Gagan Mai Thaal (गगन मै थालु) श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज गुरु नानक देव जी का शब्द है — राग धनासरी, महला 1, अंग 663। मान्यता है कि गुरु जी ने इसे जगन्नाथ पुरी में उच्चारा, जब उन्हें मंदिर की दीप-आरती में शामिल होने को कहा गया। उन्होंने बताया कि सच्ची आरती तो पूरी प्रकृति हर पल कर रही है — आकाश थाल है, सूर्य-चंद्रमा दीपक हैं, तारे मोती हैं। गुरुद्वारों में यह शब्द “आरती” के रूप में कीर्तन में गाया जाता है, खासकर रहरास और सोहिला के बाद और गुरपुरब पर। नीचे संपूर्ण शब्द देवनागरी और English में, और हर पंक्ति का अर्थ दिया गया है।

इस लेख में
Gagan Mai Thaal Lyrics in Hindi (Gurbani in Devanagari) — गगन मै थालु
धनासरी महला १ आरती
ੴ सतिगुर प्रसादि॥
गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती॥
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती॥१॥
कैसी आरती होइ॥ भव खंडना तेरी आरती॥
अनहता सबद वाजंत भेरी॥१॥ रहाउ॥
सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही॥
सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही॥२॥
सभ महि जोति जोति है सोइ॥
तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ॥
गुर साखी जोति परगटु होइ॥
जो तिसु भावै सु आरती होइ॥३॥
हरि चरण कवल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा॥
क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नाइ वासा॥४॥३॥
Gagan Mai Thaal Lyrics in English
Dhanasari Mahalla 1 Aarti,
Ik Onkar Satgur Prasad.
Gagan Mai Thaal Rav Chand Deepak Bane Tarika Mandal Janak Moti,
Dhoop Malaanlo Pavan Chavro Kare Sagal Banrai Phoolant Joti. 1.
Kaisi Aarti Hoe, Bhav Khandna Teri Aarti,
Anhata Sabad Vajant Bheri. 1. Rahao.
Sahas Tav Nain Nan Nain Hahi Tohi Kau Sahas Murat Nana Ek Tohi,
Sahas Pad Bimal Nan Ek Pad Gandh Bin Sahas Tav Gandh Iv Chalat Mohi. 2.
Sabh Mah Jot Jot Hai Soe,
Tis Dai Chanan Sabh Mah Chanan Hoe,
Gur Sakhi Jot Pargat Hoe,
Jo Tis Bhave So Aarti Hoe. 3.
Har Charan Kaval Makrand Lobhit Mano Andino Mohi Aahi Piasa,
Kirpa Jal Dehi Nanak Saring Kau Hoe Ja Te Terai Nae Vasa. 4. 3.
Gagan Mai Thaal का अर्थ
- पहली पंक्तियाँ: आकाश थाल है, सूर्य और चंद्रमा उसमें दीपक हैं, तारों के मंडल मोती हैं; मलय पर्वत (चंदन) की सुगंध धूप है, हवा चँवर कर रही है, और सारी वनस्पति फूल बनकर हे ज्योति-स्वरूप, तुम्हें अर्पित है।
- रहाउ (मुख्य भाव): हे जन्म-मरण का नाश करने वाले, तुम्हारी कैसी अद्भुत आरती हो रही है! अनहद शब्द (भीतर का दिव्य नाद) नगाड़े की तरह बज रहा है।
- निराकार प्रभु: तुम्हारी हज़ारों आँखें हैं, फिर भी तुम्हारी कोई आँख नहीं; हज़ारों रूप हैं, फिर भी तुम्हारा एक भी रूप नहीं। हज़ारों निर्मल चरण हैं, फिर भी एक भी चरण नहीं; नाक नहीं, फिर भी हज़ारों नासिकाएँ — तुम्हारा यह खेल मुझे मोह लेता है।
- एक ज्योति: सबमें एक ही ज्योति है, और वह ज्योति वही प्रभु है। उसी के प्रकाश से सबमें प्रकाश है। गुरु की शिक्षा से यह ज्योति प्रकट होती है। जो उसे भाता है, वही सच्ची आरती है।
- प्रार्थना: हरि के चरण-कमलों के मकरंद (रस) के लिए मेरा मन लालायित है, दिन-रात मुझे इसकी प्यास है। हे प्रभु, नानक रूपी पपीहे को कृपा का जल दो, जिससे वह तुम्हारे नाम में बस जाए।
गुरुद्वारे में आरती का भाव
सिख परंपरा में दीपक घुमाकर की जाने वाली आरती नहीं होती। गुरु नानक देव जी ने इस शब्द में समझाया कि प्रभु निराकार और सर्वव्यापी है, इसलिए उसकी असली आरती पूरी सृष्टि कर रही है — और मनुष्य के लिए सच्ची आरती है प्रभु का नाम और उसकी रज़ा (इच्छा) में रहना। इसलिए गुरुद्वारों में “आरती” इसी शब्द और गुरु रविदास, कबीर, सैण, धन्ना जी आदि भक्तों के शब्दों के कीर्तन के रूप में गाई जाती है।
Gagan Mai Thaal पढ़ने का तरीका
- शांत मन से बैठें, सिर ढककर और जूते उतारकर — जैसे गुरुद्वारे में बैठते हैं।
- शब्द को धीरे-धीरे, अर्थ समझते हुए पढ़ें या कीर्तन के रूप में सुनें।
- गुरपुरब, संध्या रहरास साहिब के बाद या सोहिला साहिब के बाद इसका पाठ किया जाता है।
- अंत में “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह” कहें।
Gagan Mai Thaal पढ़ने के 7 नियम
- गुरबाणी को सम्मान से पढ़ें; सिर ढककर पढ़ें।
- शब्द के शब्दों में बदलाव न करें — गुरबाणी जैसी है वैसी ही पढ़ें।
- अर्थ समझकर पढ़ें; केवल रटें नहीं।
- सिख परंपरा के अनुसार दीपक घुमाने की ज़रूरत नहीं — नाम ही आरती है।
- कीर्तन में सबके साथ मिलकर गाएँ।
- पाठ के बीच में उठें नहीं और बात न करें।
- अंत में अरदास या फतह बुलाएँ।
गगन मै थालु — गुरु नानक देव जी की आरती के लाभ
- मन में यह भाव जागता है कि प्रभु हर जगह और हर जीव में है।
- प्रकृति के प्रति प्रेम और सम्मान बढ़ता है।
- मन शांत होता है और नाम-सिमरन में लगता है।
- धार्मिक कर्मकांड से ऊपर सच्ची भक्ति की समझ आती है।
अन्य आरतियाँ: ओम जय जगदीश हरे और ॐ जय गंगाधर। अधिक जानकारी Wikipedia पर।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
गगन मै थालु किसने लिखा?
गुरु नानक देव जी ने। यह श्री गुरु ग्रंथ साहिब में राग धनासरी, महला 1, अंग 663 पर दर्ज है।
गगन मै थालु कहाँ उच्चारा गया?
परंपरा के अनुसार जगन्नाथ पुरी में, जब गुरु जी को मंदिर की संध्या आरती में शामिल होने को कहा गया। उन्होंने आकाश को थाल और सूर्य-चंद्रमा को दीपक बताकर सच्ची आरती का अर्थ समझाया।
क्या सिख धर्म में दीप-आरती होती है?
नहीं। गुरुद्वारों में “आरती” का अर्थ इस शब्द और अन्य भक्तों के शब्दों का कीर्तन है; दीपक घुमाने की परंपरा नहीं है।
गुरु नानक जयंती (गुरपुरब) कब है?
कार्तिक पूर्णिमा को — 2026 में नवंबर के अंत में। गुरपुरब पर गुरुद्वारों में यह शब्द विशेष रूप से गाया जाता है।