और कथा का पाठ करें।
पद्मिनी और परमा एकादशी में अंतर
अधिक मास की दोनों एकादशियाँ अक्सर एक साथ खोजी जाती हैं। इनका अंतर इस तालिका में देखें:
| बिंदु | पद्मिनी एकादशी | परमा एकादशी |
|---|---|---|
| पक्ष | अधिक मास का शुक्ल पक्ष | अधिक मास का कृष्ण पक्ष |
| क्रम | पहले आती है | लगभग पंद्रह दिन बाद आती है |
| कथा | राजा कृतवीर्य, रानी पद्मिनी, माता अनसूया | ब्राह्मण सुमेधा, पत्नी पवित्रा, कौण्डिन्य मुनि |
| मुख्य कामना | संतान, पाप मुक्ति | दरिद्रता दूर होना, पाप मुक्ति |
| विशेष नियम | चार प्रहर का जागरण | पंचरात्रि व्रत की परंपरा |
पद्मिनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
परंपरा और कथा के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत श्रद्धा से करने पर ये फल माने जाते हैं। इन्हें आस्था के रूप में देखें, किसी गारंटी के रूप में नहीं:
- जाने-अनजाने हुए पापों से मुक्ति की मान्यता।
- संतान की कामना रखने वाले दंपती को भगवान की कृपा मिलने की आस्था।
- माहात्म्य के अनुसार यह व्रत अनेक यज्ञ, तप, दान और तीर्थ यात्राओं से भी बढ़कर फल देने वाला कहा गया है।
- अधिक मास में की गई भक्ति का फल कई गुना होने की मान्यता।
- मन में शांति, संयम और भक्ति का भाव बढ़ना।
- परंपरा के अनुसार अंत में भगवान विष्णु के धाम (वैकुंठ) की प्राप्ति।
संबंधित एकादशी और पाठ
पद्मिनी एकादशी के लगभग पंद्रह दिन बाद अधिक मास के कृष्ण पक्ष में परमा एकादशी आती है, जिसकी कथा ब्राह्मण सुमेधा और उनकी पत्नी पवित्रा की है। माता अनसूया ने भी रानी पद्मिनी को इन दोनों एकादशियों के बारे में बताया था। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।
इस दिन की पूजा और जागरण के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।
पद्मिनी एकादशी हमें सिखाती है कि जब हमारे प्रयास थक जाएँ, तब विनम्रता से सही मार्ग पूछना और प्रेम से भगवान की शरण लेना नई राह खोल देता है। यह अवसर लगभग तीन साल में एक बार आता है, इसलिए इस दिन एक दीपक जलाएँ, कुछ समय नाम जप में बिताएँ और किसी ज़रूरतमंद की सेवा करें। भगवान पुरुषोत्तम आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
पद्मिनी एकादशी कब है 2029 में?
पद्मिनी एकादशी 2026 (मई के अंत में) बीत चुकी है और 2027 व 2028 में अधिक मास नहीं है। अगली पद्मिनी एकादशी की तारीख, तिथि और आपके शहर का पारण समय इस पेज पर ऊपर दिए संक्षिप्त उत्तर और तारीख तालिका में देखें।
पद्मिनी एकादशी किस महीने में आती है?
यह अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। जिस साल जो महीना अधिक होता है, उसी में यह आती है, जैसे 2026 में अधिक ज्येष्ठ और 2029 में अधिक चैत्र।
पद्मिनी एकादशी हर साल क्यों नहीं आती?
क्योंकि यह केवल अधिक मास में आती है, और अधिक मास लगभग हर 32 से 33 महीने में एक बार जुड़ता है। इसलिए यह एकादशी लगभग तीन साल में एक बार आती है।
अधिक मास या पुरुषोत्तम मास क्या है?
चंद्र वर्ष सौर वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा होता है। यह अंतर पूरा करने के लिए लगभग तीन साल में एक अतिरिक्त चंद्र महीना जोड़ा जाता है, जिसमें कोई संक्रांति नहीं होती। भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम दिया, इसलिए इसे पुरुषोत्तम मास कहते हैं।
पद्मिनी एकादशी को कमला एकादशी क्यों कहते हैं?
कई पंचांगों में अधिक मास की शुक्ल एकादशी को कमला एकादशी भी कहा जाता है। पद्मिनी और कमला दोनों शब्द कमल से जुड़े हैं। कुछ पंचांग यह नाम अधिक मास की दोनों एकादशियों के लिए भी इस्तेमाल करते हैं।
पद्मिनी एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु की पुरुषोत्तम रूप में पूजा की जाती है। कई भक्त श्रीकृष्ण या लड्डू गोपाल की पूजा करते हैं, और कथा पाठों में शिव-पार्वती की पूजा का भी उल्लेख मिलता है।
पद्मिनी एकादशी की व्रत कथा संक्षेप में क्या है?
माहिष्मती के संतानहीन राजा कृतवीर्य ने गंधमादन पर्वत पर दस हज़ार वर्ष तप किया, पर फल नहीं मिला। तब रानी पद्मिनी ने माता अनसूया के बताने पर अधिक मास की शुक्ल एकादशी का व्रत और जागरण किया, और भगवान विष्णु की कृपा से उन्हें कार्तवीर्य अर्जुन जैसा पुत्र मिला।
रानी पद्मिनी कौन थीं?
कथा के अनुसार वे सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की पुत्री और माहिष्मती के राजा कृतवीर्य की रानी थीं। उन्होंने ही सबसे पहले यह व्रत किया, इसलिए एकादशी का नाम पद्मिनी पड़ा। एक हिंदी पाठ में उनका नाम प्रमदा भी मिलता है।
पद्मिनी एकादशी का वर्णन किस पुराण में है?
परंपरा के अनुसार इसकी कथा स्कंद पुराण से जुड़ी मानी जाती है, जिसमें श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को इसका माहात्म्य सुनाते हैं। कुछ पाठ इसे भविष्योत्तर पुराण से जोड़ते हैं।
क्या पद्मिनी एकादशी का व्रत संतान प्राप्ति के लिए रखा जाता है?
हाँ, कथा में रानी को इसी व्रत के बाद पुत्र मिला, इसलिए कई दंपती संतान की कामना से यह व्रत रखते हैं। इसे भगवान की कृपा की प्रार्थना मानें, गारंटी नहीं, और स्वास्थ्य संबंधी समस्या में डॉक्टर की सलाह भी लें।
पद्मिनी एकादशी पर क्या खाएँ?
फलाहार व्रत में फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक ले सकते हैं। चावल, अनाज, दालें, प्याज़ और लहसुन नहीं लिए जाते।
क्या पद्मिनी एकादशी पर पानी पी सकते हैं?
कथा में रानी ने निर्जला व्रत किया था, पर माहात्म्य में ही कहा गया है कि जो ऐसा न कर सके, वह जल या दूध ले सकता है। अपनी सेहत के अनुसार चुनें। मार्च-अप्रैल की गर्मी में पानी की कमी न होने दें।
क्या पद्मिनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं। सभी एकादशियों की तरह इस दिन भी चावल और चावल से बनी चीज़ें वर्जित मानी जाती हैं, चाहे आप कोई भी व्रत रखें।
पद्मिनी एकादशी का पारण कब करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि के भीतर, हरि वासर समाप्त होने के बाद, सुबह के समय करें। अपने शहर का सही पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।
पद्मिनी एकादशी पर जागरण कैसे करें?
रात को भजन, कीर्तन, नाम जप और कथा के साथ जागें। कथा पाठों में चार प्रहरों में क्रम से नारियल, बेल, सीताफल या संतरा और सुपारी अर्पित करने का नियम मिलता है। पूरी रात न जाग सकें तो क्षमता के अनुसार करें।
पद्मिनी एकादशी पर कौन-सा मंत्र जपें?
सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है। विष्णु गायत्री मंत्र और पुरुषोत्तम मास का मंत्र “गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्…” भी जपा जाता है।
स्मार्त और वैष्णव पद्मिनी एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो दिन के सूर्योदय को छूती है या दशमी से मिलती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) व्रत अलग दिन हो सकते हैं। 2029 में दोनों का दिन एक ही बताया गया है। अपनी परंपरा के अनुसार तालिका देखें।
पद्मिनी और परमा एकादशी में क्या अंतर है?
दोनों अधिक मास में आती हैं। पद्मिनी शुक्ल पक्ष में पहले आती है और इसकी कथा रानी पद्मिनी की है, जबकि परमा कृष्ण पक्ष में लगभग पंद्रह दिन बाद आती है और इसकी कथा ब्राह्मण सुमेधा और पवित्रा की है।
गर्भवती महिलाएँ या बुज़ुर्ग पद्मिनी एकादशी का व्रत कैसे रखें?
वे निर्जला व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत रखें, दवाएँ न छोड़ें और पूजा, कथा व नाम जप से व्रत का भाव पूरा करें।
अगर गलती से व्रत टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, नाम जप करें और बाकी दिन संयम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को सबसे बड़ा माना गया है।