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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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Ekadashi

परिवर्तिनी एकादशी कब है? (Parivartini Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण, मंत्र और डोल ग्यारस

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिसे पार्श्व एकादशी, पद्मा एकादशी, वामन एकादशी, जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। परंपरा के अनुसार चातुर्मास में योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु इसी दिन करवट बदलते हैं, इसलिए इसे “परिवर्तिनी” कहा जाता है।

इस एकादशी की व्रत कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और दानवीर राजा बलि की है। इस दिन भगवान वामन की पूजा का विशेष विधान है। मान्यता है कि वामन रूप की पूजा करने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों की पूजा का फल मिलता है।

राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में यह दिन एक बड़े उत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। मंदिरों से ठाकुर जी के डोल और पालकियाँ निकलती हैं और उन्हें नदी, तालाब या कुंड पर जल विहार कराया जाता है। इस लेख में आप परिवर्तिनी एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, व्रत के नियम और डोल ग्यारस की परंपराएँ विस्तार से जानेंगे।

परिवर्तिनी एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

त्वरित उत्तर: परिवर्तिनी एकादशी 2026 (22 सितंबर) बीत चुकी है। अगली परिवर्तिनी एकादशी शनिवार, 11 सितंबर 2027 को है। नई दिल्ली के अनुसार एकादशी तिथि 10 सितंबर 2027 को शाम लगभग 5:00 बजे से 11 सितंबर को शाम लगभग 7:35 बजे तक रहेगी। पारण 12 सितंबर 2027 को सुबह लगभग 6:04 से 8:33 बजे के बीच होगा। अपने शहर का सटीक समय नीचे दी गई तालिका में देखें।

अगली परिवर्तिनी एकादशी

परिवर्तिनी एकादशी 2027

11 सितंबर 2027, शनिवार 314 दिन बाकी

मास और पक्ष
भाद्रपद शुक्ल
एकादशी तिथि
10 सितं 17:02 – 11 सितं 19:37
पारण (व्रत खोलने का समय)
12 सितं, 06:04 – 08:33
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202622 सितंबर 2026, मंगलवार21 सितं 20:02 –
22 सितं 21:44
23 सितं, 06:09 – 08:35
202711 सितंबर 2027, शनिवार10 सितं 17:02 –
11 सितं 19:37
12 सितं, 06:04 – 08:33
202830 अगस्त 2028, बुधवार29 अग 19:33 –
30 अग 20:49
31 अग, 05:58 – 08:31
202918 सितंबर 2029, मंगलवार17 सितं 17:15 –
18 सितं 17:25
19 सितं, 06:08 – 08:34

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का समय ज़रूर देखें, क्योंकि सूर्योदय के साथ समय बदल जाता है। जब एकादशी तिथि दो दिन तक फैलती है, तब स्मार्त (गृहस्थ) पहले दिन और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। वर्ष 2027 में भारत में दोनों परंपराओं का व्रत एक ही दिन बताया गया है, फिर भी विदेश में रहने वाले भक्त तालिका ज़रूर देखें।

परिवर्तिनी एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“परिवर्तिनी” नाम का अर्थ

“परिवर्तन” का अर्थ है बदलना या घूमना। देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में चले जाते हैं। मान्यता है कि लगभग दो महीने बाद, भाद्रपद शुक्ल एकादशी को, वे सोते हुए करवट बदलते हैं। इसी “करवट बदलने” यानी परिवर्तन के कारण यह परिवर्तिनी एकादशी कहलाती है।

“पार्श्व” का अर्थ है बगल या करवट। इसलिए “पार्श्व एकादशी” और “परिवर्तिनी एकादशी” दोनों नाम एक ही भाव बताते हैं: वह एकादशी जब भगवान एक करवट से दूसरी करवट लेते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी के अन्य नाम

  • पार्श्व एकादशी (Parsva / Parshva Ekadashi): दक्षिण भारत, इस्कॉन और कई पंचांगों में यही नाम प्रचलित है।
  • वामन एकादशी (Vamana Ekadashi): इस दिन भगवान के वामन रूप की पूजा होती है और कथा भी वामन अवतार की है।
  • पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi): कई पंचांगों में यह नाम भी मिलता है। ध्यान रखें कि आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी को भी पद्मा एकादशी कहा जाता है, इसलिए दोनों को लेकर भ्रम न करें।
  • जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi): व्रत कथा में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं इसे जयंती एकादशी भी कहते हैं, जो पापों पर विजय दिलाने वाली मानी जाती है।
  • जलझूलनी एकादशी (Jaljhulni Ekadashi): राजस्थान में यही नाम सबसे प्रचलित है।
  • डोल ग्यारस (Dol Gyaras / Dhol Gyaras): मध्य प्रदेश और मालवा क्षेत्र में, जहाँ भगवान के डोल निकाले जाते हैं।

पूर्णिमांत और अमांत पंचांग में महीना

उत्तर भारत में पूर्णिमांत पंचांग चलता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत में अमांत पंचांग चलता है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। कृष्ण पक्ष की एकादशियों में इन दोनों पंचांगों में महीने का नाम अलग हो जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी शुक्ल पक्ष में आती है, इसलिए दोनों पंचांगों में इसका नाम भाद्रपद शुक्ल एकादशी ही रहता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर में पड़ती है। यह गणेश चतुर्थी के लगभग सात दिन बाद और अनंत चतुर्दशी से तीन दिन पहले आती है।

परिवर्तिनी एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

व्रत कथा में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से पाप नष्ट होते हैं। परंपरा के अनुसार इस दिन जो भक्त भगवान वामन की पूजा करता है, उसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों की पूजा का फल मिलता है। कई पंचांगों में इस व्रत का फल वाजपेय यज्ञ के समान बताया गया है।

यह एकादशी चातुर्मास के बीच में आती है, जो जप, तप, दान और संयम का सबसे पवित्र समय माना जाता है। इसलिए इस समय किए गए व्रत और पूजा का पुण्य विशेष माना गया है। इस्कॉन परंपरा में इस दिन दही मिले चावल और यथाशक्ति चाँदी का दान करने का विधान बताया गया है।

आध्यात्मिक संदेश

परिवर्तिनी एकादशी का पहला संदेश है परिवर्तन। जिस तरह भगवान करवट बदलते हैं, उसी तरह यह दिन हमें अपने स्वभाव और आदतों में अच्छा बदलाव लाने की प्रेरणा देता है। चातुर्मास के बीच का यह पड़ाव अपने संकल्पों को फिर से मज़बूत करने का अवसर है।

दूसरा संदेश है दान के साथ विनम्रता। राजा बलि महादानी थे, पर उनके मन में अपनी शक्ति और दान का अहंकार आ गया था। जब उन्होंने अपना सिर भगवान के चरणों में रख दिया, तब वही अहंकार समर्पण में बदल गया। कथा सिखाती है कि दान तभी पूरा होता है, जब देने वाले के मन में “मैं दे रहा हूँ” का घमंड न रहे।

तीसरा संदेश है वचन का पालन। गुरु के मना करने के बाद भी बलि ने अपना वचन नहीं तोड़ा, और भगवान ने भी बलि को दिया वचन निभाया। इसलिए यह एकादशी भक्त और भगवान के बीच आपसी विश्वास का प्रतीक भी है।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में भगवान श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है। इस्कॉन परंपरा भी यही स्रोत बताती है। कुछ स्रोत इसे पद्म पुराण से जोड़ते हैं, जबकि अधिकतर हिंदी कथा पाठ केवल “पुराणों में” कहकर कथा सुनाते हैं।

वामन अवतार और राजा बलि की विस्तृत कथा मुख्य रूप से श्रीमद्भागवत पुराण के आठवें स्कंध में मिलती है। एकादशी की व्रत कथा उसी प्रसंग को संक्षेप में सुनाकर उसे इस दिन के करवट बदलने से जोड़ती है।

चातुर्मास में भगवान विष्णु का करवट बदलना

योगनिद्रा क्या है?

पुराणों में बताया गया है कि भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में रहते हैं। योगनिद्रा साधारण नींद नहीं है। यह भगवान की वह अवस्था है जिसमें वे बाहर से विश्राम करते दिखते हैं, पर भीतर से पूरे जगत के प्रति सजग रहते हैं।

देवशयनी से देवउठनी तक

आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी को भगवान योगनिद्रा में जाते हैं और यहीं से चातुर्मास शुरू होता है। भाद्रपद शुक्ल की परिवर्तिनी एकादशी को वे करवट बदलते हैं। फिर कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी को वे जागते हैं और चातुर्मास समाप्त होता है।

इस तरह परिवर्तिनी एकादशी चातुर्मास का बीच का पड़ाव है। भक्त इसे इस बात का संकेत मानते हैं कि भगवान के जागने का समय निकट आ रहा है, इसलिए अपने व्रत और नियमों को और श्रद्धा से निभाना चाहिए।

बलि को दिया वचन

व्रत कथा के अनुसार राजा बलि को दिए वचन के कारण भगवान का एक रूप पाताल में बलि के पास रहता है और दूसरा रूप क्षीरसागर में शेषनाग पर शयन करता है। इसी कथा से इस दिन के करवट बदलने का संबंध जोड़ा जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

प्रश्न और उत्तर

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे जनार्दन, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? उसका व्रत कैसे किया जाता है और उसका क्या फल है? कृपा करके विस्तार से बताइए।” (कुछ कथा पाठों में यह प्रश्न अर्जुन पूछते हैं।)

भगवान श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन, इस एकादशी को परिवर्तिनी और जयंती एकादशी कहते हैं। इसकी कथा सुनने मात्र से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस दिन मेरे वामन रूप की पूजा करने वाले को ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों की पूजा का फल मिलता है। इसी दिन मैं शयन करते हुए करवट बदलता हूँ।”

युधिष्ठिर ने आश्चर्य से पूछा, “हे प्रभु, आप कैसे सोते हैं और कैसे करवट बदलते हैं? आपने राजा बलि को क्यों बाँधा और वामन रूप में क्या लीला की? यह सब मुझे बताइए।”

दानवीर राजा बलि

श्रीकृष्ण ने कहा, “त्रेता युग में बलि नाम का एक दैत्य राजा था। वह दैत्य कुल में जन्मा था, पर मेरा परम भक्त था। वह प्रतिदिन वैदिक मंत्रों से मेरी पूजा करता, ब्राह्मणों का आदर करता, यज्ञ करता और बड़ा दानी था। सत्य बोलना उसका स्वभाव था।”

“अपने तप और पुण्य के बल पर बलि ने इंद्र से युद्ध किया और उन्हें हराकर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवता अपने लोक से बाहर हो गए। तब इंद्र सब देवताओं और देवगुरु बृहस्पति को साथ लेकर मेरे पास आए और वैदिक स्तुतियों से मेरी प्रार्थना की। उनकी विनती सुनकर मैंने उनकी सहायता का वचन दिया।”

वामन रूप और तीन पग भूमि

“तब मैंने अपना पाँचवाँ अवतार लिया और एक छोटे, तेजस्वी ब्राह्मण बालक (वामन) का रूप धारण किया। मैं राजा बलि के यज्ञ में पहुँचा और उससे केवल तीन पग भूमि का दान माँगा। मैंने कहा, ‘हे राजन, मुझे बस तीन पग भूमि दे दो। इससे तुम्हें तीनों लोकों के दान का फल मिलेगा।'”

“बलि ने यह छोटी-सी माँग तुरंत स्वीकार कर ली और संकल्प कर दिया।” (कुछ कथाओं में बताया गया है कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वामन को पहचानकर बलि को दान देने से रोका था, पर बलि अपने वचन से पीछे नहीं हटे।)

विराट रूप का दर्शन

“संकल्प होते ही मैंने अपना शरीर बढ़ाना शुरू किया। मेरा विराट रूप भूलोक से लेकर ऊपर के सब लोकों तक फैल गया और मेरा मस्तक सत्यलोक तक पहुँच गया। सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र, इंद्र और सब देवता मेरी स्तुति करने लगे।”

“मैंने एक पग में पूरी पृथ्वी नाप ली और दूसरे पग में स्वर्ग और ऊपर के लोक। फिर मैंने बलि से पूछा, ‘राजन, दो पग में ही सब नप गया। अब तीसरा पग कहाँ रखूँ?'”

बलि का समर्पण

“बलि समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान हैं। उन्होंने हाथ जोड़कर अपना सिर झुका दिया और कहा, ‘प्रभु, तीसरा पग मेरे सिर पर रखिए।’ मैंने तीसरा पग उनके सिर पर रखा और देवताओं के हित के लिए उन्हें पाताल लोक भेज दिया।”

“बलि के इस समर्पण और भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न हुआ। जब बलि ने विनम्र होकर मुझसे कृपा माँगी, तो मैंने उन्हें वचन दिया कि मैं सदा तुम्हारे पास रहूँगा।” (भागवत परंपरा के अनुसार बलि को सुतल लोक का राजा बनाया गया।)

भगवान के दो रूप और करवट बदलना

“इसी वचन के कारण भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन बलि के आश्रम में मेरी एक मूर्ति स्थापित हुई। मेरा एक रूप बलि के पास पाताल में रहता है और दूसरा रूप क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर शयन करता है। इसी एकादशी को मैं शयन करते हुए करवट बदलता हूँ। इसलिए इसका नाम परिवर्तिनी पड़ा।”

व्रत का विधान और फल

श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “हे राजन, इस दिन तीनों लोकों के स्वामी भगवान त्रिलोकीनाथ (वामन) की पूजा करनी चाहिए। यथाशक्ति चाँदी के साथ चावल और दही का दान करना चाहिए और रात में जागरण करना चाहिए। जो व्यक्ति विधिपूर्वक यह व्रत करता है, वह पापों से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है।”

“जो इस पाप नाशक कथा को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है।” इस प्रकार परिवर्तिनी एकादशी की कथा पूरी होती है।

कथा से सीख

कथा-सार में यह भी कहा जाता है कि दान देने के बाद उसका घमंड नहीं करना चाहिए। बलि का पतन उनके अहंकार के कारण हुआ और उद्धार उनके समर्पण के कारण। भगवान ने बलि को दंड नहीं, बल्कि अपना सान्निध्य दिया। यही इस कथा का सबसे सुंदर पक्ष है।

वामन अवतार और राजा बलि: कुछ और जानकारी

वामन भगवान विष्णु के दस अवतारों में पाँचवें अवतार हैं और मानव रूप में आने वाले पहले अवतार माने जाते हैं। परंपरा के अनुसार उनका जन्म माता अदिति और महर्षि कश्यप के यहाँ हुआ। राजा बलि भक्त प्रह्लाद के पौत्र थे, इसलिए भक्ति उनके कुल की परंपरा थी।

परिवर्तिनी एकादशी और वामन जयंती

परिवर्तिनी एकादशी के अगले दिन, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को वामन जयंती (वामन द्वादशी) मनाई जाती है। यदि इस द्वादशी पर श्रवण नक्षत्र हो, तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। इसलिए बहुत से भक्त एकादशी का व्रत रखकर द्वादशी को वामन जयंती की पूजा के साथ पारण करते हैं।

वामन जयंती पर वामन भगवान की सोने या मिट्टी की प्रतिमा की पूजा, कथा पाठ और चावल, दही व मिश्री के दान की परंपरा बताई जाती है। इस तरह ये दोनों दिन मिलकर वामन अवतार का उत्सव बन जाते हैं।

ओणम और बलि प्रतिपदा से संबंध

मान्यता है कि भगवान ने बलि को वर्ष में एक बार अपनी प्रजा से मिलने आने का वरदान दिया। केरल में राजा महाबलि के इसी आगमन को ओणम के रूप में मनाया जाता है, और देश के कई हिस्सों में दीपावली के अगले दिन बलि प्रतिपदा मनाई जाती है। इससे पता चलता है कि बलि को भारत में दैत्य नहीं, बल्कि दानी और भक्त राजा के रूप में याद किया जाता है।

माता लक्ष्मी द्वारा बलि को भाई बनाकर भगवान को वापस माँगने की लोक-कथा हमारे देवशयनी एकादशी लेख में है।

जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस: क्षेत्रीय परंपराएँ

उत्तर और पश्चिम भारत में परिवर्तिनी एकादशी केवल व्रत का दिन नहीं, बल्कि एक बड़ा लोक-उत्सव भी है। राजस्थान में इसे जलझूलनी एकादशी और मध्य प्रदेश में डोल ग्यारस कहते हैं। दोनों के केंद्र में भगवान श्रीकृष्ण (ठाकुर जी) का जल विहार है।

जलझूलनी नाम क्यों पड़ा?

एक प्रचलित मान्यता है कि इसी दिन माता यशोदा ने बालकृष्ण के वस्त्र धोए थे और उन्हें स्नान कराया था। इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी कहा जाता है। “जल” और “झूलनी” मिलकर उस भाव को बताते हैं जिसमें भगवान को जल के किनारे झुलाया और स्नान कराया जाता है।

मध्य प्रदेश के कुछ स्थानों पर मुख्य उत्सव से पहले “जलवा पूजा” की जाती है, जिसे अलग-अलग क्षेत्रों में सूरज पूजा, दशटोन पूजा या कुआँ पूजा भी कहते हैं। यह परंपरा स्थान के अनुसार अलग-अलग रूप में निभाई जाती है।

डोल ग्यारस: डोल यात्रा

“डोल” का अर्थ है सजी हुई लकड़ी की पालकी या झूला। डोल ग्यारस पर मंदिरों से बालकृष्ण या ठाकुर जी की प्रतिमा को सुंदर डोल में बिठाकर ढोल, मंजीरे और भजन-कीर्तन के साथ नगर में घुमाया जाता है। फिर भगवान को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर स्नान और नौका विहार कराया जाता है, और शाम को वापस मंदिर लाया जाता है।

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र, जैसे आगर मालवा, सुसनेर और नलखेड़ा में यह उत्सव बड़े उत्साह से मनाया जाता है। अशोकनगर में शहर के लगभग चालीस मंदिरों के डोल तुलसी सरोवर पर एकत्र होते हैं, जहाँ भगवान को जल विहार कराया जाता है। डोल यात्रा में अखाड़ों के करतब भी देखने को मिलते हैं।

राजस्थान के प्रसिद्ध जलझूलनी मेले

  • साँवलिया सेठ मंदिर, मंडफिया (चित्तौड़गढ़): यहाँ तीन दिन का बड़ा मेला लगता है। दशमी को शोभा यात्रा, एकादशी को रथ यात्रा और भगवान का कुंड में स्नान, और द्वादशी को समापन होता है। देश भर से लाखों श्रद्धालु आते हैं।
  • चारभुजा नाथ मंदिर, गढ़बोर (राजसमंद): जलझूलनी एकादशी पर यहाँ बड़ा मेला भरता है और भगवान विष्णु की चारभुजा रूप में पूजा होती है।
  • गाँव-कस्बों में: राजस्थान के कई स्थानों पर इस दिन गणेश और गौरी की पूजा भी होती है। देव प्रतिमाओं को नदी या तालाब के किनारे ले जाकर पूजा की जाती है और शाम को वापस लाया जाता है।

गुजरात और अन्य स्थान

गुजरात में द्वारकाधीश मंदिर और स्वामीनारायण मंदिरों में इस दिन शोभा यात्रा और जल विहार की परंपरा बताई जाती है। इस्कॉन और कई वैष्णव मंदिरों में भी भगवान की शोभा यात्रा निकाली जाती है। गणेश उत्सव के दिनों में आने के कारण कुछ शहरों में इसी दिन से गणेश विसर्जन की शोभा यात्राएँ भी शुरू हो जाती हैं।

डोल यात्रा में शामिल हों तो सावधानी रखें

जल विहार के समय नदी और तालाबों पर बहुत भीड़ होती है। बच्चों और बुज़ुर्गों का ध्यान रखें, गहरे पानी में न उतरें और प्रशासन के निर्देशों का पालन करें। भक्ति के साथ सुरक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है।

परिवर्तिनी एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। प्याज़, लहसुन, मांस-मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  2. घर और पूजा स्थान की सफ़ाई करें और अगले दिन की पूजा सामग्री जुटा लें।
  3. रात को भगवान का स्मरण करते हुए सोएँ और मन में व्रत का भाव रखें।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करें। कुछ परंपराओं में स्नान के जल में कुशा डालने का विधान बताया गया है।
  2. स्वच्छ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें।
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर व्रत का संकल्प लें: “मैं आज परिवर्तिनी एकादशी का व्रत भगवान वामन की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा से करूँगा/करूँगी।” अपनी क्षमता के अनुसार निर्जला, फलाहार या एक समय भोजन का संकल्प लें।

भगवान वामन (विष्णु) की पूजा

  1. पूजा स्थान पर चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर भगवान वामन या भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। शालिग्राम हो तो उसकी पूजा करें।
  2. पहले शुद्ध जल से, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से और फिर दोबारा शुद्ध जल से भगवान का अभिषेक करें। गंगाजल हो तो उसका प्रयोग करें।
  3. भगवान को पीले वस्त्र, चंदन, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें। कमल का फूल मिल सके तो अवश्य चढ़ाएँ, यह इस दिन विशेष शुभ माना जाता है।
  4. धूप और घी का दीपक जलाएँ।
  5. फल, मिठाई और दही का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल ज़रूर रखें।
  6. विष्णु सहस्रनाम या नीचे दिए मंत्रों का जप करें।
  7. परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। मान्यता है कि कथा सुने बिना व्रत अधूरा रहता है।
  8. ओम जय जगदीश हरे आरती से पूजा पूरी करें और प्रसाद बाँटें।

दिन भर और शाम की पूजा

  1. दिन में भगवान के नाम का जप, भजन या गीता पाठ करें। व्यर्थ बातचीत, क्रोध और निंदा से बचें।
  2. शाम को फिर से दीपक जलाकर आरती करें। तुलसी के पास भी दीपक जलाएँ।
  3. अपने क्षेत्र में डोल यात्रा निकलती हो, तो उसमें श्रद्धा से शामिल हो सकते हैं।

रात्रि जागरण

  1. व्रत कथा में रात्रि जागरण का विधान बताया गया है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार रात में भजन-कीर्तन और भगवान का स्मरण करें।
  2. पूरी रात जागना संभव न हो, तो कुछ घंटे जागरण करके भी भाव से भगवान का ध्यान कर सकते हैं।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी को सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें। कई भक्त इसी दिन वामन जयंती की पूजा भी करते हैं।
  2. ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और यथाशक्ति दही, चावल, अन्न या चाँदी का दान करें।
  3. तालिका में दिए पारण समय के भीतर तुलसी दल और जल ग्रहण करके व्रत खोलें, फिर सात्विक भोजन करें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान वामन या विष्णु की प्रतिमा, चित्र या शालिग्राम
  • चौकी और पीला कपड़ा
  • गंगाजल और शुद्ध जल
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • पीले वस्त्र या पीला अंगवस्त्र
  • चंदन, रोली और अक्षत
  • पीले फूल, फूलों की माला और यदि मिल सके तो कमल का फूल
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
  • धूप, अगरबत्ती, घी का दीपक और रुई की बत्ती
  • फल, मिठाई, पंजीरी या मखाने की खीर का भोग
  • दही (भाद्रपद में दही का भोग और दान शुभ माना जाता है)
  • कुशा (स्नान के लिए, यदि परंपरा में हो)
  • दान के लिए चावल, दही, अन्न, वस्त्र और यथाशक्ति चाँदी या ताँबा
  • तुलसी की माला (जप के लिए)
  • व्रत कथा की पुस्तक और आरती संग्रह

परिवर्तिनी एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का अपनी सुविधा से जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: सब प्राणियों के भीतर बसने वाले अंतर्यामी भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमस्कार है। बारह अक्षरों का यह मंत्र हर एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है।

2. वामन नाम मंत्र

ॐ वामनाय नमः॥

अर्थ: भगवान वामन को नमस्कार है। इस दिन भगवान के वामन रूप की पूजा होती है, इसलिए अभिषेक और पुष्प अर्पण के समय यह सरल नाम मंत्र बोला जाता है।

3. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करें।

4. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी और पूरे संसार के आधार हैं, जो आकाश के समान व्यापक और मेघ के समान श्याम वर्ण के हैं, जो लक्ष्मीपति और कमल-नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, उन संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। शेषनाग पर शयन करते भगवान का यह ध्यान करवट बदलने वाली इस एकादशी के भाव से विशेष रूप से मेल खाता है।

परिवर्तिनी एकादशी के लिए अलग से कोई लंबा विशेष मंत्र प्रामाणिक स्रोतों में नहीं मिलता। इसलिए ऊपर दिए भगवान विष्णु और वामन के प्रसिद्ध मंत्र ही इस दिन जपे जाते हैं। साथ में विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी बहुत शुभ माना जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

क्या खा सकते हैं

  • सभी तरह के ताज़े फल और सूखे मेवे
  • दूध, दही, छाछ, पनीर और मखाने
  • साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और राजगिरा
  • आलू, शकरकंद, अरबी और लौकी जैसी सब्ज़ियाँ
  • सेंधा नमक, काली मिर्च और जीरा
  • नारियल पानी, फलों का रस और नींबू पानी

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी चीज़ें
  • गेहूँ, जौ, मक्का और सभी अनाज
  • दालें, चना, मूँग और बीन्स
  • प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन
  • मांस, अंडा, मछली और शराब
  • साधारण नमक (उसकी जगह सेंधा नमक लें)
  • पैकेट वाली नमकीन, जिनमें अनाज या साधारण नमक मिला हो

ध्यान दें कि कथा में दही और चावल का दान बताया गया है, खाना नहीं। एकादशी के दिन चावल नहीं खाया जाता; चावल का दान करके द्वादशी को पारण के बाद ही चावल ग्रहण करें।

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों नहीं लिए जाते और पारण के समय ही जल ग्रहण होता है। यह सबसे कठिन व्रत है, इसलिए केवल स्वस्थ लोग ही इसे रखें। सितंबर की उमस और गर्मी में शरीर में पानी की कमी जल्दी हो सकती है, इसका ध्यान रखें।

फलाहार व्रत

फलाहार व्रत में अनाज नहीं लिया जाता, पर फल, दूध, दही, मेवे और व्रत वाले आटे से बनी चीज़ें खाई जा सकती हैं। अधिकतर गृहस्थ यही व्रत रखते हैं। इसमें पूरे दिन थोड़ा-थोड़ा खाएँ और पानी पीते रहें।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा दिन उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार बिना अनाज का सात्विक फलाहारी भोजन ले सकते हैं, जैसे साबूदाने की खिचड़ी या कुट्टू की पूरी के साथ आलू। बाकी समय फल और पानी ले सकते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी सावधानी: मधुमेह, हृदय रोग, ब्लड प्रेशर, किडनी की समस्या, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग अवस्था या नियमित दवाइयाँ लेने की स्थिति में कठिन व्रत रखने से पहले अपने डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। ऐसी स्थिति में फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत भी पूरी श्रद्धा से रखा जा सकता है, और दवाइयाँ बंद न करें।

परिवर्तिनी एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण का अर्थ है व्रत खोलना। एकादशी का व्रत अगले दिन, यानी द्वादशी तिथि को खोला जाता है। सही समय पर पारण करना व्रत का ज़रूरी हिस्सा माना जाता है।

  • द्वादशी में पारण: पारण सूर्योदय के बाद और द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना चाहिए। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण उचित नहीं माना जाता।
  • हरि वासर का ध्यान: द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग को हरि वासर कहते हैं। परंपरा के अनुसार हरि वासर में पारण नहीं किया जाता, उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा की जाती है।
  • सुबह का समय श्रेष्ठ: पारण के लिए प्रातःकाल सबसे अच्छा माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है। किसी कारण सुबह पारण न हो सके, तो मध्याह्न के बाद करें।
  • स्मार्त और वैष्णव: जिस वर्ष एकादशी दो दिन की हो, उस वर्ष स्मार्त और वैष्णव का पारण भी अलग-अलग दिन होता है। अपनी परंपरा के अनुसार ही पारण करें।
  • सटीक समय: पारण का समय हर शहर में सूर्योदय के अनुसार अलग होता है। अपने शहर का पारण समय ऊपर दी गई तालिका में देखें।

पारण कैसे करें

  1. स्नान करके भगवान विष्णु और वामन भगवान की पूजा करें।
  2. ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन या दान दें। कथा में बताए दही-चावल और चाँदी के दान का यह उत्तम समय है।
  3. सबसे पहले तुलसी दल और जल ग्रहण करें।
  4. फिर हल्का सात्विक भोजन लें। लंबे उपवास के बाद एकदम भारी या तला हुआ भोजन न करें।

परिवर्तिनी एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • भगवान वामन और भगवान विष्णु की श्रद्धा से पूजा करें।
  • व्रत कथा ज़रूर पढ़ें या सुनें।
  • विष्णु सहस्रनाम, गीता पाठ या मंत्र जप करें।
  • दही, चावल, अन्न, वस्त्र और यथाशक्ति चाँदी का दान करें।
  • तुलसी के पास दीपक जलाएँ और तुलसी की परिक्रमा करें।
  • मन, वाणी और कर्म से संयम रखें, सच बोलें।
  • संभव हो तो रात्रि जागरण में भजन-कीर्तन करें।
  • दान करते समय विनम्र रहें; बलि की कथा यही सिखाती है।

क्या न करें

  • चावल और अनाज न खाएँ।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें; पूजा के लिए एक दिन पहले तोड़ लें।
  • प्याज़, लहसुन, मांस और नशे से दूर रहें।
  • क्रोध, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें।
  • दिन में सोने से बचें, यदि स्वास्थ्य अनुमति दे।
  • दान का दिखावा या घमंड न करें।
  • हरि वासर में या द्वादशी बीतने के बाद पारण न करें।
  • डोल यात्रा में भीड़ और गहरे पानी में लापरवाही न करें।

परिवर्तिनी एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु जाग जाते हैं और चातुर्मास खत्म हो जाता है।

सच्चाई: परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान केवल करवट बदलते हैं, जागते नहीं। भगवान देवउठनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल) को जागते हैं और तभी चातुर्मास पूरा होता है। इसलिए चातुर्मास के नियम परिवर्तिनी एकादशी के बाद भी जारी रहते हैं।

मिथक: भगवान सो रहे हैं, इसलिए इस समय की पूजा उन तक नहीं पहुँचती।

सच्चाई: योगनिद्रा साधारण नींद नहीं है। शास्त्रों के भाव के अनुसार भगवान हर समय सजग हैं। इसीलिए चातुर्मास को जप, तप और पूजा का सबसे पवित्र समय माना गया है, न कि पूजा रोकने का।

मिथक: राजा बलि दुष्ट दैत्य थे, इसलिए भगवान ने उन्हें सज़ा दी।

सच्चाई: कथा में बलि को भगवान का भक्त, दानी और सत्यवादी बताया गया है। समस्या उनका अहंकार था, जो समर्पण के साथ मिट गया। भगवान ने उन्हें पाताल का राज्य दिया और स्वयं उनके पास रहने का वचन दिया। यह सज़ा नहीं, कृपा की कथा है।

मिथक: डोल ग्यारस और होली की डोल यात्रा (डोल पूर्णिमा) एक ही त्योहार है।

सच्चाई: दोनों अलग हैं। डोल पूर्णिमा फाल्गुन पूर्णिमा को बंगाल और ओडिशा में होली के समय मनाई जाती है। डोल ग्यारस भाद्रपद शुक्ल एकादशी को मध्य प्रदेश और आसपास मनाई जाती है, जिसमें भगवान का जल विहार होता है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो परिवर्तिनी एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: शास्त्रों में अपनी सामर्थ्य के अनुसार व्रत रखने की बात कही गई है। फलाहार या एक समय भोजन का व्रत भी पूरी श्रद्धा से रखा जाए तो उतना ही सार्थक माना जाता है। बीमार, गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग डॉक्टर की सलाह से ही कठिन व्रत रखें।

मिथक: कथा में दही-चावल का ज़िक्र है, इसलिए इस दिन दही-चावल खा सकते हैं।

सच्चाई: कथा में दही-चावल का दान बताया गया है, सेवन नहीं। एकादशी पर अनाज, विशेषकर चावल, नहीं खाया जाता। दही फलाहार में लिया जा सकता है, पर चावल द्वादशी को पारण के बाद ही खाएँ।

मिथक: गलती से व्रत टूट गया तो बड़ा अपशकुन होगा।

सच्चाई: भूल से कुछ खा लेने पर डरने की ज़रूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, बाकी दिन संयम से व्रत पूरा करें और यथाशक्ति दान करें। भगवान भाव देखते हैं, गलतियाँ नहीं गिनते।

परिवर्तिनी एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए लाभ परंपरा और कथाओं में बताई गई मान्यताएँ हैं। इन्हें श्रद्धा के रूप में समझें, किसी परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।

  • मान्यता है कि यह व्रत जाने-अनजाने में किए पापों का नाश करता है।
  • वामन भगवान की पूजा से ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों की पूजा का फल मिलने की मान्यता है।
  • कई पंचांगों में इस व्रत का फल वाजपेय यज्ञ के समान बताया गया है।
  • कथा पढ़ने या सुनने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य मिलने की मान्यता है।
  • दान, विशेषकर दही, चावल और चाँदी के दान को बहुत पुण्यदायी माना गया है।
  • व्रत और जप से मन शांत होता है, इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है और भक्ति गहरी होती है।
  • चातुर्मास के बीच यह व्रत अपने आध्यात्मिक संकल्पों को फिर से मज़बूत करने का अवसर देता है।

संबंधित एकादशी और पाठ

परिवर्तिनी एकादशी से पहले भाद्रपद कृष्ण पक्ष में अजा एकादशी आती है, और इसके बाद आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों के लिए समर्पित इंदिरा एकादशी आती है। चातुर्मास की शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है, जब भगवान योगनिद्रा में जाते हैं, और समापन देवउठनी एकादशी पर होता है। साल की सभी एकादशियों की तारीख और सूची के लिए हमारा एकादशी कब है पेज देखें।

पूजा के समय ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती गा सकते हैं। रोज़ की तिथि के लिए आज का पंचांग और सभी आरतियों के लिए आरती संग्रह PDF देखें।

परिवर्तिनी एकादशी हमें याद दिलाती है कि सच्चा दान वही है जिसमें अहंकार न हो, और सच्ची भक्ति वही है जिसमें पूरा समर्पण हो। राजा बलि की तरह अपना सिर भगवान के चरणों में झुकाएँ और अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से यह व्रत करें। भगवान वामन आपके जीवन में शुभ परिवर्तन लाएँ और आपको अपनी कृपा की छाया दें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

परिवर्तिनी एकादशी कब है 2027 में?

परिवर्तिनी एकादशी 2026 (22 सितंबर) बीत चुकी है। 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय के लिए इस पेज के ऊपर दिया त्वरित उत्तर और शहर के अनुसार तारीख तालिका देखें।

परिवर्तिनी एकादशी किस महीने में आती है?

यह भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। शुक्ल पक्ष होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत दोनों पंचांगों में इसका नाम भाद्रपद शुक्ल एकादशी ही रहता है। यह प्रायः अगस्त के अंत या सितंबर में आती है।

इसे परिवर्तिनी एकादशी क्यों कहते हैं?

मान्यता है कि चातुर्मास में योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु इसी दिन करवट बदलते हैं। इस परिवर्तन (करवट बदलने) के कारण इसे परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है।

क्या परिवर्तिनी एकादशी पर भगवान विष्णु जाग जाते हैं?

नहीं। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान केवल करवट बदलते हैं। वे कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी को जागते हैं, और तभी चातुर्मास समाप्त होता है।

परिवर्तिनी एकादशी के अन्य नाम क्या हैं?

इसे पार्श्व एकादशी, वामन एकादशी, पद्मा एकादशी, जयंती एकादशी, जलझूलनी एकादशी (राजस्थान) और डोल ग्यारस (मध्य प्रदेश) भी कहते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा होती है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में बालकृष्ण या ठाकुर जी की डोल यात्रा और जल विहार भी होता है।

परिवर्तिनी एकादशी की व्रत कथा क्या है?

यह वामन अवतार और दानवीर राजा बलि की कथा है। भगवान ने वामन रूप में बलि से तीन पग भूमि माँगी, दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग नाप लिए और तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उन्हें पाताल भेजा, फिर सदा उनके पास रहने का वचन दिया।

डोल ग्यारस और जलझूलनी एकादशी क्या है?

ये परिवर्तिनी एकादशी के ही क्षेत्रीय नाम हैं। इस दिन मंदिरों से ठाकुर जी को सजे डोल या पालकी में बिठाकर नदी, तालाब या कुंड पर स्नान और जल विहार के लिए ले जाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन माता यशोदा ने बालकृष्ण के वस्त्र धोए थे।

परिवर्तिनी एकादशी किस पुराण में है?

परंपरा के अनुसार इसका माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में मिलता है; कुछ स्रोत पद्म पुराण बताते हैं। वामन और बलि की विस्तृत कथा श्रीमद्भागवत के आठवें स्कंध में है।

क्या परिवर्तिनी एकादशी पर पानी पी सकते हैं?

हाँ, यदि आप निर्जला व्रत नहीं रख रहे हैं तो पानी, दूध, नारियल पानी और फलों का रस ले सकते हैं। निर्जला व्रत केवल स्वस्थ लोग ही रखें।

क्या परिवर्तिनी एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं। एकादशी पर चावल और सभी अनाज वर्जित माने जाते हैं। कथा में दही-चावल का दान बताया गया है, खाना नहीं; चावल द्वादशी को पारण के बाद ही खाएँ।

परिवर्तिनी एकादशी व्रत में क्या खा सकते हैं?

फल, दूध, दही, मेवे, मखाना, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू, शकरकंद और सेंधा नमक ले सकते हैं। अनाज, दालें, प्याज़ और लहसुन न खाएँ।

परिवर्तिनी एकादशी पर क्या दान करें?

कथा के अनुसार दही, चावल और यथाशक्ति चाँदी का दान शुभ माना जाता है। अन्न, वस्त्र और ताँबे का दान भी किया जाता है।

परिवर्तिनी एकादशी का पारण कब करें?

द्वादशी को सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी तिथि खत्म होने से पहले पारण करें। सुबह का समय सबसे अच्छा है; अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।

हरि वासर क्या है?

द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग को हरि वासर कहते हैं। परंपरा के अनुसार इस दौरान व्रत नहीं खोला जाता।

स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी दो दिन तक हो, तब स्मार्त (गृहस्थ) पहले दिन और वैष्णव (इस्कॉन आदि) दूसरे दिन व्रत रखते हैं। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार दिन चुनें और तालिका देखें।

परिवर्तिनी एकादशी और वामन जयंती में क्या संबंध है?

परिवर्तिनी एकादशी के अगले दिन, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को, वामन जयंती मनाई जाती है। बहुत से भक्त एकादशी का व्रत रखकर द्वादशी को वामन पूजा के साथ पारण करते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी के मंत्र कौन-से हैं?

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ वामनाय नमः, विष्णु गायत्री मंत्र और शान्ताकारं ध्यान मंत्र का जप किया जाता है। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी शुभ है।

क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग यह व्रत रख सकते हैं?

हाँ, पर डॉक्टर की सलाह से और हल्के रूप में, जैसे फलाहार या एक समय भोजन। मधुमेह या नियमित दवाइयाँ लेने वाले लोग दवाइयाँ बंद न करें।

अगर गलती से व्रत टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, बाकी दिन संयम से व्रत पूरा करें, यथाशक्ति दान करें और अगली एकादशी श्रद्धा से रखें।

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