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काल भैरव जयंती 2026 (Kaal Bhairav Jayanti): 1 दिसंबर, पूजा विधि, मुहूर्त, मंत्र और कथा

अंतिम अपडेट: 7 मिनट पढ़ें लेखक: admin
Kaal Bhairav Jayanti 2026 – काल भैरव जयंती पूजा विधि और मुहूर्त

Kaal Bhairav Jayanti (काल भैरव जयंती) भगवान शिव के उग्र और रक्षक रूप काल भैरव के प्रकट होने का दिन है। इसे भैरव अष्टमी और कालभैरव अष्टमी भी कहते हैं। वर्ष 2026 में काल भैरव जयंती मंगलवार, 1 दिसंबर को मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर है। मान्यता है कि इस दिन भैरव जी की पूजा से भय, शत्रु बाधा, रोग और नकारात्मक शक्तियाँ दूर होती हैं। नीचे Kaal Bhairav Jayanti का मुहूर्त, पूजा सामग्री, पूजा विधि, मंत्र, कालभैरवाष्टकम और कथा दी गई है।

Kaal Bhairav Jayanti 2026 – काल भैरव जयंती पूजा विधि और मुहूर्त

Kaal Bhairav Jayanti 2026: तारीख और मुहूर्त

विवरणसमय (2026)
काल भैरव जयंतीमंगलवार, 1 दिसंबर 2026
अष्टमी तिथि आरंभ1 दिसंबर, रात लगभग 12:12 (30 नवंबर की आधी रात के बाद)
अष्टमी तिथि समाप्त1 दिसंबर, रात लगभग 11:14
प्रदोष काल पूजा – दिल्लीशाम 5:23 से 7:47
नक्षत्रमघा (सुबह लगभग 9:01 तक), फिर पूर्वा फाल्गुनी

इस बार जयंती मंगलवार को है, जो भैरव जी और हनुमान जी दोनों की पूजा का दिन है — इसलिए इस दिन की पूजा विशेष फलदायी मानी जा रही है। ये समय हमारे पंचांग से निकाले गए हैं; अपने शहर का सूर्यास्त आज का पंचांग में देखें।

Kaal Bhairav Jayanti का महत्व

शिव पुराण के अनुसार काल भैरव भगवान शिव का रौद्र रूप हैं, जो समय (काल) के भी स्वामी हैं। वे भक्तों को भय से मुक्त करते हैं और अधर्म का नाश करते हैं। काल भैरव का वाहन श्वान (कुत्ता) है। उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है — वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव मंदिर में हाज़िरी लगाने की परंपरा है। उज्जैन के काल भैरव मंदिर में भी इस दिन विशेष उत्सव होता है।

मान्यता है कि काल भैरव की पूजा से शनि और राहु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं, कोर्ट-कचहरी और शत्रु बाधा में राहत मिलती है और घर की नकारात्मकता दूर होती है। तंत्र साधना में भी भैरव अष्टमी का बड़ा महत्व है, पर गृहस्थों के लिए सरल पूजा, जप और दान ही पर्याप्त है।

Kaal Bhairav Jayanti पूजा सामग्री

  • काल भैरव या भगवान शिव का चित्र / मूर्ति, शिवलिंग
  • सरसों का तेल, मिट्टी या लोहे का दीपक, काले तिल
  • काले या नीले फूल, बेलपत्र, धतूरा, अक्षत, रोली, सिंदूर
  • धूप, कपूर, अगरबत्ती
  • भोग के लिए इमरती या जलेबी, उड़द के बड़े, नारियल, पान-सुपारी
  • काले कुत्ते के लिए रोटी या दूध
  • दान के लिए काले कपड़े, कंबल, उड़द और सरसों का तेल

काल भैरव जयंती पूजा विधि — स्टेप बाय स्टेप

  1. सुबह स्नान करके भगवान शिव और काल भैरव के सामने व्रत या पूजा का संकल्प लें। अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार व्रत रखें।
  2. दिन में शिवलिंग पर जल, बेलपत्र और काले तिल चढ़ाएँ और “ॐ नमः शिवाय” का जाप करें।
  3. शाम को प्रदोष काल में पूजा स्थान पर भैरव जी का चित्र रखें और सरसों के तेल का चौमुखा दीपक जलाएँ।
  4. भैरव जी को सिंदूर, काले तिल, फूल और धूप अर्पित करें और इमरती, उड़द के बड़े, नारियल व पान का भोग लगाएँ।
  5. रुद्राक्ष की माला से “ॐ कालभैरवाय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें और कालभैरवाष्टकम का पाठ करें।
  6. अंत में ॐ जय शिव ओंकारा आरती करें और हनुमान चालीसा पढ़ें।
  7. काले कुत्ते को रोटी, दूध या मीठा खिलाएँ और ज़रूरतमंदों को कंबल, काले कपड़े और उड़द का दान करें। रात में भजन-कीर्तन करें।

काल भैरव के मंत्र

  • ॐ कालभैरवाय नमः — मूल मंत्र, 108 बार जाप करें।
  • ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं — बटुक भैरव मंत्र, संकट से रक्षा के लिए।
  • ॐ भयहरणं च भैरवः — भय दूर करने के लिए।

कालभैरवाष्टकम — पहला श्लोक

आदि शंकराचार्य द्वारा रचित कालभैरवाष्टकम भैरव जी की सबसे प्रसिद्ध स्तुति है। इसका पहला श्लोक:

देवराजसेव्यमानपावनाङ्घ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगम्बरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥

अर्थ: जिनके पवित्र चरण-कमलों की सेवा देवराज इंद्र करते हैं, जो सर्प का यज्ञोपवीत और चंद्रमा का मुकुट धारण करते हैं, जो कृपा के सागर हैं, जिनकी वंदना नारद आदि योगी करते हैं — उन दिगंबर, काशी नगरी के स्वामी काल भैरव को मैं भजता हूँ।

काल भैरव की उत्पत्ति की कथा

शिव पुराण की कथा के अनुसार एक बार ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं में यह विवाद हुआ कि सबसे श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्मा जी ने अहंकार में आकर भगवान शिव का अपमान कर दिया। तब शिव जी के क्रोध से एक उग्र तेज प्रकट हुआ — यही काल भैरव थे।

भैरव जी ने अपने नाखून से ब्रह्मा जी का वह पाँचवाँ सिर काट दिया, जिससे अपमानजनक शब्द निकले थे। इससे उन्हें ब्रह्महत्या का दोष लगा और ब्रह्मा जी का कपाल उनके हाथ से चिपक गया। दोष से मुक्ति के लिए भैरव जी तीनों लोकों में भटकते रहे। अंत में जब वे काशी पहुँचे, तो कपाल उनके हाथ से छूटकर गिर गया और वे दोषमुक्त हो गए। जहाँ कपाल गिरा, वह स्थान “कपाल मोचन” तीर्थ कहलाया।

तब भगवान शिव ने भैरव जी को काशी का रक्षक नियुक्त किया और वरदान दिया कि काशी में रहने वालों के पाप-पुण्य का हिसाब वही रखेंगे। तभी से वे “काशी के कोतवाल” कहलाते हैं।

Kaal Bhairav Jayanti के नियम

  • इस दिन किसी कुत्ते को मारें या भगाएँ नहीं — कुत्ते भैरव जी का वाहन हैं।
  • झूठ, क्रोध और किसी का अपमान करने से बचें।
  • माता-पिता और गुरु का सम्मान करें; भैरव जी अहंकार पसंद नहीं करते।
  • तामसिक भोजन और नशे से दूर रहें — गृहस्थों के लिए सात्विक पूजा ही श्रेष्ठ है।
  • बीमार, गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग व्रत की जगह केवल पूजा और दान करें।

Kaal Bhairav Jayanti 2026 — in English

Kaal Bhairav Jayanti, the appearance day of Lord Kaal Bhairav — the fierce, protective form of Lord Shiva — falls on Tuesday, 1 December 2026 (Margashirsha Krishna Ashtami). Ashtami tithi runs from about 12:12 AM to 11:14 PM on 1 December. Puja is best in the evening Pradosh Kaal, about 5:23 to 7:47 PM in Delhi. Read more on Wikipedia and see our व्रत-त्योहार कैलेंडर.

यह भी पढ़ें: शिव चालीसा · शिव तांडव स्तोत्रम्

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

काल भैरव जयंती 2026 कब है?

काल भैरव जयंती मंगलवार, 1 दिसंबर 2026 को मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी पर है। अष्टमी तिथि 1 दिसंबर रात लगभग 12:12 बजे शुरू होकर उसी दिन रात लगभग 11:14 बजे तक रहेगी।

काल भैरव की पूजा किस समय करें?

भैरव पूजा रात्रि में शुभ मानी जाती है। 1 दिसंबर को प्रदोष काल (दिल्ली में लगभग शाम 5:23 से 7:47) में पूजा सबसे अच्छी है, क्योंकि उस समय अष्टमी तिथि रहेगी। सुबह स्नान के बाद संकल्प और दिन में भी पूजा की जा सकती है।

काल भैरव को क्या भोग लगाते हैं?

काल भैरव को इमरती, जलेबी, उड़द के बड़े, नारियल, पान और सरसों के तेल का दीपक चढ़ाया जाता है। काले कुत्ते को रोटी या दूध खिलाना भी भैरव पूजा का हिस्सा माना जाता है।

काल भैरव को काशी का कोतवाल क्यों कहते हैं?

मान्यता है कि ब्रह्मा जी का पाँचवाँ सिर काटने के बाद ब्रह्महत्या के दोष से भैरव जी को काशी में मुक्ति मिली। तब भगवान शिव ने उन्हें काशी का रक्षक (कोतवाल) बनाया। इसलिए काशी विश्वनाथ के दर्शन से पहले काल भैरव के दर्शन किए जाते हैं।

कालाष्टमी और काल भैरव जयंती में क्या अंतर है?

हर महीने की कृष्ण अष्टमी को कालाष्टमी (मासिक भैरव अष्टमी) होती है। मार्गशीर्ष मास की कृष्ण अष्टमी को भैरव जी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए यही सबसे बड़ी कालाष्टमी काल भैरव जयंती कहलाती है।

What is Kaal Bhairav Jayanti in short?

Kaal Bhairav Jayanti marks the appearance of Lord Kaal Bhairav, the fierce form of Lord Shiva and guardian of Kashi. In 2026 it falls on Tuesday, 1 December (Margashirsha Krishna Ashtami); puja is best in the evening Pradosh Kaal.

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