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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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Ekadashi

कामिका एकादशी कब है? (Kamika Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण, तुलसी पूजा और सावन का महत्व

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin

कामिका एकादशी (Kamika Ekadashi) सावन (श्रावण) मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिस दिन भक्त भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करते हैं। यह देवशयनी एकादशी के बाद आने वाली एकादशी है, यानी भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने और चातुर्मास शुरू होने के बाद की पहली एकादशी। उत्तर भारत में यह सावन की पहली एकादशी भी होती है, इसलिए इस दिन विष्णु भक्ति के साथ सावन की शिव भक्ति का भाव भी जुड़ जाता है।

परंपरा के अनुसार कामिका एकादशी का व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। इसकी कथा एक क्रोधी क्षत्रिय की है, जिससे झगड़े में एक ब्राह्मण की हत्या हो गई थी और जिसने इसी व्रत से प्रायश्चित किया। इस एकादशी पर तुलसी दल से भगवान विष्णु की पूजा और घी या तिल के तेल के दीपक का दान विशेष रूप से बताया गया है।

यहाँ आप तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, पूजा विधि, मंत्र, तुलसी पूजा, दीपदान और व्रत के नियम विस्तार से जानेंगे।

कामिका एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: कामिका एकादशी 2026 (9 अगस्त) बीत चुकी है। अगली कामिका एकादशी (स्मार्त/गृहस्थ) गुरुवार, 29 जुलाई 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 29 जुलाई 2027 सुबह लगभग 7:33 बजे से 30 जुलाई सुबह लगभग 5:12 बजे तक रहेगी। वैष्णव (इस्कॉन आदि) परंपरा में व्रत शुक्रवार, 30 जुलाई 2027 को रखा जाएगा। स्मार्त व्रत का पारण 30 जुलाई को होगा।

अगली कामिका एकादशी

कामिका एकादशी 2027

29 जुलाई 2027, गुरुवार 270 दिन बाकी

मास और पक्ष
श्रावण कृष्ण
एकादशी तिथि
29 जुला 07:36 – 30 जुला 05:15
पारण (व्रत खोलने का समय)
30 जुला, 13:48 – 16:31
वैष्णव / इस्कॉन व्रत
30 जुलाई 2027, शुक्रवार · पारण: 31 जुला, 05:41 – 08:24
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
20269 अगस्त 2026, रविवार8 अग 14:01 –
9 अग 11:06
10 अग, 05:47 – 08:02
202729 जुलाई 2027, गुरुवार
वैष्णव: 30 जुला
29 जुला 07:36 –
30 जुला 05:15
30 जुला, 13:48 – 16:31
202818 जुलाई 2028, मंगलवार17 जुला 16:48 –
18 जुला 16:28
19 जुला, 05:35 – 08:20
20296 अगस्त 2029, सोमवार5 अग 09:37 –
6 अग 10:35
7 अग, 05:46 – 08:26

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका में अपने शहर के अनुसार व्रत की तारीख और पारण का सही समय देखें, क्योंकि सूर्योदय और हरि वासर के साथ समय बदलता है। 2027 में एकादशी तिथि किसी भी दिन के सूर्योदय को नहीं छूती, इसलिए स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव व्रत अलग-अलग दिन हैं, जैसा संक्षिप्त उत्तर में बताया गया है। अपने परिवार या गुरु परंपरा के अनुसार दिन चुनें।

कामिका एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“कामिका” नाम का अर्थ

“कामिका” शब्द “काम” से बना है, जिसका अर्थ है इच्छा या मनोकामना। इसलिए भक्त इसे मनोकामना पूरी करने वाली एकादशी मानते हैं। कई कथा पाठों में भी कहा गया है कि यह व्रत पापों का नाश करता है और व्रती की उचित इच्छाएँ पूरी करता है।

भक्ति परंपरा में सबसे बड़ी इच्छा भगवान की कृपा मानी जाती है। ध्यान दें कि यह नाम की एक प्रचलित व्याख्या है, पुराण में शब्द का अर्थ अलग से नहीं बताया गया है।

कामिका एकादशी के अन्य नाम

  • श्रावण कृष्ण एकादशी: उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में इसका सीधा नाम।
  • सावन की पहली एकादशी: उत्तर भारत में आम बोलचाल का नाम, क्योंकि पूर्णिमांत में सावन कृष्ण पक्ष से शुरू होता है।
  • आषाढ़ कृष्ण एकादशी: महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में इसी तिथि का नाम।

कामिका एकादशी को चैत्र शुक्ल की कामदा एकादशी से न मिलाएँ। दोनों नाम मिलते-जुलते हैं, पर तिथि, महीना और कथा अलग हैं।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग में महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। आषाढ़ पूर्णिमा (गुरु पूर्णिमा) के बाद सावन शुरू होता है, इसलिए वहाँ कामिका एकादशी श्रावण कृष्ण पक्ष में आती है। अमांत पंचांग में महीना अमावस्या पर समाप्त होता है, इसलिए वहाँ यही एकादशी आषाढ़ कृष्ण पक्ष की कहलाती है।

तारीख दोनों पंचांगों में एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। अंग्रेज़ी कैलेंडर में कामिका एकादशी प्रायः जुलाई या अगस्त में आती है। जिस साल अधिक मास होता है, उस साल यह अगस्त तक खिसक जाती है।

कामिका एकादशी का महत्व

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को कामिका एकादशी का माहात्म्य बताया। उन्होंने कहा कि इसकी महिमा स्वयं ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाई थी। माहात्म्य के अनुसार इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से एक बड़े यज्ञ का पुण्य मिलता है। कुछ पाठों में इसे वाजपेय यज्ञ और कुछ में अश्वमेध यज्ञ के बराबर बताया गया है।

माहात्म्य में कहा गया है कि इस दिन शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु की पूजा करने का फल गंगा, काशी, नैमिषारण्य और पुष्कर में स्नान से भी अधिक है। इसे केदारनाथ के दर्शन, सूर्य ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान और बछड़े सहित दूध देने वाली गाय के दान के बराबर भी बताया गया है।

इस एकादशी की सबसे खास बात तुलसी और दीपक की महिमा है। माहात्म्य के अनुसार भगवान विष्णु रत्नों और मोतियों से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने एक तुलसी दल से। इसी तरह इस दिन भगवान के सामने जलाए गए घी या तिल के तेल के दीपक का पुण्य इतना बड़ा बताया गया है कि चित्रगुप्त भी उसका हिसाब नहीं लगा पाते।

आध्यात्मिक संदेश

कामिका एकादशी की कथा का मूल संदेश है: क्रोध में किया गया एक पल का काम पूरा जीवन बदल सकता है। कथा का क्षत्रिय बुरा व्यक्ति नहीं था, पर गुस्से पर काबू न रख पाने से उससे बड़ा पाप हो गया। इसलिए यह एकादशी क्रोध पर नियंत्रण और वाणी पर संयम का संकल्प लेने का अच्छा अवसर है।

दूसरा संदेश पश्चाताप और सुधार का है। कथा में व्रत से पहले क्षत्रिय का सच्चा पछतावा आता है। परंपरा यह नहीं कहती कि व्रत कोई आसान रास्ता है जिससे जानबूझकर किए गए पाप धुल जाएँ। माहात्म्य स्वयं चेतावनी देता है कि इस भरोसे पर पाप करने की सोच रखना बहुत बड़ा अपराध है। व्रत तभी अर्थ रखता है जब मन बदले।

पुराणों में उल्लेख

इस्कॉन और कई वैष्णव स्रोत कामिका एकादशी का माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण से जोड़ते हैं, जिसमें युधिष्ठिर के प्रश्न पर श्रीकृष्ण ब्रह्मा-नारद संवाद सुनाते हैं। हिंदी के अधिकतर कथा पाठ किसी पुराण का नाम नहीं लेते। कुछ परंपराओं में यह कथा भीष्म पितामह द्वारा नारद जी को, और कुछ में वशिष्ठ मुनि द्वारा राजा दिलीप को सुनाई गई बताई जाती है।

क्षत्रिय और ब्राह्मण वाली कथा उत्तर भारत के लोक कथा पाठों में बहुत प्रचलित है, जबकि इस्कॉन के माहात्म्य पाठ में यह अलग कहानी के रूप में नहीं आती। इसलिए इस लेख में दोनों को अलग-अलग बताया गया है।

कामिका एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर का प्रश्न

देवशयनी एकादशी का माहात्म्य सुनने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे केशव, अब कृपा करके सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में बताइए। उसका नाम क्या है, उसकी विधि क्या है, उस दिन किस देवता की पूजा होती है और उसका फल क्या है?”

श्रीकृष्ण बोले, “हे राजन, इस एकादशी की महिमा एक बार ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाई थी। मैं वही कथा तुम्हें सुनाता हूँ। ध्यान से सुनो।”

ब्रह्मा जी द्वारा नारद जी को माहात्म्य

नारद जी ने ब्रह्मा जी से पूछा, “हे पितामह, सावन के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी क्या महिमा है?” ब्रह्मा जी ने कहा, “हे नारद, इस एकादशी का नाम कामिका है। इसकी कथा सुनने मात्र से यज्ञ का पुण्य मिलता है।”

ब्रह्मा जी ने बताया कि इस दिन चतुर्भुज भगवान विष्णु की धूप, दीप और नैवेद्य से पूजा करनी चाहिए। जो व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से पूजा करता है, उसे तीर्थों में स्नान से भी बड़ा फल मिलता है। जो पाप के बोझ से दबे हैं, वे भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार यह व्रत करें। रात भर जागरण करने वाला यमराज के भय से मुक्त रहता है।

फिर ब्रह्मा जी ने तुलसी और दीपक की महिमा बताई, जिसका वर्णन आगे तुलसी पूजा और दीपदान वाले खंडों में है।

क्रोधी क्षत्रिय और ब्राह्मण की कथा

लोक में प्रचलित कथा के अनुसार प्राचीन समय में एक गाँव में एक वीर क्षत्रिय रहता था। कुछ कथा पाठों में उसे गाँव का ठाकुर या ज़मींदार कहा गया है। वह धनी और दयालु था, पर उसका स्वभाव बहुत क्रोधी था। छोटी-छोटी बातों पर उसका गुस्सा भड़क उठता था।

एक दिन किसी बात पर उसका एक ब्राह्मण से विवाद हो गया। कुछ कथा पाठों में यह विवाद ज़मीन को लेकर बताया गया है। बात इतनी बढ़ी कि दोनों में हाथापाई हो गई। क्रोध में क्षत्रिय ने ऐसा प्रहार किया कि ब्राह्मण की मृत्यु हो गई।

पश्चाताप और समाज का बहिष्कार

गुस्सा उतरते ही क्षत्रिय को अपनी भूल का एहसास हुआ। वह बहुत दुखी हुआ और उसने सोचा कि कम से कम ब्राह्मण का अंतिम संस्कार (क्रिया-कर्म) वह स्वयं करवाए। पर जब वह इसके लिए आगे बढ़ा, तो गाँव के पंडितों ने उसे रोक दिया।

पंडितों ने कहा, “तुम पर ब्रह्महत्या का पाप है। जब तक तुम प्रायश्चित करके इस पाप से मुक्त नहीं हो जाते, हम न तुम्हें इस संस्कार में शामिल होने देंगे और न तुम्हारे घर भोजन करेंगे।” समाज ने उससे दूरी बना ली। क्षत्रिय बहुत व्याकुल हो गया, क्योंकि उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।

प्रायश्चित का उपाय

दुखी क्षत्रिय ने विनम्रता से पूछा, “हे विद्वानो, बताइए कि इस पाप से मुक्ति का क्या उपाय है?” अधिकतर कथा पाठों के अनुसार वह एक ज्ञानी मुनि के पास गया। कुछ पाठों में यही उपाय गाँव के पंडितों ने स्वयं बताया।

उत्तर मिला, “ब्रह्महत्या का पाप साधारण प्रायश्चित से नहीं धुलता। सावन मास के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का व्रत करो। उस दिन श्रद्धा से भगवान श्रीधर (विष्णु) की पूजा करो, उन्हें तुलसी दल अर्पित करो और रात भर जागरण करो। अगले दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा दो और उनका आशीर्वाद लो।”

व्रत और ब्रह्महत्या से मुक्ति

क्षत्रिय ने पूरे विधि-विधान से कामिका एकादशी का व्रत रखा। उसने दिन भर भगवान का नाम लिया, तुलसी दल से पूजा की और रात को भगवान की मूर्ति के पास बैठकर जागरण किया। रात में भगवान श्रीधर ने उसे दर्शन दिए। अधिकतर कथा पाठों में यह दर्शन स्वप्न में बताया गया है।

भगवान ने कहा, “हे क्षत्रिय, तुम्हारे सच्चे पश्चाताप और इस व्रत के प्रभाव से तुम ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त हो गए हो।” सुबह उसने ब्राह्मणों को भोजन कराया और दक्षिणा दी। इसके बाद उसने अपना क्रोधी स्वभाव छोड़ दिया और धर्म के मार्ग पर जीवन बिताया।

कथा का फल

परंपरा के अनुसार जो व्यक्ति कामिका एकादशी का व्रत करता है और यह कथा श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है, उसके पापों का नाश होता है और उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। कथा के अंत में भगवान विष्णु का स्मरण करें और आरती करें।

कथा के अलग-अलग रूप

  • प्रश्न किसने पूछा: अधिकतर पाठों में युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा। कुछ हिंदी पाठों में अर्जुन ने पूछा और श्रीकृष्ण ने भीष्म-नारद संवाद सुनाया।
  • मूल वक्ता: इस्कॉन पाठ में ब्रह्मा जी ने नारद जी को सुनाया। कुछ पाठों में भीष्म पितामह ने नारद जी को और कुछ में वशिष्ठ मुनि ने राजा दिलीप को।
  • मुख्य पात्र: कहीं वीर क्षत्रिय, कहीं ठाकुर या ज़मींदार, और कहीं केवल “एक क्रोधी व्यक्ति”। उसका नाम किसी पाठ में नहीं मिलता।
  • उपाय किसने बताया: अधिकतर पाठों में एक मुनि ने, कुछ में गाँव के पंडितों ने।
  • भगवान के दर्शन: अधिकतर पाठों में स्वप्न में, कुछ में जागरण की रात सीधे दर्शन।
  • कथा सुनने का फल: कुछ पाठों में वाजपेय यज्ञ के बराबर, कुछ में अश्वमेध यज्ञ के बराबर।

इन अंतरों से कथा का मूल भाव नहीं बदलता: क्रोध से हुआ पाप, सच्चा पश्चाताप और व्रत से मुक्ति।

कामिका एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सात्विक भोजन करें। प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन से दूर रहें।
  2. सूर्यास्त के बाद भोजन न करें या बहुत हल्का भोजन करें।
  3. पूजा के लिए तुलसी दल दशमी को ही तोड़कर रख लें, क्योंकि प्रचलित मान्यता में एकादशी को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते।
  4. घर और पूजा स्थान साफ़ करें।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करें। संभव हो तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिलाएँ।
  2. साफ़ कपड़े पहनें। पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय माना जाता है।
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: “मैं आज कामिका एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार रखूँगा/रखूँगी।”
  4. संकल्प में यह भी तय करें कि व्रत निर्जला होगा, फलाहार होगा या एक समय भोजन वाला।

भगवान विष्णु (श्रीधर रूप) की पूजा

  1. लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएँ और भगवान विष्णु की मूर्ति, चित्र या शालिग्राम स्थापित करें।
  2. घी का दीपक जलाएँ। कथा पाठों में इस दिन भगवान के “श्रीधर” रूप की पूजा बताई गई है।
  3. भगवान को जल, दूध या पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर साफ़ जल से स्नान कराएँ।
  4. चंदन का तिलक लगाएँ, पीले फूल, वस्त्र, अक्षत और फल अर्पित करें।
  5. दशमी को तोड़े गए तुलसी दल भगवान के चरणों में अर्पित करें। भोग में भी तुलसी दल रखें।
  6. धूप, दीप और नैवेद्य (फल, मिठाई, पंचामृत) अर्पित करें। कुछ पाठों में तिल अर्पित करना भी बताया गया है।
  7. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें, संभव हो तो 108 बार। विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी कर सकते हैं।
  8. कामिका एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  9. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती और एकादशी माता की आरती करें।

शाम की पूजा और दीपदान

  1. शाम को फिर से भगवान के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ।
  2. तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाएँ और तुलसी माता की आरती करें।
  3. संभव हो तो पास के विष्णु या कृष्ण मंदिर में दीपदान करें।
  4. सावन के भाव से कुछ भक्त शाम को भगवान शिव का भी स्मरण करते हैं। यह वैकल्पिक है।

रात्रि जागरण

  1. कथा में क्षत्रिय ने रात भर जागरण किया था, इसलिए इस एकादशी पर जागरण का विशेष महत्व माना जाता है।
  2. भजन, कीर्तन, नाम जप या गीता पाठ करते हुए जितना हो सके जागें। पूरी रात न जाग सकें तो देर रात तक भजन करें।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
  2. ब्राह्मण, साधु या किसी ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ और दक्षिणा या दान दें।
  3. तालिका में दिए पारण समय के भीतर भगवान को भोग लगाकर तुलसी दल डालकर व्रत खोलें।
  4. पारण के बाद दिन में सात्विक भोजन करें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु की मूर्ति, चित्र या शालिग्राम
  • लकड़ी की चौकी और पीला कपड़ा
  • तुलसी दल (दशमी को तोड़े हुए) और तुलसी मंजरी, यदि उपलब्ध हो
  • गंगाजल और साफ़ जल से भरा कलश
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • घी और तिल का तेल, दीपक और रुई की बत्तियाँ
  • धूप या अगरबत्ती, कपूर
  • चंदन, रोली, अक्षत (साबुत चावल)
  • पीले फूल और फूलों की माला
  • तिल (काले या सफ़ेद)
  • मौसमी फल, केला, सूखे मेवे
  • मिठाई या घर पर बना फलाहारी भोग
  • दक्षिणा और दान की सामग्री (अनाज, वस्त्र आदि)
  • व्रत कथा की पुस्तक या यह पेज, और आरती की पुस्तक

कामिका एकादशी के मंत्र

कामिका एकादशी के लिए अलग से कोई विशेष मंत्र प्राचीन पाठों में नहीं मिलता। इस दिन भगवान विष्णु के प्रसिद्ध मंत्रों का जप किया जाता है। मंत्र का शुद्ध उच्चारण करें, और जो मंत्र कठिन लगे, उसकी जगह भगवान का नाम श्रद्धा से लेना भी पूरा भाव रखता है।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: सभी प्राणियों में निवास करने वाले अंतर्यामी भगवान वासुदेव को नमस्कार है। यह बारह अक्षरों का मंत्र है और एकादशी पर सबसे अधिक जपा जाता है। तुलसी दल अर्पित करते समय भी इसी मंत्र का जप करें।

2. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम भगवान नारायण का चिंतन करते हैं और वासुदेव का ध्यान करते हैं। वे भगवान विष्णु हमारी बुद्धि को सही मार्ग पर प्रेरित करें। कथा का पात्र क्रोध में बुद्धि खो बैठा था, इसलिए सद्बुद्धि की यह प्रार्थना इस दिन बहुत सार्थक है।

3. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर लेटे हैं, जिनकी नाभि से कमल निकला है, जो देवताओं के स्वामी और पूरे संसार के आधार हैं, जो आकाश के समान व्यापक और मेघ के समान श्याम वर्ण वाले हैं, जो लक्ष्मी के पति और कमल नयन हैं, योगी जिन्हें ध्यान से पाते हैं, संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

4. श्रीकृष्ण नाम स्तुति

श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव।

अर्थ: हे श्रीकृष्ण, हे गोविन्द, हे हरि, हे मुरारि, हे नाथ, हे नारायण, हे वासुदेव। यह भगवान के नामों की सरल स्तुति है, जिसे जागरण में भजन की तरह गाया जाता है।

5. पंचाक्षर शिव मंत्र (सावन के भाव से, वैकल्पिक)

ॐ नमः शिवाय॥

अर्थ: भगवान शिव को नमस्कार है। कामिका एकादशी सावन में आती है, इसलिए कुछ भक्त विष्णु पूजा के बाद इस मंत्र से भगवान शिव का भी स्मरण करते हैं। एकादशी का मुख्य व्रत और पूजा भगवान विष्णु की ही रहती है।

कामिका एकादशी पर तुलसी पूजा का महत्व

कामिका एकादशी को तुलसी पूजा से सबसे अधिक जोड़ा जाता है। माहात्म्य के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु को तुलसी दल से पूजने वाला पापों से वैसे ही अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता। परंपरा के अनुसार एक तुलसी पत्ता सोने-चाँदी के दान से भी अधिक प्रिय है।

माहात्म्य में तुलसी की महिमा

  • तुलसी दल से भगवान विष्णु की पूजा करने से पापों का नाश होता है।
  • भगवान रत्न, मोती और मणियों से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने तुलसी दल से।
  • नई तुलसी मंजरी अर्पित करने से जीवन भर के पाप दूर होने की मान्यता है।
  • इस दिन तुलसी के दर्शन मात्र से पाप दूर होते हैं और तुलसी को स्पर्श करके प्रणाम करने से रोग दूर होने की मान्यता है।
  • तुलसी का पौधा लगाने वाला भगवान के धाम में वास करता है, ऐसा माहात्म्य में कहा गया है।

ये बातें आस्था की हैं। रोग होने पर डॉक्टर से इलाज ज़रूर कराएँ।

तुलसी दल कब तोड़ें?

प्रचलित मान्यता है कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। इसलिए पूजा और भोग के लिए तुलसी दल एक दिन पहले, दशमी को तोड़कर साफ़ बर्तन में रख लें। तुलसी के पत्ते हमेशा हाथ से तोड़ें, कैंची या चाकू से नहीं, और तोड़ने से पहले तुलसी माता को प्रणाम करें।

तुलसी को जल चढ़ाएँ या नहीं?

इस विषय पर दो अलग बातें मिलती हैं। कई घरों में यह मान्यता है कि तुलसी माता स्वयं एकादशी का निर्जला व्रत रखती हैं, इसलिए उस दिन तुलसी को जल नहीं चढ़ाया जाता। दूसरी ओर, इस्कॉन के कामिका एकादशी माहात्म्य पाठ में इस दिन तुलसी को सींचने को यम के भय से मुक्ति देने वाला बताया गया है।

सरल उपाय यह है कि अपने परिवार और गुरु परंपरा की रीति अपनाएँ। जिस घर में एकादशी को जल न चढ़ाने की परंपरा है, वहाँ शाम को तुलसी के पास दीपक जलाकर प्रणाम और परिक्रमा करें। तुलसी विवाह की पूरी विधि के लिए हमारा तुलसी विवाह पूजा विधि लेख पढ़ें।

कामिका एकादशी पर दीपदान

कामिका एकादशी के माहात्म्य में दीपक का बहुत सुंदर वर्णन है। कहा गया है कि इस दिन भगवान विष्णु या तुलसी के सामने जलाए गए घी के दीपक का पुण्य इतना है कि यमराज के लेखाकार चित्रगुप्त भी उसका हिसाब नहीं लगा पाते।

  • भगवान के सामने घी का दीपक जलाने से पितरों को स्वर्ग में अमृत पान का सुख मिलने की मान्यता है।
  • घी या तिल के तेल का दीपक जलाने वाला पापों से मुक्त होकर सूर्य लोक जाता है, ऐसा माहात्म्य में कहा गया है।
  • जो लोग व्रत नहीं रख पाते, वे भी तुलसी पूजा और दीपदान से इस दिन का पुण्य पा सकते हैं, ऐसा पाठ बताता है।

दीपदान कैसे करें

  1. शाम को सूर्यास्त के आसपास मिट्टी या पीतल के दीपक में घी या तिल का तेल डालें।
  2. एक दीपक भगवान विष्णु के सामने, एक तुलसी के पास और संभव हो तो एक मंदिर में जलाएँ।
  3. दीपक जलाते समय “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और अपने पितरों का स्मरण करें।
  4. जागरण में दीपक जलता रहे तो उसे सुरक्षित जगह पर रखें, पास में पर्दे या कपड़े न हों।

सावन, चातुर्मास और कामिका एकादशी

देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है। कामिका एकादशी इसके बाद आने वाली पहली एकादशी है। कुछ लोग देवशयनी को भी गिनकर इसे चातुर्मास की दूसरी एकादशी कहते हैं। चातुर्मास में भी एकादशी की पूजा पहले की तरह ही होती है।

परंपरा में साल के बारह महीनों के लिए भगवान विष्णु के बारह नाम माने जाते हैं, और श्रावण मास के लिए उनका नाम “श्रीधर” है, यानी लक्ष्मी (श्री) को धारण करने वाले। इसीलिए कथा में भी क्षत्रिय को भगवान श्रीधर की पूजा का उपाय बताया गया है।

विष्णु और शिव की एक साथ आराधना

उत्तर भारत में कामिका एकादशी सावन के पहले पखवाड़े में आती है, जब हर ओर शिव भक्ति, सोमवार व्रत और कांवड़ यात्रा का माहौल होता है। परंपरा के अनुसार चातुर्मास में जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं, तब सृष्टि के संचालन का भार भगवान शिव पर माना जाता है। इसी कारण कई भक्त इस एकादशी को विष्णु और शिव दोनों की कृपा का दिन मानते हैं।

इसलिए कुछ परिवार सुबह भगवान विष्णु की मुख्य पूजा करने के बाद शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं या “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हैं। यह एक लोक परंपरा है, शास्त्रीय विधि का अनिवार्य हिस्सा नहीं। ध्यान रखें कि अमांत पंचांग वाले क्षेत्रों में यह एकादशी आषाढ़ में आती है और वहाँ सावन बाद में शुरू होता है।

कामिका एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल: केला, सेब, पपीता, अनार, नाशपाती आदि
  • दूध, दही, छाछ, पनीर, मखाने
  • कुट्टू, सिंघाड़ा और राजगिरा का आटा (जो परिवार फलाहार में इन्हें लेते हैं)
  • साबूदाना, आलू, शकरकंद, अरबी
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
  • मूँगफली, बादाम, अखरोट, किशमिश जैसे सूखे मेवे
  • नारियल पानी, नींबू पानी और सादा पानी (यदि निर्जला व्रत नहीं है)

क्या न खाएँ

  • चावल: एकादशी पर चावल न खाने का नियम सबसे प्रसिद्ध है। पारण के दिन चावल खाया जा सकता है।
  • गेहूँ, जौ, दालें, चना, बेसन और हर तरह का अनाज
  • प्याज़, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और मदिरा
  • साधारण नमक (सेंधा नमक लें)
  • कुछ परिवार इस दिन बैंगन भी नहीं बनाते।

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के पारण तक अन्न और जल दोनों नहीं लिए जाते। यह सबसे कठिन व्रत है। कामिका एकादशी सावन की उमस भरी गर्मी में आती है, इसलिए इसे केवल वही लोग रखें जो पूरी तरह स्वस्थ हैं और पहले ऐसा व्रत रख चुके हैं।

मधुमेह, ब्लड प्रेशर, किडनी या हृदय रोग, गर्भावस्था, स्तनपान, बुज़ुर्ग और नियमित दवा लेने वाले लोग निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें। चक्कर, कमज़ोरी या बेचैनी लगे तो पानी या फल ले लें। भगवान भाव देखते हैं, शरीर को कष्ट देना व्रत का उद्देश्य नहीं है।

फलाहार व्रत

फलाहार व्रत में दिन में फल, दूध और ऊपर बताई गई फलाहारी चीज़ें ली जाती हैं, और अनाज नहीं लिया जाता। अधिकतर गृहस्थ यही व्रत रखते हैं। दिन में थोड़ा-थोड़ा खाएँ और पर्याप्त पानी पिएँ, ताकि भजन और जागरण में ऊर्जा बनी रहे।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा व्रत नहीं रख पाते, वे दिन में एक बार सात्विक फलाहारी भोजन करते हैं। बच्चे, बीमार और बुज़ुर्ग लोग इसी तरह का हल्का व्रत रख सकते हैं, या केवल चावल छोड़कर पूजा और कथा कर सकते हैं।

कामिका एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण यानी व्रत खोलना। एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और द्वादशी समाप्त होने से पहले किया जाता है।

द्वादशी का पहला चौथाई भाग हरि वासर कहलाता है। इस समय पारण नहीं किया जाता, हरि वासर समाप्त होने का इंतज़ार करें। पारण के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है, और दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचने की सलाह दी जाती है, जब तक कोई और विकल्प न हो।

जिस वर्ष एकादशी तिथि द्वादशी के सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है, जैसे 2027 में, उस सुबह हरि वासर देर तक रह सकता है। पारण का सही समय अपने शहर के अनुसार ऊपर दी गई तालिका में ज़रूर देखें। जो लोग वैष्णव परंपरा में अगले दिन व्रत रखते हैं, उनका पारण उसके अगले दिन होगा, वह भी तालिका में दिखाया जाता है।

पारण कैसे करें

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें।
  2. भगवान को भोग लगाएँ और उसमें तुलसी दल रखें।
  3. किसी ब्राह्मण, साधु या ज़रूरतमंद को भोजन, अनाज या दक्षिणा दें।
  4. भगवान का प्रसाद, तुलसी दल या थोड़ा जल लेकर व्रत खोलें।
  5. फिर हल्का सात्विक भोजन करें। चाहें तो इस दिन चावल खा सकते हैं।

कामिका एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • भगवान विष्णु की श्रीधर रूप में तुलसी दल से पूजा करें।
  • शाम को भगवान और तुलसी के पास घी या तिल के तेल का दीपक जलाएँ।
  • व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ बैठकर सुनें।
  • “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • संभव हो तो रात्रि जागरण में भजन-कीर्तन करें।
  • अपने क्रोध पर नज़र रखें। किसी से विवाद हो तो शांति से बात करें या वहाँ से हट जाएँ।
  • अगर किसी के साथ आपने गलत किया है, तो इस दिन माफ़ी माँगने का साहस करें।
  • अनाज, वस्त्र, छाता या भोजन का दान करें। सावन की बारिश में ज़रूरतमंदों को छाता या तिरपाल देना भी उपयोगी दान है।

क्या न करें

  • चावल और अन्य अनाज न खाएँ।
  • प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा और तंबाकू से दूर रहें।
  • एकादशी को तुलसी के पत्ते न तोड़ें, दशमी को ही तोड़ लें।
  • गुस्सा, झगड़ा, झूठ, निंदा और कटु वचन से बचें। इस एकादशी की कथा ही क्रोध के परिणाम की है।
  • व्रत के नाम पर शरीर को ज़रूरत से ज़्यादा कष्ट न दें।
  • हरि वासर में पारण न करें।

कामिका एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: कामिका एकादशी का व्रत रख लो, फिर कोई भी पाप करो, सब माफ़ हो जाएगा।

सच्चाई: परंपरा ऐसा नहीं कहती। कथा का क्षत्रिय पहले सच्चे मन से पछताया, फिर व्रत किया और बाद में अपना स्वभाव भी बदला। माहात्म्य पाठ स्वयं चेतावनी देता है कि व्रत के भरोसे जानबूझकर पाप करने की सोच रखना बहुत बड़ा अपराध है। व्रत सुधार की शुरुआत है, गलत काम का लाइसेंस नहीं। जिसे हमसे चोट पहुँची है, उससे माफ़ी माँगना और भरपाई करना भी हमारा कर्तव्य है।

मिथक: एकादशी पर तुलसी को छूना भी मना है।

सच्चाई: प्रचलित मान्यता केवल यह है कि एकादशी को तुलसी के पत्ते न तोड़ें। कामिका एकादशी के माहात्म्य में तो तुलसी के दर्शन, स्पर्श और प्रणाम को पुण्य देने वाला बताया गया है। आप तुलसी को प्रणाम करें, दीपक जलाएँ और परिक्रमा करें। जल चढ़ाने के बारे में अपने परिवार की रीति अपनाएँ।

मिथक: बिना निर्जला व्रत के कामिका एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: शास्त्र सामर्थ्य के अनुसार व्रत की बात करते हैं। माहात्म्य में यह भी कहा गया है कि जो व्रत नहीं रख पाते, वे तुलसी पूजा और दीपदान से भी इस दिन का पुण्य पा सकते हैं। फलाहार या एक समय भोजन वाला व्रत भी पूरी श्रद्धा से रखा जा सकता है।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और कुछ बुरा होगा।

सच्चाई: भूल से कुछ खा लेने पर डरने की ज़रूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, बाकी दिन व्रत के नियम निभाएँ और पूजा जारी रखें। व्रत का अर्थ भय नहीं, भक्ति है।

मिथक: सावन में आती है तो इस दिन विष्णु की जगह केवल शिव की पूजा करनी चाहिए।

सच्चाई: कामिका एकादशी भगवान विष्णु की एकादशी है और इसकी मुख्य पूजा उन्हीं की होती है। सावन के भाव से कुछ भक्त साथ में शिव जी का भी स्मरण करते हैं, जो एक सुंदर लोक परंपरा है। दोनों में कोई विरोध नहीं है।

मिथक: व्रत से शरीर पूरी तरह “डिटॉक्स” हो जाता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी व्रत एक धार्मिक साधना है, किसी बीमारी का इलाज या डिटॉक्स का तरीका नहीं। मधुमेह, गर्भावस्था, बुढ़ापे, कमज़ोरी या नियमित दवा की स्थिति में कठोर या निर्जला व्रत से पहले डॉक्टर की सलाह लें। ऐसे लोग फलाहार या केवल पूजा-जप से भी भक्ति कर सकते हैं।

कामिका एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे दिए गए लाभ परंपरा और आस्था पर आधारित हैं। इन्हें भक्ति का फल समझें, कोई गारंटी नहीं।

  • पापों से मुक्ति: मान्यता है कि यह व्रत जाने-अनजाने में हुए पापों का नाश करता है, जैसे कथा में ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली।
  • यज्ञ और तीर्थ का पुण्य: माहात्म्य के अनुसार इसकी कथा सुनने से यज्ञ का और व्रत से बड़े तीर्थों में स्नान से अधिक पुण्य मिलता है।
  • मनोकामना पूर्ति: “कामिका” नाम के अनुसार भक्त इसे उचित इच्छाएँ पूरी करने वाली एकादशी मानते हैं।
  • पितरों की प्रसन्नता: दीपदान से पितरों को स्वर्ग में सुख मिलने की मान्यता है।
  • यम के भय से मुक्ति: जागरण और तुलसी सेवा को यम के भय से बचाने वाला बताया गया है।
  • स्वभाव में सुधार: कथा की सीख अपनाकर व्यक्ति अपने गुस्से और कटु वचन पर काबू पाने की ओर बढ़ता है।
  • विष्णु और शिव दोनों की कृपा: सावन में आने के कारण भक्त इसे दोनों देवों की कृपा का दिन मानते हैं।

संबंधित एकादशी और पाठ

कामिका एकादशी से ठीक पहले आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी आती है, जिससे चातुर्मास शुरू होता है और जिसका माहात्म्य सुनने के बाद युधिष्ठिर ने कामिका एकादशी के बारे में पूछा था। कामिका के बाद सावन शुक्ल पक्ष की श्रावण पुत्रदा एकादशी आती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। रोज़ की तिथि और शुभ समय के लिए आज का पंचांग देखें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

कामिका एकादशी हमें याद दिलाती है कि क्रोध का एक पल बहुत कुछ छीन सकता है, पर सच्चा पश्चाताप और भगवान की शरण फिर से नई शुरुआत का रास्ता खोल देते हैं। इस दिन एक तुलसी पत्ता प्रेम से अर्पित करें, एक दीपक जलाएँ और मन से किसी कड़वाहट को विदा करें। भगवान श्रीधर आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

कामिका एकादशी कब है 2027 में?

कामिका एकादशी 2026 बीत चुकी है। 2027 की तारीख, एकादशी तिथि और आपके शहर का पारण समय इस पेज पर ऊपर दिए संक्षिप्त उत्तर और तारीख तालिका में देखें। तालिका आने वाले वर्षों की तारीखें भी अपने आप दिखाती है।

कामिका एकादशी किस महीने में आती है?

उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह श्रावण (सावन) कृष्ण पक्ष की एकादशी है, और अमांत पंचांग में आषाढ़ कृष्ण पक्ष की। तारीख दोनों में एक ही होती है, केवल महीने का नाम बदलता है। यह प्रायः जुलाई या अगस्त में आती है।

कामिका एकादशी का नाम कामिका क्यों है?

“कामिका” शब्द “काम” यानी इच्छा से जुड़ा है, इसलिए भक्त इसे मनोकामना पूरी करने वाली एकादशी मानते हैं। यह नाम की प्रचलित व्याख्या है, पुराण में शब्द का अर्थ अलग से नहीं बताया गया।

कामिका एकादशी की व्रत कथा क्या है?

प्रचलित कथा में एक क्रोधी क्षत्रिय से झगड़े में एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गई और पंडितों ने उसे ब्रह्महत्या का दोषी मानकर संस्कार से रोक दिया। एक मुनि के कहने पर उसने कामिका एकादशी का व्रत और रात्रि जागरण किया। रात में भगवान श्रीधर ने स्वप्न में दर्शन देकर उसे पाप से मुक्त बताया।

कामिका एकादशी पर किस भगवान की पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है। कथा पाठों में उनके श्रीधर रूप और शंख-चक्र-गदा धारी चतुर्भुज रूप की पूजा बताई गई है। सावन होने के कारण कुछ भक्त साथ में भगवान शिव का भी स्मरण करते हैं।

कामिका एकादशी का वर्णन किस पुराण में है?

इस्कॉन और कई वैष्णव स्रोत इसका माहात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण से जोड़ते हैं, जिसमें श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को ब्रह्मा-नारद संवाद सुनाते हैं। हिंदी के अधिकतर कथा पाठ किसी पुराण का नाम नहीं लेते।

कामिका एकादशी पर तुलसी का क्या महत्व है?

माहात्म्य के अनुसार भगवान विष्णु रत्नों और मोतियों से उतने प्रसन्न नहीं होते, जितने एक तुलसी दल से। इस दिन तुलसी दल से पूजा, तुलसी के दर्शन और प्रणाम को पाप दूर करने वाला माना गया है।

क्या एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ सकते हैं?

प्रचलित मान्यता है कि एकादशी को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। इसलिए पूजा के लिए तुलसी दल एक दिन पहले, दशमी को हाथ से तोड़कर रख लें।

कामिका एकादशी पर दीपदान का क्या महत्व है?

माहात्म्य में कहा गया है कि इस दिन भगवान या तुलसी के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाने का पुण्य चित्रगुप्त भी नहीं गिन पाते, और इससे पितरों को सुख मिलता है। शाम को भगवान के सामने, तुलसी के पास और संभव हो तो मंदिर में दीपक जलाएँ।

कामिका एकादशी व्रत में क्या खाना चाहिए?

फलाहार व्रत में फल, दूध, दही, मखाने, साबूदाना, आलू, शकरकंद, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक लिया जा सकता है। अनाज, दाल और साधारण नमक नहीं लिया जाता।

क्या कामिका एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, एकादशी पर चावल और हर तरह का अनाज नहीं खाया जाता। चावल पारण वाले दिन, यानी द्वादशी को खाया जा सकता है।

क्या कामिका एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

हाँ, अगर आपने निर्जला व्रत का संकल्प नहीं लिया है तो पानी पी सकते हैं। फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी, नारियल पानी और नींबू पानी लिया जाता है।

कामिका एकादशी का पारण कब करें?

पारण द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद, हरि वासर समाप्त होने पर और द्वादशी खत्म होने से पहले किया जाता है। अपने शहर का सही पारण समय इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

स्मार्त और वैष्णव कामिका एकादशी में क्या अंतर है?

स्मार्त (गृहस्थ) और वैष्णव (इस्कॉन आदि) परंपराएँ एकादशी तय करने के लिए सूर्योदय के अलग नियम मानती हैं, इसलिए कभी-कभी दोनों के व्रत अलग दिन पड़ते हैं। 2027 में भी ऐसा है। गृहस्थ प्रायः स्मार्त तारीख मानते हैं, दोनों तारीखें तालिका में देखें।

कामिका एकादशी और सावन का क्या संबंध है?

उत्तर भारत में यह सावन की पहली एकादशी है। परंपरा के अनुसार चातुर्मास में भगवान विष्णु योगनिद्रा में होते हैं और सृष्टि का भार भगवान शिव पर माना जाता है, इसलिए भक्त इसे विष्णु और शिव दोनों की कृपा का दिन मानते हैं।

क्या गर्भवती महिलाएँ और बुज़ुर्ग कामिका एकादशी का व्रत रख सकते हैं?

हाँ, पर कठोर या निर्जला व्रत न रखें। गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, मधुमेह के रोगी और नियमित दवा लेने वाले डॉक्टर की सलाह से फलाहार या एक समय भोजन का व्रत रखें, या केवल पूजा और कथा करें।

अगर कामिका एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

डरने की ज़रूरत नहीं है। भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, बाकी दिन व्रत के नियम निभाएँ और पूजा-जप जारी रखें।

कामिका एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

सबसे प्रचलित मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” है, जिसे 108 बार जप सकते हैं। विष्णु गायत्री मंत्र और “शान्ताकारं भुजगशयनं” ध्यान मंत्र भी पढ़े जाते हैं।

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