पापांकुशा एकादशी (Papankusha Ekadashi) आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा और व्रत किया जाता है। यह एकादशी दशहरा (विजयादशमी) के ठीक बाद आती है, इसलिए नवरात्रि और विजय पर्व के बाद यह भक्ति का अगला पड़ाव मानी जाती है। कई क्षेत्रों और ISKCON में इसे पाशांकुशा एकादशी भी कहा जाता है।
“पापांकुशा” नाम का अर्थ है पापों पर अंकुश। जैसे महावत अंकुश से मदमस्त हाथी को सही दिशा में मोड़ देता है, वैसे ही यह व्रत मन को गलत रास्ते से लौटाकर भगवान की ओर मोड़ने वाला माना जाता है। इसकी कथा विंध्याचल पर्वत पर रहने वाले क्रूर बहेलिये क्रोधन की है, जिसे अंगिरा ऋषि ने अंतिम समय में यह व्रत बताया।
परंपरा के अनुसार यह व्रत जीवन भर के पापों के भार को हल्का करता है और पितरों के उद्धार में भी सहायक माना जाता है। इस लेख में आप पापांकुशा एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पद्मनाभ पूजा विधि, मंत्र, व्रत के नियम, दान और दशहरा-शरद पूर्णिमा से इसके संबंध को सरल भाषा में जानेंगे।
पापांकुशा एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय
संक्षिप्त उत्तर: पापांकुशा एकादशी 2026 (22 अक्टूबर) बीत चुकी है। अगली पापांकुशा एकादशी सोमवार, 11 अक्टूबर 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 10 अक्टूबर 2027 को सुबह लगभग 11:40 बजे से 11 अक्टूबर को दोपहर लगभग 2:08 बजे तक रहेगी, और पारण 12 अक्टूबर 2027 की सुबह होगा (नई दिल्ली में लगभग सुबह 6:19 से 8:38 बजे के बीच) — अपने शहर का सटीक पारण समय नीचे की तालिका में देखें।
अगली पापांकुशा एकादशी
पापांकुशा एकादशी 2027
11 अक्टूबर 2027, सोमवार 344 दिन बाकी
- मास और पक्ष
- आश्विन शुक्ल
- एकादशी तिथि
- 10 अक्टू 11:42 – 11 अक्टू 14:10
- पारण (व्रत खोलने का समय)
- 12 अक्टू, 06:19 – 08:38
| वर्ष | व्रत की तारीख | एकादशी तिथि | पारण |
|---|---|---|---|
| 2026 | 22 अक्टूबर 2026, गुरुवार | 21 अक्टू 14:13 – 22 अक्टू 14:49 | 23 अक्टू, 06:26 – 08:42 |
| 2027 | 11 अक्टूबर 2027, सोमवार | 10 अक्टू 11:42 – 11 अक्टू 14:10 | 12 अक्टू, 06:19 – 08:38 |
| 2028 | 29 सितंबर 2028, शुक्रवार | 28 सितं 09:57 – 29 सितं 12:09 | 30 सितं, 06:13 – 08:36 |
| 2029 | 17 अक्टूबर 2029, बुधवार वैष्णव: 18 अक्टू | 17 अक्टू 05:25 – 18 अक्टू 06:40 | 18 अक्टू, 13:14 – 15:31 |
तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।
कभी-कभी एकादशी तिथि दो दिन तक फैल जाती है, तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय के भक्त दूसरे दिन व्रत रखते हैं। ऊपर की तालिका में यदि किसी वर्ष दो दिन दिखें, तो अपनी परंपरा के अनुसार दिन चुनें।
पापांकुशा एकादशी का अर्थ और अन्य नाम
“पाप पर अंकुश”: नाम का अर्थ
यह नाम दो शब्दों से बना है: पाप और अंकुश। अंकुश लोहे का वह नुकीला, मुड़ा हुआ औजार है जिससे महावत हाथी को नियंत्रित करता है। हाथी बहुत बलवान होता है, पर अंकुश के इशारे से वह रुकता है और सही दिशा में चलता है।
मनुष्य का मन भी कई बार मदमस्त हाथी जैसा हो जाता है, जो क्रोध, लोभ और आदतों के पीछे भागता है। मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का व्रत इसी मन पर अंकुश का काम करता है। यह पुराने पापों के फल को कम करने और नए गलत कर्मों से रुकने, दोनों की प्रेरणा देता है।
पापांकुशा एकादशी के अन्य नाम
- पाशांकुशा एकादशी (Pashankusha Ekadashi): ISKCON और कई पंचांगों में यही नाम मिलता है। “पाश” यानी बंधन और “अंकुश” यानी नियंत्रण; अर्थ है ऐसा व्रत जो पाप के बंधन काटे।
- आश्विन शुक्ल एकादशी: तिथि और मास के अनुसार नाम।
- पापकुंशा / पापाकुंशा: कुछ लेखों में लिखा जाने वाला रूप; यह इसी एकादशी का नाम है।
पूर्णिमांत और अमांत पंचांग में महीना
उत्तर भारत का पूर्णिमांत पंचांग और दक्षिण-पश्चिम भारत का अमांत पंचांग कृष्ण पक्ष के महीने के नाम में अलग होते हैं, पर शुक्ल पक्ष में दोनों का महीना एक ही रहता है। इसलिए पापांकुशा एकादशी दोनों पंचांगों में आश्विन शुक्ल एकादशी ही है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह प्रायः सितंबर के अंत से अक्टूबर के बीच आती है।
वैष्णव पंचांग में हर महीने का नाम भगवान के एक रूप पर होता है, और आश्विन मास को पद्मनाभ मास कहा जाता है। यही कारण है कि इस मास की एकादशी पर भगवान पद्मनाभ की पूजा विशेष रूप से की जाती है।
पापांकुशा एकादशी का महत्व
धार्मिक महत्व
परंपरा के अनुसार श्रीकृष्ण ने कहा है कि इस एकादशी पर भगवान विष्णु का पूजन करने वाला यम की यातना नहीं देखता। इस व्रत को सभी पापों का नाश करने वाला और अक्षय पुण्य देने वाला बताया गया है।
कथा-पाठों में इस व्रत के फल की तुलना हज़ार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों से की गई है, और कहा गया है कि इन सबका फल भी एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के बराबर नहीं। ऐसी तुलनाएँ व्रत की महिमा बताने की पौराणिक शैली हैं, जिनका भाव यह है कि सच्चे मन का उपवास और भक्ति बड़े-बड़े अनुष्ठानों से भी श्रेष्ठ है।
मान्यता है कि इस व्रत का पुण्य व्रती के पितरों तक पहुँचता है। ISKCON के वर्णन में माता और पिता, दोनों पक्षों की दस-दस पीढ़ियों के उद्धार की बात है, जबकि कुछ हिंदी कथा-पाठों में पत्नी के पक्ष की दस पीढ़ियाँ भी जोड़ी गई हैं।
आध्यात्मिक संदेश
पापांकुशा एकादशी का सबसे बड़ा संदेश है कि सुधरने में कभी देर नहीं होती। क्रोधन बहेलिये ने पूरा जीवन हिंसा में बिताया, फिर भी जब उसने सच्चे मन से अपनी गलती मानी और शरण ली, तो उसके लिए भी रास्ता खुला। यह कथा निराश व्यक्ति को आशा देती है।
दूसरा संदेश अंकुश का है। केवल एक दिन का उपवास ही पर्याप्त नहीं; असली अंकुश तो रोज़ के जीवन में क्रोध, कटु वचन और लालच पर लगाना है। संयोग से कथा के बहेलिये का नाम भी “क्रोधन” है, जो याद दिलाता है कि क्रोध पर नियंत्रण इस व्रत का मूल भाव है।
तीसरा संदेश समन्वय का है। कथा-पाठों में कहा गया है कि जो विष्णु भक्त शिव की निंदा करता है या शिव भक्त विष्णु की, उसे पुण्य नहीं मिलता। यह एकादशी भगवान के सभी रूपों के प्रति आदर सिखाती है।
पुराणों में उल्लेख
परंपरा के अनुसार पापांकुशा एकादशी का महात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है, जहाँ धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर श्रीकृष्ण इसका वर्णन करते हैं। अधिकतर एकादशी कथा-संग्रह और ISKCON के वर्णन यही स्रोत बताते हैं।
कुछ लेखों में इस शिक्षा को पद्म पुराण से जोड़ा गया है, और कुछ कथा-पाठों में श्रीकृष्ण यह कथा अर्जुन को सुनाते हैं। कथा का मूल भाव सभी में एक जैसा है, केवल संवाद के पात्र और ग्रंथ के नाम में अंतर मिलता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
युधिष्ठिर का प्रश्न
एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रता से पूछा, “हे मधुसूदन! आश्विन मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? उसकी विधि क्या है और उसका व्रत करने से क्या फल मिलता है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए।”
श्रीकृष्ण का उत्तर: व्रत की महिमा
श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन! इस एकादशी का नाम पापांकुशा है। यह सब पापों को हरने वाली है। इस दिन मनुष्य को मनवांछित फल पाने के लिए पद्मनाभ भगवान का पूजन करना चाहिए। जो भगवान विष्णु को श्रद्धा से एक बार भी नमस्कार करता है, उसे कठिन तप का फल मिलता है और वह यम की यातना से बचता है।”
श्रीकृष्ण ने आगे कहा, “जो इस दिन व्रत रखकर रात्रि में जागरण करता है और अपनी सामर्थ्य के अनुसार भूमि, गौ, अन्न, जल, वस्त्र, जूते और छाते का दान करता है, वह यमराज के दर्शन नहीं करता। अब मैं तुम्हें एक प्राचीन कथा सुनाता हूँ, जिससे इस व्रत की शक्ति समझ में आएगी।”
विंध्याचल का बहेलिया क्रोधन
बहुत समय पहले विंध्याचल पर्वत पर क्रोधन नाम का एक बहेलिया रहता था। जैसा उसका नाम था, वैसा ही उसका स्वभाव था। वह अत्यंत क्रूर था और जंगल के पशु-पक्षियों को बेरहमी से मारता था।
शिकार के अलावा उसका जीवन लूटपाट, मद्यपान, झूठ और बुरी संगति में बीता। उसने कभी किसी पर दया नहीं की, न कभी भगवान का नाम लिया और न कोई पुण्य कर्म किया। देखते-देखते उसका पूरा जीवन पापों में बीत गया और बुढ़ापा आ गया।
यमदूतों की चेतावनी
जब उसके जीवन का अंत निकट आया, तब यमराज ने अपने दूत भेजे। यमदूतों ने क्रोधन से कहा, “कल तुम्हारे जीवन का अंतिम दिन है। हम तुम्हें लेने आएँगे और तुम्हें अपने कर्मों का फल भोगना होगा।”
यह सुनकर क्रोधन का कठोर हृदय पहली बार काँप उठा। उसे अपने किए हर पाप की याद आने लगी। उसे लगा कि अब नरक की यातना से उसे कोई नहीं बचा सकता। मृत्यु के भय से वह बेचैन होकर जंगल में भटकने लगा।
अंगिरा ऋषि की शरण में
भटकते-भटकते वह महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुँचा, जो उसी वन में तपस्या करते थे। क्रोधन ऋषि के चरणों में गिर पड़ा और रोते हुए बोला, “हे मुनिवर! मैंने जीवन भर केवल पाप किए हैं। कल मेरी मृत्यु निश्चित है। मुझ जैसे पापी के लिए क्या कोई उपाय है, जिससे मैं नरक से बच सकूँ?”
अंगिरा ऋषि ने देखा कि बहेलिये के मन में सच्चा पश्चाताप है। उन्हें उस पर दया आई। उन्होंने कहा, “वत्स, घबराओ मत। कल आश्विन शुक्ल पक्ष की पापांकुशा एकादशी है। तुम इस एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करो, भगवान विष्णु की पूजा करो और उनका नाम स्मरण करो। यह व्रत पाप रूपी हाथी पर अंकुश के समान है। इसके प्रभाव से तुम्हारे पाप नष्ट हो जाएँगे।”
व्रत, पूजा और जागरण
क्रोधन ने ऋषि की बात मानकर पूरे मन से पापांकुशा एकादशी का व्रत किया। उसने दिन भर भगवान विष्णु का स्मरण किया, उनकी पूजा की और रात में जागकर उनका नाम जपता रहा। जीवन में पहली बार उसका मन हिंसा से हटकर भक्ति में लगा।
क्रोधन का उद्धार
व्रत के पुण्य से उसके सारे पाप नष्ट हो गए। जब यमदूत उसे लेने आए, तो उन्होंने देखा कि उस पर अब पाप का कोई भार नहीं है। वे खाली हाथ यमलोक लौट गए। भगवान की कृपा से क्रोधन को विष्णुलोक (वैकुंठ) की प्राप्ति हुई।
ISKCON के वर्णन में बताया गया है कि वह दिव्य चतुर्भुज रूप पाकर, पीतांबर और माला धारण करके, गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक गया। कुछ पाठों में कहा गया है कि यमदूतों की जगह विष्णु के पार्षद उसे लेने आए।
कथा के अन्य रूप
कुछ परंपराओं में यमदूत पहले चेतावनी देने नहीं आते; वहाँ बूढ़ा क्रोधन स्वयं मृत्यु और यम के भय से अंगिरा ऋषि के पास जाता है। कुछ कथा-पाठों में ऋषि से उसकी भेंट जंगल में संयोग से होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण पर आधारित कुछ संक्षिप्त पाठों में बहेलिये की कथा के बिना केवल व्रत का महात्म्य मिलता है। इन सब रूपों में मूल शिक्षा एक ही है: सच्चा पश्चाताप और भगवान की शरण।
कथा का फल
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा, “हे राजन! जो मनुष्य पापांकुशा एकादशी का व्रत करता है, उसे स्वस्थ शरीर, सुयोग्य जीवनसाथी, धन और अंत में स्वर्ग तथा हरिलोक की प्राप्ति होती है।” परंपरा के अनुसार इस कथा को श्रद्धा से पढ़ने या सुनने वाले को भी व्रत के पुण्य का भाग मिलता है। इसलिए एकादशी की पूजा के बाद परिवार के साथ बैठकर यह कथा प्रायः सुनी-सुनाई जाती है।
पापांकुशा एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)
दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी
- दशमी के दिन दोपहर में सादा, सात्विक भोजन करें। परंपरा में इस दिन गेहूँ, जौ, चावल, चना, मसूर, उड़द और मूँग जैसे अनाज-दालों से बचने की सलाह भी मिलती है; जो संभव हो, वैसा करें।
- सूर्यास्त के बाद अन्न न लें। लहसुन-प्याज, मांस, मदिरा से दूर रहें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
- दशहरे के उत्सव के बाद घर और पूजा स्थल की सफाई कर लें, ताकि एकादशी की सुबह पूजा शांत मन से हो सके।
एकादशी की सुबह और संकल्प
- ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। संभव हो तो जल में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ। स्वच्छ, हो सके तो पीले वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें: “मैं आज पापांकुशा एकादशी का व्रत भगवान पद्मनाभ की प्रसन्नता और अपने पापों के शमन के लिए रखूँगा/रखूँगी।” साथ में बताएँ कि आप निर्जला, फलाहार या एक समय का व्रत रखेंगे।
- संकल्प के साथ यह भी मन में ठानें कि आज क्रोध, कटु वचन और झूठ से दूर रहेंगे। यही इस व्रत का असली “अंकुश” है।
भगवान पद्मनाभ की पूजा
- पूजा स्थान पर चौकी रखकर पीला या सफेद कपड़ा बिछाएँ। उस पर भगवान विष्णु की ऐसी प्रतिमा या चित्र रखें जिसमें वे शेषनाग पर शयन कर रहे हों और उनकी नाभि से कमल निकल रहा हो। यही पद्मनाभ स्वरूप है।
- चौकी के पास जल से भरा कलश स्थापित करें, उसके मुख पर आम या पीपल के पत्ते और ऊपर नारियल रखें।
- भगवान को गंगाजल से स्नान कराएँ (या जल के छींटे दें), फिर पीला चंदन, अक्षत, पीले फूल और संभव हो तो कमल का फूल अर्पित करें।
- तुलसी दल अवश्य चढ़ाएँ। ध्यान रखें कि तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़ लें, क्योंकि एकादशी को तुलसी तोड़ना वर्जित माना जाता है।
- घी का दीपक और धूप जलाएँ। फल, मिठाई, पंचामृत और तुलसी मिला हुआ भोग अर्पित करें।
- विष्णु सहस्रनाम या नीचे दिए मंत्रों का जप करें। इसके बाद पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- अंत में ओम जय जगदीश हरे और एकादशी माता की आरती करें और भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।
दिन भर और शाम की पूजा
- दिन में सोने से बचें। समय मिले तो भगवद् गीता, विष्णु सहस्रनाम या भजन का पाठ करें।
- शाम को फिर से दीपक जलाकर भगवान की आरती करें। तुलसी के पास भी घी का दीपक रखें।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान का संकल्प लें, जिसे द्वादशी को पूरा किया जा सकता है।
रात्रि जागरण
- कथा में क्रोधन ने रात भर जागकर भगवान का नाम लिया था, इसलिए इस एकादशी पर जागरण का विशेष महत्व माना जाता है।
- परिवार के साथ भजन-कीर्तन करें, हरि नाम का जप करें या कथा का पाठ करें। स्वास्थ्य ठीक न हो तो पूरी रात जागना ज़रूरी नहीं; कुछ घंटे का जागरण भी श्रद्धा से किया जा सकता है।
द्वादशी और पारण
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
- ब्राह्मण, किसी ज़रूरतमंद या गौ को भोजन कराएँ और यथाशक्ति दक्षिणा या दान दें।
- इसके बाद पारण के शुभ समय में तुलसी दल डालकर जल या प्रसाद लेकर व्रत खोलें। पारण का समय ऊपर की तालिका में देखें।
पूजा सामग्री सूची
- भगवान विष्णु की पद्मनाभ स्वरूप वाली प्रतिमा या चित्र (शेषशायी, नाभि-कमल सहित)
- चौकी और पीला या सफेद कपड़ा
- कलश, आम या पीपल के पत्ते, नारियल
- गंगाजल और शुद्ध जल
- पीला चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल, केवल पूजा के लिए)
- पीले फूल, कमल का फूल (यदि मिले), फूलमाला
- तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़े हुए)
- घी का दीपक, रुई की बत्ती, धूप या अगरबत्ती, कपूर
- पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
- मौसमी फल, केला, मिठाई या खीर का भोग
- पान, सुपारी, लौंग, इलायची
- पीले वस्त्र या अंगवस्त्र (भगवान को अर्पित करने के लिए)
- तुलसी की माला (जप के लिए)
- व्रत कथा की पुस्तक, विष्णु सहस्रनाम, आरती संग्रह
- दान के लिए अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल, छाता या दक्षिणा
पापांकुशा एकादशी के मंत्र
मंत्र जप में सबसे ज़रूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। आप इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का अपनी सुविधा से जप कर सकते हैं। तुलसी की माला से 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।
1. द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
अर्थ: सभी प्राणियों के भीतर बसने वाले अंतर्यामी भगवान वासुदेव को नमस्कार है। बारह अक्षरों का यह मंत्र हर एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है।
2. विष्णु मूल मंत्र
ॐ नमो नारायणाय॥
अर्थ: सारी सृष्टि का पालन करने वाले भगवान नारायण को नमस्कार है। यह छोटा मंत्र चलते-फिरते, काम करते हुए भी मन में जपा जा सकता है।
3. विष्णु गायत्री मंत्र
ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अर्थ: हम नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही दिशा में प्रेरित करें। मन पर “अंकुश” के भाव से यह मंत्र बहुत उपयुक्त है।
4. विष्णु ध्यान मंत्र (पद्मनाभ वंदना)
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है (पद्मनाभ), जो देवताओं के स्वामी और संसार के आधार हैं, जो आकाश जैसे व्यापक और मेघ जैसे श्याम वर्ण के हैं, जो लक्ष्मीपति और कमल-नयन हैं, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, उन संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ। इस श्लोक में “पद्मनाभं” शब्द आता है, इसलिए पापांकुशा एकादशी की पूजा में यह विशेष रूप से पढ़ा जाता है।
5. पद्मनाभ नाम मंत्र
ॐ पद्मनाभाय नमः॥
अर्थ: कमल-नाभि वाले भगवान पद्मनाभ को नमस्कार है। पद्मनाभ विष्णु सहस्रनाम का भी एक नाम है। इस दिन कई भक्त पूरे दिन यही नाम-मंत्र जपते हैं।
पापांकुशा एकादशी की कथा में कोई अलग गुप्त मंत्र नहीं बताया गया है। कथा का भाव है कि भगवान का नाम श्रद्धा से लेना ही सबसे बड़ा साधन है, इसलिए ऊपर दिए प्रसिद्ध विष्णु मंत्र ही इस दिन जपे जाते हैं।
भगवान पद्मनाभ की पूजा: स्वरूप और महत्व
“पद्मनाभ” का अर्थ है जिनकी नाभि में कमल (पद्म) है। इस स्वरूप में भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, उनकी नाभि से एक कमल निकला है और उस कमल पर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी विराजमान हैं।
यह स्वरूप बताता है कि सारी सृष्टि भगवान से ही उत्पन्न होती है और उन्हीं में टिकी है। पापांकुशा एकादशी पर इस रूप की पूजा का भाव यह है कि हम अपने जीवन को फिर से उस मूल स्रोत से जोड़ें, जहाँ से सब कुछ शुरू होता है।
केरल के तिरुवनंतपुरम का प्रसिद्ध श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर इसी स्वरूप को समर्पित है। घर में पूजा करते समय यदि शेषशायी विष्णु का चित्र न हो, तो भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के किसी भी चित्र के सामने “पद्मनाभ” भाव से पूजा की जा सकती है। भगवान रूप से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं।
दशहरा, पापांकुशा एकादशी और शरद पूर्णिमा
पापांकुशा एकादशी विजयादशमी (दशहरा) के ठीक बाद आती है। पंचांग के अनुसार कभी यह दशहरे के अगले दिन पड़ती है और कभी तिथि के घटने-बढ़ने से एक दिन और बाद। दशहरा बुराई पर अच्छाई की बाहरी विजय का पर्व है, जबकि पापांकुशा एकादशी उस विजय को भीतर ले जाने का अवसर है, यानी अपने भीतर के क्रोध, लोभ और अहंकार पर विजय।
बहुत से भक्त नवरात्रि में नौ दिन का उपवास रखते हैं। ऐसे में दशहरे के तुरंत बाद एकादशी का कठोर व्रत शरीर पर भारी पड़ सकता है। यदि आपने नवरात्रि के व्रत रखे हैं, तो इस एकादशी पर फलाहार या एक समय का व्रत चुनना समझदारी है; पूरी तरह कमज़ोरी हो तो डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें।
पापांकुशा एकादशी के लगभग चार दिन बाद आश्विन पूर्णिमा यानी शरद पूर्णिमा आती है, जब चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने और रात्रि जागरण की परंपरा है। इसके बाद कार्तिक मास शुरू होता है, जिसे वैष्णव परंपरा में दामोदर मास कहते हैं। इस तरह दशहरा, पापांकुशा एकादशी, शरद पूर्णिमा और कार्तिक का आरंभ, ये सब एक के बाद एक भक्ति की सीढ़ी जैसे हैं।
पापांकुशा एकादशी पर दान का महत्व
कथा में श्रीकृष्ण ने इस दिन दान की विशेष महिमा बताई है। मान्यता है कि जो व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करता है, उसे यम की यातना का भय नहीं रहता। दान दिखावे के लिए नहीं, ज़रूरतमंद की सच्ची सहायता के भाव से करें।
- अन्न दान: भूखे को भोजन कराना, अनाज या राशन देना (एकादशी के दिन दान कर सकते हैं, स्वयं अन्न न खाएँ)।
- जल दान: प्याऊ लगवाना, राहगीरों को पानी पिलाना। कथा-पाठों में तालाब, बगीचे और धर्मशाला बनवाने का भी पुण्य बताया गया है।
- वस्त्र, जूते और छाता: मौसम बदल रहा होता है, इसलिए गरीबों को कपड़े, चप्पल और छाता देना उपयोगी है।
- गौ सेवा: गाय को हरा चारा या गुड़ खिलाना।
- भूमि और गौ दान: शास्त्रों में इनका उल्लेख है, पर आज के समय में अपनी सामर्थ्य के अनुसार किसी गौशाला या सेवा संस्था की मदद भी उसी भाव का दान है।
पापांकुशा एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ
क्या खा सकते हैं
- मौसमी फल: केला, सेब, पपीता, अनार, अमरूद आदि
- दूध, दही, छाछ, पनीर, मखाने
- साबूदाना, सिंघाड़े का आटा, कुट्टू का आटा, राजगिरा, समा के चावल (व्रत के चावल)
- आलू, शकरकंद, अरबी, कच्चा केला
- मूँगफली, बादाम, काजू, अखरोट, किशमिश
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा, हरी मिर्च, अदरक
- नारियल पानी, नींबू पानी, शुद्ध पानी
क्या न खाएँ
- चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़ (एकादशी पर चावल सबसे पहले वर्जित माना जाता है)
- गेहूँ, जौ, मक्का, बाजरा जैसे सभी अनाज
- दालें: मसूर, उड़द, मूँग, चना, अरहर आदि
- लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा, मदिरा, तंबाकू
- सामान्य नमक (साधारण आयोडीन वाला), हल्दी और गरम मसाले, यदि आपकी परंपरा इन्हें वर्जित मानती है
- बासी, तला-भुना और बाज़ार का पैकेट वाला “व्रत स्नैक”, जिसमें अनाज या प्याज-लहसुन मिला हो सकता है
निर्जला व्रत
निर्जला व्रत में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक अन्न और जल, दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोगों को ही इसे रखना चाहिए। मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी, गर्भावस्था, स्तनपान, बुढ़ापा या नियमित दवाओं की स्थिति में निर्जला व्रत न रखें और डॉक्टर से सलाह लें।
फलाहार व्रत
फलाहार व्रत में अनाज छोड़कर फल, दूध, मेवे और व्रत में मान्य चीज़ें ली जाती हैं। अधिकतर गृहस्थ भक्त यही व्रत रखते हैं। ISKCON और कई वैष्णव परंपराएँ भी अनाज और दाल छोड़कर सादा फलाहार करने की सलाह देती हैं। नवरात्रि के उपवास के बाद यह व्रत शरीर के लिए भी संतुलित रहता है।
एक समय भोजन (एकभुक्त)
जो लोग पूरे दिन उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में केवल एक बार सात्विक फलाहारी भोजन ले सकते हैं, जैसे साबूदाने की खिचड़ी या कुट्टू की पूरी के साथ आलू की सब्ज़ी। बच्चे, बुज़ुर्ग, बीमार या भारी काम करने वाले लोग इस रूप में भी श्रद्धा से व्रत रख सकते हैं।
पापांकुशा एकादशी पारण कब और कैसे करें
पारण का अर्थ है व्रत खोलना। एकादशी का व्रत अगले दिन यानी द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद खोला जाता है। पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले कर लेना चाहिए; द्वादशी बीत जाने के बाद पारण को शास्त्रों में ठीक नहीं माना गया।
हरि वासर: द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता। यदि सुबह हरि वासर चल रहा हो, तो उसके समाप्त होने की प्रतीक्षा करें। पारण के लिए सुबह का समय (प्रातःकाल) सबसे अच्छा माना जाता है; दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है।
स्मार्त और वैष्णव: जब एकादशी दो दिन की हो, तब स्मार्त भक्त पहले दिन और वैष्णव भक्त दूसरे दिन व्रत रखते हैं, इसलिए दोनों का पारण भी अलग दिन होता है। अपने व्रत के दिन के अनुसार पारण समय देखें।
पारण का सटीक समय हर शहर में सूर्योदय के अनुसार बदलता है। अपने शहर का पारण समय इसी पेज पर ऊपर दी गई तालिका में देखें।
पारण कैसे करें
- द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें भोग लगाएँ।
- किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद या गौ को भोजन कराएँ और यथाशक्ति दान दें।
- सबसे पहले तुलसी दल डालकर थोड़ा जल या भगवान का प्रसाद ग्रहण करें।
- इसके बाद हल्का, सात्विक भोजन करें। लंबे उपवास के बाद एकदम भारी, तला हुआ भोजन न करें।
पापांकुशा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
क्या करें
- सुबह स्नान करके संकल्प लें और भगवान पद्मनाभ की पूजा करें।
- तुलसी दल अर्पित करें और तुलसी के पास दीपक जलाएँ।
- व्रत कथा पढ़ें या सुनें, विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ करें।
- अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, जल, वस्त्र, जूते या छाते का दान करें।
- जिनसे मनमुटाव हो, उनसे मन ही मन क्षमा माँगें; हो सके तो बात करके संबंध सुधारें।
- रात में भजन-कीर्तन या नाम जप करें।
- शांत, मधुर और सच बोलें।
क्या न करें
- चावल और अनाज न खाएँ।
- क्रोध, झगड़ा, गाली-गलौज और कटु वचन से बचें। यह व्रत “क्रोधन” की कथा का है, इसलिए क्रोध पर नियंत्रण सबसे ज़रूरी है।
- किसी जीव को कष्ट न दें; हिंसा और शिकार से पूरी तरह दूर रहें।
- एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
- दिन में सोने से बचें।
- किसी की निंदा, चुगली या झूठ न बोलें। भगवान के किसी भी रूप (शिव या विष्णु) की निंदा न करें।
- मदिरा, तंबाकू और किसी भी नशे से दूर रहें।
पापांकुशा एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)
मिथक: पापांकुशा एकादशी का व्रत रख लिया तो आगे कुछ भी गलत करो, पाप अपने आप मिटते रहेंगे।
सच्चाई: “अंकुश” का अर्थ ही रोकना है। कथा में क्रोधन का उद्धार उसके सच्चे पश्चाताप और जीवन बदलने से जुड़ा है। परंपरा इस व्रत को गलत कामों की छूट नहीं, बल्कि उनसे रुकने की प्रेरणा मानती है।
मिथक: जिसने बहुत पाप किए हैं, उसके लिए यह व्रत रखना बेकार है।
सच्चाई: कथा इसके ठीक उलट कहती है। क्रोधन ने जीवन भर हिंसा की, फिर भी अंगिरा ऋषि ने उसे लौटाया नहीं। यह एकादशी इसी आशा का संदेश देती है कि सच्चे मन से सुधार की शुरुआत कभी भी हो सकती है।
मिथक: बिना निर्जला व्रत के पापांकुशा एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।
सच्चाई: शास्त्रों में निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन, तीनों तरह के व्रत का विधान है। श्रीकृष्ण ने कथा में भगवान को एक बार श्रद्धा से नमस्कार करने की भी महिमा बताई है। अपनी सेहत के अनुसार व्रत चुनना ही सही है।
मिथक: गलती से व्रत टूट गया तो बहुत बड़ा अपशकुन होगा।
सच्चाई: यदि अनजाने में या स्वास्थ्य के कारण व्रत टूट जाए, तो डरने की ज़रूरत नहीं। भगवान से क्षमा माँगें, बचे हुए दिन संयम रखें और नाम जप करें। परंपरा में भाव को सबसे ऊपर माना गया है।
मिथक: पितरों के उद्धार के लिए केवल पितृपक्ष में ही कुछ किया जा सकता है।
सच्चाई: पितृपक्ष में आने वाली इंदिरा एकादशी और उसके बाद पापांकुशा एकादशी, दोनों के महात्म्य में पितरों के कल्याण की बात आती है। मान्यता है कि श्रद्धा से किया गया व्रत और दान पूर्वजों के लिए भी शुभ है, चाहे वह किसी भी दिन किया जाए।
मिथक: नवरात्रि के नौ दिन व्रत रखने वाले को दशहरे के बाद एकादशी पर भी निर्जला व्रत रखना ही होगा।
सच्चाई: ऐसा कोई नियम नहीं है। लगातार उपवास के बाद शरीर कमज़ोर हो सकता है। ऐसे में फलाहार या एक समय का व्रत रखें। मधुमेह, गर्भावस्था, बुढ़ापा या दवाइयों की स्थिति में डॉक्टर की सलाह के बिना कठोर व्रत न रखें।
पापांकुशा एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)
परंपरा और कथा-पाठों के अनुसार पापांकुशा एकादशी के व्रत से ये फल मिलने की मान्यता है। इन्हें भक्ति और विश्वास के रूप में समझें, किसी गारंटी के रूप में नहीं।
- जाने-अनजाने हुए पापों के प्रभाव का शमन और मन की शुद्धि
- यम की यातना के भय से मुक्ति और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति की मान्यता
- माता-पिता के कुल की पीढ़ियों और पितरों के कल्याण की मान्यता
- स्वस्थ शरीर, सुयोग्य जीवनसाथी, धन और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद
- क्रोध और बुरी आदतों पर नियंत्रण की प्रेरणा और आत्म-अनुशासन
- दान और सेवा से समाज के ज़रूरतमंदों की सहायता और मन को संतोष
- परिवार के साथ पूजा, कथा और कीर्तन से घर में भक्ति और शांति का वातावरण
संबंधित एकादशी और पाठ
पापांकुशा एकादशी से पहले आश्विन कृष्ण पक्ष (पितृपक्ष) में इंदिरा एकादशी आती है, जिसका संबंध पितरों की मुक्ति से है। इसके बाद कार्तिक कृष्ण पक्ष में रमा एकादशी आती है, जो दीपावली से कुछ दिन पहले पड़ती है। साल की सभी एकादशियों की तारीख और सूची के लिए हमारा एकादशी कब है पेज देखें।
पूजा के समय ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती गा सकते हैं। इसके बाद आने वाले कार्तिक मास के पर्वों के लिए कार्तिक पूर्णिमा पूजा विधि भी देखें। रोज़ की तिथि के लिए आज का पंचांग और सभी आरतियों के लिए आरती संग्रह PDF देखें।
पापांकुशा एकादशी हमें याद दिलाती है कि मन रूपी हाथी कितना भी बलवान हो, भक्ति का अंकुश उसे सही राह पर ला सकता है। क्रोधन बहेलिये की तरह सच्चे मन से भगवान की शरण लें, क्रोध पर नियंत्रण रखें और अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से यह व्रत करें। भगवान पद्मनाभ आपके जीवन को शांति, सद्बुद्धि और भक्ति से भर दें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
पापांकुशा एकादशी कब है 2027 में?
पापांकुशा एकादशी 2026 (22 अक्टूबर) बीत चुकी है। 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय के लिए इस पेज के ऊपर संक्षिप्त उत्तर और शहर-वार तारीख तालिका देखें।
पापांकुशा एकादशी किस महीने में आती है?
यह आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी है। शुक्ल पक्ष होने के कारण पूर्णिमांत और अमांत, दोनों पंचांगों में इसका महीना आश्विन ही रहता है। यह प्रायः सितंबर के अंत से अक्टूबर के बीच दशहरे के ठीक बाद आती है।
इसे पापांकुशा एकादशी क्यों कहते हैं?
पाप और अंकुश से मिलकर यह नाम बना है। जैसे अंकुश हाथी को नियंत्रित करता है, वैसे ही यह व्रत पापों और मन पर अंकुश लगाने वाला माना जाता है।
पापांकुशा और पाशांकुशा एकादशी में क्या अंतर है?
दोनों एक ही एकादशी के नाम हैं। ISKCON और कई पंचांग इसे पाशांकुशा कहते हैं, जिसमें पाश का अर्थ बंधन है।
पापांकुशा एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?
इस दिन भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा होती है, जिसमें वे शेषनाग पर शयन करते हैं और उनकी नाभि से कमल निकलता है। वैष्णव पंचांग में आश्विन को पद्मनाभ मास भी कहा जाता है।
पापांकुशा एकादशी की व्रत कथा क्या है?
विंध्याचल पर्वत पर रहने वाले क्रूर बहेलिये क्रोधन को यमदूतों ने बताया कि अगले दिन उसकी मृत्यु होगी। वह अंगिरा ऋषि की शरण में गया, जिन्होंने उसे पापांकुशा एकादशी का व्रत बताया। व्रत के प्रभाव से उसके पाप नष्ट हुए और उसे विष्णुलोक मिला।
पापांकुशा एकादशी की कथा किस पुराण में है?
परंपरा के अनुसार इसका महात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में है, जहाँ श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। कुछ लेख इसे पद्म पुराण से भी जोड़ते हैं।
पापांकुशा एकादशी दशहरे के कितने दिन बाद आती है?
यह विजयादशमी के ठीक बाद आती है, प्रायः अगले दिन और कभी तिथि बदलने से एक दिन और बाद। इसके लगभग चार दिन बाद शरद पूर्णिमा आती है।
क्या पापांकुशा एकादशी पर पानी पी सकते हैं?
निर्जला व्रत में पानी नहीं पिया जाता, लेकिन फलाहार या एक समय के व्रत में पानी, नारियल पानी और दूध ले सकते हैं। स्वास्थ्य ठीक न हो तो निर्जला व्रत न रखें।
क्या पापांकुशा एकादशी पर चावल खा सकते हैं?
नहीं, एकादशी पर चावल और चावल से बनी चीज़ें वर्जित मानी जाती हैं। व्रत के चावल (समा) अनाज नहीं हैं, इसलिए उन्हें खाया जा सकता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
फल, दूध, दही, मखाने, मेवे, साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, आलू और शकरकंद सेंधा नमक के साथ खा सकते हैं। अनाज, दालें, प्याज और लहसुन से बचें।
पापांकुशा एकादशी का पारण कब करें?
पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले किया जाता है। अपने शहर का समय इस पेज की तालिका में देखें।
स्मार्त और वैष्णव एकादशी में क्या अंतर है?
जब एकादशी तिथि दो दिन तक हो, तब गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव भक्त दूसरे दिन व्रत रखते हैं। जिस वर्ष ऐसा हो, तालिका में दोनों दिन दिखाए जाते हैं।
पापांकुशा एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ नमो नारायणाय, ॐ पद्मनाभाय नमः, विष्णु गायत्री मंत्र और शान्ताकारं भुजगशयनं वाला विष्णु ध्यान मंत्र इस दिन जपे जाते हैं।
पापांकुशा एकादशी पर क्या दान करें?
कथा में भूमि, गौ, अन्न, जल, वस्त्र, जूते और छाते के दान की महिमा बताई गई है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ज़रूरतमंदों को भोजन, कपड़े या चप्पल देना शुभ माना जाता है।
क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग यह व्रत रख सकते हैं?
हाँ, पर निर्जला व्रत की जगह फलाहार या एक समय भोजन वाला हल्का व्रत रखें। गर्भावस्था, मधुमेह, बुढ़ापा या नियमित दवाओं की स्थिति में पहले डॉक्टर से सलाह लें।
नवरात्रि का व्रत रखने के बाद क्या पापांकुशा एकादशी का व्रत रखना ज़रूरी है?
कोई बाध्यता नहीं है, पर श्रद्धा हो तो रख सकते हैं। नौ दिन के उपवास के बाद फलाहार या एक समय का व्रत अधिक उपयुक्त रहता है।
अगर पापांकुशा एकादशी का व्रत टूट जाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, बाकी दिन संयम और नाम जप जारी रखें, और अगली एकादशी श्रद्धा से रखें।
पापांकुशा एकादशी के व्रत से क्या फल मिलता है?
मान्यता है कि यह व्रत पापों का शमन करता है, यम के भय से बचाता है, पितरों का कल्याण करता है और स्वास्थ्य, धन तथा अंत में विष्णुलोक का आशीर्वाद देता है। इन्हें श्रद्धा के रूप में समझें।