Lavthavti Vikrala (लवथवती विक्राळा) भगवान शंकर की सबसे प्रसिद्ध मराठी आरती है, जिसे महाराष्ट्र में “शंकराची आरती” कहा जाता है। इसके रचयिता समर्थ रामदास हैं — अंतिम पंक्ति “रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं” में उनकी छाप है, वही संत जिन्होंने सुखकर्ता दुःखहर्ता लिखी। गणेशोत्सव में गणपति की आरती के बाद “दुर्गे दुर्घट भारी” और फिर यही शंकर आरती गाई जाती है। इसकी टेक है “जय देव जय देव जय श्रीशंकरा, आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा”। नीचे संपूर्ण आरती, English transliteration और अर्थ दिया गया है।

इस लेख में
Lavthavti Vikrala Lyrics in Marathi (Hindi Devanagari) — शंकराची आरती
लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडी माळा।
वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा।
लावण्यसुंदर मस्तकीं बाळा।
तेथुनियां जळ निर्मळ वाहे झुळझुळां॥
जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा॥ जय देव जय देव॥
कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा।
अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा।
विभुतीचें उधळण शितिकंठ नीळा।
ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा॥
जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा॥ जय देव जय देव॥
देवीं दैत्यीं सागरमंथन पैं केलें।
त्यामाजीं अवचित हळाहळ जें उठिलें।
तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें।
नीलकंठ नाम प्रसिद्ध झालें॥
जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा॥ जय देव जय देव॥
व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी।
पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी।
शतकोटीचें बीज वाचे उच्चारी।
रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं॥
जय देव जय देव जय श्रीशंकरा।
आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा॥ जय देव जय देव॥
Lavthavti Vikrala Lyrics in English
Lavthavti Vikrala Brahmandi Mala,
Vishe Kanth Kala Trinetri Jvala,
Lavanyasundar Mastaki Bala,
Tethuniya Jal Nirmal Vahe Jhuljhula.
Jai Dev Jai Dev Jai Shri Shankara,
Aarti Ovalu Tuj Karpurgaura. Jai Dev Jai Dev.
Karpurgaura Bhola Nayani Vishala,
Ardhangi Parvati Sumananchya Mala,
Vibhutiche Udhalan Shitikanth Neela,
Aisa Shankar Shobhe Umavelhala.
Jai Dev Jai Dev Jai Shri Shankara,
Aarti Ovalu Tuj Karpurgaura. Jai Dev Jai Dev.
Devi Daityi Sagarmanthan Pai Kele,
Tyamaaji Avachit Halahal Je Uthile,
Te Tva Asurpane Prashan Kele,
Neelkanth Naam Prasiddha Jhale.
Jai Dev Jai Dev Jai Shri Shankara,
Aarti Ovalu Tuj Karpurgaura. Jai Dev Jai Dev.
Vyaghrambar Phanivardhar Sundar Madanari,
Panchanan Manmohan Munijan Sukhkari,
Shatkotiche Beej Vache Uchchari,
Raghukul Tilak Ramdasa Antari.
Jai Dev Jai Dev Jai Shri Shankara,
Aarti Ovalu Tuj Karpurgaura. Jai Dev Jai Dev.
Lavthavti Vikrala का अर्थ
- पहला पद: जिनका विकराल रूप (तांडव में) थरथराता है, जिनके गले में ब्रह्मांडों की माला है; विष से जिनका कंठ काला है और तीसरे नेत्र में ज्वाला है; जिनके मस्तक पर लावण्यमयी सुंदर कन्या (गंगा) है, जहाँ से निर्मल जल झुलझुल बहता है।
- टेक: हे श्री शंकर, आपकी जय हो — हे कपूर जैसे गौर, मैं आपकी आरती उतारता हूँ।
- दूसरा पद: कपूर जैसे गौर, भोले, बड़ी-बड़ी आँखों वाले; आधे अंग में पार्वती, फूलों की मालाएँ; शरीर पर भस्म का लेप, नीला कंठ — ऐसे उमा के प्रिय शंकर शोभा देते हैं।
- तीसरा पद: देवताओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया; उसमें अचानक जो हलाहल विष निकला, उसे आपने अपने पराक्रम से पी लिया — तभी से आपका नाम “नीलकंठ” प्रसिद्ध हुआ।
- चौथा पद: बाघ की खाल पहने, नागराज को धारण किए, सुंदर, कामदेव के शत्रु; पाँच मुख वाले, मन मोहने वाले, मुनियों को सुख देने वाले — जो सौ करोड़ (रामायण) के बीज “राम” नाम को वाणी से जपते हैं; रघुकुल के तिलक श्रीराम रामदास के हृदय में बसते हैं।
गणेशोत्सव में आरतियों का क्रम
महाराष्ट्र में गणेशोत्सव और रोज़ की पूजा में आरतियाँ एक तय क्रम में गाई जाती हैं: पहले सुखकर्ता दुःखहर्ता (गणपति), फिर “दुर्गे दुर्घट भारी” (देवी), फिर “लवथवती विक्राळा” (शंकर) — ये तीनों समर्थ रामदास की रचनाएँ हैं। इसके बाद दत्ताची आरती, विठ्ठल की “युगें अठ्ठावीस” और अंत में “घालीन लोटांगण” प्रार्थना और मंत्रपुष्पांजलि।
Lavthavti Vikrala की विधि
- शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र और भस्म अर्पित करें।
- “ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जाप करें।
- घी या कपूर का दीपक जलाकर यह आरती गाएँ; गणेशोत्सव में सुखकर्ता दुःखहर्ता और दुर्गे दुर्घट भारी के बाद।
- सोमवार, श्रावण और महाशिवरात्रि पर इसे जय जय त्र्यंबकराज के साथ भी गाया जाता है।
Lavthavti Vikrala के 7 नियम
- आरती खड़े होकर, घी या कपूर के दीपक से करें और दीपक को घड़ी की दिशा में घुमाएँ।
- पहले चरणों की ओर 4 बार, नाभि की ओर 2 बार, मुख की ओर 1 बार और फिर पूरे विग्रह की 7 बार आरती उतारें।
- आरती से पहले भगवान को भोग लगाएँ, फिर आरती करें।
- आरती के समय शंख, घंटी या ताली बजाएँ — मन एकाग्र रहता है।
- आरती के बीच में उठें नहीं और बात न करें।
- आरती के बाद दोनों हाथों से आरती लें और प्रसाद बाँटें।
- उच्चारण साफ़ रखें; जल्दबाज़ी न करें, भाव से गाएँ।
लवथवती विक्राळा — शंकराची आरती के लाभ
- मान्यता है कि शिव कृपा से भय और विष (कष्ट) दूर होते हैं — जैसे नीलकंठ ने विष पिया।
- मन में राम-नाम और शिव भक्ति दोनों जागते हैं।
- परिवार में सुख और शांति रहती है।
- गणेशोत्सव की पूजा पूर्ण होती है।
सुखकर्ता दुःखहर्ता, जय जय त्र्यंबकराज और ॐ जय गंगाधर भी पढ़ें। अधिक जानकारी Wikipedia पर।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
लवथवती विक्राळा किसने लिखी?
समर्थ रामदास ने। अंतिम पंक्ति “रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं” में उनकी छाप है।
“लवथवती” का क्या अर्थ है?
मराठी में “लवथवणे” यानी थरथराना या लहराना — तांडव में शिव का विकराल रूप थरथराता है, यही वर्णन है।
“कर्पूरगौरा” का क्या अर्थ है?
कपूर जैसे गोरे — शिव का एक नाम। “कर्पूरगौरं करुणावतारं” मंत्र में भी यही विशेषण है।
शंकराची आरती कौन-कौन सी हैं?
महाराष्ट्र में दो प्रसिद्ध हैं — “लवथवती विक्राळा” (समर्थ रामदास) और “जय जय त्र्यंबकराज” (गोसावीनंदन)।