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रविवार, 1 नवंबर 2026 · कार्तिक कृष्ण सप्तमी · आज अहोई अष्टमी · वि.सं. 2083 आज का पंचांग → हिंदीEnglish
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विजया एकादशी कब है? (Vijaya Ekadashi 2027) व्रत कथा, पूजा विधि, पारण और सप्तधान्य कलश स्थापना

अंतिम अपडेट: 29 मिनट पढ़ें लेखक: admin
विजया एकादशी – समुद्र तट पर कलश पूजन करते श्रीराम और लक्ष्मण, हनुमान जी और राम सेतु बनाती वानर सेना (Vijaya Ekadashi)

विजया एकादशी (Vijaya Ekadashi) फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी है, जिसे विजय और सफलता देने वाला व्रत माना जाता है। इसका नाम ही इसका भाव बताता है — “विजया” यानी विजय दिलाने वाली। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप की पूजा होती है और व्रत रखकर जीवन की बाधाओं पर विजय की कामना की जाती है।

इस एकादशी की सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीराम से जुड़ी है। मान्यता है कि लंका पर चढ़ाई से पहले, जब वानर सेना समुद्र के किनारे रुकी हुई थी, तब वकदाल्भ्य (बकदाल्भ्य) मुनि की सलाह पर श्रीराम ने अपने सेनापतियों के साथ यही व्रत रखा था। इसके बाद समुद्र पार हुआ और रावण पर विजय मिली। इसलिए इसे “लंका विजय से पहले का व्रत” भी कहा जाता है।

विजया एकादशी की एक खास पहचान है — सप्तधान्य कलश स्थापना। व्रत कथा में ही एक कलश को सात अनाजों पर स्थापित करके उस पर भगवान नारायण की प्रतिमा रखने की विधि बताई गई है। नीचे आपको विजया एकादशी की तारीख, पारण समय, पूरी व्रत कथा, कलश स्थापना सहित स्टेप बाय स्टेप पूजा विधि, मंत्र, व्रत के नियम और इससे जुड़े सवालों के जवाब सरल भाषा में मिलेंगे।

विजया एकादशी कब है? 2027 की तारीख, तिथि और पारण समय

संक्षिप्त उत्तर: विजया एकादशी 2026 (13 फरवरी) बीत चुकी है। अगली विजया एकादशी गुरुवार, 4 मार्च 2027 को है। नई दिल्ली के पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 3 मार्च सुबह 4:44 बजे शुरू होकर 4 मार्च सुबह 7:24 बजे समाप्त होगी, और पारण 5 मार्च को सुबह 6:42 से 9:03 बजे के बीच किया जा सकता है।

अगली विजया एकादशी

विजया एकादशी 2027

3 मार्च 2027, बुधवार 122 दिन बाकी

मास और पक्ष
फाल्गुन कृष्ण
एकादशी तिथि
3 मार्च 04:46 – 4 मार्च 07:26
पारण (व्रत खोलने का समय)
4 मार्च, 14:03 – 16:02
वैष्णव / इस्कॉन व्रत
4 मार्च 2027, गुरुवार · पारण: 5 मार्च, 06:42 – 09:02
वर्षव्रत की तारीखएकादशी तिथिपारण
202613 फ़रवरी 2026, शुक्रवार12 फ़र 12:24 –
13 फ़र 14:28
14 फ़र, 07:00 – 09:14
20273 मार्च 2027, बुधवार
वैष्णव: 4 मार्च
3 मार्च 04:46 –
4 मार्च 07:26
4 मार्च, 14:03 – 16:02
202820 फ़रवरी 2028, रविवार
वैष्णव: 21 फ़र
20 फ़र 03:50 –
21 फ़र 05:48
21 फ़र, 13:43 – 15:59
20299 फ़रवरी 2029, शुक्रवार8 फ़र 12:46 –
9 फ़र 12:35
10 फ़र, 07:03 – 09:16

तारीखें चुने गए शहर (दिल्ली) के सूर्योदय के अनुसार स्मार्त परंपरा की हैं और हर साल अपने आप आगे बढ़ती हैं। अपने शहर का समय देखने के लिए ऊपर शहर चुनें। समय लगभग हैं, अपने स्थानीय पंचांग से मिलान कर लें।

ऊपर दी गई तालिका आपके शहर के अनुसार इस वर्ष और आने वाले वर्षों की तारीख और पारण समय अपने-आप दिखाती है। सूर्योदय हर शहर में अलग समय पर होता है, इसलिए पारण का समय अपने शहर के अनुसार ही देखें।

स्मार्त और वैष्णव: जब एकादशी तिथि दो सूर्योदयों को छूती है, तो कभी-कभी गृहस्थ (स्मार्त) और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अलग-अलग दिन व्रत रखते हैं। 2027 में एकादशी तिथि दोनों दिन के सूर्योदय पर है, इसलिए कुछ पंचांगों में तारीख को लेकर हल्का अंतर दिख सकता है। द्रिक पंचांग सहित कई पंचांग नई दिल्ली के लिए दोनों परंपराओं का व्रत 4 मार्च को बताते हैं, जबकि कुछ पंचांग (और हमारी तालिका की गणना) गृहस्थों के लिए 3 मार्च और वैष्णवों के लिए 4 मार्च दिखाते हैं। ऐसे में अपनी पारिवारिक परंपरा, स्थानीय मंदिर या पुरोहित की सलाह के अनुसार दिन चुनें।

विजया एकादशी का अर्थ और अन्य नाम

“विजया” शब्द “विजय” से बना है, जिसका अर्थ है जीत, सफलता या किसी कठिनाई पर पार पाना। इस तरह विजया एकादशी का अर्थ हुआ “विजय दिलाने वाली एकादशी”। व्रत कथा में स्वयं ब्रह्मा जी कहते हैं कि यह व्रत करने वाले को विजय प्राप्त होती है, और श्रीराम के लंका विजय के प्रसंग ने इस नाम को और भी प्रसिद्ध बना दिया।

विजया एकादशी के अन्य नाम

  • फाल्गुन कृष्ण एकादशी — उत्तर भारत (पूर्णिमांत कैलेंडर) में तिथि के आधार पर सामान्य नाम।
  • माघ कृष्ण एकादशी — दक्षिण और पश्चिम भारत (अमांत कैलेंडर) में इसी तिथि का नाम।
  • विजया एकादशी व्रत / विजय एकादशी — बोलचाल में कई लोग इसे विजय एकादशी भी कहते हैं।
  • Vijaya Ekadasi — इस्कॉन और वैष्णव कैलेंडरों में यही नाम मिलता है।

पूर्णिमांत और अमांत कैलेंडर में महीना

उत्तर भारत में पूर्णिमांत कैलेंडर चलता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है। दक्षिण व पश्चिम भारत (महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश आदि) में अमांत कैलेंडर चलता है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। कृष्ण पक्ष के महीने का नाम इन दोनों कैलेंडरों में एक महीना आगे-पीछे हो जाता है।

इसलिए विजया एकादशी उत्तर भारत में फाल्गुन कृष्ण एकादशी कहलाती है, जबकि अमांत कैलेंडर में यही दिन माघ कृष्ण एकादशी होता है। दिन एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है। यह एकादशी आमतौर पर फरवरी या मार्च में आती है।

क्रम में देखें तो इससे पहले माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी आती है, और इसके बाद फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी। विजया एकादशी के कुछ ही दिन बाद महाशिवरात्रि का पर्व आता है, इसलिए यह समय भक्ति की दृष्टि से बहुत पावन माना जाता है।

विजया एकादशी का महत्व

वर्ष भर की चौबीस एकादशियों में हर एक का अपना विशेष फल बताया गया है। विजया एकादशी का संबंध विजय, साहस और कठिन कार्यों में सफलता से है। यही कारण है कि नए काम की शुरुआत, बड़ी परीक्षा या किसी कठिन संघर्ष से पहले कई लोग यह व्रत श्रद्धा से रखते हैं।

धार्मिक महत्व

परंपरा के अनुसार विजया एकादशी का व्रत पुराने और नए, दोनों प्रकार के पापों का नाश करने वाला माना गया है। कथा में ब्रह्मा जी इसे “सब व्रतों में उत्तम” बताते हैं। मान्यता है कि श्रद्धा से यह व्रत करने वाला व्यक्ति इस लोक और परलोक, दोनों में विजय प्राप्त करता है।

इस एकादशी की पूजा में भगवान विष्णु के साथ भगवान श्रीराम का स्मरण भी किया जाता है, क्योंकि कथा उन्हीं से जुड़ी है। कई घरों में इस दिन राम नाम का जप, रामचरितमानस के सुंदरकांड या लंकाकांड का पाठ भी किया जाता है।

आध्यात्मिक संदेश

विजया एकादशी का गहरा संदेश यह है कि बाहर की लड़ाई जीतने से पहले मन को जीतना पड़ता है। भगवान श्रीराम स्वयं विष्णु के अवतार थे, फिर भी उन्होंने ऋषि की सलाह मानी, विनम्रता से व्रत किया और पूरी तैयारी के बाद ही आगे बढ़े। यह हमें सिखाता है कि सच्ची सफलता अहंकार से नहीं, बल्कि संयम, धैर्य, सही मार्गदर्शन और ईश्वर पर भरोसे से आती है।

कथा में श्रीराम अकेले नहीं, बल्कि अपने सेनापतियों के साथ व्रत करते हैं। इसका भाव यह भी है कि किसी बड़े लक्ष्य में पूरी टीम का मन एक होना चाहिए। उपवास इंद्रियों पर नियंत्रण सिखाता है, और जो अपनी इंद्रियों को जीत लेता है, उसके लिए बाहर की चुनौतियाँ आसान हो जाती हैं।

पुराणों में उल्लेख

परंपरा के अनुसार विजया एकादशी का माहात्म्य स्कंद पुराण में बताया गया है, और पद्म पुराण के एकादशी माहात्म्य प्रसंगों में भी इसका वर्णन मिलता है। इन प्रसंगों में धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से फाल्गुन कृष्ण एकादशी के बारे में पूछते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें वह कथा सुनाते हैं, जो कभी ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को सुनाई थी।

कथा के अंत में कहा गया है कि इस व्रत का माहात्म्य पढ़ने या सुनने मात्र से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। ये बातें आस्था और भक्ति की भाषा में कही गई हैं, इन्हें उसी भाव से समझना चाहिए।

विजया एकादशी व्रत कथा: लंका विजय से पहले श्रीराम का व्रत

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रता से पूछा — “हे जनार्दन! माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी का माहात्म्य तो मैंने सुन लिया। अब कृपा करके बताइए कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है और उसकी विधि क्या है?”

श्रीकृष्ण बोले — “हे राजन्! फाल्गुन कृष्ण पक्ष की इस एकादशी का नाम विजया है। यह व्रत करने वाले को विजय दिलाती है। एक बार देवर्षि नारद ने ब्रह्मा जी से इसी एकादशी के बारे में पूछा था। तब ब्रह्मा जी ने कहा था — हे नारद! यह व्रत पुराने और नए सब पापों का नाश करने वाला है। इसकी विधि मैंने आज तक किसी को नहीं बताई। अब मैं तुम्हें यह कथा सुनाता हूँ।”

सीता हरण और समुद्र तट पर श्रीराम

ब्रह्मा जी ने कहा — त्रेता युग में भगवान विष्णु के अवतार श्रीरामचंद्र जी चौदह वर्ष के वनवास में थे। वे लक्ष्मण जी और माता सीता के साथ पंचवटी में रह रहे थे। वहीं लंका के राजा रावण ने छल से माता सीता का हरण कर लिया। इस दुख से व्याकुल होकर श्रीराम और लक्ष्मण वन-वन सीता जी को खोजने लगे।

रास्ते में उन्हें घायल जटायु मिले, जिन्होंने सीता हरण की पूरी बात बताई और फिर प्राण त्याग दिए। आगे चलकर श्रीराम की मित्रता वानरराज सुग्रीव से हुई और उन्होंने बाली का वध किया। फिर हनुमान जी लंका गए, अशोक वाटिका में सीता जी का पता लगाया और लौटकर श्रीराम को सारा समाचार सुनाया।

इसके बाद श्रीराम सुग्रीव की विशाल वानर सेना के साथ लंका की ओर चल पड़े और समुद्र के किनारे पहुँचे। सामने अथाह समुद्र था, जो मगरमच्छों और भयानक जल-जीवों से भरा हुआ था। उसे देखकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा — “हे लक्ष्मण! यह समुद्र बहुत गहरा और विशाल है। इसे पार करने का कोई उपाय दिखाई नहीं देता। हम इसे कैसे पार करेंगे?”

वकदाल्भ्य मुनि की सलाह

लक्ष्मण जी ने कहा — “हे प्रभु! आप तो स्वयं आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं। फिर भी यहाँ से आधा योजन दूर कुमारी द्वीप पर वकदाल्भ्य मुनि का आश्रम है। वे बहुत ज्ञानी और तपस्वी हैं। कहा जाता है कि उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं। आप उनके पास चलकर उपाय पूछिए।”

श्रीराम लक्ष्मण के साथ वकदाल्भ्य मुनि के आश्रम पहुँचे और उन्हें प्रणाम किया। मुनि ने पहचान लिया कि ये साक्षात भगवान हैं, जो मनुष्य रूप में लीला कर रहे हैं। उन्होंने आदर से पूछा — “हे राम! आप यहाँ कैसे पधारे?” श्रीराम बोले — “हे मुनिवर! मैं अपनी सेना के साथ लंका पर विजय के लिए यहाँ आया हूँ। कृपा करके बताइए कि यह समुद्र कैसे पार हो।”

मुनि ने कहा — “हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली विजया एकादशी का व्रत कीजिए। आप अपने सेनापतियों के साथ विधिपूर्वक यह व्रत करेंगे तो निश्चय ही समुद्र पार करेंगे और लंका पर विजय पाएँगे।”

मुनि द्वारा बताई गई कलश पूजा विधि

फिर मुनि ने व्रत की विधि बताई — “दशमी के दिन सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टी का एक कलश बनवाएँ। उसमें जल भरकर पाँच पल्लव (आम आदि के पत्ते) रखें और उसे वेदी पर स्थापित करें। कलश के नीचे सतनजा यानी सात प्रकार के अनाज रखें और ऊपर जौ रखें। उस पर भगवान श्रीनारायण की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित करें।”

“एकादशी के दिन स्नान करके धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान नारायण की पूजा करें। पूरा दिन उस कलश के सामने भक्ति भाव से बैठकर बिताएँ और रात में भी उसी प्रकार जागरण करें। द्वादशी के दिन नित्य कर्म से निवृत्त होकर नदी या तालाब के किनारे स्नान करें, कलश की पूजा करें और उसे किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर दें।”

श्रीराम का व्रत और लंका विजय

मुनि की आज्ञा मानकर श्रीराम ने फाल्गुन कृष्ण एकादशी आने पर अपने सेनापतियों के साथ पूरी श्रद्धा से विजया एकादशी का व्रत किया। उन्होंने कलश स्थापित किया, दिन भर भगवान नारायण का पूजन किया, रात में जागरण किया और द्वादशी को कलश दान करके पारण किया।

इस व्रत के प्रभाव से श्रीराम की सेना समुद्र पार करके लंका पहुँची। युद्ध में रावण और राक्षसों का संहार हुआ और श्रीराम को विजय मिली। माता सीता का उद्धार हुआ। ब्रह्मा जी ने नारद से कहा — “हे पुत्र! जो मनुष्य इस विधि से यह व्रत करता है, उसे इस लोक में भी विजय मिलती है और परलोक भी सुधरता है।”

कथा के अंत में श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा — “हे राजन्! जो इस व्रत का माहात्म्य पढ़ता या सुनता है, उसे वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है।”

कथा की सीख: भगवान होकर भी श्रीराम ने ऋषि से मार्गदर्शन लिया और नियम से व्रत किया। यह बताता है कि किसी भी बड़े काम से पहले विनम्रता, सही सलाह, तैयारी और ईश्वर का स्मरण जरूरी है। व्रत कथा पढ़ने के बाद एकादशी माता की आरती करने की परंपरा है।

सप्तधान्य कलश स्थापना विधि

विजया एकादशी की पूजा को बाकी एकादशियों से अलग बनाती है कथा में बताई गई सप्तधान्य कलश स्थापना। आज के समय में सोने की प्रतिमा या सोने का कलश हर किसी के लिए संभव नहीं, इसलिए अधिकतर घरों में ताँबे, पीतल या मिट्टी का कलश और भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र से यह पूजा की जाती है। भाव ही मुख्य है।

सप्तधान्य क्या है?

सप्तधान्य का अर्थ है सात प्रकार के अनाज। कथा में इसे “सतनजा” कहा गया है। अलग-अलग क्षेत्रों में सात अनाजों की सूची थोड़ी अलग होती है। प्रचलित रूप से इनमें ये अनाज लिए जाते हैं:

  • जौ
  • गेहूँ
  • चावल (धान)
  • तिल
  • कंगनी (काँगनी)
  • मूंग
  • चना (कुछ परंपराओं में उड़द या मसूर)

बाजार में “सतनजा” के नाम से पैकेट भी मिलता है। ध्यान रखें कि ये अनाज केवल पूजा के लिए हैं, व्रत के दिन इन्हें खाया नहीं जाता। पूजा के बाद इन्हें दान कर दिया जाता है या पक्षियों को डाल दिया जाता है।

कलश स्थापना कैसे करें (दशमी या एकादशी की सुबह)

  1. पूजा स्थान को साफ करके एक चौकी या छोटी वेदी बनाएँ और उस पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएँ।
  2. वेदी पर सप्तधान्य (सतनजा) की एक छोटी ढेरी बनाएँ।
  3. ताँबे, पीतल या मिट्टी के कलश को साफ जल से भरें। उसमें थोड़ा गंगाजल, एक सुपारी, एक सिक्का और अक्षत डालें।
  4. कलश के मुख पर पाँच आम के पत्ते (पंच पल्लव) रखें और कलश को सप्तधान्य की ढेरी पर स्थापित करें।
  5. कलश के मुख पर एक ढक्कन या दीया रखकर उसमें जौ भरें। कुछ परंपराओं में इसमें अनार या नारियल भी रखा जाता है।
  6. जौ के ऊपर भगवान विष्णु/नारायण की छोटी प्रतिमा रखें। प्रतिमा न हो तो कलश के पास भगवान का चित्र रखें।
  7. कलश पर रोली से स्वस्तिक बनाएँ, मौली (कलावा) बाँधें और फूलमाला अर्पित करें।
  8. दिन भर इसी कलश के सामने पूजा, जप और कथा करें। रात में यहीं दीपक जलाकर जागरण करें।
  9. द्वादशी को स्नान के बाद कलश की पूजा करें और उसे सामग्री सहित किसी ब्राह्मण या मंदिर को दान करें। कलश का जल तुलसी या किसी पौधे में डाल दें।

कई परिवार यह स्थापना दशमी की शाम को ही कर लेते हैं, जैसा कथा में बताया गया है, जबकि कई लोग एकादशी की सुबह संकल्प के बाद करते हैं। अपनी सुविधा और कुल परंपरा के अनुसार कोई भी तरीका अपना सकते हैं।

विजया एकादशी पूजा विधि (स्टेप बाय स्टेप)

नीचे दी गई विधि सामान्य गृहस्थों के लिए है। आपके परिवार या संप्रदाय की कोई विशेष परंपरा हो, तो उसे प्राथमिकता दें। श्रद्धा और नियम का पालन सबसे महत्वपूर्ण है, सामग्री की कमी से घबराएँ नहीं।

दशमी (एक दिन पहले) की तैयारी

  1. दशमी के दिन सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। चावल, मसूर, प्याज-लहसुन और मांसाहार से बचें।
  2. रात को ब्रह्मचर्य का पालन करें और मन में अगले दिन के व्रत का संकल्प रखें।
  3. पूजा स्थान साफ करें, सप्तधान्य, कलश, आम के पत्ते, जौ और तुलसी दल पहले से तैयार रखें। तुलसी के पत्ते दशमी को ही तोड़ लें।
  4. चाहें तो दशमी की शाम को ही सप्तधान्य कलश स्थापित कर लें।

एकादशी की सुबह और संकल्प

  1. ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और स्वच्छ (संभव हो तो पीले) वस्त्र पहनें।
  2. सूर्य देव को जल अर्पित करें।
  3. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — “मैं आज विजया एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए और अपने जीवन की बाधाओं पर विजय की कामना से कर रहा/रही हूँ।” अपना नाम और गोत्र बोलें, और अपनी विशेष मनोकामना मन में दोहराएँ।
  4. अपनी क्षमता के अनुसार व्रत का प्रकार (निर्जला, फलाहार या एक समय) तय कर लें।

भगवान विष्णु और श्रीराम की पूजा

  1. पहले भगवान गणेश का स्मरण करें।
  2. सप्तधान्य कलश स्थापित न किया हो तो अब करें (विधि ऊपर दी गई है)।
  3. भगवान विष्णु की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएँ, फिर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें और फिर शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
  4. पीले वस्त्र, पीला चंदन, पीले फूल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। भगवान श्रीराम का चित्र भी साथ रखें और उन्हें भी फूल अर्पित करें।
  5. धूप-दीप जलाएँ और फल, नारियल, मिठाई या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल अवश्य रखें।
  6. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र की कम से कम एक माला (108 बार) जप करें। साथ में “श्री राम जय राम जय जय राम” का जप भी कर सकते हैं।
  7. विजया एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या परिवार के साथ बैठकर सुनें।
  8. विष्णु सहस्रनाम, रामरक्षा स्तोत्र या सुंदरकांड का पाठ करें (जो आपकी परंपरा में हो)।
  9. अंत में ओम जय जगदीश हरे आरती करें और भूल-चूक के लिए क्षमा माँगें।

शाम की पूजा और रात्रि जागरण

  1. शाम को कलश के सामने फिर से घी का दीपक जलाएँ। तुलसी के पास भी दीपक रखें।
  2. भजन-कीर्तन, राम नाम संकीर्तन या गीता पाठ करें।
  3. कथा के अनुसार विजया एकादशी पर रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। पूरी रात जागना संभव न हो तो कुछ घंटे भजन करके सो सकते हैं।
  4. दिन में सोने से बचें — एकादशी पर दिन में सोना उचित नहीं माना जाता।

द्वादशी और पारण

  1. द्वादशी की सुबह स्नान करें। संभव हो तो नदी या तालाब के किनारे स्नान करें, अन्यथा घर पर स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
  2. भगवान और कलश की पूजा करें।
  3. कलश को सामग्री (सप्तधान्य, जौ आदि) सहित किसी ब्राह्मण, पुजारी या मंदिर को दान करें। किसी जरूरतमंद को भोजन भी कराएँ।
  4. ऊपर दी गई तालिका में बताए गए पारण समय के भीतर, तुलसी दल या भगवान के प्रसाद से व्रत खोलें।

पूजा सामग्री सूची

  • भगवान विष्णु / नारायण की प्रतिमा या चित्र
  • भगवान श्रीराम (राम दरबार) का चित्र
  • ताँबे, पीतल या मिट्टी का कलश
  • सप्तधान्य (सतनजा) — लगभग आधा से एक किलो
  • जौ (कलश के ऊपर रखने के लिए)
  • पाँच आम के पत्ते (पंच पल्लव)
  • नारियल (पानी वाला, भोग और कलश के लिए)
  • चौकी, पीला या लाल कपड़ा
  • गंगाजल, सुपारी, सिक्का, मौली (कलावा)
  • पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़े हुए)
  • पीले फूल, फूलमाला
  • पीला चंदन, रोली, हल्दी, अक्षत
  • धूप, अगरबत्ती, कपूर
  • घी का दीपक और रुई की बत्ती
  • मौसमी फल, केले, मिश्री, मेवे
  • तुलसी या चंदन की माला (जप के लिए)
  • दान के लिए अन्न, वस्त्र या दक्षिणा

विजया एकादशी के मंत्र

मंत्र जप में शुद्ध उच्चारण से ज्यादा जरूरी है श्रद्धा और एकाग्रता। अपनी सुविधा से इनमें से किसी एक या अधिक मंत्र का जप कर सकते हैं।

1. द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥

अर्थ: मैं भगवान वासुदेव (विष्णु) को नमन करता हूँ। यह एकादशी का सबसे प्रचलित मंत्र है, इसका 108 बार जप करना शुभ माना जाता है।

2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र

ॐ नमो नारायणाय॥

अर्थ: मैं भगवान नारायण को प्रणाम करता हूँ। विजया एकादशी की कथा में कलश पर नारायण की प्रतिमा स्थापित करने का विधान है, इसलिए यह मंत्र विशेष रूप से उपयुक्त माना जाता है।

3. श्रीराम तारक मंत्र

श्री राम जय राम जय जय राम॥

अर्थ: भगवान श्रीराम की जय हो। यह सरल राम नाम मंत्र कोई भी, कहीं भी जप सकता है। लंका विजय की कथा से जुड़े होने के कारण इस दिन राम नाम का जप बहुत प्रिय माना जाता है।

4. श्रीराम स्तुति मंत्र

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥

अर्थ: राम, रामभद्र, रामचंद्र, सृष्टि के विधाता, रघुकुल के नाथ और माता सीता के पति श्रीराम को मेरा नमस्कार। यह श्लोक रामरक्षा परंपरा में प्रसिद्ध है।

5. विष्णु ध्यान मंत्र

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ: जो शांत स्वरूप हैं, शेषनाग पर शयन करते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो पूरे विश्व के आधार हैं — संसार के भय को हरने वाले उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

विजया एकादशी और विजय व सफलता की कामना

विजया एकादशी को लोग खास तौर पर उन कामों से जोड़ते हैं जिनमें जीत या सफलता चाहिए — जैसे कोई बड़ी परीक्षा, इंटरव्यू, नया व्यापार, कोर्ट-कचहरी का मामला या जीवन का कोई कठिन संघर्ष। यह आस्था श्रीराम की कथा से आती है, जहाँ व्रत के बाद असंभव लगने वाला समुद्र भी पार हो गया।

सफलता की कामना से व्रत कैसे रखें

  • संकल्प के समय अपनी मनोकामना स्पष्ट और सकारात्मक शब्दों में भगवान के सामने रखें।
  • सप्तधान्य कलश की स्थापना करें और दिन भर उसी के सामने जप-पाठ करें।
  • “ॐ नमो नारायणाय” या “श्री राम जय राम जय जय राम” का अपनी क्षमता अनुसार जप करें।
  • सुंदरकांड का पाठ करें — इसमें हनुमान जी के समुद्र लांघने और लंका जाने का प्रसंग है, जो इस कथा से मेल खाता है।
  • द्वादशी को कलश दान के साथ किसी विद्यार्थी को पुस्तकें या जरूरतमंद को अन्न दान करें।

आस्था और कर्म दोनों जरूरी

ध्यान रखें कि यह व्रत आस्था का विषय है, किसी परिणाम की गारंटी नहीं। कथा में भी श्रीराम ने व्रत के बाद हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे — सेतु बना, सेना ने परिश्रम किया और युद्ध लड़ा गया। इसी तरह विजया एकादशी का व्रत मन को शांत, एकाग्र और साहसी बनाने में सहायक माना जाता है, पर परीक्षा की तैयारी या काम की मेहनत का स्थान नहीं ले सकता। भक्ति और कर्म, दोनों साथ चलें — यही इस व्रत का सच्चा भाव है।

विजया एकादशी व्रत में क्या खाएँ, क्या न खाएँ

एकादशी व्रत का मूल नियम है — अन्न, विशेषकर चावल का त्याग। इसके साथ सात्विकता और संयम का पालन। नीचे सामान्य नियम दिए गए हैं, जिन्हें आप अपनी परंपरा के अनुसार अपना सकते हैं।

क्या खा सकते हैं

  • मौसमी फल — केला, सेब, पपीता, अमरूद, संतरा, अंगूर आदि।
  • दूध, दही, छाछ, पनीर, मावा।
  • सूखे मेवे — बादाम, काजू, किशमिश, मखाना।
  • कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा (फलाहारी परंपरा के अनुसार)।
  • साबूदाना, आलू, शकरकंद, अरबी।
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा।
  • मूंगफली और नारियल पानी।

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज।
  • गेहूँ, जौ, मक्का जैसे अनाज और सभी दालें — पूजा में रखा सप्तधान्य भी नहीं खाया जाता।
  • प्याज, लहसुन और मांसाहार।
  • साधारण (आयोडीन युक्त) नमक — कई लोग केवल सेंधा नमक लेते हैं।
  • शराब, तंबाकू और कोई भी नशा।
  • बासी या बाजार का तला-भुना भोजन।

निर्जला व्रत

निर्जला व्रत में पूरे दिन अन्न और जल दोनों का त्याग किया जाता है। यह सबसे कठिन व्रत है और केवल पूरी तरह स्वस्थ लोग ही इसे रखें। फरवरी-मार्च में मौसम बदल रहा होता है और दिन गरम होने लगते हैं, इसलिए शरीर में पानी की कमी न हो, इसका ध्यान रखें।

फलाहार व्रत

अधिकांश गृहस्थ फलाहार व्रत रखते हैं, जिसमें फल, दूध, मेवे और व्रत में मान्य चीजें ली जाती हैं। जल पी सकते हैं। विजया एकादशी पर रात्रि जागरण की परंपरा है, इसलिए फलाहार व्रत से शरीर में पूजा और जागरण के लिए ऊर्जा बनी रहती है।

एक समय भोजन (एकभुक्त)

जो लोग पूरा उपवास नहीं कर सकते, वे दिन में एक बार फलाहारी या सात्विक व्रत-भोजन लेकर व्रत रख सकते हैं। ध्यान रखें कि इसमें भी अन्न और चावल नहीं लिया जाता।

स्वास्थ्य सावधानी: मधुमेह, उच्च या निम्न रक्तचाप, हृदय रोग, किडनी की समस्या, गर्भावस्था, स्तनपान, बढ़ती उम्र या नियमित दवाएँ लेने की स्थिति में कठोर व्रत न रखें। ऐसे में अपने डॉक्टर से सलाह लेकर हल्का फलाहार व्रत रखें और दवाएँ समय पर लें। परंपरा में भी बालकों, वृद्धों और रोगियों को व्रत के नियमों में छूट दी गई है।

विजया एकादशी पारण कब और कैसे करें

पारण यानी व्रत खोलना। एकादशी का पारण उतना ही महत्वपूर्ण है जितना व्रत। सही समय पर पारण न करने से व्रत अधूरा माना जाता है।

  • द्वादशी में पारण: पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद, द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करें। द्वादशी बीत जाने के बाद पारण करना उचित नहीं माना जाता।
  • हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग “हरि वासर” कहलाता है। इस समय पारण नहीं करना चाहिए, हरि वासर समाप्त होने का इंतजार करें।
  • प्रातःकाल श्रेष्ठ: पारण के लिए सुबह का समय सबसे अच्छा माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचें। जिस वर्ष द्वादशी सुबह जल्दी समाप्त हो रही हो, उस वर्ष पारण का समय छोटा होता है, इसलिए पहले से तैयारी रखें।
  • स्मार्त और वैष्णव: जिस वर्ष दोनों परंपराओं के व्रत अलग दिनों में हों, उस वर्ष पारण का दिन भी अलग होगा। वैष्णव परंपरा में पारण की समय-सीमा कभी-कभी थोड़ी लंबी होती है। अपनी परंपरा के अनुसार तालिका देखें।

पारण कैसे करें

  1. स्नान करके भगवान विष्णु और कलश की पूजा करें और भोग लगाएँ।
  2. कलश और सप्तधान्य का दान करें, साथ में किसी जरूरतमंद को भोजन या दक्षिणा दें।
  3. सबसे पहले तुलसी दल, जल या भगवान के प्रसाद से व्रत खोलें।
  4. उसके बाद हल्का सात्विक भोजन लें। पारण के दिन भी प्याज-लहसुन और तामसिक भोजन से बचें।

आपके शहर का सटीक पारण समय ऊपर दी गई तालिका में दिया है। रोज की तिथि जानने के लिए आप हमारा दैनिक पंचांग भी देख सकते हैं।

विजया एकादशी पर क्या करें और क्या न करें

क्या करें

  • सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
  • सप्तधान्य कलश स्थापित करके भगवान नारायण की पूजा करें।
  • भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल अवश्य चढ़ाएँ।
  • विजया एकादशी की कथा पढ़ें या सुनें, और राम नाम का जप करें।
  • सुंदरकांड, रामरक्षा स्तोत्र या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
  • सत्य बोलें, शांत रहें और सबके प्रति दया का भाव रखें।
  • संभव हो तो रात में भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
  • द्वादशी को कलश दान करके सही समय पर पारण करें।

क्या न करें

  • चावल या कोई भी अन्न न खाएँ।
  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें।
  • प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा का सेवन न करें।
  • दिन में न सोएँ।
  • किसी से झगड़ा, कटु वचन, निंदा या झूठ से बचें — विजय की कामना के दिन मन में बैर न रखें।
  • बाल, नाखून कटवाने और दाढ़ी बनाने से बचें (कई परिवारों की परंपरा)।
  • पूजा के सप्तधान्य को फेंकें नहीं — दान करें या पक्षियों को डालें।
  • स्वास्थ्य ठीक न हो तो जबरदस्ती कठोर व्रत न रखें।

विजया एकादशी से जुड़े मिथक और सच्चाई (Myth vs Reality)

मिथक: विजया एकादशी का व्रत रखने से हर मुकदमा या परीक्षा निश्चित रूप से जीत ली जाती है।

सच्चाई: परंपरा इस व्रत को विजय दिलाने वाला बताती है, पर यह आस्था का विषय है, कोई गारंटी नहीं। कथा में भी श्रीराम ने व्रत के बाद पूरी मेहनत और तैयारी के साथ युद्ध किया था। व्रत मन को शक्ति देता है, लेकिन परिश्रम का स्थान नहीं लेता।

मिथक: सोने का कलश और सोने की प्रतिमा न हो तो विजया एकादशी की पूजा अधूरी रहती है।

सच्चाई: कथा में ही सोने, चाँदी, ताँबे या मिट्टी — चारों में से किसी भी कलश का विकल्प दिया गया है। सामर्थ्य के अनुसार मिट्टी या ताँबे का कलश और भगवान का चित्र भी पूरी तरह मान्य है। परंपरा में श्रद्धा को धन से बड़ा माना गया है।

मिथक: सप्तधान्य कलश में अनाज है, इसलिए एकादशी पर इसे घर में रखना भी वर्जित है।

सच्चाई: एकादशी पर अन्न खाने का निषेध है, पूजा में अनाज रखने का नहीं। विजया एकादशी की कथा में ही कलश के नीचे सात अनाज और ऊपर जौ रखने का विधान बताया गया है। बस इन अनाजों को व्रत के दिन खाया नहीं जाता।

मिथक: यह व्रत केवल भगवान राम के भक्त या पुरुष ही रख सकते हैं।

सच्चाई: एकादशी व्रत भगवान विष्णु का व्रत है, और स्त्री-पुरुष, कोई भी श्रद्धा से इसे रख सकता है। श्रीराम विष्णु के ही अवतार हैं, इसलिए विष्णु और राम, दोनों की पूजा इस दिन स्वाभाविक रूप से साथ होती है।

मिथक: निर्जला व्रत न रखा तो विजया एकादशी का कोई फल नहीं मिलता।

सच्चाई: परंपरा में निर्जला, फलाहार और एक समय भोजन — सभी प्रकार के व्रत बताए गए हैं। अपनी क्षमता के अनुसार चुना गया व्रत, सच्ची श्रद्धा के साथ, उतना ही मान्य माना जाता है। स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाकर व्रत करना धर्म का उद्देश्य नहीं है।

मिथक: गलती से कुछ खा लिया तो व्रत टूट गया और अपशकुन होगा।

सच्चाई: भूल से या मजबूरी में कुछ खा लेने पर घबराने की जरूरत नहीं है। भगवान से क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को नियम से बड़ा माना गया है, डर का इसमें कोई स्थान नहीं।

मिथक: व्रत रखने से शरीर का “डिटॉक्स” होता है, इसलिए हर किसी को कठोर व्रत रखना चाहिए।

सच्चाई: एकादशी व्रत का उद्देश्य आध्यात्मिक संयम है, किसी बीमारी का इलाज नहीं। उपवास हर शरीर के लिए एक जैसा सुरक्षित नहीं होता। मधुमेह, गर्भावस्था, बुजुर्गों और दवा लेने वालों को डॉक्टर की सलाह से ही व्रत का तरीका तय करना चाहिए।

विजया एकादशी के लाभ (धार्मिक मान्यता)

नीचे बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं और परंपरा पर आधारित हैं। इनका अनुभव हर व्यक्ति की श्रद्धा, आचरण और भाव पर निर्भर माना जाता है।

  • बाधाओं पर विजय: मान्यता है कि यह व्रत जीवन की कठिनाइयों और विरोध पर विजय पाने में सहायक है।
  • कार्यों में सफलता: नए काम, परीक्षा या किसी बड़े लक्ष्य से पहले यह व्रत शुभ माना जाता है।
  • पापों का क्षय: कथा के अनुसार यह व्रत पुराने और नए पापों के नाश का अवसर है।
  • साहस और आत्मविश्वास: उपवास, जप और ध्यान से मन स्थिर होता है और डर कम होता है — ऐसा अनेक साधक अनुभव करते हैं।
  • पुण्य फल: परंपरा के अनुसार इसका माहात्म्य पढ़ने-सुनने से वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य मिलता है।
  • पारिवारिक एकता: जैसे श्रीराम ने अपने सेनापतियों के साथ व्रत किया, वैसे ही परिवार के साथ पूजा करने से आपसी जुड़ाव बढ़ता है।
  • विष्णु कृपा: भक्तों का विश्वास है कि इस दिन की गई भक्ति से भगवान नारायण प्रसन्न होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।

संबंधित एकादशी और पाठ

विजया एकादशी से ठीक पहले माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी आती है, जिसे पिशाच योनि से मुक्ति दिलाने वाली एकादशी कहा जाता है। विजया के बाद फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आती है, जिस दिन आंवले के वृक्ष की पूजा होती है। साल भर की सभी एकादशियों की तारीखें हमारे एकादशी कब है पेज पर देखें।

इस दिन की पूजा के लिए ओम जय जगदीश हरे आरती, एकादशी माता की आरती और तुलसी माता की आरती भी पढ़ें। सभी आरतियाँ एक साथ चाहिए तो आरती संग्रह PDF डाउनलोड कर सकते हैं।

विजया एकादशी हमें याद दिलाती है कि सबसे बड़ा समुद्र भी पार हो सकता है, जब मन में श्रद्धा, साथ में सही मार्गदर्शन और कर्म में ईमानदारी हो। इस दिन सप्तधान्य कलश के सामने बैठकर भगवान नारायण का स्मरण करें, राम नाम जपें और अपने जीवन की हर अच्छी लड़ाई के लिए शक्ति माँगें। भगवान श्रीराम और श्रीहरि आप पर और आपके पूरे परिवार पर अपनी कृपा बनाए रखें। जय श्रीराम, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

विजया एकादशी कब है 2027 में?

विजया एकादशी 2026 (13 फरवरी) बीत चुकी है। अगला व्रत गुरुवार, 4 मार्च 2027 को है और पारण 5 मार्च की सुबह होगा (नई दिल्ली)। अपने शहर का पारण समय और आने वाले वर्षों की तारीख इस पेज की तारीख तालिका में देखें।

विजया एकादशी किस महीने में आती है?

विजया एकादशी पूर्णिमांत कैलेंडर (उत्तर भारत) में फाल्गुन कृष्ण पक्ष की और अमांत कैलेंडर (दक्षिण व पश्चिम भारत) में माघ कृष्ण पक्ष की एकादशी है। दिन एक ही है, केवल महीने का नाम अलग है, और यह आमतौर पर फरवरी-मार्च में आती है।

इसे विजया एकादशी क्यों कहते हैं?

‘विजया’ का अर्थ है विजय दिलाने वाली। कथा के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका विजय से पहले यही व्रत रखा था और इसके बाद उन्हें समुद्र पार करके रावण पर विजय मिली।

विजया एकादशी की व्रत कथा क्या है?

सीता हरण के बाद जब श्रीराम वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँचे, तो लक्ष्मण की सलाह पर वे वकदाल्भ्य मुनि के पास गए। मुनि ने उन्हें सप्तधान्य कलश स्थापित करके विजया एकादशी का व्रत करने को कहा, और व्रत के प्रभाव से श्रीराम ने समुद्र पार करके लंका पर विजय पाई।

विजया एकादशी व्रत का उपाय श्रीराम को किसने बताया था?

परंपरा के अनुसार यह व्रत वकदाल्भ्य (बकदाल्भ्य) मुनि ने बताया था, जिनका आश्रम समुद्र तट से लगभग आधा योजन दूर एक द्वीप (कुमारी द्वीप) पर था। लक्ष्मण जी ने श्रीराम को उनके पास जाने की सलाह दी थी।

विजया एकादशी पर सप्तधान्य कलश कैसे स्थापित करें?

वेदी पर सात अनाजों की ढेरी बनाकर उस पर जल से भरा कलश रखें, मुख पर पाँच आम के पत्ते लगाएँ, ऊपर ढक्कन में जौ भरें और उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखें। द्वादशी को इस कलश की पूजा करके इसे ब्राह्मण या मंदिर को दान कर दें।

सप्तधान्य में कौन-कौन से अनाज होते हैं?

प्रचलित रूप से जौ, गेहूँ, चावल (धान), तिल, कंगनी, मूंग और चना लिए जाते हैं, हालाँकि अलग-अलग क्षेत्रों में सूची थोड़ी बदल जाती है। बाजार में ‘सतनजा’ नाम से तैयार पैकेट भी मिलता है।

विजया एकादशी पर किसकी पूजा होती है?

इस दिन भगवान विष्णु के नारायण स्वरूप की पूजा होती है, और कथा से जुड़े होने के कारण भगवान श्रीराम का स्मरण भी किया जाता है। पूजा सप्तधान्य कलश के सामने करने की परंपरा है।

विजया एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?

‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘ॐ नमो नारायणाय’ सबसे प्रचलित मंत्र हैं। इसके साथ ‘श्री राम जय राम जय जय राम’ का जप भी इस दिन बहुत प्रिय माना जाता है।

विजया एकादशी पर क्या खाना चाहिए?

फल, दूध, दही, मेवे, साबूदाना, आलू, शकरकंद, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा और सेंधा नमक लिया जा सकता है। चावल, गेहूँ, दालें, प्याज-लहसुन और मांसाहार से बचें।

क्या विजया एकादशी पर चावल खा सकते हैं?

नहीं, किसी भी एकादशी पर चावल और अन्न खाना वर्जित माना जाता है। पूजा के कलश में रखा सप्तधान्य भी व्रत के दिन नहीं खाया जाता।

क्या विजया एकादशी व्रत में पानी पी सकते हैं?

हाँ, फलाहार और एक समय भोजन वाले व्रत में पानी पी सकते हैं। केवल निर्जला व्रत में जल का भी त्याग होता है, जिसे पूरी तरह स्वस्थ लोग ही रखें।

विजया एकादशी का पारण कब करें?

पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में, सूर्योदय के बाद और हरि वासर समाप्त होने पर करें, और द्वादशी समाप्त होने से पहले कर लें। 2027 में नई दिल्ली में पारण 5 मार्च सुबह 6:42 से 9:03 बजे तक है, अन्य शहरों और वर्षों के लिए इस पेज की तालिका देखें।

स्मार्त और वैष्णव विजया एकादशी में क्या अंतर है?

जब एकादशी तिथि दो सूर्योदयों को छूती है, तो कभी गृहस्थ (स्मार्त) पहले दिन और वैष्णव संप्रदाय (जैसे इस्कॉन) अगले दिन व्रत रखते हैं। अपने शहर और परंपरा की सही तारीख के लिए इस पेज की तालिका देखें।

क्या विजया एकादशी का व्रत परीक्षा या मुकदमे में सफलता के लिए रखा जा सकता है?

हाँ, बहुत से लोग परीक्षा, नए काम या कठिन मामलों में सफलता की कामना से यह व्रत श्रद्धा से रखते हैं। ध्यान रखें कि यह आस्था का विषय है, व्रत के साथ अपनी मेहनत और तैयारी भी जरूरी है।

क्या गर्भवती महिलाएँ और बुजुर्ग विजया एकादशी का व्रत रख सकते हैं?

गर्भवती महिलाएँ, बुजुर्ग, मधुमेह के रोगी या नियमित दवा लेने वाले लोग कठोर व्रत न रखें। डॉक्टर की सलाह से हल्का फलाहार व्रत रख सकते हैं, या केवल पूजा, जप और कथा से भी भक्ति कर सकते हैं।

अगर विजया एकादशी का व्रत गलती से टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं, भगवान विष्णु से क्षमा माँगें, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें और बाकी दिन नियम से व्रत पूरा करें। परंपरा में भाव को सबसे बड़ा माना गया है।

विजया एकादशी से पहले और बाद में कौन सी एकादशी आती है?

विजया से पहले माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी और बाद में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आती है। विजया एकादशी के कुछ दिन बाद महाशिवरात्रि का पर्व भी आता है।

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